शनिवार, जुलाई 07, 2012

बादल की अठखेलियाँ बारिश का उत्पात

बड़े इंतजार के बाद पानी बरसा। चैनल वालों ने सूखे की आशंका वाले समाचारों में सूखे की जगह बाढ़ लिखा। आवाज में उतार-चढ़ाव वही है बस आंखों में सूखे की जगह पानी का सीन चिपका दिया। चिलचिलाती धूप में खड़े होकर रिपोर्टिंग करने वालों को पानी भरी सड़क पर माइक थमा के कैमरा परशन के साथ भेज दिया। सड़कों पर पानी भरा है। छतों से पानी चूने लगा है। मेढ़क वगैरह भी टर्राने का काम संभाल लिये होंगे।

कवियों के हृदय पटल से कवितायें उचकने लगी। लोग अपनी कविता-कारगुजारियों को प्रणय गीत कहकर पेश कर रहे हैं।

घरों में पकौड़ियां छन रही हैं। अपने मिजाज के मुताबिक लोग गीत गुनगुनाने लगे हैं। कोई आह्वान कर रहा है- बरखा रानी जरा जम के बरसो तो कोई रोअंटे मोड में है और गुनगुना रहा है- आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया

हर जगह बारिश के जलवे हैं लेकिन पानी अभी फ़ेसबुक और ट्विटर के लेवल तक नहीं पहुंचा है। मतलब सावन के आने में कौनौ संदेह नहीं रह गया। लेकिन कुछ लोग कह रहे हैं कि चकाचक बनारसी टेस्ट कर लिया जाये सावन के आने का। आप कहोगे चकाचक बनारसी टेस्ट क्या होता है। तो देख लीजिये चकाचक बनारसी का सावन टेस्ट:

बदरा-बदरी के पिछउलेस,
सावन आयल का!
खटिया चौथी टांग उठइलेस,
सावन आयल का!
सावन जब भी आता है सबसे पहले दिल्ली में रिपोर्ट करता है या कि मुंबई में। मुंबई का तो अभी कौनौ पता नहीं चला है लेकिन दिल्ली की रिपोर्टिंग के लिये लिये चलते हैं हम आपको विनीत कुमार के यहां। फ़िलहाल वही इस समय संवाददाता हैं, कैमरापरशन हैं और खुदै लिखवैया इस इस्टोरी के। संवाददाता जरा शर्मिंदा सा है अपनी बरसाती जिम्मेदारियों को ठीक से अंजाम न दे पाने के चलते।  देखिये जरा सीन विनीत कुमार के कैमरे से :

सॉरी दिल्ली की पहली बारिश ! मैं तुम्हारे साथ रेन डांस नहीं कर सका. तुम्हारे साथ भीगते हुए, नाजायज सी दिखती टमी को अंदर करके, सीने को लपलपाती जीभ सी आगे करके, लोकट शार्टस और स्लीवलेस टी में इरॉटिक पिक खिंचवाकर एफबी वॉल पर नहीं टांग सका. मुझे न त पकौड़े का ध्यान आया और न ही कॉफी की तलब हुई.
बारिश का सौंन्दर्य वर्णन करने के बाद संवाददाता झटके से यथार्थ के धरातल पर आ जाता है और बताता है कि जिस बारिश की प्रतीक्षा में पूरा देश हलकान था उसको ’कैरी करने की’  ताब नहीं है उसमें।  देखिये :
तुम जब तक नहीं आती हो न, यहां के लोग,मीडिया से लेकर सरकार तक तुम्हारा ऐसा इंतजार करते हैं, जैसे तुम पेड न्यूज जैसी बेशकीमती हो. गर्लफ्रैंड या ब्ऑयफ्रैंड से भी ज्यादा मोहब्बत है तुमसे. जैसे कि सारी राजनीति तुम पर ही टिकी हो. लेकिन देखो न. कायदे से तुम्हें आए दो घंटे भी नहीं होते हैं कि लोग बेहाल हो जाते हैं. सड़कें जाम हो जाती है, शहर हांफने लग जाती हैं. सरकार की सारी धोखेबाजी सीवर,सड़कों और गलियों में तैरने लग जाती है. मीडिया की सारी काबिलियत और जुमले टांय-टांय फिस्स हो जाते हैं. लोग बेदम हो जाते हैं. ये शहर तुम्हारे साथ फ्लर्ट करता है कि उसे तुम्हारे आने का बेसब्री से इंतजार रहता है. तुम शाम आयी नहीं कि शीघ्रपतन का शिकार हो गया. इस शहर में तुम्हें कैरी करने की हैसियत ही नहीं है, बस हवाबाजी करता है.

हवाबाजी की बात चली तो देखिये क्या कुछ हुआ कि अलीजी के यहां बारिश के में कुछ हवाबाज गिरे।

उधर "एक टैं-टैं-टों-टों" के शुरुआती सफ़र से गैंग आफ़ वासेपुर में वुमनिया-वुमनिया गाकर प्रसिद्ध होने वाली स्नेहा के किस्से सुनिये गौरव सोलंकी से। बिहार के बारे में स्नेहा का बयान भी देखते चलिये:
”मैंने बहुत underestimate किया था बिहार को, कि तड़क भड़क वाला ही होगा, ढोलक पे ही होगा। लेकिन अच्छी कविता, sweet tunes, गाने का इमोशनल स्टाइल, सब है। और अलग अलग भाषा के distinction हैं। अंगिका, भज्जिका, मैथिली, सबकी अलग ही मधुरता है, यह जाना।“


गैंग आफ़ वासेपुर की बात चली तो बता दें कि हमने भी ये पिक्चर देख डाली। लगा कि लोगों ने हल्ला कुछ ज्यादा मचाया इसका। हमको इस फ़िलिम में जो सबसे मजेदार सीन लगा वह वह है जिसमें लड़की हड़काती है लड़के जब वह उससे बिना पूछे उसके हाथ पर हाथ रख देता है। लड़की कहती है- ये कौन सी हरकत है। ये करने से पहले हमसे पूछना चाहिये थ न! हम कोई मना थोड़ी कर रहे हैं लेकिन पूछना चाहिये न! :)

अब प्रवीण पाण्डेय का बयान सुनिये। कहते हैं- उर्वशी पढ़ने बैठा तो एक समस्या उठ खड़ी हुयी। विवरण आप उनके यहां ही जानिये। समस्या कुछ वैसी ही टाइप की है। लेकिन हमारा तो यही कहना है कि जब एक के साथ बैठेंगे तो दूसरा तो खड़ा हो ही जायेगा। अगले की भी इज्जत है।

वायरसों के बाप और दादे भी आ गये देखिये। मिल लीजिये।

बरसात में तो आल्हा चलता है। लेकिन कुछ लोग मानस पाठ करते हैं। तो कुछ महाभारत पढ़ते हैं। आप अब महाभारत ही देखिये। अदा जी ने पेश किया है। साथ में खूबसूरत गाना भी है सुनिये वहीं वादियां मेरा दामन, रास्ते मेरी बाहें।
अब अगर संगीत सुनने का मन है तो सुनिये -राग मेघ उस्ताद फ़तेह अली खान से !


मेरी पसंद

भादों आया देख के हुई सुहानी शाम
मौसम भी लिखने लगा पत्तों पे पैगाम।

गलियारे पानी भरे आँगन भरे फुहार
सावन बरसा झूम के भादों बही बयार।

छम-छम बाजे पायली रुके नहीं बरसात
हरी मलमली चूनरी तितली चूड़ा हाथ।

बादल में मादल बजे नभ गूँजे संतूर
मन में बिच्छू-सा चुभे घर है कितनी दूर।

कच्ची पक्की मेड़ पर एक छाते का साथ
हवा मनचली खींचती पकड़-पकड़ कर हाथ।

गड़-गड़ बाजी बादरी भिगो गई दालान
खट्ठे मन मीठे हुए क्या जामुन क्या आम।

बादल की अठखेलियाँ बारिश का उत्पात
ऐसा दोनों का मिलन सूखे को दी मात।

ताल–तलैया¸ बाग़–वन, झरनों की भरमार
मन खिड़की से झाँकता हरा भरा व्यापार।

पूर्णिमा वर्मन

और अंत में

आज के लिये फ़िलहाल इत्ता ही। आपका शनीचर शुभ हो। नीचे का चित्र सतीश पंचम के कैमरे से है।

गाँव-गाँव की मेरी घुमक्कड़ी के दौरान ली गई एक तस्वीर जिसमें एक महिला मथनी से मेटी में मट्ठा तैयार कर रही है। जिस वक्त मट्ठा मथा जा रहा था उस समय उसका बेटा बगल में इस उम्मीद से खड़ा था कि मट्ठा मथने से जो उपरी सतह पर 'नैनू' (मक्खन) उतरायेगा तो वह खाने मिलेगा। जबकि उसकी माता इस फेर में थी कि थोड़ा सा चख भर ले, बाकि जो बचे वह उपलों की आग पर रख खर करते हुए घी बनाये....लेकिन बच्चा डटा था कि मुझे और 'नैनू' चाहिये :-)

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15 टिप्‍पणियां:

  1. मजेदार. किन हमारा तो यही कहना है कि जब एक के साथ बैठेंगे तो दूसरा तो खड़ा हो ही जायेगा। अगले की भी इज्जत है।
    हमारी फैमिली में ऐसी भाषा अल्लाउ नहीं है. :)

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    1. भाषा के बारे में अपने नंदलाल पाठक जी लिखते हैं:
      भाषा तो है मुस्कानों का ही एक रूप,
      अधरों से बहता यह आंखों का पानी है,
      भाषा तो पुल है मन के दूरस्थ किनारों पर,
      पुल को दीवार समझ लेना नादानी है।

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  2. आपकी चर्चा से तो कोई न कोई श्रेष्‍ठ लिंक मिल ही जाता है। आज भी तलाशते हैं उन मोतियों को। आभार।

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    1. धन्यवाद! देखिये आज कौन सा लिंक मिलता है काम का। :)

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  3. चेले की कारगुज़ारियों वाला लिंक दुरुस्त कर दीजियेगा :)

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    1. लिंक ठीक कर दिये हैं। पता नहीं कौन सा लिंक चेले का था। किसके चेले का था? सभी तो गुरुजी लोग हैं।

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  4. विनीत कुमार की बारिश की सच्ची कमेंट्री अच्छी लगी.अली साहब की पोस्ट की जानकारी भी यहीं से मिल पाई.

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    1. चलो ये अच्छा रहा कि कुछ अच्छा लगा। :)

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  5. भीगी हुई चर्चा...


    पोस्‍ट की शुरूआत में दादुर की याद खतरनाक लग रही थी... बाद में मामला संभल गया :)


    हमें तो कविता आती नहीं...

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    1. दादुर की याद खतरनाक क्यों भाई! क्या वे कवि हैं? :)

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  6. माने कि ऊहाँ गरजत-बरसत सावन आयो रे...
    लेकिन हमरे हियाँ को भरखर जेठ है अभी, तापमान ३०-२६ के बीच रहता है... ऐसे में आल्हा-उदल कहाँ से होगा...?
    मानसून, बादल , बरसात सबके लिए आपसब को हार्दिक बधाई..| आपके टी. वी. के रिपोर्टर्स भी सावन की झड़ी के बीच, एक ही बात की शास्वत रिपोर्टिंग करते रहे,,,विभिन्न प्रकार के.'महाभारत' की...:)
    गैंग ऑफ़ वासेपुर हम भी देख ही लिए, कुल मिला कर फिलिम हमको भी मय हड्काने वाला सीन,, अच्छी लगी,
    आपकी पसंद भी ज़बरदस्त है...और तस्वीर तो एकदमे लाजवाब .है .!!
    धनबाद...पेटरवार, गोला, माराफारी..हूरा-हूरीईईइ :) (ई हमरे रांची में बस वाले हांक लगाते हैं, पसिंजर बैठाने के वास्ते, आप इसको हमरा थान्कू का नया अंदाज़ समझ सकते हैं..:) )

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    1. आपका थान्कू का अंदाज बड़ा जबरदस्त है। हां नहीं तो ! :)

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  7. चकाचक को याद किया तो चर्चा चकाचक होनी ही थी।:)

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    1. धन्यवाद! संभव हो तो चकाचक बनारसी की ये वाली कविता पूरी पोस्ट करें।

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