शुक्रवार, जुलाई 18, 2008

पालिटिक्स अब हाथ की नहीं, जूता लात की है

कैटरपिलर
कैटरपिलर
हिंदी ब्लागर कम लिखते हैं| लेकिन जब लिखते हैं, पाठक की जानकारी में इजाफ़ा होता है। बालू में से तेल निकालने का मुहावरा तो सुना था लेकिन सच में तेल निकल सकता है बालू से ऐसा पता न था। अपनी पोस्ट में उन्होंने बालू में से तेल निकालने के बारे में बताया। हम तो कैटरपिलर के बारे में पढ़कर चकित च विस्मित रह गये। 6 लाख किलो की मशीन। मतलब हमारे जैसे पचास-साथ हजार के वजन के बराबर!


एक ही समय में एक ही देश समाज में लोग अलग-अलग कालखंड की मन:स्थितियों में जीते हैं। घुघूतीबासुती जी ने लड़कियों की पढ़ाई में उनके मां-बाप की हिस्से दारी के बारे में कई सवाल उठाये हैं।

कुश ने महिला-पुरुष सवाल पर अपने विचार व्यक्त किये। उनका कहना है कि दोनो को समान अधिकार मिलें! तमाम लोगों के उनके इस विचार का स्वागत किया। मीताजी ने लिखा-
.काश की हर लड़का कुश होता और एकता में इतना विश्वास रखता ...पर क्या करे... जहाँ देखो वहाँ .. सिर्फ़ बहस होती है इस बात पर सदियो से...... और वैसे एक और मुद्दा भी है उठाने को... अगर सिर्फ़ लड़के और सिर्फ़ लड़कियो में भी एकता नही बन पाई तो लड़के और लड़कियो में ये बात कहा संभव होगी ....शुरुआत घर से करनी चाहिए ऐसा सुना है ...तो पहले हमे शुरुआत करनी पड़ेगी
और भी लोगों ने कुश की तारीफ़ की। लेकिन एक अनाम ब्लागर ने इसे कुश की नेतागीरी का प्रयास माना:
कुश जी ,पता नही क्यों इस प्रयास में आपकी नेतागिरी के अलावा मुझे कुछ नही दिखाई देता .नाम "५० प्रतिशत " और बातें १०० की , क्या गारंटी है कि यहाँ ५०-५० में मतभेद, नाराजगी नही रहेगा


राकेश खण्डेलवालजी अद्बुत गीतकार हैं। उनकी कविताओं के बिम्ब देखकर कभी-कभी चमत्कृत सा हो जाता है पाठक। आज उन्होंने लिखा:
राह भटका रहा पग उठा राह में
होंठ पर मौन बैठी रही बाँसुरी
फूल अक्षत बिखरते रहे थाल से
भर नहीं पाई संकल्प की आँजुरी
सिन्धु था सामने खिलखिलाता हुआ
बाँह अपनी पसारे हुए था खड़ा
पर अनिश्चय का पल लंगरों के लिए
बोझ, अपनी ज़िदों पे रहा है अड़ा

हाशिये से परे हो खड़े हम रहे
पॄष्ठ पर वाक्य थे झिलमिलाते रहे
यज्ञ में जो हुआ शेष, वह स्वर लिये
इक अधूरी गज़ल गुनगुनाते रहे


अगर किसी लेखक के लेख का एक वाक्य आपको याद रखने लायक लगे तो समझिये लेख सार्थक हो गया। आलोक पुराणिक आज लिखते हैं
पालिटिक्स अब हाथ की नहीं, जूता लात की है। लेफ्ट की लात मजबूत रहेगी, तो हाथ की मजबूती क्या कर लेगी।


निठल्ले तरुण ने आज आमने-सामने खड़ा किया संजय बेंगाणी और अमित गुप्ता को। एक को अपना गुस्सा छोड़ने लायक आदत लगती है दूसरे को आलस्य। :)

समीरलाल ठीक होते ही पतंग उड़ाने लगे। लेकिन लेख दिख नहीं रहा है सिवाय शीर्षक के। यही हाल काकेश की दीवार का है। दीवार गिरी है लेकिन मलवा नहीं दिख रहा।

स्वामीजी आजकल ब्लागशिक्षा दे रहे हैं। आज उन्होंने सिखाया ब्लागिंग के लिये टेम्पेलेट के चुनाव के बारे में।

अजित जी की मेहनत और लगन देखकर ताज्जुब होता है और उनकी तारीफ़ करने का बरबस मन करता है। जिस मेहनत से वे हम लोगों को शब्दों के बारे में बता रहे हैं वह काबिले तारीफ़ है। आज उन्होंने कथा-कहानी पर प्रवचन दिया:
इस संदर्भ में भजन, नाटक और एकांकियों के जरिये किसी ज़माने में देशभर में धूम मचा देने वाले पंडित राधेश्याम कथावाचक का जिक्र किए बिना बात अधूरी रह जाएगी। बरेली में करीब एक सदी से भी ज्यादा पहले जन्में कथावाचक जी ने पारसी और नौटंकी शैली के रंगमंच में खूब अपना हुनर दिखाया । इनके पिता भी कथावाचक थे। बाद में राधेश्यामजी ने अपनी खुद की रामकथा शैली विकसित की। उन्होने राधेश्याम रामायण भी लिखी। उनकी रामकथा के निरालेपन की वजह वह छंद था जिसे लोगों ने राधेश्याम छंद नाम ही दे दिया था।


ज्ञानजी कल चहलकदमी करते रहे। आप देखिये कैसे मसाला जुटाते हैं अपनी पोस्ट के लिये ज्ञानजी।

पंगेबाज पंगाकास्टिंग भी करने लगे। देखिये।

दफ़्तर जाने का समय हो गया। सो अब एक लाइना शाम को या फिर कल। :)

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8 टिप्‍पणियां:

  1. आप तो सीज़न्ड मानुस लगते हैं, जी..
    लिखने के पहले कुछ सोचते भी अवश्य होंगे, फिर ?
    टप्प से लिख दिया, ' पालिटिक्स अब हाथ की नहीं, जूता लात की है।'
    ई क्या आसान बात है ? जूता-लात बहुतै मुस्किल बात है, आप कर सकते हैं ? नहीं ..न, फिर ?
    अंदर का शरीफ आदमी और बाहर का शरीफ दिखने वाला आदमी आपको रोक लेता है, कि नहीं ?
    लिखने से फायदा क्या है,इसी पर अब सोचेंगे ।

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  2. आपके पास अबतो इतनी "जमाये रहिये जी"जमा हो गई होंगी कि आपभी "उखर्रा पूडी वाले "की तरह "फ़ुरस्तिया जमाये रहिये "सम्मान चालू कर सकते है जी :)

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  3. जमाये रहियेजी।
    जमाये रहियेजी।
    जमाये रहियेजी।
    जमाये रहियेजी।
    जमाये रहियेजी।
    जमाये रहियेजी।
    जमाये रहियेजी।
    जमाये रहियेजी।....मैं अरुण के समर्थन में बचे हुये जमाये रहियेजी पूरा कर रहा हूं! :)

    उत्तर देंहटाएं
  4. जमाये रहियेजी।
    जमाये रहियेजी।
    जमाये रहियेजी।
    जमाये रहियेजी।
    जमाये रहियेजी।
    जमाये रहियेजी।
    जमाये रहियेजी।
    जमाये रहियेजी।....मैं ज्ञानजी के समर्थन में बचे हुये जमाये रहियेजी पूरा कर रहा हूं! :)

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  5. जमाये रहियेजी।
    जमाये रहियेजी।
    जमाये रहियेजी।


    ऐसे ही नियमितता बनाये रहिये चिट्ठा चर्चा में. आपका बांचा पढना अच्छा लगता है. अब तो मानो बिना इसके दिन शुरु करना अच्छा ही नहीं लगता. जारी रहें. :)

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  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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