रविवार, जुलाई 22, 2007

कविता की रसधार में

बांझ कौन है ? कविता मान्या जी के भीतरी आक्रोश को उजागर करती कविता है ! इसमें कविता का महीनपन न होकर सवालों की स्थूलता ज्यादा है! यहां कविता का संवेदना संप्रेषण कविता की शैली पर हावी होता दिखाई दे रहा है ! कवियित्री के लिए भावना अहम है उसका प्रदर्शन नहीं ! इस कविता में बांझ ,निपूती जैसे पांपरिक विभूषनणों से नवाजी जाती औरत का दर्द साकार हो उठा है ! यह कबविता समाज पर गहरा व्यंग्य करते हुए जिस सवाल को सामने रख देती है उससे बचल्कर निकल पाना कविता पढ लेने के बाद संभव नहीं ! यह पाठक ही जो तय करेगा कि बांझ का क्या मायना है भारतीय सामाजिक जीवन में-

आज फ़िर दो और वर्ष बीत चुके हैं...

आज 'वह' एक बेटी की गौरवान्वित 'मां' है...

सुहागन, भागन जैसे अलंकार हैं....

और सुना है उसके पहले पति ने....

अपनी दूसरी बीवी को भी...

'बांझ' कहना शुरू कर दिया है....

बोतल जिन्न और शब्द में अभिव्यक्ति के लिए व्याकुल कवि मन के उद्गार हैं ! कवि अन्याय से सामाजिक शोषण से आहत होता है -सबसे अधिक आहत होता है वह संवेदना को अभिव्यक्त न कर पाने से। ओर इसी जिन्‍न को साधने की कोशिश है लेखन-

सोचता हूँ अपने शब्द-लेखन से
कहीं दूर हो जाऊं
बिना पढे मैं कब तक लिखता जाऊं
पर शब्द और बोतल में बंद जिन्न के
बीच मैं खङा होकर सोचता हूँ
मुझे किसी एक रास्ते पर तो जाना होगा
और शब्द हैं कि झुंड के झुंड
पीडाओं को साथ लिए चले आते हैं
मुझे अपने साथ खींच ले जाते हैं

कवितामूलक पोस्‍टों के ही क्रम में युनुस के रोडियोवाणी में चॉंद प्रेरित गीतो का आनंद लें। मूलचर्चा पर वापसी के लिए क्लिक करें

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1 टिप्पणी:

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