गुरुवार, अप्रैल 16, 2009

एक चर्चा कविताओं वाली

चुनाव के दिन हैं. अभाव के दिन हैं. कुछ लोगों के लिए तो प्रभाव के दिन हैं. वोट लिए जा रहे हैं. नोट दिए जा रहे हैं. संवाददाता व्यस्त हैं. एंकर मस्त हैं. विश्लेषक त्रस्त हैं. नक्सली जी अपना काम कर रहे हैं. थके-हारे नेता आराम कर रहे हैं. लोकतंत्र का पर्व है. हमें इसपर गर्व है.....

अरे! ये तो कविता टाइप हो गया. दस ग्राम शुद्ध तुकबंदी. बिना मिलावट वाली. पूरी तरह से बनावट वाली.

लेकिन ओम प्रकाश कश्यप जी के लेख में कोई तुकबंदी नहीं है. किसी को लगे तो अलग बात है. हमें तो नहीं लगी. लेख बड़ा धाराप्रवाह लिखा गया है.

वे लिखते हैं;

फत्तु उठ! जंगल-झाड़े जा. जल्दी वापस आ. हाथ-मुंह धोने में, खाने में, पीने में, नहाने और बाल संवारने में—वक्त मत चटका. सूरज उग आया? या रात है बाकी? मत देख—मत सोच. खुद को देख, अपनी भूख को देख. जीवन की बदहाली, घर की तंगहाली को देख. काम देख, काम का दाम मत देख. याद रख कि तू बंधुआ है, मालिक का गुलाम है. वह तेरा अन्नदाता है. वही तुझको खिलाता-पिलाता और जिलाता है."


किसी 'गरीब' के लिए लिखा गया है. फत्तू, जिसके लिए लिखा गया है, वो नाम से भी गरीब लगता है. केवल दो अक्षर के नाम वाला व्यक्ति. फत्तू.

वे आगे लिखते हैं;

"फत्तु, अपने पिचके हुए गालों, पैर के छालों, उभरी हुई पसलियों, निकली हुई पिंडलियों, फटी बिबाइयों और आंखों के नीचे की झाइंयों को मत देख. देखना है तो मालिक की खुशहाली को देख. सोचना है तो उसकी संपन्नता के लिए सोच. आलस छोड़. बहादुर बन. काम में लग. मत सोच कि ईंटें अभी गर्म हैं, मत सोच कि जमीन तप रही है."


पूरा लेख आप ओम प्रकाश जी के ब्लॉग पर पढें.

ओम प्रकाश जी के लेख से फत्तू के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है. लेख पढ़कर जानना आसान हो जाता है. लेकिन;

मैं क्या हूँ ? - जानना इतना आसान भी तो नहीं

जी हाँ. यह बताया है हिमांशु पाण्डेय जी ने.

वे लिखते हैं;

"अपनी कस्बाई संस्कृति में हर शाम बिजली न आने तक छत पर लेटता हूँ । अपने इस लघु जीवन की एकरस-चर्या में आकाश देख ही नहीं पाता शायद अवकाश लेकर । और फिर आकाश को भी खिड़कियों से क्या देखना । तो शाम होते ही, अंधेरा गहराते ही कमरे में बिखरी इन्वर्टर की रोशनी अपने मन में सहेज छत की ओर रुख करता हूँ । चटाई बिछाकर लेट जाता हूँ । तत्क्षण ही छत पर बिखरी निस्तब्धता पास आकर सिर सहलाने लगती है, आँखें कुछ मुँद सी जाती हैं । फिर तो झूम-झूम कर सम्मुख होती हैं अनगिनत स्मृतियाँ, कुछ धुँधली तस्वीरें, और.........न जाने किसकी सुधि जो कसकती है अन्तर में, व्यथित करती है ।"


वे आगे लिखते हैं;

"मुक्ताकाश के नीचे इस लघु शयन में एक स्वर बार-बार प्रतिध्वनित होता है इस एकाकी अन्तर में । मन का निर्वेद पिघलने लगता है । स्वर के पीछे छिपी असंख्य संभावनाओं का चेतस भाव मन को कँपाने लगता है । मैं अचानक ही अपने को ढूँढने लगता हूँ, अपने अस्तित्व की तलाश में लग जाता हूँ ।"



मुंबई की किसी गली में घूमता राजू 'केतली' हो या फिर बनारस की कस्बाई संस्कृति वाले हिमांशु जी, हर आदमी यह सवाल कभी न कभी करते ही हैं.

यह अलग बात है कि जहाँ राजू 'केतली' खुद से सवाल करता हुआ कहता होगा कि; "स्साला, कितनाईच बार अपुन सोचे कि अपुन कौन है, लेकिन बावा जवाब नहीं मिलता..." वहीँ हिमांशु जी का सवाल बनता है भारी-भरकम शब्दों से. ऐसे शब्द जिनसे 'हिंदी' जीवित है.

भाषा की बात है. शायद इसीलिए कवि ने लिखा है;

...........
...........
...........
ओ मेरी भाषा
मैं लौटता हूं तुम में
जब चुप रहते-रहते
अकड़ जाती है मेरी जीभ
दुखने लगती है
मेरी आत्मा ।

आप हिमांशु जी का लेख पढिये. और अगर अकेले रहने पर यह सवाल मन में पैदा हो तो उसे पैदा होने दीजिये. अपनी-अपनी भाखा में.

उपरोक्त दोनों लेखों को पढ़कर लगता है जैसे कविता पढ़ रहे हैं. इसलिए चलिए आज केवल कविताओं की चर्चा करते हैं.

तो इस कड़ी में पढिये कौतुक रमण जी की कविता; मुझे चाहिए एक तख्खलुस. वे लिखते हैं;

मुझे चाहिए एक तख्खलुस
इसलिए की लोग जान जाते हैं मेरा नाम
और जब किसी प्रिया का सौंदर्य वर्णन करता हूँ
सोचती है जानकार युवतियां ”कहीं ये मैं तो नहीं


कौतुक जी की मानें तो बड़े काम का है ये 'तख्खलुस'. इसको लगाकर बहुत कुछ छुपाया जा सकता है? 'तख्खलुस' क्यों चाहिए, इसके और भी कारण बताये हैं कौतुक जी ने. आप पूरी कविता उनके ब्लॉग पर पढें.

इसी कड़ी में श्री कुंवर 'बेचैन' की कविता पढिये. वे लिखते हैं;


दिन सरौता
हम सुपारी-से।

ज़िंदगी-है तश्तरी का पान
काल-घर जाता हुआ मेहमान
चार कंधों की
सवारी-से।

जन्म-अंकुर में बदलता बीज़
मृत्यु है कोई ख़रीदी चीज़
साँस वाली
रेजगारी-से।

बचपना-ज्यों सूर, कवि रसखान
है बुढ़ापा-रहिमना का ग्यान
दिन जवानी के
बिहारी-से।


महेंद्र भटनागर जी की कविता पढिये. शगुफ्ता रियाज़ जी ने हिंदी वांगमय पर छापी है. महेंद्र जी लिखते हैं;

हर आदमी
अपनी मुसीबत में
अकेला है !
यातना की राशिµसारी
मात्र उसकी है !
साँसत के क्षणों में
आदमी बिल्कुल अकेला है !
.
संकटों की रात
एकाकी बितानी है उसे,
घुप अँधेरे में
किरण उम्मीद की जगानी है उसे !
हर चोट
सहलाना उसी को है,
हर सत्य
बहलाना उसी को है !


पूरी कविता आप शगुफ्ता जी के ब्लॉग पर पढिये.

वंदना जी ने क्षणिकाएं लिखी हैं. आप पढिये. वे लिखती हैं;

मेरे इश्क की इम्तिहान तो देख
कितना टूट कर चाहा है तुझको
की तिनका तिनका बिखर गई


और भी क्षणिकाएं हैं. उनका ब्लॉग असुरक्षित नहीं है, इसलिए यहाँ नहीं दे पा रहा. आप उनके ब्लॉग पर पढिये.

रवि रतलामी जी ने स्वर्गीय माखन लाल चतुर्वेदी जी की आत्मा से क्षमा-याचना मांगते हुए कविता लिखी है. या कह सकते हैं कि कविता लिखने के बाद क्षमा-याचना माँगी है.

जूते की अभिलाषा शीर्षक वाली कविता में वे लिखते हैं;

चाह नहीं मैं नेता मंत्री के
ऊपर फेंका जाऊँ,

चाह नहीं प्रेस कान्फ्रेंस में
किसी पत्रकार को ललचाऊँ,

चाह नहीं, किसी समस्या के लिए
हे हरि, किसी के काम आऊँ

चाह नहीं, मजनूं के सिर पर,
किसी लैला से वारा जाऊँ!

मुझे पहन कर वनमाली!
उस पथ चल देना तुम,

संसद पथ पर देस लूटने
जिस पथ जावें वीर अनेक।


अब पढ़िए महेंद्र मिश्र जी की गजल. वे लिखते हैं;

दूर न किया किसी ने मेरे दिल के दर्द को
गमे दास्तां सुनाकर कुछ भी हासिल न हुआ.

मेरे खुदा प्यार का रोग किसी को भी न दे
जिंदगी को मिटाकर...इसमें जीना पड़ता है.

इस जिंदगी में रखा ही क्या है यादो के सिवा
तेरे टूटे वादों और तेरी झूठी कसमो के सिवा.

किसी से अपना दुखड़ा कह नहीं सकते है
पुराने इरादों के सिवा याद कुछ भी नहीं


इसी कड़ी में (अगर अब तक कड़ी में बंध न चुके हों तो) संजीव गौतम जी का गीत पढ़िए. वे लिखते हैं;

हर क्षण पराजय हो रही पर
जीतने का नाम है
कितना अजब संग्राम है.

इस जन्म की सौगन्ध हम
भूखे लड़े हैं भूख से.
तन में अगन, मन में अगन,
फिर भी जुड़े हैं धूप से.
खाई बनाकर पाटना,
दुख से दुखों को काटना
कितना निरर्थक काम है.
कितना अजब संग्राम है.


पूरा गीत आप उनके ब्लॉग पर पढ़िए.

निर्मल सिद्धू जी की रचना पढ़िए. वे लिखते हैं;

जैसा तुम कहो, हमें मंज़ूर है
जो भी तुम चाहो, हमें मंज़ूर है
जैसा तुम कहो.....

बैठी रहो बस यूं ही मेरे रूबरू
तेरा ही ख़्याल मुझे तेरी जुस्तजू
तेरे लिये सब, हमें मंज़ूर है
जैसा तुम कहो.....


आशीष दशोत्तर ‘अंकुर’ की एक गजल पढ़िए. विष्णु वैरागी जी ने अपने ब्लॉग पर छापी है. वे लिखते हैं;

चूल्हा-चौका, झाडू-बर्तन और हाथों की लकीरें,
बन्द कोठरी बदबू-सीलन और हाथों की लकीरें।

सास -ननदें, पति-देवर और जो भी शेष है,
सहन करती सबकी झिड़कन और हाथों की लकीरें।


और कवितायें पढ़नी हो तो नीचे दिए लिंक क्लिकियायें.

मत पूछिए

गजल गुरुवार २

प्रश्न और अर्थ

और अब आज की ब्लागरीय कविता. अविनाश वाचस्पति जी ने लिखी है. कविता की आखिरी पंक्तियाँ देखिये. वे लिखते हैं;

नाश्‍ता करने से
मरूंगा नहीं
जिए जाऊंगा
पोस्‍ट लगाऊंगा
टिप्‍पणियां पिए जाऊंगा
ब्‍लॉगवाणी पर पसंद
खूब चटकाऊंगा
उसी से उर्जा पाऊंगा।


अब लिंक कुछ और लेखों के.

गुरुदेव की कविता एकला चोलो रे...से प्रभावित कुमारी शशि पाण्डेय से मिलिए. इलाहबाद संसदीय चुनाव क्षेत्र की निर्दलीय प्रत्याशी शशि पाण्डेय जी से मिलवा रहे हैं सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी.

आरक्षण की राजनीति कहाँ तक जा सकती है, यह जानने और इसमें मीडिया के रोल के बारे में जानने के लिए पढिये डॉक्टर अमर कुमार का लेख.

उम्र के साथ मनुष्य खडूस होता है या नहीं? आज घुघूती जी ने इस बात पर विचार किया है. आप यह लेख ज़रूर पढिये.

ताऊ जी ने आज संजय बेंगाणी जी का परिचयनामा छापा है. पठनीय है.

रतन सिंह शेखावत जी ने आज दिनेश राय द्विवेदी जी से एक बातचीत छापी है. आप पढिये.

कोहिनूर भारत के बाहर कैसे गया? इसपर गगन शर्मा जी का लेख पढिये.

विष्णु प्रभाकर जी को एक श्रद्धांजलि. रचना जी की माताजी डॉक्टर मंजुलता सिंह द्बारा लिखी गई है. इंक ब्लागिंग के जरिये रचना जी ने पोस्ट किया है. बहुत बढ़िया और पठनीय लेख है.

आज के लिए बस इतना ही.

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28 टिप्‍पणियां:

  1. इस कविता प्रधान चर्चा को शिव जी के द्वारा ठेला गया देखकर मुझे आनन्द आ गया। कविता की पैरोडी करते-करते चर्चा पर उतर आए हैं तो लगता है बहुत जल्दी ओरिजिनल की ओर कदम बढ़ाने वाले हैं। ये ब्लॉगरी जो न करा दे...!

    कु.शशि पाण्डेय का लिंक देने का शुक्रिया। आज वो बहुत खुश थीं।

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  2. आज की पसंद: फत्तू और डॉक्टर अमर कुमार वाली पोस्ट.

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  3. बहुत मजेदार है आज की चर्चा.

    रामराम.

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  4. कविताओं वाली इस चर्चा में हमारा आलेख भी शामिल हुआ, धन्यवाद ।

    ताऊ द्वारा संजय बेंगाणी से बातचीत और कुँवर बेचैन की कविता का उल्लेख जरूरी था ।

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  5. बढियां काव्य सत्र रहा -धन्यवाद!

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  6. लिंक बाद में खोले जाएँगे, अभी तो कविता चर्चा की बधाई।

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  7. आब्ज़ेक्शन योर मोडरेटर, इस मुवक्किल ने आज तक ब्लागर पर कोई लेख न लिखा है,
    अतः इस पर यह मुल्ज़िमाना तोहमत श्री शिव कुमार मिश्रा जी ने जानबूझकर बदनाम करने के लिये लगाया है ।
    इनकी माँग पर मैं कविता नहीं लिख रहा हूँ, जिसकी ब्लागरीय रंज़िश यह भरे चर्चा-बाज़ार निकाल रहे हैं !

    जो लिखा सच लिखा, सच के अलावा कुछ न लिखा..
    पर आपने मेरे भेजे लिंक का उपयोग किया, भला लग रहा है !
    मैं अपने पहली तीन लाइनें वापस लेता हूँ, क्या मेरी हैसियत वरूण जित्ती भी नहीं ?

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  8. मेरे इश्क की इम्तिहान तो देख
    कितना टूट कर चाहा है तुझको
    की तिनका तिनका बिखर गई.


    .......... अच्छी लगी..

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  9. आप के आशुकवि वाला रूप से परिचय हुआ. आपकी कविता भी अच्छी रही और चर्चा लाजवाब है. -कौतुक

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  10. aap aur kavita charcha vaah achchi haen
    vishnu prabhakar ji ko shardhanjali , is ink bloging kae laekh ko padhae jarur . yahaan link uplabdh karaaya aapne thanks

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  11. कसम से---वाह!! वाह!!!

    ऐसे शब्द जिनसे 'हिंदी' जीवित है.

    एवं

    वो नाम से भी गरीब लगता है. केवल दो अक्षर के नाम वाला व्यक्ति. फत्तू.-ये दोनों पंक्तियां ही अपने आप में महाकाव्य की योग्यता रखती हैं. :)

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  12. फत्तू वह है जो पोस्ट नहीं लिख सकता। जिसपर पोस्ट लिखी जाती है और चर्चा की जा सकती है।
    फत्तू सिद्धान्त नहीं ठेलता, फत्तू पर सिद्धान्त टांगे जाते हैं। सारा साम्यवाद-समाजवाद-सामन्तवाद का सलीब उठाता है फत्तू!

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  13. हमेशा की तरह दिलचस्प चर्चा...और गयानदत्त पांडेय जी की लाजवाब टिप्पणी सोने पे सुहागा जैसी

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  14. आज की चिट्ठाचर्चा से यह तो प्रमाणित हो गया कि कविताजी वाली कविता पर चर्चा का प्रभाव अभी मिटा नहीं है। ओ माँ........:)
    >ताज़ा सूचना के अनुसार आदरणीय द्विवेदी जी ने डॊ. अमर कुमार का केस लेने का फैसला कर लिया है...फीस पर अभी फैसला होना बाकी है:)

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  15. बहुत अच्‍छी चर्चा ... बहुत सारे लिंक मिल गए।

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  16. कविता चर्चा बड़ी शानदार करी। कविता में बड़ी बरक्कत है। सबको लिखनी चाहिये।

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  17. चर्चा क़ी शुरुआत क़ी तीन लाइनो ने तो मन ही मोह लिया.. बहुत ही धाकड़..
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  18. सुन्दर..शुरुवाती लाइनों में तो लोकतंत्र का दर्शन ही समेट लिया आपने

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  19. आज का कवि‍ता-वि‍शेषांक अच्‍छा लगा।

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  20. बहुत मजेदार है कविता चर्चा....बहुत सारे लिंक मिल गए।

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  21. फत्‍तु फत्‍तू ही रहेगा

    और क्‍या फटेगा।

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  22. हमने कविता करना कम किया और आप कविताओं पर लिखने लगे। फिर से कविताएँ लिखनी पड़ेंगी।
    घुघूती बासूती

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  23. बहुत सुन्दर चर्चा . सभी को शुभकामनायें.

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  24. कविताओ पर बहुत अच्छी चर्चा की है।बधाई।

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