मंगलवार, जुलाई 03, 2007

गागरी भर तॄषा , आंजुरि तॄप्ति की


गागरी भर तॄषा, आंजुरि तॄप्ति को

भेजा तुमको नेह निमंत्रण चिट्ठे पर टिपियाने को
हे मानस के राजहंस, तुम भूल गये पर आने को

नातों का आभास कभी बहलाता कभी दुखाता है
और यहां हम लाये हैं कुछ गज़लें तुम्हेम सुनाने को

मिले न जिनको छंद गीत वे कैसे फिर बन पायेंगे
मुट्ठी भर अक्षर हैं केवल पन्नों पर बिखराने को

अब हम क्या बतलायें देखें खुद ही आप वहां जाकर
लाये हैं आलोक पुराणिक किसको हूट कराने को

आतुर होता रहा आदमी, वो भी कविता बन जाये
फ़ुरसतियाजी किसको लाये मुलाकात करवाने को

पांच मिनट में क्य हो सकता है इसको पहचानो अब
जायें आप सारथी पर अपना भंडार बढ़ाने को

यों तो चलती रहे ज़िन्दगी फूलों पर, कांटों में भी
तेरे ख्याल सदा हैं काफ़ी, इस दिल के बहलाने को

खोना-पाना ये दोनों इक सिक्के के दो पहलू हैं
अगर समझ लें फिर न बचेगा कुछ खोने या पाने को

काफ़ी, काकटेल या पानी, अलग तरीके पीने के
आओ खोजें नये सलीके, कुछ खुद को सिखलाने को

एक कहानी रही दुलारी, तो हैरानी और हुई
तो कोई आया है चल कर अपना गीत सुनाने को

हो कबीर की वाणी या फिर गीत सुनहरा हो कोई
भाई लोगों का जमघट लगने वाला बतियाने को

जो बीमारी रही भूख की जिस को भी या तिस को भी
जायें तरकश पर अपना पूरा इलाज करवाने को

उड़नतश्तरी, फ़ुरसतियाजी, गीतकलश, दिल का दर्पण
खुली छूट है जायें चाहे जिस पर, पढ़, टिपियाने को

कमी समय की रही इसी से चर्चा उनकीहो न सकी
बुला हमें जो लाये चिट्ठे की चर्चा करवाने को






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5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बेहतरीन चर्चा, राकेश भाई, बधाई!!!

    कमी समय की रही इसी से चर्चा उनकीहो न सकी
    बुला हमें जो लाये चिट्ठे की चर्चा करवाने को

    --अब क्या करियेगा-आखिर समय तो समय है. :)

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  2. अरे, हमारी टिप्पणी दिख क्यूँ नहीं रही!!! कोई है!!!!!!!!

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  3. आपने मेरी कविता को चर्चा के लायक समझा, इसके लिए आभार। आशा है भविष्य में भी आपका मार्गदर्शन मिलता रहेगा।

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  4. thanks for reading खोना और पाना
    and its a suggestion sometimes do a charcha on comments that are posted on various mentioned posts!!!

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  5. आप की प्रस्तुति मे जो वैविध्य है मैं उसकी प्रशंसा करता हूं

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