हमने अपनी टिपण्णी के रूप में पियूष मिश्रा द्वारा लिखित गुलाल फिल्म का गीत लिखाये तो रही हमारी बात, आइये पलटी मारते है आज की चर्चा की तरफ.. शुरुआत करते है मिथिलेश दुबे जी की पोस्ट से मिथिलेश जी कहते है
सभी जगत ये पूछे था, जब इतना सब कुछ हो रियो तो
तो शहर हमारा काहे भाईसाब आँख मूंद के सो रियो थो
तो शहर ये बोलियो नींद गजब की ऐसी आई रे
जिस रात गगन से खून की बारिश आई रे
देखिए, जो कुछ भी होता है, इसी समाज में होता है और इस बात की दुहाई के साथ कि यह समाज का एक अंग है। मैं इससे इनकार नहीं करता। राइट टू इक्वलिटी की बात पर वे लिखते है..
आगे वे लिखते है..
न्युज चैनल हो या अखबार, अनर्गल विज्ञापनों और नग्न चित्रों से पटे हैं। तेल,
साबुन, कपड़ा सभी जगह यही नग्नता। यहाँ पर मेरा सवाल उन प्रगतिवादी
महिलाओं से है जो की महिला उत्थान के लिए कार्यरत है इस तरह के बाजारीकरण
से उन्हे समान अधिकार मिल रहें है या उनको बाजार में परोसा जा रहा है ?।
चुनाव प्रचार हो या शादी का पंड़ाल छोट-छोटे कपड़ो में महिलाओं को स्टेज पर
नचाया जा रहा है। यहाँ पर महिला उत्थान के लिए कार्यरत लोग न पता कहाँ है।
अब उन्हे ये कौन समझाये कि उनका किस तरह से बाजारीकरण हो रहा है।
टीवी पर दिखाए जा सारे धारावाहिक एक्सट्रा मैराइटल अफेयर पर केंद्रित हैं। तर्क
यह दिया जाता है कि जो समाज में हो रहा है, हम वही दिखा रहे हैं, अगर आपको
न पंसद हो तो आप स्विच ऑफ कर लें। कल को आप टीवी पर ब्लू फिल्में दिखाने
लगें और कहें कि आपको पसंद न हो तो स्विच ऑफ कर लें।
समाज का एक वर्ग तर्क दे रहा है कि हमारे शास्त्रों में समलैंगिक संबंधों और
यौनिक खुलापन को जगह दी गई है। ठीक है, चार पुरुषार्थो में काम को भी रखा
गया है। उसके ऊपर चिंतन करें, यह गलत नहीं, इसका उद्देश्य प्रकृति को
अनवरत रूप से चलने देना है। मगर मात्र खजुराहो के मंदिर व वात्स्यायन का
कामशास्त्र ही भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व नहीं करते। सामाजिक नियम
द्रव्य, क्षेत्र, काल भाव के अनुसार बदलते रहते हैं।
रवि रावत जी अपने ब्लॉग मनोदशा पर श्री राम, कृष्ण को भगवान् मानने से इनकार कर रहे है..
आज छल-कपट का मायाजाल चारों ओर फैला हुआ है। लेकिन क्या राम ने छल नहीं किया या फिर कृष्ण इससे अछूते रहे। कृष्ण का तो एक नाम ही छलिया था। मुझे ऐसा लगता है कि कृष्ण ने सिर्फ अपनी सत्ता मनवाने के लिए महाभारत जैसा दुनिया का सबसे बड़ा युद्ध करवाया था। इसे नाम दिया धर्म युद्ध। जबकि मेरी नजर में कदम- कदम पर यह युद्ध छल और अधर्म की विसात पर लड़ा गया।
आगे वे लिखते है
अब राम की बात करें तो बाली वध में उन्होंने भी छल से ही काम लिया। किसी को भी छिपकर मारना राम जैसे मर्यादापुरुषोत्तम को शोभा नहीं देता।
हालाँकि यदि कोई उन्हें इन बातो पर विस्तृत जानकारी दे पाए तो वे अपनी ये सोच बदल भी सकते है.. ऐसा कहते हुए उन्होंने आगे लिखा है..
हो सकता है कि मुझे उचित तर्क नहीं मिले हैं, इसलिए मैं राम से थोड़ा खफा हूं। अगर कोई भी राम और कृष्ण को लेकर मेरे कुछ सवालों को सही उत्तर देता है, तो शायद में उन पर विश्वास करने लगूं।
यदि आप उनके सवालों के जवाब देना चाहे तो यहाँ क्लिक कर सकते है
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पहले पहल यह खबर पढ़कर मैं हैरान रह गयी थी कि गुजरात में संपन्न माता-पिता अपने बच्चों की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए गुप्तचर संस्थाओं का सहारा लेते हैं.
पर मन यह सोचने पर मजबूर हो गया कि आखिर ऐसी नौबत आयी ही क्यूँ? माँ-बाप को इतना भी भरोसा नहीं, अपने बच्चों पर ?और अगर भरोसा नहीं है तो फिर उन्हें देर रात तक बाहर भेजते ही क्यूँ हैं? बच्चों को वो जाने से नहीं रोक पाते यानि कि बच्चों पर उनका वश भी नहीं.
जाहिर है उनकी परवरिश में कोई कमी रह गयी.अच्छे संस्कार नहीं दे पाए.अच्छे बुरे को पहचानने कि समझ नहीं विकसित नहीं कर पाए. वे अपने काम में इतने मुब्तिला रहें कि बच्चे नौकरों और ट्यूशन टीचरों के सहारे ही पलते रहें.
रश्मि जी का मानना है कि अच्छे संस्कारों की कमी की वजह से ही ऐसा करने की नौबत आती है..
मुंबई में जन्मी,पली,बढ़ी मेरी कई सहेलियां बताती हैं कि वे लोग नवरात्रि के दिनों में डांडिया खेलकर सुबह ४ बजे घर आया करती थीं.साथ में होता था कालोनी के लड़के ,लड़कियों का झुण्ड. उन सबके माता पिता ने उनपर कैसे विश्वास किया?...लोग कहेंगे अब ज़माना खराब है.पर ज़माना हमसे ही तो है. इस ज़माने में रहकर ही,खुद को कैसे महफूज़ रखें, अपना चरित्र कैसे सुदृढ़ रखें,अपने संस्कारों को न भूलें.यह जरूरी है न कि किसी गुप्तचर के साए की दरकार है.
मेरे पड़ोस की मध्यम वर्ग की दो लड़कियां २० साल की कच्ची उम्र में उच्च शिक्षा के लिए विदेश गयी हैं.कभी लिफ्ट में मिल जातीं तो हलके से मुस्करा कर हेल्लो कहतीं.स्मार्ट हैं, पर कभी उन्हें उल्टे सीधे फैशन करते या बढ़ चढ़कर बांते करते नहीं सुना.मैं सुनकर चिंता में पड़ गयी थी,वे लोग वहां अकेले कैसे रहेंगी? पर उनके माता पिता को अपनी परवरिश पर पूरा भरोसा है.
लेख का अंत वे एक शेर से करती है
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"ये पत्थरों का है जंगल,चलो यहाँ से चलें
हमारे पास तो, गीली जमीन के पौधे हैं"
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गन्दी सच्चाई दिखाती है उनकी ये पोस्ट
अरे सुनो मैं आवाज लगा देता हूं।ये कौन है तुम्हारी बीवी?
मै पूछता हूं, यह सोचकर कि किसी जगह कुछ जानकार मित्रों से कह कर कहीं इसे दिहाडी पर लगवा दूंगा । लड़की अबतक सड़क के उस पार जा चुकी है।लड़की के जाते ही वह कहता है
"बेटी है बाबू, ऎसी कुलखनी औलाद भगवान किसी को न दें! अविवाहित बेटी का कुंवारापन टूट जाए तो बाप के लिए गाँव में जगह कहां बचती है बाबू "? इसलिये दिल्ली आ गया हूं।
वह मेरा कंधा बड़े इत्मीनान से झकझोर कर कहता है,मेरी नजर में तो मेरी बिटिया आज भी कुंवारी है बाबूजी!आओ न तुम्हारे थके हुये जिस्म की मालिश करवा दें।__________________________________________________
मेरी बेटी कर देगी न! महताना कुल बीस रूपए दे देना।
पीछे किसी गाडी की लंबी हार्न सुनकर मैं आगे बढ़ जाता हूं ।
देखता हूँ सडक के उसपार एक सेंट्रो कार का दरवाजा खुलता है और खटक से बंद हो जाता है।उसकी बेटी अब सड़क पर नहीहै और मेरे पास से उसका बाप भी जा चुका होता है।
अनायास मेरे दिल से निकल पड़ता है "आह दिल्ली"।
मै, सबसे पहले एक बेटी,फ़िर बहन,फ़िर सहेली,फ़िर पत्नी,फ़िर बहू, फ़िर माँ,फ़िर पिता,फ़िर वार्डन, फ़िर स्पोर्ट्स टीचर और फ़िलहाल "ब्लॊगर" के किरदार को निभाती हुई,"ईश्वर" द्वारा रचित "जीवन" नामक नाटक की एक पात्र।
इसी जीवन के कुछ किरदारों से परिचय कराती उनकी ये पोस्ट त्योहारों पर अकेले रहते बुजुर्गो की व्यथा बताती है..
मैंने पूछा आ गए आंटी कुछ दिन और वही आराम करलेते ------उनका जबाब था ----अपने घर में ही अच्छा लगता है ........मैंने कहा ----फ़िर भी थोडी देख-भाल हो जाती ,-------उसके लिए तुम हो न ........तुम्हे भगवान ने मेरे लिए भेजा है ....मेरे घर के सामने ...........और मै उनका मुझे पर विश्वास देखकर दंग रह गई ....(बाद में पता चला बहन के बेटी- दामाद आने वाले थे इसलिए वे उन्हें वापस छोड़ गई थी )
ईद के दिन सुबह-सुबह फ़िर मुझे जगाया ------आओ गले मिल लो आज मेरी ईद है ----( सुबह से तैयार होकरबैठी आंटी से शाम तक उनका कोई रिश्तेदार मिलने नही आया ........)
कायरे मामी की उम्र भी अस्सी साल के लगभग होगी , इस उम्र में भी क्रोशिये से बुनाई करती है , और सबको सीखाती भी है ,अकेले रहती है ............वे अपने पति की दूसरी पत्नी है ,पति अपने ज़माने के बहुत बड़े वकील थे
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रचना जी का मानना है कि ब्लोग्वानी को सदस्यता शुल्क लेना चाहिए.. 1200 रूपये मात्र..
अगर हम ब्रॉड बैंड के लिये ३०० - १००० रुपए महिना खर्च कर सकते हैं तो १२०० साल कि सदस्यता ब्लोग्वानी कि ले कर अपने लिखे को पढ़वा भी सकते हैं । जो सदस्यता ना ले वो पढ़ तो सकते हैं पर उनका लिखा ब्लॉगवाणी पर आयेगा नहीं । हिन्दी को आगे ले जाने के लिये हम इतना तो कर ही सकते हैं ।
बल्ली राय अपने बारे में कुछ यु लिखते है अपनी पोस्ट में..
पूरी पोस्ट में एक मासूमियत का भाव आपको भिगोये रहता हैबारिश मे भीगना बहुत पसन्द है, जाहिर बचपन मे कागज की नावें बहुत चलायी.
बचपन मे मै बहुत शरारती था और मोहल्ले की वानर सेना का लीडर था.
मै ईश्वर मे विश्वास रखता हूँ.
मै हिन्दी, उर्दू,अंग्रेजी, पंजाबी और फ्रेंच भाषायें बोल लेता हूँ, अब फ्रेंच बोलने के लिये मत बोल देना, मिट्टी पलीत हो जायेगी.
लेकिन मेरे को हिन्दी भाषा सबसे अच्छी लगती है.
कालेज टाइम मे धूम्रपान के कई रिकार्ड तोड़े…..अब स्मोकिंग एकदम बन्द,हालात यहाँ तक कि यदि कोई मेरे सामने स्मोक करे तो धुँए से परेशानी होती है.
जिन्दगी हर रोज कुछ ना कुछ नया सिखाती है, बहुत कुछ सीखा…….नही सीख पाया तो बस किसी से नफरत करना.
मेरा मानना है प्यार के लिये जिन्दगी कम पड़ती है, नफरत के लिये कहाँ जगह है इसमे?
मै किसी को बाय बाय नही कर सकता, मुझे बहुत दुःख होता है किसी को बाय बाय करने मे.
जीवन मे अपनी माताजी से बहुत प्रेरित रहा, अब वो तो नही रही, लेकिन उनके कहे एक एक शब्द आज भी मेरा मार्गदर्शन करते रहते है.
व्यापार के लिये एकदम अनफिट, पिछले अनुभव तो यही बताते है, शायद कई बार दिल से डिसीजन लिये इसलिये.
आत्मनिर्भरता के शौंक की वजह से जल्द ही अपने पैरों पर खड़ा हुआ, पढाई के साथ साथ नौकरी मे भी हाथ आजमाया.
कहते है हर सफल व्यक्ति के पीछे किसी महिला का हाथ होता है, अब मै किस किस का नाम लूँ?
ब्लाग लिखने का मकसद, लोगों तक अपने विचार पहुँचाना और लोगो के विचारों तक पहुँचना.
ब्लाग लिखने के लिये कभी भी ड्राफ्ट का प्रयोग नही किया, जो जी मे आया लिख दिया, हालांकि बाद मे कई बार लगा, कि इससे भी बेहतर लिखा जा सकता था.
आस पास की सबसे बड़ी उपलब्धि-हिन्दी ब्लागजगत के साथियों का सानिध्य पाना.
सपने देखना बहुत पसन्द है, खासकर पिछली जिन्दगी से मुत्तालिक……
प्रेमचंद का सेवासदन डाउनलोड करें
![]() | प्रेमचंद को हिन्दी साहित्य में उपन्यास सम्राट की उपाधि प्राप्त है। 'सेवासदन' ,प्रेमचंद का प्रमुख उपन्यास है,इसका प्रकाशन सन १९१८ में हुआ था। प्रेमचंद को हिन्दी में प्रतिष्ठित करने वाला पहला उपन्यास सेवासदन पहले उर्दू में 'बजारे हुस्न' शीर्षक से लिखा गया था,पर उसका उर्दू रूप हिन्दी रूपांतरण के बाद प्रकाशित हुआ। इसी आधार पर सेवासदन को प्रेमचंद का पहला उपन्यास माना जाता है। आप इस उपन्यास को यहाँ से डाउनलोड करें |
तो दोस्तों ये थी आज की चिटठा चर्चा.. अंत में बात करते है चिटठा चर्चा के बदले हुए रूप की
नया कलेवर
चिटठा चर्चा का हमेशा से प्रयास रहा है अच्छे चिट्ठो की पोस्ट को एक स्थान पर उपलब्ध करना.. खैर पिछले कुछ समय में चिटठा चर्चा की तर्ज़ पर और साथी ब्लोगरो ने प्रयास किये है और कर रहे है ये अच्छी बात है परन्तु चिटठा चर्चा की ही तरह ले आउट बनाकर पाठको को गुमराह करना ठीक नहीं.. फिर भी चूँकि चर्चा का टेम्पलेट एक निशुल्क टेम्पलेट है जिसका उपयोग कोई भी कर सकता है इसलिए हमने चिटठा चर्चा का ही टेम्पलेट बदलना उचित समझा.. और इसीलिए आज आप चर्चा का नया ले आउट देख रहे है..
हमारे लिए ख़ुशी की बात होगी यदि आप टिपण्णी के साथ साथ इस ले आउट से सम्बंधित अपनी प्रतिक्रिया भी दे और साथ ही आपका सुझाव भी दे.. हम इसे और बेहतर बनाने के लिए प्रयत्नरत है..
आभार