शनिवार, जुलाई 17, 2010

अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो

इस चर्चा में दिये गये पहले लिंक को देखकर हो सकता है आप में से कुछ लोग कहें कि इस मंच का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है लेकिन हम तो यही कहेंगे कि शुक्र मनाईये कम से कम इस्तेमाल तो किया जा रहा है वरना तो देश में कई चीजें हैं जिनका इस्तेमाल ही नही हो रहा। जैसे आइपीएल में खेलने के लिये इत्ते ज्यादा क्रिकेट खिलाड़ी हैं लेकिन एशियाड में टीम भेजने के लिये उनका इस्तेमाल ही नही किया जा रहा, देश में पानी से भरी कई नदियाँ हैं लेकिन फिर भी बिजली पैदा करने के लिये उनका इस्तेमाल नही किया जा रहा, जनसंख्या नियंत्रण के लिये इतने साधन हैं फिर भी ज्यादातर लोगों द्वारा उसका इस्तेमाल नही किया जा रहा, इससे पहले ये चर्चा ये लिस्ट थमाते थमाते खत्म हो जाये हम वो लिंक ही आपको थमा देते हैं, आप बताईयेगा ढोल ज्यादा शोर करता है या मीडिया, अब इसे पढ़कर भी अगर आपके चहरे में मुस्कान ना आये तो हम यही कहेंगे देखिये साहेब आप अपनी मुस्कान का इस्तेमाल नही कर रहे।

अब ये कोई जनाब हैं जो अपने को समय बताते हैं और कहते हैं समीर लाल, धीरू सिंह, शिवम् मिश्रा जैसे लोगो का अब क्या होगा??, इनका जो होगा वो तो बाद में होगा लेकिन ये लोग हैं कौन? हम सब भूल गये हैं। लेकिन इतना तो तय है आटो वालों की तो निकल पड़ेगी।

अब पता नही वो इंजीनियर अपने इस ईजाद को अपने गुरूदेव को समर्पित कर पाये कि नही लेकिन ये ब्लोगर इतने मासूम हैं कि अपनी इस पोस्ट को अपने गुरूदेव को समर्पित कर रहे हैं। वजह सिर्फ इतनी है कि उन्होंने उन्हें ब्लोग से धकियाके चिट्ठे तक पहुँचाया दिया। लेकिन इनका और भी बहुत कुछ कहना है -

तरक़्क़ी याफ़्ता व मोहज़्ज़ब समाजों में छोटी छोटी और मामूली मामूली बातों पर शुक्रिया अदा करने का रिवाज है, लेकिन पिछड़े समाज़ों में मन्ज़र इसके बिल्कुल उलटा है, वहाँ शुक्रिया अदा करने के बजाए हमेशा एतेराज़ किये जाते हैं। उनकी मंतिक़ यही होती है कि उसकी ज़िम्मेदारी है लिहाज़ा उसे अदा करना चाहिए। अगर ड्राईवर है तो ड्राईवरी करनी चाहिए, मुहाफ़िज़ है तो उसे पहरा देना चाहिए और अगर सफ़ाई करने वाला है तो उसे सफ़ाई करना चाहिए।यह सोंच हकीकत मैं सही नहीं है

पंजाब स्क्रीन नाम का चिट्ठा देखा और देखकर वाकई में लगा कि स्क्रीन ही है क्योंकि नीचे न्यूज चैनल के किसी स्क्रीन की तरह ब्रेकिंग न्यूज आ रही थी जिसमें आवाजाही का लेखाजोखा दिखाया जा रहा था। इस स्क्रीन में आने की हमारी वजह सिर्फ इत्ती थी - भूखे बच्चों की तसल्ली के लिए, माँ ने फिर पानी पकाया देर तक। सच मानिये नसीबों वाली माँ थी वरना तो कई ऐसी माँयें भी हैं जिनको पकाने को पानी भी नसीब नही होता।

स्वप्नमहल नाम के इस चिट्ठे की पोस्ट पढ़कर हम अपने को ये कहने को मजबूर हो गये मैं नासमझ, अब ये इतने समय तक गायब रहने की वजह से था या कुछ और आप जाकर पढ़िये और हमें भी बताये कि वो लिखने वाले ने अपने लिये लिखा या सिर्फ लिखने के लिये लिखा।

अपने विचार में एक कहानी पोस्ट की गयी है, ऊँच-नीच, तो अगर अभी तक लिखने में कुछ ऊँच-नीच हो गयी हो तो माफ करें क्योंकि इस बहाने ही सही आप चर्चे में तो हैं।

एक हैं पुरूषोत्तम जो अपने कुछ दोस्तों को ढूँढ रहे हैं वजह सिर्फ इतनी है कि वो उन्हें अपने साथ मयखाना ले जाकर उन्हें कुछ जाम पिलाना चाहते हैं क्योंकि

निकले चौराहे पर
जिन्दगी जीने के लिए
कुछ यार मिल गए! बोले
चल मैखाने ,पीने के लिए
हमने सोचा !
इंसान जब पैदा होता है
तो पीता है, हम भी पीयेंगे
फिर इन्हीं दोस्तों के संग,
खुलकर जियेंगे

आगे का हाल आप खुद जाकर देखिये। नाम है मस्तकलम, लिखने वाले का नही बल्कि चिट्ठे का, लिखने वाले हैं सुदामा सिंह। उन्होंने अपनी इस पोस्ट बोलो क्या-क्या खरीदोगे...? में एक बहुत ही विचारणीय बात उठायी है -

भले अपने गांव वाली फुलमतिया चार-छ: पेबंद लगी पुरन की साड़ी लपेटे अपने शहीद हुए सिपहिया पति के मुवावजे के लिए सड़क-सड़क की ख़ाक छानती दिखे.........अपने दायरे में सिमटा हुआ याद करता हूँ वो दिन जब आज की फटेहाल फुलमतिया कल को मिसेज फूलमती वाइफ़ ऑफ सूबेदार मेजर सूरज सिंह कहलाती थी।


बेटा तुम्हारे पिता ने इसे इतनी बार धोया है कि, अगल सा अपने नाम को सार्थक कर रहें हैं ये बताकर।

वो बिहारी को तो आप जानता होगा, वो ही बड़का बिहारी जो ब्लोगर बनने के लिये घर छोड़ दिया था। अब वही हमका आपका छोटा छोटा सीख देने में तुला है। -

एक बार का बात है. हम लोग ट्रेन से कलकत्ता से पटना जा रहे थे. गाड़ी में एगो सज्जन चिनिया बादाम (मूँगफली) खा रहे थे, अऊर छिलका ओहीं जमीन पर गिराते जा रहे थे. हम लोग का आदत है कि सब छिलका एगो अखबार में लपेट कर बाहर फेंक देते हैं. ऊ भाई जी मान के बईठे थे कि रेलवे उनका सम्पत्ति है

देखा ना कित्ता सही सीख दिये हैं कि मूँगफली का छिलका ट्रेन की जमीन में नही ट्रेन से बाहर की जमीन पर गिरायें। बाहर का जमीन बड़ा है इसलिये जल्दी से गंदा नही दिखेगा।

आप सोच रहे होंगे कि चर्चा के टाईटिल का चर्चा से तो कोई लिंक ही नही है, है क्यों नही जनाब वैसा ही लिंक है जैसा अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो में आने वाले शब्दों का एक दूसरे से। वैसे आप ज्ञानी जन क्या बतायेंगे कि इस 'अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो' का मतलब क्या होता है। हमारी अक्ल कहती है कि कई जमाने पूर्व अक्कड़ और बक्कड़ नाम के दो शैतान भाई रहे होंगे जिनकी शैतानियों से तंग आकर उनके अंग्रेजी कम जानने वाले माँ-बाप ने उनसे बोला होगा - अक्कड़ बक्कड़ बॉम्बे गो (यानि अक्कड़ बक्कड़ बॉम्बे चले जाओ) जो कि कालांतर में बिगड़ कर वो हो गया जो इस पोस्ट का टाईटिल। लो जी चर्चा के टाईटिल का चर्चा से लिंक हो गया।

(चर्चा की जनसंख्या का काउंटर कहता है कि आधी से ज्यादा आबादी हमें नही जानती होगी तो सोचा हम भी बताते चलें कि हमारा भी यही हाल है, हम भी नही जानते।)

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8 टिप्‍पणियां:


  1. बिल्कुल सही जा रहे हो, जोशी दाज़्यू !
    एकदम परफ़ेक्ट लाइन व लेंग्थ ( यह दू टर्म त सीखिये लिये हैं, जी !
    बकिया लिंक सब तो एक से एक जानमारी खुरचानी है !
    एतना कि पूरा रात आपही के चक्कर में कट गया ।
    शिव-शँभो शिव-शँभो शिव-शँभो कैलाशपति !

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  2. शिवम् मिश्र की आप बीती और बिहारी बाबू की बेहतरीन पोस्ट पढ़ चूका हूँ ! बाकी लिंक अगले सेशन के लिए सुरक्षित ...
    बहुत दिन बाद पढ़ा आपको ...

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  3. अभी सुबह उठकर देखा कि निठल्ले भाई तरुण ने चर्चा की है। बहुत आनन्दित हुये। सब लिंक देखकर आये। खूबसूरत चर्चा। सिंह और सियार वाली कहानी में आखिरी तक हम ट्विस्ट का इंतजार करते रहे। चर्चा न करते तो शायद रह जाती यह कहानी बांचने से।

    जय हो। अब नियमित चर्चा का विचार किया जाये। किया जाये। जय हो।

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  4. आज त एके दिन में दू-दू गो चर्चा इ मंच से, आनंदम हो गया।
    चर्चा की गहराई बरबस हर लिंक प्रर फेर लगाने को मज़बूर करती है।
    ई त अजब संजोग हि कि एक तरफ़ गद है त दोसर तरफ़ पद, आ पढके मन हो गया गद-गद!
    नियमित चर्चा किया जाए, ई हमरो रिकवेस्ट है।

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  5. अच्छे लिंक्स मिले. धन्यवाद पंजाब स्क्रीन के लिंक के लिए जिसमें हमारे जिक्र का औचित्य ही समझ में नहीं आया हमें .सार्थक चर्चा.

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  6. चर्चा में मेरे ब्लॉग को शामिल करने के लिए आपका बहुत बहुत आभार !

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