रविवार, अप्रैल 26, 2009

मिलिए, दिल्ली हंसोड़ दंगल चैम्पियन से...

चलिए, इस चर्चा में कुछ अत्यल्प या अचर्चित से चिट्ठों की चर्चा करते हैं. अचर्चित इसलिए भी कि इनमें बहुत से चिट्ठे मूलत: अंग्रेजी में हैं, परंतु इनमें इक्का दुक्का प्रविष्टियाँ हिन्दी में भी हैं. हम इन्हीं हिन्दी प्रविष्टियों की चर्चा करेंगे.

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अजयेन्द्र राजन – ‘दोस्तों का दोस्त’ बढ़िया तस्वीरें छांटकर दिखाते हैं. तस्वीरों से ज्यादा बढ़िया तस्वीरों के शीर्षक या उनके वर्णन होते हैं. जैसे कि उनकी पोस्ट – जिंदगी मौत न बन जाए संभालो यारों से लिया गया ये चित्र:

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….,

मेरे गीत के गीतकार गोदियाल ने अपने प्रोफ़ाइल में लिखा है –

मेरी आंतरिक इच्छा है कि मैं लोगों को मुझसे भी अच्छा लिखने हेतु प्रेरित कर सकूं...

और फिर वे अपने आप से पूछते हैं –

तू सच क्यों बोलता है ?

छल और कपट है जिस जग में

अंहकार भरा हर रग-रग में !

उस जगत की सब चीजों को तू

एक तराजू में ही क्यों तोलता है ?

झूठ-फरेब भरी इस दुनिया में

गोदियाल, तू सच क्यों बोलता है ?

जहां कदम-कदम पर मिथ्या धोखे

बंद हो गए सब सत्य झरोखे !

वहाँ इंसान को आज भला तू

अपने भाव से ही क्यों मोलता है ?

झूठ-फरेब भरी इस दुनिया में

गोदियाल, तू सच क्यों बोलता है ?

--.

जेन हिन्दी सीख रही है. कम से कम उनके चिट्ठे की इस प्रविष्टि से तो यही लगता है –

http://lerite.livejournal.com/712247.html?view=2064951#t2064951

मैँ सोना चहती हुँ, लेकिन भी Dungeons and Dragons खेलना चाहती हुँ ।

मैं ने देवनागरी keyboard setting को मिलता है । माजेदार है, लेकिन शबध लेखना मुशकिल है ।

मेरा नाम एलिजबेथ जेन है । मुझे सोना पसांद है । मैं खाना बनाना नाहीँ सकती हुँ । मैं खाना बनाना सकना चहाती हुँ । मुझे मेरे पती को बहुत महातविपुरन हैं ।

मैं टीख हुँ ।

- एलिजाबेथ जेन

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मल्लिका शेरावत भी ब्लॉग लिखती हैं? ये शायद कोई और मल्लिका हैं.

संदीप कोठारी फैन क्लब की! और, पोस्ट तो बड़ा गंभीर है -

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http://sandeepkotharithepoet.blogspot.com/2009/04/blog-post_20.html

सृष्टि का सार

रंगों की मृगतृष्णा कहीं

डरती है कैनवस की उस सादगी से

जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं

जो कुछ रचे जाने के लिये

नष्ट होने को है तैयार।।

स्वीकार्य है उसे मेरी,

काँपती उंगलियों की अस्थिरता

मेरे अपरिपक्व अर्थों की मान्यतायें

मेरे अस्प्ष्ट भावों का विकार॥

- मल्लिका शेरावत

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बहुभाषी ब्लॉगर संकेत बारोट हिन्दी में भी ब्लॉग लिखते हैं. हिन्दी कुछ-कुछ गुजराती मिश्रित स्थानीय पुट लिए हुए है -

http://loveablepoet.blogspot.com/2009/04/blog-post_3725.html

शहर की इस दौड़ में दोड़ के करना क्या है..?

गर यही जीना है तो फिर मरना क्या है...!!?

पहली बारिश में ट्रेन लेट होने की फ़िक्र है...,

भूल गए भीगते हुए टेहेलना क्या है..!!

सीरियल के किरदारों का सारा हाल है मालुम..,

पर माँ का हाल पूछने की फुर्सद कहा है..!!

अब रेत पे नंगे पाँव टहलते क्यों नहीं..?

१०८ है चैनल पर दिल बहेलते क्यों नहीं..??

इन्टरनेट से दुनिया के तो टच में है..,

लेकिन पड़ोस में कौन रहता है जानते तक नहीं..!!

संकेत बारोट का गुजराती ब्लॉग भी है. एक प्रविष्टि का आनंद देवनागरी लिपि में लें :

आ मानवी

आ मानवी केवो निष्ठुर छे

बोले छे कांई, विचारे छे कांई,

अने करे छे कांई

विचारे छे कपटी छुं केटलो

कोण जुए छे हृदय मांही

आ मानवी...

संबंधोमां शोधे छे फायदा

धंधामां करे छे वायदा

अने रोज नवा करे छे तायफा

आ मानवी...

पैसाथी तोले छे संबंधोने

खोट जाय तो तोडे छे संबंधोने

संबंधोनो वेपार करी लीधो

आ मानवी...

चहेरा पर खंधु स્मित

अने हृदयमांही शकुनि झरतो

लालच अने कपटने साथ राखतो

ईश्वर ने बदनाम करी दीधो

आ मानवी...

(गुजराती लिपि से देवनागरी परिवर्तन – इंडीनेटर द्वारा)

संकेत बारोट का एक तकनीकी ब्लॉग अंग्रेज़ी में भी है. एक प्रविष्टि (http://jmdcomputer.blogspot.com/2009/03/folder-lock-without-any-software.html ) में वे आसानी से फोल्डर लॉक करने की विधि बता रहे हैं.

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मोहम्मद अली वफा का बहु-भाषी ब्लॉग – बागे वफा शेरो-शायरी से भरपूर है. आप उर्दू तथा हिन्दी दोनों लिपि में नामी ग़ज़कारों के मशहूर ग़ज़लों का संग्रह कर रहे हैं. अहमद फराज की ग़ज़ल नोश फरमाएँ -

हुई है शाम__अहमद फराज़

हुई है शाम तो आँखों में बस गया फिर तू

कहाँ गया है मेरे शहर के मुसाफ़िर तू

बहुत उदास है इक शख़्स तेरे जाने से

जो हो सके तो चला आ उसी की ख़ातिर तू

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अब मिलिए दिल्ली हंसोड़ दंगल चैम्पियन से. आपका प्रोफ़ाइल कुछ यूं है –

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About Me

Dr.T.S. Daral

medical doctor, nuclear medicine physician,gold medal for research on ORS- the jeevan rakshak ghol,extensive study of epidemic dropsy- a disease caused by consumtion of contaminated mustard oil- devised a diagnostic critera for the disease- first of its kind-led to presentation of STATE AWARD by the govt. of GNCT in 2008. I believe in living the life to the fullest.Life is too short to waste it in petty issues.My mantra in life is-Hanste raho,hansate raho.Jo log hanste hain, voh apna tanav door karte hain,jo hansate hain voh doosron ke tanav bhagate hain.yahi junoon mujhe le gaya DELHI AAJ TAK in Dec.2007 to become DELHI HANSOD DANGAL CHAMPION.apne aas paas ghatit hone wali ghatnaon se prabhavit hokar likhta hun aur hasya-vyang ke jariye apne udgar prakat karta hun.

हम्म... इतने इम्प्रेसिव प्रोफ़ाइल के हंसोड़ डाक्टर ने ऐसा पोस्ट लिखा है कि पाठक पेट पकड़ कर हँस रहे हैं –

आज सोचा तो ---

वो उसके दिल का राजा था, वो उसके दिल की रानी थी।

शिरी फरहाद से ऊंची, उनकी प्रेम कहानी थी।

वो उसको छोड़ कर भागा कोई तो थी ये मजबूरी ,

उस चाँद पे था दाग फ़िजा, तुझ पे खिजा तो आनी थी।

----.

कुमारअमृत पर अंकित यूं तो अंग्रेज़ी में पोस्टें लिखते हैं, परंतु उन्होंने राजनीति पर कुछ सुविचार संकलित किए –

राजनीति

"पॉलीटिक्स" दो शब्द- पॉली और टिक्स से बना है। ‘पॉली’ का अर्थ बहुत और ‘टिक्स’ का मतलब खून चूसनेवाला परजीवी (पैरासाइट)।

- लैरी हार्डिमैन

सब कुछ बदल गया है। लोग हास्य-अभिनेता को गंभीरता से लेते हैं और राजनेता को मजाक में।

- विल रोजर्स

राजनीति में हिस्सा नहीं लेने का यह खामियाजा भुगतना पड़ता है कि आपको घटिया लोगों के हाथों शासित होना पड़ता है।

- प्लेटो

बल का सीधा प्रयोग किसी समस्या का इतना कमजोर समाधान होता है कि इसे छोटे बच्चे और बड़े देश ही अपने प्रयोग में लाते हैं।

- डेविड फ्रायडमेन।

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राम मैरी और अल्ला सब एक हैं फिर क्यों करते हो हल्ला – इस टैगलाइन वाले चिट्ठे की चिट्ठाकारा रिना56 के अनुसार संसार की परिभाषा कुछ यूं है

सागर के इस पार

सोच रही हूँ,कहाँ है भिन्नता

यह ही है तकरार

जाना तो है सबको एक जगह

न कर भाई इंकार

येहीं पर है, सबका क्रीडांगन

अलग नहीं है, यह संसार

----.

अंग्रेजी में चिट्ठा लिखने वाले विशाल अपने पिता द्वारा अग्रेषित हिन्दी के ईमेल फारवर्ड कारपोरेट गीता को साझा करते हैं –

हे पार्थ !! (कर्मचारी),

इनक्रीमेंट अच्छा नहीं हुआ, बुरा हुआ…

इनसेंटिव नहीं मिला, ये भी बुरा हुआ…

वेतन में कटौती हो रही है बुरा हो रहा है, …..

तुम पिछले इनसेंटिव ना मिलने का पश्चाताप ना करो,

तुम अगले इनसेंटिव की चिंता भी मत करो,

बस अपने वेतन में संतुष्ट रहो….

तुम्हारी जेब से क्या गया,जो रोते हो?

जो आया था सब यहीं से आया था…

तुम जब नही थे, तब भी ये कंपनी चल रही थी,

तुम जब नहीं होगे, तब भी चलेगी,

--- (>>आगे पढ़ें)

----.

लास्ट इन स्पेस में अपनी पुत्री शैलजा के लिए उनकी मां प्रोमिला सरस्वती लिखती हैं -

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(शैलजा)

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(शैलजा और उनकी माता जी)

मेरी बेटी

जो नन्हे हाथ जरा चोट लगने पर

आकर सिमट जाते थे मेरी बाँहों में

पता ही नही चला कब थाम लिया

उन्ही हाथों ने मेरा हाथ

जब में थी अकेली असहाय एस संसर में

पता ही नही चला कब इस मासूम ने

---.

उद्गार.इन पर सुधांशु गुप्ता अपने सीनियर्स को याद कर रहे हैं. लगता है सुधांशु को बढ़िया सीनियर्स मिले. भगवान सभी विद्यार्थियों को ऐसे ही सीनियर्स दें.

हमारे सीनियर्स के लिए………. बी.टेक. की यादें !

राह देखी थी इस दिन की कबसे,

आगे के सपने सजा रखे थे ना जाने कब से .

बड़े उतावले थे यहाँ से जाने को ,

ज़िन्दगी का अगला पडाव् पाने को .

पर ना जाने क्यों …दिल में आज कुछ और आता है ,

वक़्त को रोकने का जी चाहता है .

जिन बातों को लेकर रोते थे, आज उन पर हंसी आती है ,

न जाने क्यों आज उन पलों की याद बहुत आती है .

….,

अभय डेविड फ्रॉस्ट के बारे में मालूमात करते हुए बताते हैं कि कोई भी व्यक्ति विज्ञान की दुनिया में तमाम बातें कभी भी नहीं जान सकता. उसकी उतनी क्षमता ही नहीं है. इसी बात को वे अपनी एक विज्ञान कविता में बताते हैं –

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(अभय)

विज्ञान के धरातलों पर घूमता फिरा हूं मै

रसायनों के चक्करों में था कभी

कम्प्यूटरों की भूमि में भटका भी था

और कभी कैंसर ने घसीटा अपनी खोज में

भौतिकी यंत्रों का मै कायल रहा

और भी कितने ही विषय विज्ञान के

है आज भी मुझको निमंत्रण दे रहे

सोचता हूं और समझता भी हूं मै इस अपवाद को

हो नही सकता है कोई विश्व के विज्ञान में

भेद सारे जान पाये विश्व के विज्ञान के

है कठिन पथ खोज का सब जानते हैं

फिर भी जो इसमें रमें सब मानते हैं

इससे बढकर है नही आनंद कोई विश्व में

ज्ञान की सीमा बढाना हे अभय

---.

लगता है चर्चा कुछ ज्यादा ही लम्बी हो गई, जबकि ऐसे अचर्चित चिट्ठों की तो कतारें लगी हैं. चलिए, उनमें से कुछेक की चर्चा करेंगे अगले हफ़्ते.

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9 टिप्‍पणियां:

  1. मिलिए, दिल्ली हंसोड़ दंगल चैम्पियन से...
    चिट्ठा चर्चा अच्छी रही।

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  2. निःसंदेह आज की यह चर्चा अपने आपमें बहुत अच्छी है..
    पर, कहीं स्पष्ट चर्चा-नीति के अभाव में, यह नित नये प्रयोगों की बलि तो नहीं चढ़ती जा रही है ?

    और रहा अचर्चित पोस्ट एवं ब्लाग की बात .. तो
    " एक कर्मचारी का विदाई समारोह "
    भी देखने योग्य है..

    चमक रहा है उसकी आंखों का
    खालीपन

    सेवाकाल के अंत पर आयोजित उत्सव में
    बुलाया गया है
    संगमरमरी सीढ़ियों
    कालीनों बिछे गलियारों से
    लकदक सुसज्जित सभ्य-सभागार में
    लाया गया है

    चकित चैधियायी आंखों से अपनी ही
    देख रहा है वह
    बधस्थल पर लाए गए बकरे-सा
    होता हुआ अपना ही अभिनन्दन
    अपने ही जीवन में
    पहली और अंतिम बार
    इस प्रकार!

    दौड़ती हुई हाफती सी जिंदगी की दौड़ से
    बाहर कर दिया गया है उसे आज ही दिसम्बर की इस
    इकतीसवीं तारीख को
    ‘आफटरनून से’

    कर दिया गया है रिटायर

    सेवा काल का यह अंतिम प्रहर
    प्रारम्भ है नए दुःस्वप्न का
    खोल दी गई है लगाम
    निकाल लिए गए हैं खुरों में ठुके नाल
    और हांक दिया गया है चटियल रेगिस्तान में
    आजाद कर दिया गया है
    देस की बघ्घी में नधा यह घोड़ा
    जीवन के उत्तर-काल में
    निहत्था बना कर छोड़ दिया गया है
    जबकि युद्ध अभी अधूरा है
    और उसके पखुरे ढीले पड़ गए हैं
    ढीली पड़ गई है धमनियां
    दुह उठी हैं
    गुजिस्ता पैंतीस वर्षो तक वफादारी
    ईमानदारी की तवारीख लिखते लिखते
    जर्जर हो उठे हैं
    उसकी जिन्दगी के पन्ने

    बिला गया उसका जीवन
    ‘सर्विस पुस्तिका’ और गोपनीय रिपोटों
    का बेदाग स्वाभिमान ढोते ढोते!

    विदाई के दुख से
    प्रशन्न होने का
    अपनी ही रची दुनिया से बेगाना
    कर दिए जाने का
    कैसा
    कातर क्षण है
    यह अपने ही जीवन को
    अमिट इतिहास में बदलता हुआ
    देखने का ?

    बखान के चैतरफा शोर से आक्रांत उसे
    जिस समादृत आसन पर
    बैठाया गया है--सर्वोच्च ईश्वर के प्रभावलय के
    ठीक स्पर्श-विन्दु पर
    सिंह के अयाल के इतने करीब होने के सुख और डर के बीच
    आत्म-चकित है वह

    अनघटा अटपटा अनुभव यह रोमांचक कितना
    कातर बना रहा है उसे
    कितना कृतज्ञ !
    पैंतीस वर्षों का चिर प्रतीक्षित
    पुरस्कार यह मौखिक
    महोच्चार !

    फहराई जा रही है
    उसकी कीर्ति की पताका
    खोखले शब्दों के फूल झर रहे हैं सभाकक्ष में
    भरा जा रहा है भावनाओं का अकिंचन कटोरा
    सद्वचनों के चिल्लर सिक्कों से
    उसके जीवन में पहली और
    अंतिम बार

    मैं देख रहा था कि
    उसके भीतर की उदासी की
    धूसर रेत को भिगोती
    बेगानी प्रशंसाओे की बौछारों नें
    उसे असुविधा में डाल दिया है
    रोना चाहता है जार जार

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  3. विविध आयाम लिए इस चर्चा के लिए धन्यवाद। अहमद फराज़ की रचना पढकर क्या कोई हिंदी और उर्दू का भेद बता सकता- क्या यह रचना किसी ‘हिंदी’जीवी की समझ से परे है? यदि नहीं, तो भाषा की इस दूरी को मिटाना ही होगा।
    > डॊ. अमर जी कि इस टिप्पणी - "पर, कहीं स्पष्ट चर्चा-नीति के अभाव में, यह नित नये प्रयोगों की बलि तो नहीं चढ़ती जा रही है ?" पर मतभेद हो सकता है। अंग्रेज़ी की वो कहावत है ना--
    VARIETY IS THE SPICE OF LIFE :)

    उत्तर देंहटाएं
  4. रवि रतलामी का स्वागत है! चलिये आज ईद के चांद का दर्शन हो ही गया.

    इस नवीन आयाम के चर्चा के लिये आभार.

    पाठकों की खातिर जरा चर्चा की अपनी आवृत्ति बढा दें तो अच्छा होगा!!

    सस्नेह -- शास्त्री

    उत्तर देंहटाएं
  5. रवि जी की यह कविता

    बहुत अच्‍छी और यूनिक है

    बधाई

    इसके अगले अंश की

    भी रहेगी प्रतीक्षा

    हिन्‍दी के विकास
    की यहीं तो दौड़
    रही है रिक्‍शा।

    उत्तर देंहटाएं
  6. रवि भाई महिने में एक चर्चा इस तरह की आप करते रहें, अवश्य।

    उत्तर देंहटाएं

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