रविवार, सितंबर 27, 2009

एक नारकीय चर्चा

कुछ दिन पहले अचानक इस पोस्ट पर नजर गई -

देश नरक बन गया है

“…सुबह सुबह एक दोस्त जो की पूर्वी भारत के एक मशहूर राज्य में सिविल सर्विसेस ट्रेनिंग ले रहा है का फ़ोन आया. वो बता रहा था सभी probationers को अपनी सलेरी स्लिप लेने के लिए 500 रुपये घूस देने हैं! जब राज्य के सिविल सर्वेंट को घूस देना पड़े तो बताने की जरूरत नहीं है की क्या दुर्दशा चल रही होगी! उसने घूस नहीं दिया और उसका कागज़ रुका हुआ है! बाकि सब लोग कैसे ट्रेनिंग के बाद कमाने पे रणनीति भी तैयार कर रहे हैं!…”

अब जब देश नरक बन गया है तो फिर बचा क्या है चर्चा के लिए? इस नारकीय चर्चा से पहले और बाद में कोई चर्चा हो सकती है भला? तो, क्यों न हफ़्ते भर का मौन धारण करें देश की नरकगति के लिए?

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8 टिप्‍पणियां:

  1. इसे पाठ्यक्रम का प्रथम पाठ मानना ही उचित होगा
    कहीं से तो समाजवादी-व्यवस्था का संकेत मिल रहा है

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  2. सप्‍ताह भर मौन से अधिक
    साल भर भी लगे रहें तो
    क्‍या कोई नरकगति से बचा सकता है
    जब रावण हर बरस जल कर
    फिर जिंदा नजर आता है
    वैसे नरक ही जीवन की
    प्रथम पाठशाला है
    स्‍वर्ग बन गया तो
    फिर कोई कुछ वैसे ही नहीं करेगा
    क्‍योंकि फिर जरूरत ही कहां रहेगी ?

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  3. कमाल है यहाँ बरसो से डॉ ओर टीचर गाँवों में अपनी अटेनडेंस दिखाने के नाम पर तनख्वाह का कितना प्रतिशत दे रहे है ...तब देश नर्क नहीं हुआ ......
    एक्साइज ओफ्फिसर की भारती के लिए लाख रुपये की रिश्वत देखर लोग बरसो से भरती होते आ रहे है ...तब भी देश नर्क नहीं हुआ ....
    देश की स्तर प्रतिशत आबादी महीने का ८० रूपया दिहाडी से कम में कई सालो से जीवन यापन कर रही है ...ये देश तब भी नर्क नहीं हुआ ....
    ३ से पांच साल के बच्चो की म्रत्यु दरोमे ४७ प्रतिशत बच्चे सिर्फ कुपोषण ओर डायरिया की वजह से मर जाते है तब भी ये देश नर्क नहीं हुआ ...
    हर दिन देश में एक नारी कही न कही बलात्कार का शिकार होती है .तब भी ये देश नर्क नहीं हुआ ......

    ५०० रुपियो से कैसे नर्क हुआ भला ?????

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  4. मैंने मूल पोस्ट भी पढ़ रखी थी,
    कोई टिप्पणी न दी, क्या फ़ायदा
    मैंने फ़ायदा न देखा और एक टिप्पणी बचा लाया,
    बँदे को इधर ब्लागस्पाट पर आना तो है नहीं ?
    यह है अपना अभेद्य भ्रष्टतँत्र मानस, रवि भाई :)

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  5. ठीक ही है, मौनं सम्मति लक्षणं.

    जिस देश में भगवान बिना रिश्वत और पैरवी के नहीं सुनते हों वहाँ यह कोई नई बात नहीं.

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  6. अरे! हम तो समझे थे कि यह तो ‘एक नार की यह पोस्ट’ होगी:)

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  7. यहां तक तो ले ही आए हैं देश को...

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