मंगलवार, मई 15, 2007

लिखो नहीं रोमन में हिन्दी

लेखन के शैदाई कैसे लेखक की कर रहे प्रशंसा
उड़नतश्तरी पर मिलता है असमंजस का इक अफ़साना
पढ़ कर यदि गर्मी चढ़ जाये, तो इसका इलाज़ भी हाज़िर
मेथी की तासीर यही है दिल दिमाग तक ठंडक लाना

संगम कथा पोपली की है,व्यंग्य त्रिपाठी जी का लाये
कोशिश हर नाकाम रही है हम अपने मैं को पहचानें
ई-स्वामीजी अब खुशियों के लड्डू सबको बाँट रहे है
धन्यवाद दें आप उन्हें फिर रुकें साथ में जश्न मनाने

रतलामीजी के चिट्ठे पर नई नई बातों को सीखें
शब्द चित्र मे अपने मन की बातें ले तुषार आये हैं
नई कल्पना लगी छलकने आज यहां अनुभूति कलश से
रमा द्विवेदी ने क्लोन के नये फ़ायदे समझाये हैं

परमजीत ने आज लिखी हैं सुन्दर नई नई क्षणिकायें
अगड़म एक विचारक की हैं लोकतंत्र पर लिखी कथायें
ताऊजी के पन्ने पर सादर मिलता सम्पूर्ण समर्पण
कौन अकल का कितना अंधा, ये बस संजयजी बतलायें

यों तो यह गुरनाम कहे हैं, लिखना नहीं उन्हें कुछ आता
लेकिन कोई कोई मौका अच्छे भाव स्वयं लिखवाता
आसमान बातें दहेज की, प्रश्न उठाता ढाई अक्षर
यमुना की हालत पर देखें कितने आंसू कौन बहाता

कायर की क्या कथा, शहर है कैसा, बस बस और नहीं
पूछ रहे हैं ज्ञानदत्तजी किस स्पैमर का है डर
एक डायरी हिन्दुस्तानी, और एक तकनीकी चिट्ठा
एक और कविता को देखें, लिखी गई जो मातॄ दिवस पर

रोमन में हिन्दी लिखने से सारे अर्थ बदल जाते हैं
बतलाया समीर ने देखो जीता इसका एक नमूना
कुछ चिट्ठे जो छूट गये हैं, उन्हें आप नारद पर देखें
अपने अपने चुनें आप सब, मजा आयेगा तब ही दूना

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4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बेहतरीन चर्चा राकेश भाई....हुर्रे....आज हम भी कवर हो गये....बहुते खुशी की बात हो गई...बस करते रहें चर्चा.....:) बधाई!!

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  2. समीरजी को देखिये। कवर (में) हो गये लेकिन उछल रहे हैं। नीचे करें और इनको!

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  3. हमारा कहना है सही रही चर्चा. कोई कवर भी हो गया :)

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  4. बहुत बढ़िया खासतौर पर इसलिए कि सभी उड़ने वालों जैसे हम व उड़न तश्तरी का नाम आया ।
    घुघूती बासूती

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