June 17, 2007

[चर्चाकारः मसिजीवी] [20 टिप्पणियाँ]


आज ऐसे एक चिट्ठे की चर्चा जो (अब) नहीं है-

लो प्रत्‍यक्षा तुम्‍हें छोटा सा बहाना चाहिए था खुश होने का, हम एक बड़ा सा कारण दे देते हैं, कारण यह है कि ये दुनिया आज सुबह सात बजे से एक बहुत अच्‍छी दुनिया बन गई है, सब बुरों और बुराइयों से मुक्‍त-
हमारी यह अच्छी-बुरे लोगों से भरी दुनिया, अब सिर्फ अच्छी, और अच्छी
बनने जा रही है. इसकी प्रक्रिया तो शुरु हो ही चुकी है, जहां असहमति का कोई जगह नहीं. अब आप इस दुनिया को एक आदर्श दुनिया बनाने वाले हैं, जहां सब अच्छा ही अच्छा हो. अच्छी बातें. अच्छे लोग. वाह! ऐसी आदर्श दुनिया में विरोध का क्या काम?धुरविरोधी का क्या काम? यहां तो सिर्फ सहमति की ही जगह है. इसलिये उचित यही है कि इस विरोध को विराम दिया जाय.


धुरविरोधी का परिचय देना एक कठिन काम है, वैसे अपनी एक पोस्‍ट में उन्‍होंने बता दिया था कि -मेरा नाम जे.एल.सोनारे है, मैं मुम्बई, गोकुलधाम के साईंबाबा काम्प्लेक्स में रहता हूं, उम्र उनतीस साल, एक फिल्म प्रोडक्शन कंम्पनी में थर्ड अस्सिस्टेंट हूं, मतलब, चपरासी जैसा काम। वे सुनीता फाल्‍के पर लट्टू थे जो उनसे कहीं ज्‍यादा कमाती थी, वहॉं इस ज्‍यादा कमाई ने धुरविरोधी को चुप कर दिया था। और यहॉं हम सब ने मिलकर धुरविरोधी की हत्‍या कर दी- जब विरोध का दम घुटता है तो धुरविरोधी को मरना ही पड़ता है।

‘धुरविरोधी कौन है’ की शुरूआत में ही धुरविरोधी ने बता दिया था कि- ये सब झूठ है. मैं जे एल सोनारे नहीं हू, न मुम्बई में रहता हूं. मैं ब्लाग की दुनिया में धुरविरोधी के नाम से हूं, यही मेरा परिचय है. इसी न जाने कौन धुरविरोधी ने हिदी चिट्ठाकारी को अब तक की कुछ सबसे दमदार पोस्‍टें दीं जो साल की सबसे लोकप्रिय पोस्‍टों में शुमार हैं किंतु नारद की इन सबसे लोकप्रिय पोस्‍टों के लिंक को क्लिक करके तो देखें- आज वे वहॉं ले जा रही हैं जहॉं वह नहीं है जो आप खोज रहे हैं।
असहमति की मौत पर विजयगान गाने वाले गिरीराज जी और महाशक्ति जाहिर है प्रसन्‍न होंगे कि धुरविरोधी हट गया (वरना वे हटवा देते), खुद मिट गया (वरना वे मिटा देते)। ई-पंडित तकनीकी पक्ष समझाकर कहेंगे कि चूंकि अपने चिट्ठे का पासवर्ड सिर्फ धुरविरोधी के पास था इसलिए वे खुद ही उसे मिटा सकते थे इसलिए इस अंत की जिम्‍मेदारी नारद, जितेंद्र या आपकी हमारी नहीं है- यह आत्‍महत्‍या है इसे हत्‍या कहना तकनीकी तौर पर गलत है। फिर वे उन दिक्‍कतों के विषय में बताएंगे जो किसी चिट्ठे के खुद हट जाने से एग्रीगेशन में होती हैं हालांकि धुरविरोधी को भी चिंता थी कि कहीं उनके चिट्ठे का शव जितेंद्र के नारद की एग्रीगेशन मिल में दिक्‍कतें पैदा न करे और इसके उपाय भी उन्‍होंने किए थे-
मैं सुनो नारद पर भी ई-मेल कर रहा हूं कि इसकी फीड नारद से कल हटा दें,
जिससे नारद को किसी तरह फीड की दिक्कत न आये.


अनूप भी कहेंगे कि धुरविरोधी नहीं रहा ये अप्रिय हुआ लेकिन गलत नहीं हुआ।

पर जो जानते हैं कि असहमति का बना रहना जीवन के बने रहने से भी ज्‍यादा जरूरी है वे मानेंगें कि धुरविरोधी का जाना गलत हुआ और राहुल को धकियाने, अविनाश को लतियाने की स्‍वाभाविक परिणति थी कि धुरविरोधी को जाना पड़ता। वे ये भी जान लें कि भले ही धुरविरोधी जे एल सोनारे की जगह के पी गुप्‍ता, तिलकद्वार, मथुरा बनकर वापस आ सकता है पर उसे भी जाना पड़ेगा- ओर ये भी कि वे सब पोस्‍टें जो टिप्‍पणियों सहित मिट गईं- उनका मिटना एक अध्‍याय का मिट जाना है। उनका मिटना भी जरूरी था क्‍योंकि वे लगातार खटकती रहतीं सहमति के पैरोकारों के समक्ष। धुरविरोधी ने कहा था कि ये प्रतिबंध हमें अंधी गली में अंधी गली में धकेल देंगे पर जिन्‍हें लगा था कि ऐसा नहीं है क्‍या उन्‍हें अभी भी अंधेरा नहीं दिख रहा।-

ॐ द्यौ शान्तिरन्तरिशँ, शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्ति
वनस्पतयः शान्तिविशवेदेवाः शान्तिब्रम्हा शान्तिँ, सवॅ शान्तिः शान्तिरेव शान्ति
सामा शान्तिः, शान्तिरेधि़,ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः




और हॉं मुझे लगता है संजय बेंगाणी गंदे नैपकिन कतई नहीं हैं। धुरविरोधी, अफलातून, मसिजीवी, अविनाश, रवीश, प्रियंकर, अनामदास, नसीर, राहुल, दुखदीन, विनोद.... ये सब गंदे नैपकिन हैं- इस गंदे नैपकिन नस्‍ल को हटाइए और साफ नैपकिनों की दुनिया बसाइए

20 टिप्पणियाँ

RC Mishra ने कहा… @ June 17, 2007 11:10 AM

एक ने भावुक होकर गलत निर्णय लिया, दूसरा उसकी जिम्मेदारी तीसरे पर डालकर खुद एक बार फ़िर एक वृहद मञ्च पर क्या जताना चाहता है? अब चिट्ठा चर्चा पर भी निजी बातों-विवादों को उठाया जा रहा है, सिर्फ़ इसलिये कि, एक बार आप Contributor बन गये तो चिट्ठाचर्चा के नाम पर ये भी सही है, मेरे विचार से ये प्रविष्टि आपको अपने ब्लॉग पर लिखनी चहिये थी।
हम इस पर किसी के व्यक्तिगत विचार नही बल्कि चिट्ठा-जगत की हलचल और प्रस्तुति की शैली का आनन्द उठाने के लिये आते हैं।

Neelima ने कहा… @ June 17, 2007 11:39 AM

आप लोग ये कर क्या रहे हैं ? शांति बहुत जरूरी चीज भी नहीं है पर संघर्ष का भी अपना एक तेवर होना चाहिए जो कि जाहिर है कि रचनात्मक होना चाहिए ! धुरविरोधी के विरोघ का अपना एकदम निजी तरीका है इसपर सेंटी होने की भी जरूरत नहीं है उक्त विचार भी आपके एकदम निजी हैं ! आप सब को आओ राय मिलाऎ खेलने की जरूरत क्यों पड रही है वह भी इतनी कटुता के साथ ? वैसे मिश्रा जी चिट्ठाजगत की हलचल ही को यहां प्रस्तुत किया गया है लेकिन बहुत भावुक मन के साथ! और हां मसिजीवी जी धुरविरोधी के जाने को आप ऎसे देखो कि वो आएगा फिर नई दस्तक देगा नए घोरविरोधी तेवरों के साथ क्योंकि विवश कर देगा उसे उसका यही तेवर क्योंकि ......दुनिया हर जगह एक सी है ! कहां जाएगा एक विरोधी मन आखिर विरोध भी जीवन का एक जरूरी शेड है ! पर बस अब बहुत हुआ आगे बढो भी ....

अनूप शुक्ला ने कहा… @ June 17, 2007 11:45 AM

ये भावुक पोस्ट हमारे लैपटाप को भिगो रही है। राहुल के ब्लाग पर बैन से उतना लफ़ड़ा नहीं मचता जितना उसके बैन होने पर विजय घोष मचने और और उसके विरोध में खड़े होने से मच रहा है।लेकिन यह भी अच्छा ही है कि लोगों के विचार सामने आ रहे हैं और आचरण भी। यह इस प्रकरण की छ्द्म उपलब्धि है!

Neelima ने कहा… @ June 17, 2007 11:57 AM
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.
masijeevi ने कहा… @ June 17, 2007 11:59 AM

यदि इस चर्चा से यह लगा कि यहॉं किसी व्‍यक्तिगत का हिसाब चुकाने के लिए चर्चा की गई है तो निश्‍चय ही ये मेरे लेखन व आचरण की कमी रही होगी...उसके लिए क्षमा।
यह चर्चा मूलत: धुरविरोधी के चिटृठे की स्‍मृति में लिखी गई है- राहुल के समर्थन में नहीं है। राहुल निष्‍कासन का विरोध जो इसमें प्रछन्‍न आ गया है वह लेखन की स्‍वाभाविकता है, लिखने वाले की राय तो लिखने में आएगी ही।
कल के चिट्ठों की चर्चा हमारे ही जिम्‍मे थी और हमें कल के चिट्ठाजगत की सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण (व त्रासद) घटना यही लगी- आपकी राय इससे भिन्‍न हो सकती है, होनी चाहिए। कुछ अन्‍य पोस्‍टों की भी चर्चा की है भई...

गिरिराज जोशी ने कहा… @ June 17, 2007 12:52 PM

मसिजीवीजी,

धुरविरोधीजी के चले जाने का दुख संभवतया: सभी को है, मुझे भी... ऐसे में आपका यह कहना कि "असहमति की मौत पर विजयगान गाने वाले गिरीराज जी और महाशक्ति जाहिर है प्रसन्‍न होंगे कि धुरविरोधी हट गया (वरना वे हटवा देते), खुद मिट गया (वरना वे मिटा देते)" इस दुख को और भी बढ़ा देता है।

मित्र, जब विचारों में अत्यधिक उग्रता आ जायें, एक दूसरे के साथ गाली-गलौज़ को तर्क देकर सही ठहराने का प्रयास किया जाये तो सहनशीलता स्वत: ही कमजोर पड़ जाती है, आपकी यह पोस्ट दर्शाती है कि आप अत्यधिक भावुक हो उठे है, होना लाज़मी भी है, "धुरविरोधी" नामक चिट्ठा बंद होना, हम सबकी हार है...

हालांकि निश्चय ही आपने अपनी बात कहने के लिये गलत मंच का प्रयोग किया है मगर भावुकता में आप कुछ ऐसा भी कह गये जो शायद ज़ख्मों को कुरेदने का काम कर रहें है...

मेरा कुछ कहना शायद ठीक न होगा, इसे मेरी पोस्ट से जोड़कर देखा जायेगा, इसलिये मैं बस इतना ही कहना चाहूँगा कि आप एक-दो दिन बाद इसे फिर से पढ़ियेगा।

Beji ने कहा… @ June 17, 2007 1:17 PM

"असहमति की मौत पर विजयगान गाने वाले गिरीराज जी और महाशक्ति जाहिर है प्रसन्‍न होंगे कि धुरविरोधी हट गया (वरना वे हटवा देते), खुद मिट गया (वरना वे मिटा देते)।

और हॉं मुझे लगता है संजय बेंगाणी गंदे नैपकिन कतई नहीं हैं। धुरविरोधी, अफलातून, मसिजीवी, अविनाश, रवीश, प्रियंकर, अनामदास, नसीर, राहुल, दुखदीन, विनोद.... ये सब गंदे नैपकिन हैं- इस गंदे नैपकिन नस्‍ल को हटाइए और साफ नैपकिनों की दुनिया बसाइए"

बहुत दुख की बात है कि आपने उपरोक्त अभिव्यक्ति के लिये चिट्ठा चर्चा का उपयोग किया।

masijeevi ने कहा… @ June 17, 2007 1:52 PM

चिट्ठाचर्चा के मंच के 'दुरुपयोग' की राय एक स्‍पष्‍टीकरण की अपेक्षा रखती है-- चिट्ठाचर्चा में अक्‍सर चिट्ठों के जन्‍म के प्रिय समाचारों से चर्चा की जाती है (आज ही मालवी जाजम पर चर्चा है) जाहिर है चिट्ठों की मृत्‍यु पर चर्चा के लिए भी यह उचित मंच होना चाहिए।

गिरीराज जी व महाशक्ति की विजयगान वाली पोस्‍टों के लिंक ऊपर दिए ही थे इसलिए उस विषय में उन पोस्‍टों पर जाकर देखा जा सकता है।

रही बात भाषा व अभिव्‍यक्ति के उचित न होने की- लेखन में कच्‍चा रहा हूँगा इसलिए ऐसा लगा- किसी को आहत करने की मंशा न थी, ऐसा हुआ है तो खेद है।

Shrish ने कहा… @ June 17, 2007 3:15 PM

मसिजीवी जी अपनी राय रखने का सबको अधिकार है, इसी तरह चर्चाकार को चर्चा स्वतंत्रतापूर्वक करने का अधिकार है ऐसा पहले भी कहा जा चुका है, लेकिन फिर भी यदि आप अपनी व्यक्तिगत राय अपने चिट्ठे पर रखते तो ज्यादा अच्छा होता।

दूसरी बात आप की कल की अपने चिट्ठे पर पोस्ट निष्पक्ष थी, लेकिन मुझे खेदपूर्वक कहना पड़ रहा है कि आपकी आज की पोस्ट में निष्पक्षता नहीं है खासकर पोस्ट के सैकेंड हाफ में। आपको किस तरह विश्वास दिलाएं कि धुरविरोधी के जाने का हम सब को उतना ही दुख है जितना आपको, क्योंकि वे ईमानदार आदमी हैं, अपने लिखे की जिम्मेदारी वहन करते हैं। दुख की बात है कि सागर और धुरविरोधी जैसे शरीफ चिट्ठाकारों को ही जाना पड़ता है जिन्हें जाना चाहिए वो तो झंडा गाड़कर बैठे हैं। फिर भी यह कहना चाहूँगा कि अपने फैसले के लिए धुरविरोधी पूरी तरह खुद जिम्मेवार हैं क्योंकि जिस तरह वे अपनी बात रख सकते हैं उसी तरह औरों ने भी रखी और उसी शिष्ट और संयत भाषा में रखी जिसमें धुरविरोधी ने रखते हैं।

आपने यह पोस्ट भावुक होकर लिखी है, आपकी मनोस्थिति समझता हूँ आप कुछ समय बाद यह पोस्ट फिर पढ़ेंगे तो पाएंगे कि आपने अकारण ही धुरविरोधी के जाने का दोष औरों पर मढ़ा है।

अंत में एक प्रश्न:
सागर को भी एक समय जाना पढ़ा था, वह भी उतना ही गलत था जितना धुरविरोधी का जाना। तब आपकी लेखनी खामोश क्यों रही??

अरुण ने कहा… @ June 17, 2007 3:37 PM

अंत में एक प्रश्न:
सागर को भी एक समय जाना पढ़ा था, वह भी उतना ही गलत था जितना धुरविरोधी का जाना। तब आपकी लेखनी खामोश क्यों रही??

बह्त सही सवाल,इसका जवाब मै भी देखना चाहूगा

Aflatoon ने कहा… @ June 17, 2007 4:31 PM

धुरविरोधी के फैसले पर इस खूबसूरत पोस्ट से चिट्ठाचर्चा की प्रासंगिकता पुख्ता हुई । मुझे भी यकीन है धुरविरोधी आएगा , कुछ देगा भी ,छा भी जाएगा ,शायद आसमान दूसरा हो ।
साधुवाद , मसिजीवी

masijeevi ने कहा… @ June 17, 2007 4:50 PM

प्रिय श्रीश व अरुण,
यदि मैं आज निष्‍पक्ष नहीं दे रहा तो इसलिए कि मैं कल भी निष्‍पक्ष नहीं था मेरी स्‍पष्‍ट ए कराय रही जो कल भी कही थी- हॉं कल से कम संयत हूँ- सच्‍चे शोक में होना ही चाहिए वरना शोक घडि़याली होता है।

सागर के हटने के निर्णय पर भी इतना ही दु:खी था और लेखनी भी खामोश नहीं थ लिखा था- जबाव है कि अदीब को टीस भर मिलतीं हैं....बिन सागर चंद नाहर के चिट्ठाकारी का इतिहास वो नहीं रह जाता है जो उसे होना चाहिए... पर अविनाश को जबरिया धकेल बाहर करने की कोशिश तक से भी चिट्ठाकारी, चिट्ठाकारी नहीं रह जाती

देखें
http://masijeevi.blogspot.com/2007/04/blog-post_24.html

या स्‍वयं सागर भाई से पूछें और पूछें अविनाश से कि उन्‍हें कटघरे में खड़ा किया था कि नहीं।

हॉं श्रीश, धुरविरोधी की मौत आत्‍महत्‍या ही थी।

masijeevi ने कहा… @ June 17, 2007 4:54 PM

पढें -यदि मैं आज निष्‍पक्ष नहीं दिख रहा तो इसलिए कि मैं कल भी निष्‍पक्ष नहीं था मेरी स्‍पष्‍ट एक राय रही....

sunita (shanoo) ने कहा… @ June 17, 2007 5:02 PM

एक हाथ की पाँच अँगुलिया जिस प्रकार एक समान नही होती वैसे ही नारद पर हमारा एक परिवार है हम सब अलग-अलग विचारधाराओं के साथ अपना-अपना नजरिया पेश करते है,मगर एक ही हाथ से जुड़े है यानि की लेखन...मुझे बेहद दुख हो रहा है नारद का यदि एक भी मैम्बर जा रहा है तो परिवार का विघटन अब दूर नही...हम तो इस परिवार के बहुत नये सदस्य है आप सभी बहुत समझदार है मगर अच्छा नही लग रहा धुरविरोधी का जाना...इसीलिये कह रहे है...

सुनीता(शानू)

मेरा ई पन्ना ने कहा… @ June 17, 2007 5:11 PM

साधुवाद मसिजीवी, लगता है आप ही ने हमारी 'चिट्ठाचर्चा मे बदलाव की गुंजाइश'पोस्ट पढी ओर समझी है । लेकिन उन चिट्ठाकारो से एक सवाल पूछ्ना चाहूगा जो ये कहते नही थक रहे कि नारद को छोडना उसका निजी फैसला है उसके लिए कोई जिमेदार नही है तो क्या जो किसान रोज आत्महत्या कर रहे है उनके लिए वो किसान ही जिमेदार है सरकार नही ।

RC Mishra ने कहा… @ June 17, 2007 6:10 PM

धुरविरोधी, भावुकता और तकनीक।
मैने ये पोस्ट इस के तुरन्त बाद लिखी थी, अभी तक आप लोगों ने न देखी हो तो देखिये और समझिये।
धुरविरोधी, भावुकता और तकनीक।

Raj ने कहा… @ June 17, 2007 9:23 PM

धुरविरोधी जी की याद मे...
मुरझाऎ हूऎ फ़ुलो की कसम,इस ब्लॉग मे फ़िर ना आऊगा.
मालिक ने अगर भेजा भी कभी,मॆ रहॊ मे खो जाउगा.

mahashakti ने कहा… @ June 18, 2007 7:23 AM

धुरविरोधी का जाना न तो हत्या है और न ही आत्महत्‍या।
इनका जाना तो उसी प्रकार का हुआ कि इन्‍होन जो गड्डे दूसरों के लिये खोदें थे एक एक कर औधे मुँह खुद ही गिर रहे है।

हरिराम ने कहा… @ June 18, 2007 12:34 PM

मित्रो,
वास्तव में 'धुरविरोधी' अमर हो गए हैं। शायद 'सर्वव्यापी' भी। आज उनके विचारों को, उनके चिट्ठे को पहले से सैंकड़ों गुना अधिक लोग तलाश कर पढ़ने का प्रयास कर रहे हैं।

स्वाभाविक है, जिसे 'बैन' किया जाता है, वह कहीं अधिक तेजी से लोकप्रियता हासिल कर लेता है। क्योंकि बच्चे में भी हरेक गुप्त/छुपाई गई वस्तु के प्रति कहीं अधिक उत्सुकता प्रकट होती है।

शायद 'सलमान रश्दी', 'तस्लीमा नसरीन' आदि इतने प्रसिद्ध, इतने लोकप्रिय नहीं होते, यदि उनके नाम 'मौत का फतवा' जारी नहीं होता!

कहीँ हम किसी को रोकने का प्रयास करके "अधिक प्रबल, अधिक तेज, अधिक लोकप्रिय" तो नहीं बना रहे?

V ने कहा… @ December 13, 2008 11:20 PM

ये श्लोक ग़लत दिया है -
ॐ द्यौ शान्तिरन्तरिशँ, शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्ति
वनस्पतयः शान्तिविशवेदेवाः शान्तिब्रम्हा शान्तिँ, सवॅ शान्तिः शान्तिरेव शान्ति
सामा शान्तिः, शान्तिरेधि़,ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः

सही श्लोक इस प्रकार से है

ॐ द्यौः शांतिः अंतरिक्षगुं शांतिः पृथिवी शांतिरापः शांतिरोषधयः शांतिः वनस्पतयः शांतिर्विश्वे देवाः शांतिर्ब्रह्म शांतिः सर्वगुं शांतिः शांतिरेव शांति सा मा शांतिरेधि।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
सर्वारिष्ट-सुशान्तिर्भवतु।

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