मंगलवार, अप्रैल 28, 2009

पुस्तक चर्चा, टिप्पणी चर्चा

कल पुस्तकचर्चा के अंतर्गत दो पोस्टें छूट गयीं थीं। एक पुस्तक की चर्चा नीरज गोस्वामीजी ने की थी। उन्होंने राजेश रेड्डी के गजल संग्रह उड़ान का जिक्र करने से पहले राजेश रेड्डी के बारे में जानकारी दी! येल्लो भैया नीरजजी भी तालेबाज हो गये। आप उनके ब्लाग पर ही आगे की पुस्तक चर्चा बांच लीजिये। हम न खुटखुटाने वाले अब आगे।


मार्कोपोलो का सफ़रनामा
दूसरी पुस्तक की चर्चा अजित वडनेरकर के ब्लाग पर हुई। मार्कोपोलो का सफ़रनामा किताब का जिक्र करते हुये उन्होंने पहले मंगोलों के बारे में बताया:
वे लोग दस दिन बिना खाना खाए घुड़सवारी करते रहते थे और अपनी शारीरिक शक्ति बनाये रखने की लिए घोड़े की कोई नस खोल कर खून की धार को अपने मुंह मे छोड़ देते। मंगोल सैनिकों की इसी शारीरिक शक्ति ने उन्हें संसार का सबसे बड़ा अर्धांश जीतने में सहायता दी। असली मंगोल लोग इसी तरह की होते थे।



अबीर
सन्मार्ग प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित इस किताब के मूल लेखक मॉरिस कॉलिस और अनुवादक उदयकांत पाठक हैं। यह पुस्तक चर्चा की है पंद्रह वर्षीय अबीर ने जो भोपाल के केन्द्रीय विद्यालय में 11वीं कक्षा के छात्र हैं। इतिहास, भूगोल में बहुत दिलचस्पी रखते हैं। मानचित्र-पर्यटन के शौकीन हैं। पिछले दिनों हमारे संग्रह से मार्को पोलो पुस्तक इन्होंने पढ़ी तो अजितजी ने उनसे समीक्षा झटक ली। आशा है अबीर आगे भी इस तरह की समीक्षायें लिखते रहेंगे।


मार्कोपोलों के बारे में जानकारी देते हुये अबीर लिखते हैं:

मार्कोपोलो की इस यात्रा का प्रारंभ 1271 में सत्रह वर्ष की उम्र में होता है। वेनिस से शुरू हुई उसकी यात्रा में वह कुस्तुन्तुनिया से वोल्गा तट, वहां से सीरिया, फारस, कराकोरम, कराकोरम से उत्तर की ओर बुखारा से होते हुए मध्य एशिया में स्टेपी के मैदानी से गुज़रकर पीकिंग पहुंचता है, जहां उसके पिता और चाचा कुबलाई खां के दरबार में अधिकारी हैं। इस पूरी यात्रा में साढ़े तीन वर्ष लग जाते हैं और इस अवधि में वह मंगोल भाषा सीख लेता है।


अजितजी के ब्लाग की साज-सज्जा देखकर दिल खुश हो जाता है। सर्वांग सुन्दर ब्लाग। आज तो वे गोलगप्पे खिला रहे हैं जी लपक लें।

कल काफ़ी टिप्पणी चिंतन हुआ। आज कुछ झलक और देख लें जी। कबाड़खाना हिंदी ब्लाग जगत के बेहतरीन ब्लागों में से एक है। इसके माध्यम से हमें अपनी भाषा में संसार के बेहतरीन लेखन की जानकारी मिलती रहती है। पिछले दिनों कुछ अशोभनीय टिप्पणियों के चलते अशोक पाण्डेयजी ने इस पर कमेंट माडरेशन चालू किया। शिरीष कुमार मौर्य का इस पर कहना था:
सही समय पर लिया गया एक बिलकुल सही फैसला. कबाड़खाने का सदस्य होने के नाते मैं भी पिछले कुछ समय से चाह रहा था कि हम इस बारे में कोई ठोस क़दम उठाएं. हमारे ब्लॉग की गरिमा हमारे लिए सर्वोपरि है और कबाड़खाना की ब्लॉगजगत में क्या हैसियत है, इसे कौन नहीं जानता ! आपके इस निर्णय का मैं स्वागत करता हूँ.

कल शिरीषजी ने कबाड़खाना पर अपनी पोस्ट में लिखा :
पिछली पोस्ट पर मेरी टिप्पणी पर मुनीश जी की इस टिप्पणी और इसके प्रकाशन पर मैं कबाड़खाना छोड़ रहा हूँ। उम्मीद है मेरे इस फैसले से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। ये एक मूर्ख की विदाई है ! इसे इससे ज़्यादा कुछ न समझें ! सभी दोस्तों से मुआफी !

मेरी टिप्पणी : समकालीन हिन्दी साहित्य संसार के लिए ये सपनों सरीखी बातें हैं। बहुत बढ़िया पोस्ट- बहुत बढ़िया सपना ! "सपनों के सौदागर" ! मुझे लगता है कई सालों से प्रकाशित हो रही ये किताब इस साल पुस्तक मेले में आ जाएगी।
मुनीश जी की टिप्पणी : Some of them may be ur friends , but i feel the most unwanted people in the realm of literature are none but critics! Who are they to instruct people what to read and what not to! This 'kaum' has strangulated many a budding talent in the spring of their lives . Not everyone had the nerves of steel like Marquez.


शिरीषजी ने बाद में अपने ब्लाग पर भी कबाड़खाना छोड़ने की सूचना दी।

मुनीश ने अपनी सफ़ाई देते हुये कहा कि वे शिरीष के निर्णय से हतप्रभ हैं। नीरज रोहिल्ला ने भी लिखा- Good for you. Although, I didn't see how the comment was offensive

सच तो यह है कि मुझे भी यह समझ में नहीं आया कि मुनीश की टिप्पणी में आहत होने की कौन सी बात थी। लेकिन शिरीष जी संवेदनशील हैं उन्हें जो बात बुरी लगी होगी शायद उस तक मेरी पहुंच ही न हो। मुझे एक बार फ़िर ब्लाग माडरेटर की बेचारी स्थिति का एहसास हुआ। अशोक पाण्डेयजी ने मुनीश की टिप्पणी प्रकाशित कर दी शायद उनको उसमें कोई असहज बात नहीं लगी होगी। लेकिन शिरीष को खराब लगा और वे अशोक पाण्डेयजी से खफ़ा होकर कबाड़खाना छोड़ गये।

हालांकि यह अशोक पाण्डेयजी और शिरीष के बीच की बात है और इस बारे में मेरा कुछ कहना सही नहीं लगता लेकिन आम पाठक की हैसियत से मुझे कि शिरीष जी का निर्णय उचित नहीं लगता। एक टिप्पणी से आहत होकर आप उस ब्लाग को छोड़कर चल दिये जिसे एक हफ़्ते पहले आप अपना ब्लाग बताते थे और उसकी गरिमा को सर्वोपरि मानते थे।

मेरा अपना ब्लागिंग का चार साल से कुछ अधिक जितना अनुभव है उसके अनुसार सामूहिक ब्लाग के माडरेटर की स्थिति शंकर जी के बरात के संयोजक की सी होती है। सदस्यों में तालमेल रखना मुश्किल काम होता है। अगर कबाड़खाना के संयोजक अशोक पाण्डेय जी की जगह शिरीष कुमार मौर्य होते तो वे इस मुनीश की टिप्पणी से शायद इतने आहत नहीं होते और न कबाड़खाना छोड़ने/बंद करने की बात करते। ब्लाग अभिव्यक्ति का माध्यम है। खुले ,त्वरित संवाद का एक जरिया। लेकिन इस माध्यम ने यह नहीं कहा कि आप अपने संवाद के अन्य माध्यम का उपयोग बन्द कर दें। कबाड़खाना छोड़ने न छोड़ने की पोस्ट लिखने से पहले ब्लाग माडरेटर से संवाद कर लेना शायद बेहतर होता।

नानक जी की बात याद आती है जो उन्होंने कुछ भले लोगों से कही थी कि तुम सब उजड़ जाओ, अलग-अलग हो जाओ। अच्छे लोग बहुत दिन साथ नहीं रह पाते। छुई-मुई संवेदन उनको आदर सहित अलग-अलग कर देती है और जिस उद्देश्य के लिये वे साथ-साथ चले थे वो इसका खामियाजा भुगतता है।

टिप्पणी को लेकर ही मुंबई टाईगर ने एक पोस्ट लिखी थी- हिन्दी ब्लोग जगत मे टीपणीकारो का भयकर अभाव :व्यग इस पर किसी अनामी टिप्पणीकार ने टिपियाया-
naam tiger kam gidad ka. ye jo nam likhe hain, inko tel lagane se behtar hai naye ane walo ka swagat karo. badiya parosoge to naye log judege. in namo ki chamachagiri karane se kuchh nahi milanewala.


एक बहादुर की तरह मुंबई टाईगर ने अनामी ब्लागर की टिप्पणी प्रकाशित की और सवाल पूछा- क्या ज्ञानदत्तजी,समीरजी,भाटीयाजी,शास्त्रीजी,ताऊ, बैगाणीजी,मिश्राजी, फुरसतियाजी को मैने तेल लगाया ? अब बताइये ई बात का कौन जबाब है?

कल शिवबाबू अपने ब्लाग पर एक ठो शेर ठेल दिये-

हजारों साल 'नर्गिस' अपनी बेनूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा


तमाम लोग इसका अर्थ लगाते पाये गये। हमें लगता है कि कवि यहां कहना चाहता है कि कोई नर्गिस है जो हज्जारों साल रोती रहती है कि उसे कोई देखने नहीं आता है। वह अपने को बेनूर समझने लगती है। तब कवि नर्गिस को कवि समझाता है कि चमन में ऐसे लोग बड़ी मुश्किल से पैदा होते हैं बोले तो बर्थ लेते हैं जिनके दीदे माने बड़ी आंखें होती हैं। मतलब कवि आशावादी है और नर्गिस को समझाता है तू रो मत दीदे फ़ाड़ के देखने वाला देर से पैदा होता है लेकिन थोड़ा समय लगता है।

टिप्पणी/प्रतिटिप्पणी:


कल हिमांशु ने टिपियाया:और यह टिचन्न रहें, कौन सा मुहावरा है? कहीं इसका मतलब टिप्पणी चितन्न से आछन्न रहें तो नहीं !
टिचन्न रहें का मतलब यह भी समझ में आ रहा है कि टिप्पणी चिन्तन से सन्न रहें ।

हिमांशुजी जब कोई व्यक्ति बतियाता है तो उसकी शारीरिक भावभंगिमायें (बाडी लैन्गुयेज )भी बहुत कुछ संप्रषित करती है। कभी -कभी ये बाडी लैन्गुयेज भाषा से अधिक संप्रेषण करती है। ऐसे ही शब्दों की भी बाडी लैन्गुयेज होती है। ई किसी शब्दकोश में या मुहावरा कोश में न मिलती है। बस समझ में आने वाली बात है। गूंगे का गुड़ टाइप। ऐसे ही टिचन्न शब्द भी है। बस ऐसे ही निकल पड़ा। जैसे कहते हैं कि अ मैन इज नोन बाई द कम्पनी ही कीप्स ऐसे ही शब्द किसके साथ आ रहा है उससे उसका अर्थ ध्वनित होता है। मैंने लिखा -आपका हफ़्ता चकाचक शुरू हो! प्रसन्न रहें, टिचन्न रहें। मुस्कराते रहें, मस्त रहें। इससे मतलब लगाया जा सकता है कि टिच्चन का मतलब कुछ उल्लास मय ही होगा। जैसे रागदरबारी में छोटे पहलवान कहते हैं- हम यहीं चु्र्रैट हैं। इससे अन्दाज लगता है कि वे कहना चाहते हैं वे जहां हैं मजे में हैं। आपको कुछ और मजेदार शब्द संयोजन देखना चाहें तो कानपुर के अविस्मरणीय व्यक्तित्व मुन्नू गुरू के बारे में पढ़ें।

अनिल पुसदकर ने लिखा:चर्चा से ज्यादा तो लगता है,मुझे आपकी मेहनत की तारीफ़ करनी चाहिये।काश ये लगन और ये मेहनत करने का ज़ज़्बा हमारे पास भी होता।सलाम करता हूं आपको।

अनिलजी आपकी तारीफ़ का शर्माते हुये शुक्रिया। असल में हमारे अभी चर्चाकार साथी जुटे रहते हैं और चर्चा होती रहती है। चर्चा करने का कभी-कभी मन नहीं होता कि क्या चर्चा करना? जिसको जो पढ़ना है पढ़ ही लेगा लेकिन जैसे ही लैपटाप खुलता है, खुटुरपुटुर होने लगती है। यह हमारे हर चर्चाकार साथी के साथ होता है।


अन्य सभी साथियों की टिप्पणियों का भी शुक्रिया। डा.बन्धुओं सर्वश्री अनुराग-अमर जी के दिये ब्लाग पोस्टों का जिक्र कर नहीं पा रहा हूं लेकिन साथियों से अनुरोध है कि वे इन पोस्टों को पढ़ें। लप्पूझन्ना तो एकदम तैयार उपन्यास है जस का तस छपने के लिये।

और अंत में

आज चर्चा देर से शुरू कर पाये इसीलिये कम पोस्टों का जिक्र हो पाया। लेकिन संभव हुआ तो शाम को फ़िर कुछ लिखेंगे। कल की चर्चा मीनाक्षी जी करेंगी।

फ़िलहाल इतना ही। आपका दिन शुभ हो।

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25 टिप्‍पणियां:

  1. किसी का किसी ब्लॉग को छोड़ना या लिखना उसकी अपनी पसंद है...पर मोडरेटर की व्यथा को आपने सही शब्द दिए हैं ..बाकि आज की चर्चा जरा छोटी थी कब शुरू कब खत्म पता ही न चला.

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  2. शिरीष जी के कबाड़खाना छोड़ने की सूचना से हतप्रभ तो सभी हैं । पर इससे टिप्पणी के आत्यन्तिक प्रभाव का पता चल गया । मुनीश जी की टिप्पणी को अपने स्व पर लेने की कोई आवश्यकता नहीं थी । वस्तुतः वह एक ट्रेंड की बात कर रहे थे जो प्रचलित हो गया है इन दिनों साहित्य में ।
    टिचन्न रहें । ऐसा कहना अच्छा लग रहा है । कहता रहूँगा । धन्यवाद ।

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  3. तेल लगाया नहीं जी

    पूरा ही तेल में डुबाया

    अनामदास को बोलो

    वो भी डूबना चाहते हैं

    या थोड़ा सा तलवे में

    लगवाकर फिसलना।

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  4. फ़ुरसतियाजी, आज की चर्चा टिपणि केंद्रित भी है. और मेरा भी नाम हे प्रभु...वाली पोस्ट मे शामिल है. मोडरेशन की बात भी उठी. पहले भी जब तब ऊठती रही है.

    मेरे हिसाब से हे प्रभु...वाले महावीर सेमलानी जी बहादुर हैं और बधाई के हकदार हैं जो उन्होने अपनी बात सबके सामने रखी है. और मुझे उनकी नितय मे कोई खोट नजर नही आता.

    वर्ना तो आप जानते हैं कि इस तरह की बेनाम टिपणीयों का स्तर क्या होता है? और हद तो तब हो गई जब उस ब्लागर ने वो पोस्ट ही निकाल दी जिस पर इस तरह की गालियां लिखी थी जो शायद मुझे तो पढने मे भी शर्म आ रही थी.

    उसका स्क्रीन शाट मैं आपको उसी दिन भेज चुका था. ये सब देख सुन कर गहन निराशा होती है कि आखिर हम क्युं यहां टाईम खोटी कर रहे हैं?

    कडवी दवा की तरह विरोध जरुरी है. पर उसका ये स्तर? नही मैं इस सबसे सहमत नही हो सकता. इससे अच्छा तो इस जगह से रामराम कह के निकल लेना ही अच्छा.

    रामराम.

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  5. चिट्ठा चर्चा पर की जाने वाली मेहन्त इसे गागर मे सागर साबित कर रही है।बधाई पूरी टीम को।

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  6. चिट्ठा चर्चा केवल रोज प्काशित ब्लाग पोस्ट की चर्चा का मंच तो है नहीं, ब्लागिंग से जुड़े हर पहलू को यहां चर्चाया जा सकता है।
    बढिया पोस्ट।

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  7. प्रिय अनूप,

    समय की कमी के बावजूद आज जो चर्चा प्रस्तुत की है उसके लिये आभार.
    कई लोग चर्चा करने की सोचते रह जाते हैं, लेकिन कर नहीं पाते. कभी नहीं से कुछ न कुछ सही!! कारण यह है कि चिट्ठाचर्चा हिन्दी चिट्ठाजगत को एक परिवार के रूप में बांधने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है.

    यदि सिर्फ एक पेराग्राफ लिखने का ही समय मिले तो भी लिख देना!! छोटी चर्चा के लिये हम शिकायत जरूर करेंगे, लेकिन उसका भावार्थ यह है कि अच्छी चीज ही हमेशा मांग अधिक रहती है!!

    सस्नेह -- शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.Sarathi.info

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  8. कुछ और शंकाएँ दूर कर दें तो उपकार होगा -शिव भाई तो मौन ले लिए अब पूरी उम्मीद आपसे ही है .
    क्या नर्गिस नाम का फूल अनाकर्षक होता है ? क्या आपने नर्गिस का फूल देखा है ? क्या हजारों साल में ऐसा भी होता है कभी कि यह सुन्दर /आकर्षक हो उठता है ? कोई लाख अपनी बेनूरी पर रोता रहे क्यों कोई दीदावर हो पैदा ? दीदावर तो किसी खास चाह को लेकर ही प्रगट होगा ? क्यों वह हजारो साल से किसी निस्तेज सी पडी चीज को देखने के लिए एक जन्म बर्बाद करेगा ?
    ये सारे प्रश्न इमानदारी से पूंछे गए हैं ! कोई मेरी मंशा /शेर को न समझ पाने की मूर्खता पर जरा भी शक न करे
    इस शेर ने अपने को ठीक से न समझा पाने के जद्दोजहद में मेरे जीवन के तीन दशक बर्बाद किये हैं ! अब आप मिल गए हैं तो समझ के ही छोडूंगा !

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  9. शास्त्रीजी ने सही कहा है कि चर्चा छोटी सही पर रोज़ होनी चाहिए। सच तो यह है कि कम्प्यूटर खोलते ही सब से पहले चिट्ठाचर्चा पर ही क्लिक करके देखने की आदत एक व्यसन का रूप ले लिया है:)

    "हमारे ब्लॉग की गरिमा हमारे लिए सर्वोपरि है " ...सही है, ब्लाग तो लिखने वाले का होता है. पर यदि कुछ अभद्र या अवांछित कमेंट हो तो उसे ब्लाग लिखने वाला का हिस्सा तो नहीं कहा जाएगा। अब यह ब्लाग के ओनर पर है कि उस टिप्पणी को रखे या माडरेशन कर दे। प्रायः यह माना जाता है कि जब किसी ने अपने लेखन को सार्वजनिक कर दिया तो वह पब्लिक प्रापर्टी हो जाती है:) उसे सराहे, उसका कचूमर बनाए - यह पाठक का प्रेरागेटिव हो जाता है:)

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  10. चर्चा छोटी तो है लेकिन अच्छी रही।

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  11. अभी अभी अरविंद मिश्र जी का कमेंट देखा। जितना मुझे मालूम है[मैं बाटनी का छात्र नहीं हूं] यह एक छोटा सा पौधा होता है जिसके पत्तों के नीचे आँख के आकार का फूल होता है। देखने में सुंदर होता है पर उसका नोटिस शायद इसलिए नहीं लिया जाता कि वह एक क्रोर्टन की तरह होता है। इस फूल को देखकर ही शायद ‘नर्गिसी आँखे’ मुहावरा चल पडा है॥

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  12. अनूप आप को
    फुर्सत मिल जाये तो यहाँ भी देखे की आम ब्लॉगर क्या कह रहा हैं टिपण्णी के बारे मे . वैसे आम ब्लॉगर की राय शायद ही कोई महत्व रखती हो पर फिर भी आप टिप्पणी क्यूँ देते हैं ?

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  13. मुझे लगता है की ब्लॉग्गिंग में विवाद एक रेगुलर इंटरवल के बाद होता रहता है ! जो भी हो चर्चा से ही पता चला वर्ना अपना उस गली में आना जाना कम ही होता है. अरविन्दजी क्षमा चाहता हूँ आपकी शिव भैया वाली पोस्ट पर टिपण्णी बाद में देख पाया और यहाँ भी अभी देख रहा हूँ. जितना समझ में आया, आपको घर पहुच कर शाम तक ही मेल कर पाऊंगा :(

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  14. बढ़िया चर्चा. टिप्पणी पर और भी बढ़िया चर्चा. 'टिचन्न' की व्याख्या बहुत खूब रही.

    जहाँ तक मेरे द्बारा ठेले गए शेर की बात है तो हमें तो वह शेर हर बार महासचिव को देखते ही याद आता है. वैसे आपने शेर का भावार्थ गजब निकाला है.

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  15. तस्लीम पर तो न जाने कितनी पुस्तकों की चर्चा हो गयी, कभी उधर भी कान दे देते।

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    S.B.A.
    TSALIIM.

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  16. अशोक पाण्डेयजी ने इस पर कमेंट माडरेशन चालू किया।
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    एक और शरीफ आदमी कमेण्ट मॉडरेशन की शरण में!

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  17. "कबाड़खाना हिंदी ब्लाग जगत के बेहतरीन ब्लागों में से एक है।" यह वाक्य तो अपने आप ही में, एक-लाइना टाइप उलटबांसी हो कर चल निकला.निसंदेह यह एक बेहतरीन ब्लॉग है.

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  18. हुँह! क्या-क्या खोज लाते हैं आपभी। हम तो सनाका खा गये हैं यह सब पढ़कर।

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  19. श्री अनूपजी शुक्ल
    टिप्पणी चर्चा मे आपने आज बडी ही अच्छी जानकारी दी पंद्रह वर्षीय अबीर ने मार्कोपोलों पुस्तक की चर्चा कि।
    आपने मुझे भी (मुम्बई टाईगर) चर्चा मे शामिल किया एवम मेरी पीठ थपथपाई, आपका शुक्रियाजी।
    विशेष आ,रामपुरायाजी ने आपकी अदलात मे मेरा पक्ष रखा मै उनका भी आभारी हू। मुझे आपकि इस अदलात स न्याय मिला इसलिऐ आप सभी वशिष्ठजनो को प्रणाम करता हुआ- शुभ मगल॥

    हे प्रभु यह तेरापन्थ
    मुम्बई टाईगर का सामुहिक नमस्कार जी

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  20. सब तरफ ऐसा तेल फैला कि फिसल ही गये और टिप्पणी करने में देर हो गई. क्या बताऐं भाई!! मुम्बई टाइगर को अब बेनामी शनि देव को तेल चढ़ाना चाहिये वरना साढ़े साती का एफेक्ट न हो जाये. :)

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  21. समीरजी साढा-साति कि दशा तो शुरु हो ही गई , जब मेने आप लोगो को तेल चढाया। ऐसे बेनामी शनि को तेल लगाना या तेल चढाना रास नही आ रहा है । कृपया कोई दुसरा ईलाज कि खोज करके रखीए नमस्कार

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नोट- चर्चा में अक्सर स्पैम टिप्पणियों की अधिकता से मोडरेशन लगाया जा सकता है और टिपण्णी प्रकशित होने में विलम्ब भी हो सकता है।

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