शुक्रवार, जुलाई 27, 2012

मीडिया शरीर का बुखार तक मुफ्त में नहीं देता

देश कठिन दौर  से गुजर रहा है। बारिश कम हो रही है। दालों के दाम बढ़ रहे हैं। मारुति का कारखाना अभी खुला नहीं है। बाल ठाकरे बीमार हैं। टीम अन्ना को कवरेज कम मिल रहा है। बैंकों के एटीएम  के ड्रापबॉक्स से लोग चेक उड़ा रहे हैं। उ.प्र. में मायावती की मूर्ति तोड़ दी गयी। असम में हिंसा अभी रुकी है लेकिन हाल बेहाल हैं। कपिल देव ने बीसीसीआई से समझौता करके पैसे हासिल करने का जुगाड़ कर लिया है। देश के बारे में बाकी खबरे पढियेगा आप ब्रेक के बाद तब तक दो-चार पोस्टों का जिक्र कर लिया जाये।
 

टीम अन्ना के कम कवरेज की मीडिया पल्टी को अपनी निगाह से देखते हुये विनीत  लिखा है-अब यही चैनल आंदोलन को शो बता रहे हैं उनका कहना है:
अब कोई अर्णव से जाकर पूछे कि मीडिया इज अन्ना और अन्ना इज मीडिया का नारा कहां गया. वी सपोर्ट अन्ना के सुपर कहां गए और द टाइम्स ऑफ इंडिया का इश्तहार. भाईजी, हम ऐसे ही नहीं कहते हैं कि मीडिया शरीर का बुखार तक मुफ्त में नहीं देता,कवरेज कहां से देगा ? अब देखिएगा केजरीवाल और उनके वृंदों की जुबान उस मीडिया के खिलाफ जल्द ही खुलेगी जिसे अब तक मसीहा मानकर थै-थै कर रहे थे. चैनलों के एक-एक स्लग,सुपर,पीटूसी और एंकर लाइन अन्ना सीजन4 को कमजोर करने में जुटे हैं और इस हालत तक ला छोड़ेगे कि विजयादशमी तक केजरीवाल के पुतले फूंके जाएंगे और क्या पता अबकी बार सोनियाजी लाल किला जाकर रावण के पुतले में नहीं, उनके ही पुतले में बत्ती लगा आए.
दीपक बाबा ने समय के तापमान को कुछ इस तरह देखा:
पिछले दिनों मानेसर में मारुती सुजुकी कंपनी में जो हुआ, उस पर मैं कोई टिपण्णी टिप्पणी नहीं करना चाहता. पर क्यों लग रहा है कि आने वाले दिनों में धार्मिक/भाषाई दंगे इतिहास की बातें हो जायेंगी. औद्योगिक फसाद शुरू होने को हैं... रोटी को तरसते मजदूरों को और उसमे भडकने वाले असंतोष को हवा/समर्थन दिया जा रहा है. 

 जवाहरलाल का चोट-बु्लेटिन जारी करते हुये ज्ञानजी ने लिखा:
जवाहिर लाल जितना कष्ट में था, उतना ही दयनीय भी दिख रहा था। सामान्यत: वह अपने हालात में प्रसन्नमन दिखता है। कुत्तों, बकरियों, सूअरों से बोलता बतियाता। मुखारी करता और बीच बीच में बीड़ी सुलगाता। आज उसके पास एक कुत्ता – नेपुरा बैठा था, पर जवाहिर लाल वह जवाहिर नहीं था, जो सामान्यत: होता था।
अनु सिंह चौधरी ने अपनी अंतिम इच्छा जारी करते हुये लिखा:
 मुझे मालूम नहीं कि मोहभंग हो जाना किसको कहते हैं। ये भी नहीं मालूम कि मैस्लो के आवश्यकता सिद्धांत के पिरामिड पर पांचवें और अंतिम स्तर की आवश्यकता की सिद्धि कभी हो भी पाती है या नहीं। लेकिन इतना जानती हूं कि प्रेम, सुरक्षा, आत्मसम्मान और आत्मसिद्धि का मूल केन्द्र अहं होता है - ये मेरा है, मेरी दुनिया, मेरी बात, मेरी गुरूर, मेरे ख्वाब, मेरी इच्छाएं, मेरा स्वार्थ - इन सबसे जुड़ा हुआ अहं का बोध। उस अहं को तोड़ने के लिए मेरे आस-पास की चीज़ों से मोह तोड़ना होता होगा शायद। और उस मोह को तोड़ देने का सबसे सुन्दर ज़रिया होता होगा दान - कंबल दान, या 101 रुपए का चढ़ावा नहीं, बल्कि सही मायने में दान।
आगे  देखिये उन्होंने अपने शरीर के बारे में क्या वसीयत की:
आंखें, लीवर, लिगामेंट और बाकी जो भी अंग काम में आ सकते हैं, उनका दान कर दिया जाए। इसके लिए किसी भी नज़दीकी सरकारी अस्पताल से संपर्क साधा जा सकता है। बाकी, अंगदान का शपथपत्र, जितनी जल्दी हो सके, मैं भर दूंगी। मेरे शरीर को ना जलाया जाए, ना दफ़न किया जाए बल्कि शव को छात्रों के रिसर्च और एनैटॉमी की बेहतर समझ के लिए मेडिकल कॉलेज को दान कर दिया जाए। इसे वाकई मेरी हार्दिक इच्छा माना जाए।
उधर सतीश सक्सेना जी के हवाले से खबर मिली कि संवेदनशील शायर सर्वज जमाल जी का कुछ दिन से पता नहीं चल रहा है।  साथी ब्लॉगरों ने उनकी सलामती की दुआ की है।

आज से लंदन ओलम्पिक शुरु हो रहा है। देखिये उसकी सुर्खियां टीवी पर आती ही होंगी।


फ़िलहाल इतना ही। बाकी फ़िर कभी।

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12 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणिय, आपने फिर मार दिया मैदान....
    दिलचस्प खबरों से सुबह की शुरुआत...आज का दिन अच्छा गुज़रेगा।

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  2. मारुति घटना प्रकरण दुर्भाग्य पूर्ण है पर बहुत से मित्रो का ऐसे समय में मजदूर शोषण का नारा "लायूड "करना जैसे हिंसा के वोल्यूम को कम करना है .इसमें बहुत से ऐसे लोग है जिनकी बुद्धिमानी ओर विचाधारा मेरे लिए मायने रखते है पर मुझे संवेदनशील बुद्धिमानो का ये " वैचारिक बायस शिफ्ट " हैरान करता है .ऐसा लगता है दुःख भी वर्गीकृत होने लगे है पर .सत्य का तो कोई "पक्ष "नहीं होता न "लेफ्ट "न" राईट ".किसी" विचार समर्थन: के अतिरेक में एक घटना की ओर खड़े हो जाना संतुलन को डिस्टर्ब करता है . ऐसा लगता है दुःख भी आरक्षित है केवल गरीबो के लिए किसी इंसान की दो टाँगे इस तरह से तोड़ देना के वो चल न पाए ओर फिर उस शैम्बर में आग लगा देना ये किसी भी मजदूर वाद का हिस्सा नहीं है .उसके दस साल से दो छोटे बच्चों को क्या कहे यही की ये मजदूर क्रांतियो में से एक का एक हादसा भर था ये क्रूर हत्या है .आज के टाइम्स ऑफ़ इंडिया में इस घटना में बचे एक व्यक्ति का पूरा ब्यौरा है .
    .एक ओर अस्थायी कर्मचारी ,यूनियन के पहचान के लिए लड़ाई. लेबर ला जैसे क़ानून में मजदूरों के अधिकारों को सरक्षण न मिलना उनके लिए प्राथमिक सुविधाओं का अभाव . ओर सत्ता ओर उद्योगपति का गठजोड़ है तो दूसरी ओर भी चीज़े इतनी साफ़ ओर सफ़ेद नहीं है जितनी प्रतीत होती है लोकल गुंडों का यूनियन में दखल ,स्वार्थ के लिए राजनितिक ओर पुलिस का दखल,निजी स्वार्थ .(२०११ में मजूरो के दो नेता ४० लाख रुपये लेकर खुद अलग हुए थे )
    आज से बीस साल पहले मैंने एक यूनियन नेता ओर पोलिस पोस्ट में ऊँचे ताकतवर पद पर बैठे अधिकारी को इस किस्म की हड़ताल से बड़ा मुनाफा उठाते है ओर अगले कई रोज अखबारों में उनकी वाहवाही पढ़कर इस किस्म की इमानदारी ओर संघर्षो से उस उम्र में ही मोह भंग हो गया था ..दरअसल ये कई स्वार्थो .लिप्साओ ओर पैसे का बड़ा तिकड़मी खेल है जिसमे इस्तेमाल मजदूर या प्रबंधन के कुछ कर्मचारी होते है .बंगाल में निवेश का क्या हाल हुआ सबने देखा है .
    किसी भी हिंसा की निंदा करते हुए इस घटना की त्रासदी को याद रख अब उन लोगो को सामने आकर लेबर ला एक्ट को ओर अधिक मजबूत कर एक्टिव भागेदारी निभानी चाहिए जो इस क्षेत्र के विशेषग है ओर वास्तव में मजदूर ओर प्रबंधन दोनों के हितो को समझते है ओर सत्ता ओर राजनैतिक पार्टियों पर दबाव बनाने में सक्षम है

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    1. दूसरी ओर असम !!! अमेरिका में पंद्रह लोगो की हत्या पे वहां का राष्टपति दुःख प्रकट करने खुद स्टेटमेंट देने आता है ,कई प्रोग्राम कैंसिल हो जाते है . असम में 1 .7 लाख लोग बेघर हो गये है .कितने लोग मारे गये है हम यहाँ कल सुबह से लोकतंत्र का भौंडा अश्लील राजसी प्रदर्शन देखते है . वर्तमान हालातो में असम को पहुंचाने के लिए राष्ट हित को दरकिनार करती सभी राजनैतिक पार्टिया क्या देशद्रोही नहीं है .इलेक्शन कमीशन के रिकोर्ड के मुताबिक असम में ढाई लाख से ज्यादा व्यक्ति संदेहस्पद वोटर है .जिनका केस चल रहा है .दूसरी बात वहां एक अजीब सा नियम है अगर आप किस व्यक्ति को "इल्लीलीगल माइग्रेंट" कहते है तो आपको उसे प्रूव करना है जिसको कहा गया उसे नहीं करना .१९८३ के इलेक्शन में तकरीबन ३५ हज़ार लोग असम में इल्लिलिगल डिटेक्ट हुए थे जिनके वोट के अधिकार की चुनौती दी गयी थी ये एक नॉन फेक्ट है .
      दरअसल इन्हें रिकोगनाइजड करने का अधिकार जिन लोगो के पास है उनके अपने निजी स्वार्थ है .एक ओर बात है अब बंगलादेशी आस पास के एरियो में फैलने लगे है . नागालेंड की पोपुलेशन २००१ के सेन्सस के मुकाबले कई प्रतिशत का इजाफा हुआ है जिसका कोई एक्सप्लेनेशन किसी के पास नहीं है .
      .ऐसा नहीं के अमेरिका बिलकुल राम राज्य है पर वहां दुःख अभी भी भोगोलिकता में बंटे हुए नहीं है .आप उन्हें कितना ही बुरा ओर क्रूर कहे पर कम से कम उसके लिए राष्ट हित सर्वोपरि है अब देखिये ओसामा को कितने साल बाद ही उन्होंने घुस कर मारा तो .यानी इच्छा शक्ति थी देश के दुश्मन को ख़त्म करने की .26 / 11 हो या संसद पर हमला हमने किया क्या ? चीन ने कश्मीर पे ररेलवे ट्रेक बिछा दिया ,मिजोरम ओर दूसरी जगह जगह कब्ज़ा ली ,ब्रह्मपुत्र के रुख को मोड़ रहा है , समुन्द्र में अब ओर हड़का रहा है .बंगलादेश जिसे हमने आज़ाद करवाया था वो हमारे यहाँ आतंकवादी भेज रहा है हम उसे बिना कोई समय सीमा तय किये नदी से पानी देने की नीतिया देने की कोशिश कर रहे है इधर नेपाल उधर श्रीलंका . हम क्या कर रहे है पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेल रहे है ,आपस में लड़ मर रहे है .राजनैतिक इच्छा शक्ति ओर दृढ निर्णय लेने की शक्ति का अभाव वास्तव में इस देश की आने वाली नस्लों को इतने जटिल हालात में भेज रहा है के आने वाले ५० सालो में देश एक जुट भी रह पायेगा या नहीं कहना मुश्किल है .
      दिक्कत ये भी है कहने को"सूचनाओं की आंधी "वाले इस युग में वास्तविक सूचनाये अब भी परतो नीचे दबी है कुछ भौगोलिक क्षेत्रो का दुःख पूरे भारत का दुःख नहीं बन पाता है न वहां के हालात की वास्तविक जानकारी . इलेक्ट्रोनिक मीडिया जो सूचना का सबसे बड़ा ओर सुलभ माध्यम है वो ये डिस्कस कर रहा है प्रणव मुखर्जी को खाने में क्या पसंद है ? कल जी टी वि पर लगतार ये न्यूज़ चलती रही द्रश्य के साथ के मायावती की मूर्ति टूट गयी जैसे पता नहीं बहुत बड़ा आसमान टूट पड़ा खबर पेश करने का अंदाज़ अपने आप में सनसनी फैलाने जैसा था उस पे टूर ये के साहब हम जिम्मेदार चैनल वास्ते अपील करते है के कोई न भड़के .
      हम किस ओर जा रहे है ? ऐसे कौन से कारण है के कोई भी पार्टी कभी भी नाराज होकर व्यवस्था को हाइजैक कर सकती है ?

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    2. पंद्रह अगस्त ज्यादा दूर नहीं है लोग " मेरे देश की धरती सोना उगले " बजायेगे ओर देशभक्ति की अपनी दूसरी किस्त पूरी कर लेंगे

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  3. समाचार तो सारे ऐसे हैं कि आदमी को बुखार हो जाए..
    पोस्ट्स अच्छी थीं.. डा. अनुराग जी के विस्तृत कमेंट विचार करने लायक हैं..

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  4. पोस्ट अच्छी है, लेकिन डॉ. अनुराग की टिप्पणी ऐसी बातों की ओर इशारा करती है, जो आने वाले समय में देश के सामने और भी कई सवाल उठाने वाले हैं. हम ज्यादा से ज्यादा मीडिया पर आश्रित होते जा रहे हैं और मीडिया क्या दिखाता है, सभी को मालूम है. असं की सच्चाई क्या है? ये सबके सामने आना चाहिए, नहीं तो ऐसे एक-दो नहीं कई कश्मीर पैदा हो जायेंगे.

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  5. हमें तो ब्लॉगर सर्वज जी के गुम होने से व्यग्रता हो रही है। सतीश सक्सेना जी उन्हे ढूंढ़ पाने में सफल हों, यह कामना है।

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  6. इतने समाचार पढ़कर अब अख़बार पढने की ज़रुरत ही नहीं रही . वैसे भी अख़बारों में जो भरा पड़ा रहता है , उन्हें पढने का दिल भी कहाँ करता है .

    वैसे कहाँ तक आक्रोश प्रकट करें !

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  7. डा.अनुराग जी, की टिप्पणी को पढ़ कर ह्रदय थरथरा उठा है...
    अब तो मुझे भी लगने लगा है कि आने नस्लों को राजनैतिक झंझवातों का सामना करना ही पड़ेगा।

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