शुक्रवार, अप्रैल 24, 2009

जो "आज की पसन्द" पर टकटकी लगाए नही खड़े हैं

हिन्दी लिखने ,पढने , जीने वालों की हमेशा से यह एक दिक्कत रही है कि वे हमेशा से एक चौपालनुमा स्पेस गढते रहना चाहते हैं। जहाँ घर-बार ,नौकरी ,बाल-बच्चे की चिंता घरवालियों पर छोड़कर , चन्द पगड़ीधारी , चारपाइयाँ बिछा -बिछा कर  इस गली के उस नम्बर वाले की ऐसी तैसी करते हैं या फलाने नमबर वाली की खिड़की के भीतर ताक झांक करते हुए कमेंटियाते रहते हैं।इस समाज सेवा की आदत से हिन्दी की सेवा तो क्या खाक होती है , बस इतना भर होता है कि चारपाई पर विराजमान रहने वाले सरपंची के स्वभाव मे आवाज़ उठा उठा कर एक दिन गली-कूचे  के दादा हो जाते हैं।

खैर, हिन्दी ब्लॉगिंग अपने इस चौपाल-चर्चा ,चारपाई-टॉक की आदत  के कारण भी विशिष्ट तो  है।फिलहाल आज मै ऐसे ब्लॉग ढूंढने की कोशिश मे हूँ जिनका ब्लॉग दूसरों के पढे जाने और स्वीकृत सहमत होने के इंतज़ार मे"आज की पसन्द " पर टकटकी लगाकर नही खड़ा है।जिसे फर्क नही पड़ता कि कौन उसे पढने, सराहने या गाली देने आएगा।और दुर्भाग्य से ब्लॉगिंग की इस मूल फितरत से मेल खाते ब्लॉग हिन्दी मे उंगली पर गिने जा सकने के ही काबिल हैं।

ऐसा ही एक ब्लॉग है जिसे मै पढती आई हूँ , कभी शायद ही कमेंटियाई हूँ - अखाड़े का उदास मुदगर।यहाँ टैगलाइन है- प्यार की 100 मुश्किल कहानियों के बाद लगता है कि एक दिन बाकी 463 भी पूरी हो जाएंगी.. नफरत की कहानियों का कोई नंबर नहीं।
वाकई प्यार की कहानियाँ लिखना एक मुश्किल काम है वह भी ऐसी प्रेम कहानियाँ जो अपने कथ्य-शिल्प मे प्रेम की बहुप्रचारित ग्लैमरपूर्ण छवि से कदापि मेल नही खातीं।सूरज का सातवाँ घोड़ा पढते हुए बार बार यही अहसास होता है कि प्रेम कोई दैवीय लोक की चीज़ नही है वह इसी संसार -जिसमे भूख,लाचारी,कपट,आर्थिक विषमताएँ हैं ,के बीच जन्मता है और बमुश्किल ही फलता फूलता है या नही भी फलता फूलता है।विशुद्ध प्रेम जैसा यहाँ इस ब्लॉग की किसी कहानी मे भी नही दीखता।
यहाँ एक पोस्ट की शुरुआत मे लिखा गया है - लिखना हम सबके अकेले होने की निशानी है. और अच्छा लिखना बहुत अकेले होने की।
भीड़ जुटाने ,तालियाम बजवाने की कि - 'वाह ! क्या धोया ! 'की और यह कहलवाने की मंशा कि मेरा विचार सर्वोत्तम है शायद ही ब्लॉगिंग के लिए हितकारी हो ।
इससे परे एक ब्लॉग और दिखता है - अनुराग आर्या का।इसी की तर्ज़ पर आज कुश की भी कलम चल निकली।ब्लॉगिंग का यह डायरीनुमा स्टाइल खास भाता है।एक बार को धोखा हुआ था कि अनुराग को ही पढ रहे हैं। फिर खुशी हुई कि वाह ! आज कुश ने अपने बचपन की यादों का पिटारा खोला है- ज़िन्दगी अब पुरानी जींस लगती है। 

ये सब्जी मुझे अच्छी नहीं लगती मैं नहीं खाऊँगा.. और मम्मी दूसरी सब्जी बना देती थी.. और अब अगर चावल
कच्चे भी हो तो मैं खा लेता हूँ सोचता हु इतनी गर्मी में दोबोरा कौन एक सी टी और लगायेगा.. 
झंकार बीट्स फ़िल्म का एक डायलोग है... ' दुनिया गोल है और हर पाप का एक डबल रोल है '
मम्मी के खाना बनाते वक़्त मैंने कभी मम्मी के सर पर जमी पसीने की बूंदों पर गौर नहीं किया.. 
सोचता हूँकितनी बार मैंने कहा होगा खाना अच्छा नहीं बना.. कितनी बार मैंने थाली में खाना छोडा होगा.. 
अब मम्मी तोखाना बनाती नहीं है पर जब भी घर जाता हूँ भाभी के बनाये खाने की जम कर तारीफ़ करता हूँ.
मैं उनके लिएइतना तो कर ही सकता हूँ..
 
कुश की डायरी के ये पन्ने किसी स्त्री विमर्श से जा जुड़ेंगे शायद कुश ने सोचा न होगा पर इस स्वीकारोक्ति को चोखेरबाली मे संग्रह कर लिया जाना चाहिए।
ऐसे ही पिछली पोस्ट है - जिंदगी कब लाईफ बन गयी पता ही नहीं चलापहले हम इससे खेलते थे अब ये हमसे खेलती है.. ज़िन्दगी का फेवरेट गेम छुपम छुपाई.।यूँ उन्होने स्वीकारा ही है कि कुछ स्टाइल अनुराग जी से उधार लिया है :) 
फिर भी बहुत खूब  !!

लिखना और लिखते लिखते खुद को पाना-पहचानना , यही ब्लॉग की असली ताकत है जो लगातार क्षीण हो रही है क्योंकि हर चिट्ठा अपनी छवि बना और उसमे कैद हो रहा है।आज़ादी का माध्यम जेल हो रहा है।दूसरे की ओर देख कर लिखने की प्रवृत्ति बढती जा रही है।

मै कौन हूँ का प्रश्न ब्लॉग के लेखन की मूल प्रेरणा नही रह पाई है।मेरे लिखने की उपयोगिता क्या हो  यहकोई स्वयम ही कैसे तय करके चिपका सकता है पाठको पर। यह तय करना इतिहास के हाथों छोड़ देना चाहिए।लगातार अपने लघुता को स्वीकार करके लिखने वाला लेखक ही बड़ा लेखक हो सकता है।
शब्दों का सफर भी इसी तरह जारी है।और आज तो पूरी कचौरी की कहानी के साथ।

पूरी के मूल में है संस्कृत धातु पूर् जिसमें समाने, भरने, का भाव है। इससे ही बना है पूर्ण शब्द जिसका अर्थ होता है भरना, संतुष्ट होना। समझा जा सकता है कि सम्पूर्णता में ही संतोष और संतुष्टि है। व्यंजन के रूप में पूरी नाम के पीछे उसका पूर्ण आकार नहीं बल्कि उसकी स्टफिंग से हैं। गौरतलब है की आमतौर पर बनाई जाने वाली पूरी के अंदर कोई भरावन नहीं होती है जबकि पूरी या पूरिका से अभिप्राय ऐसे खाद्य पदार्थ से ही है जो भरावन से बनाया गया है। पूरी बनाने के लिए आटे या मैदे की लोई में गढ़ा बनाया जाता है और फिर उसे मसाले से पूरा जाता है। यही है पूरना। इस तरह पूरने की क्रिया से बनती है


एक डायरीनुमा पोस्ट यह भी - असमंजस , क्या हम सही हैं?


ब्लॉगिंग मे किसी लेखक की पहचान उसके लेखन के स्टाइल और कथ्य से ही बनती है यह बार बार स्वीकारा जा चुका।इसमे भी खास बात यह कि निजता का संस्पर्श किसी ब्लॉग को पढने का सबसे बड़ा आकर्षण है।यह डायरीनुमा लेखन , निजता का संस्पर्श जितना ही अधिक होगा हिन्दी के संसार मे उतना की बेहतर होगा।

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14 टिप्‍पणियां:

  1. bikul alag andaaj mein likhee gayee anokhee charchaa, aapke mijaj aur shailee ke anuroop hai. achha laga.

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  2. बहुत सटीक चर्चा। और हो सकता है कि इस पर टिप्पणियाँ कम ही आएँ क्योंकि चौपाल पर बैठ कर इधर-की उधर करने वाले बहुत हैं यहाँ ।

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  3. यह भी ठीक है अच्छी रही चर्चा

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  4. सही परिभाषित कर छोड़ा है-अच्छा लगा.

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  5. आपके अन्दाज़े बयाँ ने हमेशा मोहित किया है, बहुत कम लोग इस तरह लिख पाते हैं..आज की चर्चा मे एक ब्लॉग हमारे लिए नया है जिसे पढने जा रहे है..शुक्रिया

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  6. बहुत बढ़िया चर्चा.

    अनुराग जी का लेखन अद्भुत है. कुश और अनुराग जी के लेखन के हम भी फैन हैं. कारण यही है कि निजता का संस्पर्श उनके लेखन को अलग बनाता है.

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  7. ब्लागिंग तो डायरीलेखन ही नहीं , कुछ और भी है
    चर्चा, घरों में तांक-झांक का चौपाल ही नहीं, कुछ और भी है
    ब्लागर को सरपंच या गली का दादा समझो, तो ये हक है तुमको
    मेरी बात और है, मैं ने तो केवल कमेंट की है :)
    [साहिर से क्षमा मांगते हुए]

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  8. पर.. यदि " यह हम सबके अकेले होने की निशानी है " तो,
    लेखन का कच्चा माल कहाँ सेंध लगा कर लाया जाय,
    या किसी लेखन में प्रतिबिम्ब किसका दिखता है ?
    मैं तो अपना कच्चा माल इसी समाज से लूट कर लाता हूँ, और बाकी आप लोग ?

    समाज और कुटुम्ब से कट कर अलग थलग पड़ा एकल लेखक
    साहित्य तो क्या एक पत्र तक लिखने का मोहताज़ बना रहेगा ।
    मुगदर जी से कई बार सामना हुआ है , आगे भी होता रहेगा
    पर यह टैग लाइन अपने अनोखेपन के लिये ही रची गयी होगी ।

    2 घँटे पहले क्लिनिक में भी समय निकाल कर देख ली थी यह चर्चा ,
    किसी स्वभाव में आवाज़ उठाने की मँशा तो नहीं है..
    यह सोचा कि असहमत रहना ही, कहीं मेरी नियति न बन जाये
    सो बिना कुछ लिखे लौट गया था

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  9. "...इसमे भी खास बात यह कि निजता का संस्पर्श किसी ब्लॉग को पढने का सबसे बड़ा आकर्षण है..."
    पूर्णतः सहमत हूँ आपसे

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  10. नोटपैड बहना,
    ये चिट्ठाचर्चा, अब तक की
    चर्चाओं का गहना...
    साभार
    अजितभाई भोपाली

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  11. अच्छी चर्चा। निजता का संस्पर्श किसी ब्लॉग को पढने का सबसे बड़ा आकर्षण है।यह डायरीनुमा लेखन , निजता का संस्पर्श जितना ही अधिक होगा हिन्दी के संसार मे उतना की बेहतर होगा। पढ़कर अच्छा लगा।

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  12. थोडा समय हो गया अजगर को अपनी शकल देखे हुए भी, पर जब उठा हूँ तो यकायक इस लिंक तक आया.
    आपने जिक्र करने के लायक समझा, इसका शुक्रगुजार हूँ दस महीने बाद भी.

    आस्तीन का अजगर
    sinning was the best part of repentence
    अखाड़े का उदास मुगदर (www.kataksh.blogspot.com)

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