०३-०७-२००८

हमारी इनडिस्पेंसिबिलिटी तो जीरो बटा सन्नाटा है।

रवीश कुमार हिंदी दैनिक हिंदुस्तान में नियमित ब्लागचर्चा करते हैं। इस बार उन्होंने साई ब्लाग और तस्लीम ब्लाग की चर्चा की।

रवीश कुमार की चर्चा की खासियत यह है कि वे चर्चा करने के लिये ब्लाग का चयन यारी-दोस्ती के आधार पर नहीं वरन उपयोगिता के आधार पर करते हैं। अरविंद मिश्र के बारे में पता करने के लिये मुझसे भी फोन नं पूछा था। मेरे पास था नहीं लेकिन किसी और से जरूर मिला होगा और उनसे बतियाने के बाद उन्होंन यह लेख लिखा।

केवल महिला ब्लागर्स से कुछ सवाल पूछे गये हैं इस पोस्ट में। देखना है कितने जबाब आते हैं। इंतजार है।

पल्लवी जी ने अपने साथ काम कर चुके दद्दू को याद करते हुये लिखा है- दद्दू तुम अक्सर याद आते हो। वे लिखती हैं-
जिस दिन दद्दू अपने बाल और मूंछे डाई करके आते...उस दिन शर्ट भी इन करके पहनते और अपनी उम्र से सीधे १० साल पीछे चले जाते और मुझे उन्हें छेड़ने का एक और मौका मिल जाता! और दद्दू शरमा के रह जाते! बारिश के दिनों में मेरे लॉन में काफी पानी भर जाता था ,एक दिन ऐसी ही तेज़ बारिश में मैं ढेर सारी कागज़ की नाव बनाकर पानी में पहुंची और सारी नाव एक साथ तैरा दीं.. साथ में अपनी हवाई चप्पलें भी पानी में तैरा दीं! दद्दू देख देख कर मुस्कुरा रहे थे...थोडी देर बाद मैं अन्दर आ गयी और १० मिनिट बाद बाहर झाँककर देखा तो दद्दू एक अखबार की नाव बनाकर पानी में छोड़ रहे थे..एकदम तल्लीन! मैं बाहर नहीं गयी...कहीं उनके भीतर का बच्चा शरमा कर भाग न जाए!


अनीताजी ने विश्वनाथजी के बच्चे ,नकुल कृष्णा ,की सफ़लता के बारे में बताते हुये लिखा है। आप इसे पढियेगा तो शायद आपको अपने आसपास के किसी बच्चे को भी सफ़ल होने के गुर सिखाने का मन बने।

प्रत्यक्षा जी की नयी कविता की कुछ लाइनें देखिये-
पर इन सबके बीच मन कहाँ मानता
जाने क्या अटकता है
जाने क्या ?
और मैं अंत में कहती हूँ सब माया है
इस विस्तार से उस छोर का खेला है, चौपड़ की बिसात है, कोई छे वाली लकी गोटी है
ओह ! जाने क्या है क्या क्या है ? पर इतना तो है कि ज़्यादा प्यार नहीं है ?

आइये अब कुछ एकलाइना देखिये:

ऑमलेट उड़न तश्तरी स्टाईल में.. : साधुवाद, साधुवाद!

जीवन में प्यार ज़्यादा ? नहीं ही है : जो है , जित्ता है उत्ते में काम चलाया जाये।

आपकी इनडिस्पेंसिबिलिटी क्या है मित्र? : हमारी इनडिस्पेंसिबिलिटी तो जीरो बटा सन्नाटा है।


टापमटाप वाया नाली : ये भी बढिया है खामख्याली ।

चांद पर सबसे पहले पहुंचे थे भारतीय! कोई शक? किसकी हिम्मत जो सक करे?






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11 टिप्पणियाँ:

प्रभाकर पाण्डेय on July 03, 2008 7:57 AM ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति।

दिनेशराय द्विवेदी on July 03, 2008 10:02 AM ने कहा…

0/सन्नाटा = अनन्त
हमारी इनडिस्पेंसिबिलिटी सन्नाटा बटा जीरो है।

Aflatoon on July 03, 2008 10:27 AM ने कहा…

०/कुछ भी=०,कुछ भी/०=अनन्त गणितीय मान्यताएं गलत न हों

ब्‍लॉग... ब्‍ला... ब्‍ला... ब्‍ला... on July 03, 2008 10:48 AM ने कहा…

आपहु तो गुट देखि के चिट्ठा चर्चा करते हैं।

Gyandutt Pandey on July 03, 2008 11:02 AM ने कहा…

हमारा यह कहना है कि जीरो बटा सन्नाटा पर हमारा कापीराइट है।

बिला...बिला...बिला...मर बिला.. on July 03, 2008 11:58 AM ने कहा…

आप गुट देखते हैं...फिर चिट्ठे देखने का टाइम कब मिलता है...और चर्चा का?

ALOK PURANIK on July 03, 2008 12:24 PM ने कहा…

जमाये रहियेजी।

अभिषेक ओझा on July 03, 2008 12:31 PM ने कहा…

सुंदर चर्चा. !

Udan Tashtari on July 03, 2008 3:47 PM ने कहा…

बढ़िया चर्चा. इसे नियमित रखें.

pallavi trivedi on July 04, 2008 12:05 AM ने कहा…

बढ़िया चर्चा...अच्छा लगा यहाँ आकर! मेरी पंक्तियों की चर्चा करने के लिए धन्यवाद आपको!

डा० अमर कुमार on July 04, 2008 1:32 AM ने कहा…

महज़ चर्चा करने को ' कुमार ' सवाल बड़ा अच्छा है
वरना यह सन्नाटा ही था कुछ काम का, ज़ीरो बटा सन्नाटा..
हुँह !

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