July 16, 2008

[चर्चाकारः अनूप शुक्ल] [7 टिप्पणियाँ]


हिंदी ब्लाग
हिंदी ब्लाग


शुरुआत मौसम से। रमानाथ अवस्थीजी अपनी एक कविता में कहते हैं:-

कुछ कर गुजरने के लिये मौसम नहीं नहीं मन चाहिये।

इसी बात को प्रपन्ना इस कहते हैं:
बाहिर का मौसम कैसा भी हो ,
अंदर का मौसम तै करता है मौसम(कैसा) होगा



शिवकुमारजी भी न्यूक्लियर डील में ठिल गये। शुरुआत अपने अनुभव बांटने से करते हैं:-
अपने देश में दो तरह के नेता होते हैं. एक वे जो डिमांड में रहते हैं और दूसरे वे जो रिमांड में रहते हैं.


हैदराबादी नये ब्लागर हैं। उनसे बीबियों के बारे में जानिये।

हिंदी मीडिया की उछलकूद भरी तबियत के बारे में जायजा ले रहे हैं विनीत कुमार। वे फ़र्माते हैं:
हिन्दी मीडिया देस की बदहाली, गरीबी, भूखमरी पर स्टोरी कर-करके थक गयी है. बीच में तो उसके कारण हिन्दुस्तान की छवि ऐसी बन गयी थी कि लगता था हिन्दुस्तान में भुखमरी के अलावे कुछ भी नहीं है. पता नहीं बाहर के देशों में लोग सोचते भी हों कि भारत में बदहाली और बेकारी की खेती होती है. अब हिन्दी मीडिया के दिमाग की बत्ती जल गयी है, उसके ऑडिएंस भी दिनभर की दिहाड़ी करने के बजाय एमेंसीज में जाने लगे हैं। हिन्दी मीडिया को एक ऐसा ऑडिएंस ग्रुप मिल गया है जो दिनभर अंग्रेजीयत में जीकर-काम करके घर लौटता है, ऑफिस में हिन्दी बोलने-सुनने के लिए तरस जाता है। कुछ मजे करना चाहता है लेकिन ससुरी ऑफिस में सारी चीजें अंग्रेजी में होती है, कूलीग मजाक भी करते हैं तो अंग्रेजी में। वो मजा नहीं आता जो अपने हिन्दी में है।


डाक्टर लोगों के साथ मुश्किल होती है कि जो दिखता है उसका एक्सरे करने लगते हैं।यही तो किया डाक्टर अमर कुमार ने। मेडिकल रेप्रेजेन्टेटिव की बनियाइन तक दिखा दी लोगों को:
कारपोरेट जगत और कंज़्यूमर के बीच उलझे हुये मकड़जाल में फँसे वेतनभोगी सेल्सकर्मी.. निर्ममता से बोले तो बिचौलिये । इनका डाक्टर से क्या लेना-देना ? तो, यह भी डाकटर को माध्यम बना कर अपनी कंपनी के दवाओं की बिक्री बढ़ाने की ग़ुज़ारिश में भटकते आम मध्यमवर्गीय आदमी हैं । इनकी इल्तेज़ा में कुछ हनक लाने को यह इनका गलैमरस रूप है । गंदी बनियाइन के ऊपर चमकती कमीज़ और दमघोंटू दुनिया में इनका गला कसता हुआ टाई । लकदक विदेशी परिवेश से देसी मानस को प्रभावित कर सकने की सोच को ढोते बिक्रीदूत । बुरा लग रहा होगा ? सहन करिये, तथ्य तो इससे भी बुरे हैं, बढ़ लीजिये ।

सेल्समैन का हिंदी अनुवाद बिक्रीदूत कैसा लगा आपको? बताइये डाक्टर साहब बेचैन होंगे सुनने के लिये।

सुमीतकुमार आवाहन करते हैं:
आ मीत ! चल साथ उडें , आ हाथ मिला बिन पाँख उडें
आ चल ऐसी उडान उडें


आप अगर पुराने समय के कुछ कम्प्यूटर विज्ञापन देखना चाहते हैं तो देखिये रवीन्द्र राठी दिखा रहे हैं।

प्रीति बड्थ्वाल दिल्ली की ब्लागर हैं। कल उनका जन्मदिन था। इस अवसर उन्होंने कविता लिखी:
कब तक तकिये पर सर रखकर,
तुम बचपन में सोती रहोगी।
कब तक आंगन की माटी से,
नंगे पैरो को धोती रहोगी।
अब यौवन के फूल खिले हैं,
फूलों के रंग से खेलो भी।
अब इठलाती मदमस्त हवा है,
उनके आंचल में झूलो भी।

बारिश की इन बौछारों से,
ऊपर बैठा ‘वो’ बोल रहा।
“तारिका” तुम भी खुश रहना
सीख ही लो,
इन बारिश की बूंदों की तरहा।


प्रीति जी की डायरी पढ़ना रोचक अनुभव है। आप भी देखिये अभी जारी है लिखना।

स्वामीजी हिंदी के दहाई जमाने के ब्लागर हैं। जब ब्लाग संख्या चालीस-पचास थी तब वे प्रकट हुये थे। वे नियमित लिखते भले न रहे हों लेकिन पढने में लगे रहे। आज वे असली चिट्ठाकार के बारे में बताते हुयेकहते हैं:-
अच्छे ब्लागर्स वो चाहे किसी भी भाषा में लिखें - वे लिखने से कहीं अधिक पढते हैं, पढने से अधिक करते हैं. पढना हर चीज़ को दिशा देता है - अत: वे अच्छे कंटेंट के पारखी होते हैं और उसकी मदद से अपना ज्ञान और समझ बढानें में लगे होते हैं.

इसी लिये सक्रीय ब्लागर्स अच्छे लेखन, व्यक्तित्व और अभिरुचियों वाले दूसरे लोगों से आन-लाईन जुडना पसंद करते हैं. पुराना नीयम है की ‘एक रंग के पंछी साथ उडते हैं’.


सार्थक टिप्पणियां करें लिखकर उन्होंने लगता है हमारे जैसे लोगों (जो सही है, बहुत सही, सत्यवचन, लिखते रहें कहकर टिपियाते हैं ) से कहा ये अच्छी बात नहीं है।

बकलम खुद में प्रभाकर पाण्डेय अपनी दास्तान बता रहे हैं। वे आई.आई.टी. मुबई कैसे पहुंचे और वहां क्या किया:

एक दिन दीदी के घरवालों के माध्यम से मेरा पदार्पण आई.आई.टी. बाम्बे में हुआ और एक प्राध्यापक की महती कृपा से मैं भाषाओं के क्षेत्र में काम करने लगा। आई.आई.टी. में मुझ जैसे गँवार का टिक पाना बहुत ही मुश्किल था पर मेरी कड़ी मेहनत और लगन तथा उस प्राध्यापक को दिख रही मेरी आंतरिक योग्यता ने मुझे जमाए रखा और मैं U.N.L.(Universal
Networking Language) जो यूएनयू जापान की परियोजना थी पर काम करता रहा। फिर मैंने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा।


आज दैनिक हिंदुस्तान में रवीशकुमार ने अशोक चक्रधर के ब्लाग का जिक्र किया। मजेदार है। पढियेगा।
आप अब तक बोरे हो गये होंगे। लीजिये गाना सुनिये- अभी तो मैं जवान हूं।

चलते हैं। चलने के पहले कुछ हड़बडिया एकलाइना:

१. असली चिट्ठाकारों का ध्यान कैसे खींचें?: गाली-गलौज करके या फ़िर सनसनी फ़ैलाकर।

२.सोमनाथ की शुचिता : एक और बबाल! कोड़ में खाज!

३.एक प्रेम पत्र फ़्रिज पर चिपका हुआ : पंगेबाज उखाड़ नहीं पा रहे हैं।

४. 'हम बेशर्मी के स्वर्णकाल में जी रहे हैं.: सोने का कैरेट तो बताओ मालिक।

५. सच या सपना कौन है तू ,: सच,सच बताओ वर्ना बुलवाती हूं अभी पुलिस।

६.मैं असद ज़ैदी का गुनहगार नहीं : तो सफ़ाई काहे दे रहे हौ।

७. एक भी आज तक तुमने गाया नहीं: क्या गला खराब है?

८. भूत-वर्तमान-भविष्य: का फ़ैसला चवन्नी उछाल कर करें।

९. कामरेड की नयी डायरी: लेकिन कामरेड वहीं हैं पुराने, लाल वाले।

मेरी टिप्पणी:



कल पंगेबाज एक प्रेम पत्र फ़्रिज पर चिपका के चले गये। उस पर हमारी प्रतिक्रिया अभी तक चपक नहीं पा रही है।सो यहीं चिपका देते हैं। आप भी बांच लीजिये:

अरे पंगेबाज भाई अरुण अरोरा। साल भर हो गया ब्लागिंग में पोस्ट छीलते-छीलते अभी तक कायदे से प्रेम पत्र भी न लिखना आया। लाहौल बिला कूवत। :)

जो जरा सा भी शादी-शुदा है वो जानता है कि इत्ती बातें डिटेल में लिखने का चलन नहीं है। ऐसी डांट-डपट चिट्ठियों में नहीं आमने-सामने चलती है। ये तो ऐसा लग रहा है कि कोई दफ़्तर में 'एडवाइजरी नोट' दिया जा रहा है। अगर
किसी भी तरीके से कोई भी इस पत्र को सही मानता है तो उसके अपने घर की स्थिति होगी। वह प्रत्यक्षम किम प्रमाणम कहने का बूता होगा।


हमारी पत्नी हमारे मित्रों के बारे में इसी तरह की बातें कहती हैं। इस पत्र को देखेंगी तो कहेंगी कि कैसे बांगडू दोस्त हैं तुम्हारे जिनको एक जरा सा प्रेमपत्र लिखने का भी शऊर नहीं है। लगता है कि वो खाली हाकिन्स से इन्कार न करके बीबी से प्यार का इजहार करते हैं। लेकिन लिखा-पढ़ी में इस तरह की बातें करने में न उनके पास समय है न यकीन। घर में वे अपने
दस्तखत करने के अलावा लिखा-पढ़ी का कोई काम नहीं करतीं।इसीलिये पढ़े-लिखे पति का इन्तजाम किया है अपने लिये। :)


इत्ती सुना-सुनाई का मौका छोड़कर चिट्ठी लिखने का धैर्य किसी पत्नी के पास न होगा।रोजमर्रा की बात दफ़्तर में जाने से पहले अगर पत्नी लिखती है तो यह तय है :

१.वह पत्नी नहीं है। वह आपकी काल्पनिक प्रेमिका है (जो कभी सच के कुछ करीब रही हो शायद) जिसके पुराने सारे पत्र आप अपने मित्रों के नाम बताकर के नाम बदलकर खपा रहे हो।

२. अगर वह किसी की पत्नी है भी तो निश्चित तौर परगूंगी होगी या फ़िर उसके मियांजी बहरे होंगे। इसीलिये दिन-प्रतिदिन की सहज डांट-डपट भी बेचारों को लिखकर करनी पड़ती होगी। ऐसे विकलांग लोगों का पत्र छापकर आप उनके साथ
अन्याय कर रहे हैं।

बकिया प्रयास बहुत अच्छा है। ट्राई मारते रहो। कभी सच्ची में लिखने लगोगे रियल प्रेमपत्र। इस वाले में उत्साह अधिक विश्वास कम है।

7 टिप्पणियाँ

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा… @ July 16, 2008 8:36 AM

चवन्नीन को टोटो ह्वे गयो है, रुपैया उछाल लें?

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा… @ July 16, 2008 10:29 AM

पुलिस ?:) अच्छा इस नजरिये से हमने इसको देखा ही नही :) गुड आइडिया है :)

ALOK PURANIK ने कहा… @ July 16, 2008 10:35 AM

जमाये रहिये। एक चवन्नी चांदी की,जय बोलो महात्मा गांधीकी.

Shiv Kumar Mishra ने कहा… @ July 16, 2008 11:45 AM

बेशर्मी का सोना है. इस सोने में कोई मिलावट नहीं. पूरे चौबीस कैरेट का.

डा० अमर कुमार ने कहा… @ July 16, 2008 12:00 PM

कानपुर में उस ज़माने में जन्माष्टमी पर परमट पर
जन्मोत्सव के तीसरे दिन नौटंकी हुआ करते थी ।
सेकेन्ड प्रोफ़ेशनल निपट जाने की खुशी में तो थी,


लेकिन ज़ेब से फ़कीर सही, दिल के अमीर हम चार
दोस्त कुछ जुगाड़ वुगाड़ कर आर्य नगर से माल ले
कर दो लीटर के दूध के डिब्बे में डाइल्यूट कर करा
कर नौटंकी देखने पहुँचे, तैयार माल के घूँटों के साथ
मस्त मौज रही । किसी दोस्त शायद इटावा का अ.सि.
यादव ही था । घूँटें मारने का यह स्वै्च्छिक ऎप्रेंटिस
कुछ ख़ास ही मस्तिया गया ।

एक एक ठुमके पर झूम कर चीत्कार कर उठता...,
जियो रज्जाः ..ऽ ऽ चवन्नी उछाल के..
अरे वाह ये तो अनायास मस्त चीज बन गयी । यादव जी को चूमा चाटा गया और लौटने में तय हुआ कि,
गुरु इसको कल से चला दिया जाय । सो, अगले दिन से यह हिट हो गया.. " अयहय ..सदके जावाँ.. ऽ चवन्नी उछाल के...,
कई सालों तक चला, अपना चवन्नी उछाल के..


हर आम ओ खास को इत्तिला दी जाती है, कि यह मेरा पेटेंट है, मैं तो आता ही हूँ चिट्ठाचर्चा पर ..अयहयः चवन्नी उछाल के

अब पता यह लगाना है, कि अपने अनूप सुकुल कहाँ से सूँघ लिये...और चले आये यहाँ चवन्नी उछाल के..

चलो चिट्ठाचर्चा पर उनके योगदान से खुस होकर माबदौलत आज से ये चवन्नी उनको अता फ़रमाते हैं, किबला ऎश करें ।

अपना © पेटेंट उनको ट्रांसफ़र किया..चवन्नी उछाल के...ऽ ऽ..♫♫

Udan Tashtari ने कहा… @ July 16, 2008 6:08 PM

अगर वह किसी की पत्नी है भी तो निश्चित तौर परगूंगी होगी या फ़िर उसके मियांजी बहरे होंगे।

-बिल्कुल सही आबजर्वेशन है..चव्वनी उछाल के!!

ऐसे ही नियमितता बनाये रहिये चिट्ठा चर्चा में. आपका बांचा पढना अच्छा लगता है. अब तो मानो बिना इसके दिन शुरु करना अच्छा ही नहीं लगता. जारी रहें. :)

Gyandutt Pandey ने कहा… @ July 16, 2008 7:36 PM

चवन्नी तो दो भैया उछालै बदे!

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