कुछ पोस्टों के अंश
- गुलामी जिस्म की रहती है जंजीर कटने तक
गुलामी जेहन की बड़ी मुश्किल से जाती है |
वसीम बरेलवी धीरू सिंह के ब्लॉग दरबार में - मतलब यही कि इस नियमन-प्रबंधन के पीछे आखिरकार किस तरह की नगरीय दृष्टि काम करती है. बडे स्केल पर फ्लाईओवरों व सडकों की चौडाई के काम अंजाम हुए मगर उनके आजू-बाजू गरीब बस्तियों के लोगों के लिए ऐसा कोई वैकल्पिक इंतजाम न खडा किया गया कि वे हाईवे की तेजी से आती-जाती गाडियों के बीच हाथ में बाल्टी-कनस्तर लिये अदबदाकर सडक पार करने की बेवकूफी व हिंसा से बचें. यह महज भ्रष्टाचार है या एक ज़ाहिल जनविमुख व्यवस्था के बीमार कारनामे?
प्रमोद सिंह तीन साल पहले एक पोस्ट में - इस शान्त और सोच समझ कर बात करने वाले बच्चे को लेकर मुझे कभी कभी उलझन होती कि यह घोर कलयुग मेरे गाँधी बाबा के लिए ठीक नहीं।
आभा अपने घर में - बादल कुछ शर्म से तथा बाकी बेशर्मी से बोला,’साहब बरसने का मजा तो मुंबई में ही है। वहां तो हीरो-हीरोइनों तक को भिगोने का मौका-मजा मिलता है। मुझे जब आपने झांसी भेजा तो स्टेशन से बरसने की शुरूआत का डौल लगा ही था ,भूरा रंग कर लिया था,हवा चला दी। मेढक की टर्र-टर्र का इंतजाम कर लिया,कौन झोपड़ी गिरानी है यह भी तय कर लिया।कौन सा नाला उफनायेगा,कहां सड़क में पानी भरेगा सब प्लान कर लिया। हम बस ‘एक्शन’कहने ही वाले थे कि साहब हमें पुष्पक एक्सप्रेस दिख गयी। सो साहब अपना दिल मचल गया। पिछले साल की याद आ गई। दिल माना नहीं और हम लटक लिये ट्रेन में और जाकर मुंबई में बरस आये। अब आप जो सजा देओ ,सो सर माथे। ‘सजा सर माथे’ सुनते ही इन्द्र भगवान ने अपना सर और माथा दोनों पकड़ लिया।’
….बरखा रानी जरा जम के बरसो - खिड़कियों के शीशों पर छोटी बूंदें बजती रहती है सारी रात. जैसे जेब में ज़रा सा पैसा बजता है. जैसे मेरे ज़रा से शब्द. ताव खाते रहते हैं. शब्दों से दूर खड़ा मैं कभी देख पाता हूं कि बज रहा हूं. अपने लघुकायपने में सारंगी जैसा सिरजने की कोशिश सा करता कुछ. सन्नाटे में छोटी आवाज़ें घन्-घन् घूमती कोई पुकार बुनती रहती हैं.
प्रमोद सिंह - मेरी जिंदगी में ऐसा जादू कोई न जगा पाया जैसा की किताबें जगाती हैं! कल के अखबार में रस्किन बोंड ने किताबों के बारे में कुछ लिखा था!तब से मेरा भी मन कर रहा था कि मैं भी किताबों से अपने रिश्ते के बारे में कुछ लिखूं! पिछले एक हफ्ते से खूब किताबें पढ़ मारी हैं! जिस किताब को पढो लगता है खुद एक दर्शक बनी बैठी हूँ और किताब की कहानी को जीने लगी हूँ!
किताबों का असर मेरी जिंदगी पर ....जादू जैसा -पल्लवी त्रिवेदी - मेरा जोश
अब ठंडा पड़ गया है...
अब मेरे भीतर कई विचार
एक साथ नहीं चल पाते
शायद ....
मेरे विचारों पर धारा
एक सौ चव्वालिस
लागू होती जा रही है...
महफ़ूज अली - कविता निकल गयी है मुझसे
जो कवि में
चुन-चुन कर प्रेम संजोती है,
आशा रोपती है
और जरिया बनती है कवि होने के लिए
मैं पूरा कर आया हूँ
वह वक़्त
जिसके बाद एक कवि
बलात्कारी हो जाता है,
पेंड काटता है
और पैसे कमाता है
ओम आर्य - क्या आपने कभी सोचा है कि अगर आपकी आँखें न होतीं, तो? सोच कर ही बदन सिहर सा जाता है। लेकिन यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि हमारे देश में लगभग सवा करोड़ आँख की रौशनी से महरूम हैं। इनमें से लगभग 30 लाख लोग कार्निया की गड़बड़ी के कारण इस अवस्था में जी रहे हैं। और इनमें बच्चों की संख्या 25 प्रतिशत से अधिक है। इस समस्या का निपटारा नेत्र दान से संभव है, लेकिन नेत्रदान सम्बंधी चेतना का अभाव होने के कारण पूरे वर्ष में हमारे देशमें सिर्फ 12 हजार नेत्र ही प्रत्यारोपित हो पाते हैं।
जाकिर अली रजनीश नेत्रदान के बारे में जानकारी देती पोस्ट में - क्या हुआ जो हमारे पास विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थान, शोध सुविधायें, ट्रेनिंग सुविधायें, कोच, ट्रेनर, फैकल्टी,खेल के मैदान, संसाधन, सर्वश्रेष्ठता को प्राप्त करने का आत्मविश्वास, हौसला व जुनून आदि आदि नहीं हैं....
हमारे पास गर्भाधान व पुंसवन संस्कार तो हैं न!
प्रवीण शाह अपनी पोस्ट -पेंसिल के छिलके और दूध, चांदनी रात में रबड़ का बनना... गर्भाधान संस्कार व पुंसवन...मनचाही संतान ??? में - ऐसा लगता है कि हमारे स्वाभिमान को सोच-समझकर नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। कोई राजनीति से घृणा करना सिखा रहा है तो कोई मीडिया से। कोई हमारी शिक्षा पद्धति को खराब बता रहा है तो कोई बारिश से ही बेहाल हो रहा है। हमारी चिकित्सा प्रणाली को तो कूड़े के ढेर में डालने की पूरी कोशिश है। इसलिए आप सभी के चिंतन का विषय है कि क्या भारत को हम उस राजकुमार की तरह त्याग दें या फिर उसे पुन: स्वस्थ और सुंदर बनाने में सहयोगी बने।
अजित गुप्ता - हमारे समाज में यह भ्रान्ति है की एलोपैथ ही सब कुछ है। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। समाज का double standard शर्मनाक है।
दिव्या - दिल्ली और मुंबई की बारिश का राष्ट्रीय चरित्र हो गया है। चार बूंदें गिरती हैं और चालीस ख़बरें बनती हैं। राष्ट्रीय मीडिया ने अब तय कर लिया है जो इन दो महानगरों में रहता है वही राष्ट्रीय है। मुझे अच्छी तरह याद है,बिहार की कोसी नदी में बाढ़़ आई। राष्ट्रीय मीडिया ने संज्ञान लेने में दस दिन लगा दिए, तब तक लाखों लोग बेघर हो चुके थे। सैंकड़ों लोग मर चुके थे। राहत का काम तक शुरू नहीं हुआ था। वो दिन गए कि मल्हार और कजरी यूपी के बागों में रची और सुनी जाती थी। अब तो कजरी और मल्हार को भी झूमने के लिए दिल्ली आना होगा। वर्ना कोई उसे कवर भी नहीं करेगा।
रवीश कुमार
कुछ टिप्पणियां
प्रशासनिक पदों पर चयन के लिए उम्र की जो अधिकतम सीमा निर्धारित सीमा है उससे पुष्पराज जैसे इक्का-दुक्का लोगों को तो लाभ हो जाता है लेकिन एक बहुत बड़ी संख्या इस दौड़ में आखिरी समय तक शामिल होने के बाद अपना जीवन घनघोर कष्ट में बिताने के लिए अभिशप्त हो जाती हैं। आजकल पीसीएस में चयन के लिए कड़ी मेहनत और अच्छी प्रतिभा के साथ-साथ अच्छे भाग्य की जरूरत भी पड़ रही है।
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी अनंत अन्वेषी के ब्लॉग पर
अजित गुप्ता
मेरी पसन्द
यदि अब भी साँप की तरह ही होते
तो अब तक उग आते पँख उनके
और दादी की किस्सों की तरह उड़ने लगते
आसमान में
जब से,
परियाँ आसमान से
नही उतरी ज़मीन पर
और मेरे पास वक्त नही बचा
न दादी के लिये और न अपने लिये
साँप,
पहनने लगे हैं इन्सानी चेहरा
और बस्तियों में रहने लगे हैं
बड़ा खौफ बना रहता है
किसी इन्सान के करीब से गुजरते हुये
मुकेश कुमार तिवारी
सीधा सपाट मस्त कलेक्शन...
जवाब देंहटाएंbahut khoob.........anupam andaaz.....
जवाब देंहटाएंबेचारे साँपों को क्यों बदनाम करते हैं? वे अनावश्यक किसी को नहीं काटते। मगर इंसान अनावश्यक ही काटता है। दोनों में बहुत अन्तर है भाई। परिश्रम से तैयार किया चर्चा, आभार।
जवाब देंहटाएंअच्छे लिंक्स ..
जवाब देंहटाएंकविता आज का यथार्थ बन गयी है ..
आपके दो लाईना नहीं पढ़े लम्बे समय से ...!
सभी रंग समेटे सुन्दर चर्चा....
जवाब देंहटाएंregards
प्रमोद जी की पोस्ट से आगे....
जवाब देंहटाएंदिल्ली के धौला कुआं पर आर्मी का एक गोल्फ़-मैदान है. इसकी पार्किंग व मुख्य मैदान के बीच से जनकपुरी को जाने वाली सड़क गुजरती है. सेना के दो-चार बड़े साबह लोग सुबह-शाम यहां गोल्फ़ खेलने आते हैं. उनकी सुविधा के लिए सरकारी पैसे से यहां एक बिजली से चलने वाला एक्सलेटर लगाया गया है. (एक्सलेटर अपने आप चलने वाली उन सीढ़ियों को कहते हैं जिन पर बस खड़े होना होता है, चलने की ज़रूरत नहीं). एक्सलेटर का एक सिरा साहब लोगों की पार्किंग में है तो दूसरा ठीक गोल्फ़-मैदान के गेट पर.
यहीं से महज़ 300 मीटर दूर धौला कुआं के वे बस-स्टैंड हैं जिनका प्रयोग हरियाणा, राजस्थान वा पश्चिमी दिल्ली के हज़ारों लोग प्रतिदिन करते हैं. इनमें से, बहुत से अंतर्राज्यीय यात्री सामान व परिवार के साथ होते हैं. इनके परिवारों में बच्चे, बुजुर्ग व महिलाएं भी होती हैं. इनमें से कई लोग तो इस तरह की तेज़-रफ़तार व भीड़-भरी सड़कें पार करने के अभ्यस्त तक नहीं होते. इस सड़क को राष्ट्रीय राजमार्ग-8 के नाम से जाना जाता है. इसे पार करना बच्चों को खेल नहीं है.
लेकिन यहां एक्सलेटर तो दूर, एक फ़लाईओवर तक की ज़रूरत किसी सरकार, राजनेता या बाबू को आज तक नहीं महसूस हुई. तरस खाकर, मुख्य बस-स्टैंड से बहुत दूर, अब एक सर्वथा असुरक्षित सब-वे बनाया गया है जो सुरंग सा लगता है. जिसके भीतर सामान सहित जाना व वाहर आना खालाजी का बाड़ा नहीं है. दूसरे, इसका प्रयोग करने के कारण दो बस-स्टापों के बीच की दूरी लगभग एक-डेढ़ किलोमीटर बढ़ गई है.
ग़रीब आदमी फिर ठगा खड़ा है. अंधों की रेवड़ी बंट रही है.
अच्छी चर्चा करती पोस्ट ,आभार ...
जवाब देंहटाएंकाजल जी सम्बेदनाएं बहुत ही उम्दा है ,क्या करें देश का प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के पद पर बैठा व्यक्ति भी महीने में एक दिन भी गरीब के असल उत्थान व जरूरत के बारे में नहीं सोचेगा तो ऐसा ही होगा बल्कि गरीबों की अवस्था और भी खराब ही होगी ....
जवाब देंहटाएंकई अच्छे लिंक दिए आपने ! शुभकामनायें आपको !
जवाब देंहटाएंबहुत विविधता भरे पोस्टों के साथ सुंदर प्रस्तुतिकरण !!
जवाब देंहटाएंगज़ब के लिंक दिये हैं …………एक से बढकर एक प्रस्तुति।
जवाब देंहटाएंएक से बढकर एक.
जवाब देंहटाएंबढ़िया चर्चा..सुन्दर प्रस्तुतिकरण
जवाब देंहटाएंहमेशा की तरह स्तरीय चर्चा. मुकेश जी की कविता भी बहुत सुन्दर है.
जवाब देंहटाएंभूल सुधार... एक्सलेटर = एसक्लेटर
जवाब देंहटाएंसभी रंग समेटे सुन्दर चर्चा....
जवाब देंहटाएंप्रणाम...
बेहतरीन चर्चा
जवाब देंहटाएं.
जवाब देंहटाएं.
.
आभार!
...
acchhe links mile. badhiya charcha.
जवाब देंहटाएंधीरू भाई जी के ब्लोग पर वसीम बरेलवी जी की सीरीज की डिमान्ड प्रवीण जी के साथ साथ हम भी कर आये थे..
जवाब देंहटाएंप्रमोद जी की छोटी छोटी बाते तो हमको भी बजा गयी उन छोटी छोटी बूदो के जैसे ही.. पुरानी वाली पोस्ट देखते है..
बरसात मे काफ़ी लोग बौराये है, हम भी शायद :) आपकी खतरा पोस्ट भी पढ चुके है, रविश जी की देखी जाय.. मुकेश जी काफ़ी दिन के बाद अपनी कविता लेकर आये.. चिट्ठाचर्चा के सौजन्य से ही मैने उनकी एक कविता पढी थी ’मै, तुम, बेटा और दीवारे’। वो अभी भी मेरी वन ओफ़ द फ़ेवरिट कविता है.. मैने अपने ब्लोग पर भी उसे शेयर किया था...
आभा जी के मानस से मिला और ’भानी’ के बारे मे भी पता चला।
कुल मिलाकर नीयरली सारी पोस्ट्स पढी हुयी है.. बहुत सुन्दर चर्चा
जवाब देंहटाएंपढ़ा !