गुरुवार, जुलाई 26, 2012

पेड़ों के पत्ते सूखे धोबी के लत्ते सूखे

आज सुबह जब ब्लॉग देखने शुरु किये तो ललित कुमार की पोस्ट का शीर्षक देखा- कृपया मझे नाराज न हो!   
उत्सुकता हुई कि कौन नाराज हो गया भाई! गये उनके कने तो पता चला कि किसी ब्लॉगर को उन्होंने किसी ब्लॉगर को उसके ब्लॉग की कुछ कमियां बताईं इसलिये वो उनसे नाराज हो गये। 

ललित कुमार ने अच्छे  ब्लॉग की जरूरतें सीरीज में कुल सत्रह पोस्टें लिखीं हैं।  इनको पढ़कर पता चलता है कि किस तरह अपने ब्लॉग को बेहतर बनाया जा सकता है।

ब्लॉग के बारे में कुछ बातें नये सिरे  से लिखना शुरु करने वाले सतीश चन्द्र सत्यार्थी भी हैं, जिनका मूड कल की चर्चा  पढ़कर फ़िलासिफ़ियाना हो गया! सतीश ने अपना ब्लॉग बनाने के पांच कारण बताये हैं। अपनी सबसे नयी पोस्ट में सतीश ने विदेशी महिलाओं के प्रति भारतीय पुरुषों का नजरिया की जानकारी दी है। सतीश बताते हैं कि विदशी महिलाओं से बदतमीजी करने वाले शायद यह सोचते होंगे:
विदेशी महिलाएं हाफ-पैंट और स्कर्ट में रहती हैं. उनके देश में लड़का-लड़की सब कुछ खुलेआम करते हैं. कोई खुलेआम उनको धर पकड़ ले. उनको जबरदस्ती इधर-उधर हाथ लगाएं तो उनको अच्छा लगता है यह सब. हमारे भारत की लड़कियों जैसी नहीं होती हैं ये. इनके कल्चर में यह सब बुरा नहीं होता. वैसे यह सब हमने देखा नहीं है. पढ़ा तो जिंदगी में नहीं. कुछ लौंडे-लपाड़े टाइप दोस्तों को इन देशों के कल्चर के बारे में बहुत पता है. वही बताते हैं. इसलिए हम विदेशी टूरिस्ट औरतों से बहुत ‘खुल’ कर बीहेव करते हैं.
 सतीश लिखते हैं कि वे महिलायें क्या सोचती हैं ऐसे मसलों पर:
जब खुली-संस्कृति वाले देशों की महिलाएं भारत जैसे देशों में जाती हैं और उनके साथ ऐसा व्यवहार और ऐसी घटनाएं होती हैं वो बुरी तरह डर जाती हैं. क्योंकि उन्होंने जीवन में ऐसी घटनाओं का सामना कम ही किया होता है, इसलिए उन्हें यह भी पता नहीं होता कि ऐसी सिचुएशन में कैसे प्रतिक्रिया की जाए. फिर दूसरे देश में होने के कारण भाषा की समस्या और पुलिस का रूखा रवैया, ये सब उन्हें बस सब कुछ सह लेने को मजबूर करता है . और अंततः वे हमारे देश और संस्कृति के बारे में एक गंदी इमेज लेकर वापस लौटती हैं. यह सब मैं कोई थ्योरी या अपने विचार नहीं बतला रहा बल्कि मैं ऐसी कई महिलाओं से मिला हूँ जो भारत से घूम कर आयी हैं और उन्होंने अपने अनुभव मेरे साथ शेयर किया.
 निशांत के ब्लॉग पर जायें तो आपको जानकारी मिलेगी एक बहुत बड़ी संख्या और कुछ प्रसिद्ध संख्या के बारे में। उधर देखिये कुछ परिभाषायें बताते हुये अभिषेक ओझा ने बताया कि समानता क्या होती है:
समानता: ये कोई पौराणिक कथा नहीं। बचपन में खेत में खाद डाला जा रहा था। खेत के एक हिस्से के लिए खाद कम पड़ गया। एक बुजुर्ग ने कहा - वक़्त रहते बाजार से खाद लेते आओ, नहीं तो बचा हुए खेत गाली देता है ! गौर करें - यहाँ निर्जीव की बात है।

परिभाषाओं की ही बात करें तो किस्से-कहानियां क्यों छोड़े जायें। देख लीजिये शिवकुमार मिश्र के ब्लॉग पर रामायण महाभारत जमाने की कथाओं के नये रूप! युधिष्ठर बेचारे अपने भाइयों की जमानत का जुगाड़ कर रहे हैं।

इस बीच   लखनऊ में अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन की खबर भी आ गयी है। पहुंचिये।
 
उधर लंदन में  ओलम्पिक शुरु होने वाला है।   किस खिलाड़ी से क्या उम्मीदें हैं देखिये यह भी। मान लीजिये पदक  न भी मिले तो घूमने का हिसाब तो है ही। कुछ झलकियां   देखिये शिखा के ब्लॉग पर।

पुरानी स्लेट, बाल कविता और चवन्नी भर चकबक में गिरिजेश एक पुरानी कविता साझा करते हैं:
पेड़ों के पत्ते सूखे 
धोबी के लत्ते सूखे 
घबराई मछली रानी 
देख नदी में कम पानी। 

सब मिल कर के चिल्लाये 
उमड़ घुमड़ मेघा आये 
ओले गिरे लप लप लप 
हमने खाये गप गप गप!
 और फ़िर बयान करते हैं आज के समय का सच:
ज़िन्दगी इस कविता सरीखी आसान होती तो क्या बात होती! बरेली, कोकराझार, मानेसर और दंडकारण्य जैसे मामले कितनी आसानी से सुलझ जाते! छेड़खानी के बाद चलती ट्रेन से फेंक दी गई लड़की को कोई हवाई राजकुमार बाहों में सँभाल लेता और उन सबकी आँखों में सुराख कर देता जिन्हों ने चुप तमाशा देखा। 
लेकिन ऐसा कहाँ होता है? 
 समय बदल रहा है! लड़कियां आगे आ रही हैं। वे कुछ अच्छा करें तो कहा जाता है कि वे पुरुषों की नकल कर रही हैं। इस सोच के बारे में विस्तार से लिखते हुये रश्मि रविजा कहती हैं:
अब जब पुरुष समाज नए रास्ते पर चल रहा है....और स्त्रियों से काफी आगे चल रहा है (प्रतिशत में ) ...धीरे-धीरे स्त्रियाँ भी उसी रास्ते पर चलने लगी हैं...शिक्षा..नौकरी..अपने घर -परिवार का ध्यान रखती हैं....तो इसे पुरुषों की नक़ल..या बराबरी कैसे कहा जा सकता है?? 
अब उनके लिए अलग रास्ता क्या हो सकता है..जिस से ये नक़ल ना लगे?? यही हो सकता है कि वे बस पीछे रहकर सिर्फ घर और बच्चे संभालें...जो अब प्रगति के पथ पर कदम रख देने वाली स्त्रियों के लिए संभव नहीं. वे  सफलता भी पाएंगी..असफल भी होंगी.....अपनी मर्जी से अपनी जिंदगी जियेंगी....गलतियाँ भी करेंगी...उसका खामियाजा भी भुगतेंगी और उन्हीं गलतियों से  सीखेंगी भी...क्यूंकि दासी वे रही नहीं...देवी उन्हें बनना नहीं..बस एक इंसान ही बने रहना चाहती हैं.

आइये अब मिलवाते हैं आपको एक ऐसे लड़के से जो एक अजीब से डर के किस्से सुनाता  है। अपने ब्लॉग  की दो सौ पोस्टों की जानकारी देते हुये एक नहीं, दो नहीं तीन-तीन पोस्टें लिखता है। फ़ेरारी की सवारी को ताजगी भरी फ़िल्म बताता है। प्रेम कहानियां और  कारों के किस्से    लिखता रहता है। फ़िल्मों के लिहाज से अस्सी के दशक सबसे अच्छा दशक बताते हुये लिखता है:
मुझे नहीं पता की अस्सी का दशक मुझे हमेशा से इतना फैसनेट क्यों करता है..शायद इसलिए की अस्सी के दशक में आई कुछ फ़िल्में मेरी पसंदीदा फिल्मों की सूचि में सबसे आगे रही हैं..कुछ फ़िल्में जैसे गृह प्रवेश, बातों बातों में, क़र्ज़, याराना, सिलसिला, बाजार,मासूम, जाने भी दो यारों, स्पर्श, चश्मे बद्दूर, वो सात दिन, इजाजत...ये सभी अस्सी के दशक में ही रिलीज हुई थी और मैं हमेशा इन फिल्मों के किरदारों को, उनके बातचीत करने के, रहने सहने के ढंग को बड़े गौर से देखता हूँ..ये फ़िल्में देखते हुए मुझे लगता है की मैं उस ज़माने में खड़ा हूँ कहीं.मुझे लगता है की मैं उन दिनों के सुकून भरी जिंदगी को महसूस कर सकता हूँ.मुझे लगता है की मैं यारों की वैसी महफ़िल का एक हिस्सा हूँ जो फिल्म में मुझे देखने को मिलती है.ये सब फ़िल्में मैंने जाने कितनी ही बार देखी है, और हर बार मैं फिल्मों में, उनके किरदारों में खो जाता हूँ.
 
हां भाई हम बात कर रहे हैं अभिषेक कुमार की जो अपने बारे में लिखते हैं- बस कुछ सपने के पीछे भाग रहा हूँ, देखता हूँ कब पुरे होते हैं वो...होते भी हैं या नहीं!

अभिेषेक का आज जन्मदिन है। उनको मुबारकबाद देते हुये दुआ करते हैं कि उनके सारे सपने पूरे हों। भाग-दौड़ के बीच सुकून का जीवन  भी मिले। उनका जन्मदिन मंगलमय हो शुभ हो! चलते-चलते  ब्लॉग-खिचड़ी चखते चलियेगा।

आज के लिये फ़िलहाल इतना ही। बाकी फ़िर कभी।  यहां का चित्र सुनील दीपक जी के ब्लॉग से साभार!