शुक्रवार, जुलाई 13, 2012

अपनी बेटी का ख्याल आया तो दिल कांप गया

कल एन.डी.टी.वी. प्राइम टाइम पर रवीश कुमार का कार्यक्रम देख रहा था। एक ग्यारहवीं में पढ़ने वाली 16-17 की बच्ची को कुछ लड़कों ने आधे घंटे तक सरे आम छेड़खानी की। मारा-पीटा! उसके कपड़े फ़ाड़े। इतना कि हैवानियत भी शर्मशार हो जाये। रवीश कुमार का पूरा शो आप यहां देख सकते हैं।

इस घटना का यू-ट्यूब से लिया वीडियो फ़ेसबुक पर मौजूद है। रवीश कुमार के इस शो में भी। देखकर मन क्षुब्ध हो गया। एक बच्ची सी लगती लड़की को लड़के इधर-उधर धकिया रहे थे। उसको छेड़छाड़ रहे थे। इसी बीच माइक उसके मुंह के आगे सटाकर उससे कुछ पूछ-पाछ भी रहे थे।

विनीत कुमार ने अपने फ़ेसबुक स्टेटस पर लिखा-आज हम एनडीटीवी इंडिया पर प्राइम टाइम नहीं हिन्दुस्तान, इस देश और अपने ही मर्द समाज की तस्वीर देख रहे थे!

लोगों की प्रतिक्रियायें आ रहीं थीं। महिलाओं गुस्से में थीं। लगभग सभी ने कहा- ऐसे लोगों को इतनी कड़ी सजा मिलनी चाहिये कि वे कभी भूलकर भी इस तरह की बात न सोचें। कई ने कहा ऐसे लोगों को चौराहे पर खड़ा करके गोली मार देनी चाहिये।

लंदन से एक पुरुष दर्शक का बयान था- इसीलिये महिलाओं की भ्रूण-हत्या होती है।

गोहाटी से ही एक महिला का कहना था कि पुलिस निकम्मी है। वह राजनीतिक दबाब में काम करती है।

यह भी पता चला कि वे लड़के जो इस हैवानियत में शामिल थे -एक दूसरे को जानते नहीं थे। वे इस लम्पटई के सहज स्वयंसेवक बन गये। सड़क पर शुरुआत तो छेड़छाड़ और हैवानियत के काम के सेवादार बन गये।

विनीत कुमार का एक और स्टेटस था:
एनडीटीवी इंडिया और एनडीटीवी 24x7 की प्राइम टाइम स्टोरी देखकर संभव हो कि दिव्या की तरह आप भी कहेंगे कि ऐसे लड़कों को जब तक चौक पर खड़ी होकर गोली नहीं मार देते,समस्या का समाधान नहीं होगा. जो फोन कॉल आ रहे हैं, लोग गुस्से में हैं,रो रहे हैं,गोली मार देने की बात कर रहे हैं. आप उस गुस्से से गुजरेंगे तो आपको लगेगा आप किस समाज में जी रहे हैं. मुझे एमटीवी,यूटीवी बिंदास, चैनल वी पर प्रसारित उन कार्यक्रमों का ध्यान आता है, जहां रियलिटी शो के नाम पर मर्द प्रतिभागी वो सबकुछ करता है, जो यौन शोषण के अन्तर्गत आता है. दूसरा कि ऐसे शो ने वो माहौल पैदा किया है कि छोटे से समाज में लड़के-लड़कियों के बीच संबंध वैसे ही खुले रहे हों लेकिन जिस समाज में ये सहज संबंध नहीं है वहां के दर्शकों में दरिंदगी का विस्तार होता है.


इस घटना के बारे में फ़ेसबुक पर छिटपुट स्टेटस के अलावा और किसी ने कुछ लिखा नहीं। शायद यह शो देख न पायें हों। ललित कुमार ने अपनी पोस्ट भयावह…हम कब सभ्य होंगे? में लिखा:
देखा आपने, किस तरह की हैवानियत और बेशर्मी इन लोगों पर हावी है? लड़की छूट कर भाग जाना चाहती है –लेकिन इतने सारे लोग उसे पकड़ कर सकड़ पर घसीटने लगते हैं। एक आदमी हेलमेट पहने है –ऐसा लगता है कि यह भीड़ धीरे-धीरे बनी। कुछ लोगों ने यह अमानवीय हरकत शुरु की होगी और बाकि लोग इसमें मज़े के लिए जुड़ते चले गए जैसे कि वो लड़की कोई खिलौना हो। चूंकि यह वीडियो सम्पादित है इसलिए इसमें ऐसा नहीं दिखता पर अखबार में लिखा गया है कि लड़की के कपड़े फाड़ दिए गए थे।


ललित कुमार की पोस्ट में उन लड़कों में से एक का फ़ेसबुक एकाउंट का लिंक भी दिया जो इस हैवानियत में शामिल था। वे लिखते हैं:
यह लड़की रात को एक बार से पार्टी करने के बाद घर लौट रही थी कि उसे कुछ लोगों ने पकड़ लिया। भीड़ इस लड़की के साथ आधे घंटे तक “खेलती” रही तब जाकर पुलिस वहाँ पहुँची और लड़की को उसके परिवार को सौंपा। इस भीड़ का धीरे-धीरे बढ़ना सबसे अधिक चिंता का विषय है। जिस ने भी इस कुकृत्य को देखा –वो इसे रोकने की कोशिश करने की बजाए इसमें शामिल हो गया। यह प्रवृति हमारे पूरे समाज के चेहरे को दिखाती है। यहाँ किसी एक व्यक्ति की बात नहीं है –बल्कि मसला पूरे समाज का ही है क्योंकि भीड़ समाज का प्रतिनिधित्व करती है। शायद इन लोगों ने सोचा होगा कि इस लड़की को पीट कर हम अपनी मर्दानगी का परिचय दे रहे हैं; लेकिन यह मर्दानगी नहीं बल्कि पशुता, कायरता और नपुंसकता का परिचय है।


ललित की पोस्ट पर निशांत मिश्र की प्रतिक्रिया है:
लगभग चालीस साल पहले मुंबई की एक नर्स अरुणा शानबाग से अस्पताल में काम करनेवाले एक स्वीपर ने बलात्कार किया. उसने उनके गले में कसकर पट्टा बाँधा जिससे वह कोमा में चली गयी और पिछले चालीस साल से कोमा में है. अब उसकी उम्र साठ से भी ज्यादा की होगी. उसके लिए मर्सी किलिंग की बात कुछ साल पहले उठी थी लेकिन न्यायालय ने यह स्वीकार नहीं किया. लेकिन इस मामले में एक सवाल और है, और वह है उस बलात्कारी का. मामूली सजा पाकर वह न केवल रिहा हुआ बल्कि पूरी नौकरी करने के बाद रिटायर हुआ. कैसे? उसने कोई अच्छा वकील किया होगा. या जज ने उसपर उदारता बरती होगी क्योंकि वह कम उम्र था और वह उसका पहला अपराध था! मुझे शिकायत है उन लोगों से जो ऐसे या इससे मिलते-जुलते मामलों में अतिवादिता दिखाते हुए अपराधी को मृत्युदंड या गोली मार देने की मांग करते हैं. देश में जघन्य अपराध करनेवाले अपराधी ठीक से जेल में टिक पाते नहीं हैं तो कोई वाकया होनेपर लोग बड़े-बड़े बोल कहकर अपनी जिम्मेदारी निभा लेते हैं. कुछ दिन पहले देखा जेल से ए राजा का कितना स्वागत सत्कार हुआ और किसने किया? माफिया और सरगनाओं को अपार बहुमत से कौन जिताता है? राह में दुर्घटना के शिकार को तड़पता देख कौन आगे बढ़ जाता है? और दंगा होनेपर सुपर बाज़ार से सामान चुराने के लिए अपनी कारों से उतरकर भागनेवाले लोग भुखमरे नहीं होते! उस दिन तुमने सच कहा था... हम अजीब लोग हैं. हम गुनाहगार को सजा नहीं देते, और भला काम करनेवालों की सराहना नहीं करते. ऐसे में हमारी दुनिया कैसे बदलेगी, कैसे सुधरेगी? बस नारे लगाकर?
एक मातृसत्तात्मक समाज में सरेआम इस तरह की दरिदंगी होती रही। लोग देखते रहे। अफ़सोस, शर्मनाक।

कुछ लोगों ने कहा कि लड़कियां आगे आ रही हैं। अधकचरी शिक्षा पाये लम्पट लड़के समझ नहीं पाते कि अपने समाज के आधे हिस्से से कैसे पेश आया जाये। बाजार भी लोगों को केवल सामान में बदल रहा है।

आशुतोष कुमार का फ़ेसबुक बयान है:
छात्र-जीवन में सहपाठिनें बताती थीं की उन्हें अधेड़ों और बुजर्गों से सब से ज़्यादा डर रहता है.. नौजवान तो ज्यादातर शिष्ट - शालीन और मददगार होते हैं .अधेड़ों की पकी हुयी कुंठाओं को समझा जा सकता है , लेकिन किशोरों और नौजवानों को क्या हो गया है ?क्या समय इतना बदल गया है?क्या पार्टी में जाने का मतलब लड़की के माथे पर इस इबारत का चस्पां हो जाना है कि उस के साथ कुछ भी किया जा सकता है ? अपराध सामने हो रहा हो , लेकिन पत्रकार उसे रोकने की जगह रिकार्ड करने को प्रथमिकता दे तो क्या वह भी बर्बर तमाशबीनों में से एक नहीं है ?


इस पर गौरव सोलंकी की प्रतिक्रिया है:
सहपाठिनें अब भी यही कहती हैं कि उन्हें अधेड़ों और बुजुर्गों से सबसे ज़्यादा डर लगता है, लेकिन ये जो पूरब पश्चिम के बीच में फंसा हुआ देश है, जिसे लगता है कि लड़की का छोटे कपड़े पहनना, देर रात में बाहर घूमना या पार्टी में आना आमंत्रण है, वह सबसे ज़्यादा ख़तरनाक है. दिमाग बन्द रह गए हैं या और भी वीभत्स होते गए हैं और बाज़ार खुलते गए हैं, और चमकदार होते गए हैं. यह असंतुलन ख़तरनाक है. लोकप्रिय मीडिया में भी वही पुरुष हैं. नवभारत टाइम्स और दैनिक भास्कर की वेबसाइट्स पर स्त्री को लेकर यही नज़रिया मैंने बार बार देखा है ख़बरों में..उसके आज़ाद या बेपरवाह होने पर बेशर्मी से उसे चरित्रहीन बता देना. तो वह मीडिया तो रिकॉर्ड ही करेगा. उसे हिट्स लेने हैं अगले दिन.और मीडिया का ऐसी घटनाओं को रिकॉर्ड करने में जो रोल है, उस पर बहस भी होती है. मैं भी कनफ्यूज्ड हूं. कि क्या उस या किसी भी घटना को हम तक पहुंचाना उसकी ज़िम्मेदारी है, या उस समय कैमरा छोड़कर पुलिस या किसी ज़िम्मेदार नागरिक की तरह लड़ना?


सोमवार को हुई इस घटना के तीन दिन बाद यह रिपोर्ट मीडिया में आई। स्थानीय समाचार में छपी खबरों के बाद कुछ लोग गिरफ़्तार किया गया। मीडिया बता रहा है कि उनकी खबर के बाद लोग गिरफ़्तार किया गया। डीजीपी आसाम से जब पूछा गया कि गिरफ़्तारी में इतनी देरी क्यों हुई। पुलिस अधिकारी का कहना है कि लड़की को सुरक्षित पहुंचाना उनकी पहली जिम्मेदारी थी। लड़के कहां जायेंगे वे तो आसाम के ही हैं। पकड़ लिये जायेंगे।

संवाददाता बता रही है - यह महज ग्यारह लोग नहीं हैं। यह हमारे समाज का चेहरा है।

इसी दिन एक खाप पंचायत के प्रतिनिधि का टीवी पर बयान आ रहा है:
1. लड़कियां घर से बाहर सर ढक कर निकलेंगी।
2.कोई भी लड़की चालीस साल की बाजार नहीं जायेगी।
3.लड़कियां मोबाइल नहीं ले जायेंगी साथ।
इसी दौरान यह समाचार भी सुनाया गया-
भारतीय महिला क्रिकेट खिलाड़ी मिताली राज सबसे अधिक रन बनानी वाली खिलाड़ी बनीं।


नवाज देवबंदी का शेर याद आ रहा है:
'बद नजर उठने ही वाली थी किसी की जानिब लेकिन,
अपनी बेटी का ख्याल आया तो दिल कांप गया।'

ये तो बुजुर्ग के अपने मन की बद नजर के बरजने का बयान है। इन आवारा, लम्पट लड़कों को कौन सा शेर सुनाया जाये?

अपडेट:

नोयडा की पत्रकार अनु सिंह चौधरी ने भी पोस्ट लिखी- दोष तुम्हारा है, पागल लड़की! उनकी पोस्ट के अंश देखिये:
सुना कि तुम मां-बहन की गुहार लगा रहा थी लड़कों के सामने? अरे पागल, नहीं जानती क्या कि यहां लोग बहनों को भी नहीं छोड़ते? ऊपरी आवरण से मसीहा और संरक्षक-सा दिखाई देने वाला तुम्हारा कोई 'कज़न ब्रदर' या 'गार्डियन' अकेले में तुम्हें बख़्श देगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। मां ने सिखाया नहीं था कि किसी पर भरोसा नहीं करना? किसी पर भी नहीं। किसी ने बताया नहीं था कि हम ऐसे भीरुओं के बीच रहते हैं जो ऊंची आवाज़ में चिल्लाना जानते हैं, मौका-ए-वारदात पर कुछ क़दम उठाना नहीं जानते? मैं होती वहां तो कुछ कर पाती, कहना मुश्किल है। बचकर आंखें नीची किए किनारे से निकल गई होती शायद। हम जैसे तमाशबीन रहनुमाई के लिए थोड़े ना पैदा हुए हैं?
आगे लिखती हैं वे:
वैसे अब क्या करोगी तुम पागल लड़की? पूरे देश ने ये वीडियो देखा है। बल्कि यूट्यूब पर तो विदेशों में बैठे लोगों ने भी तुम्हारा हश्र देख लिया। तुम्हारे गली-मोहल्ले के लोग तुम्हारा जीना दूभर ना कर दें तो कहना। तुम्हारे स्कूल में बच्चे और टीचर्स तुम्हें अजीब-सी निगाहों से ना देखें तो कहना। और ठीक चौबीस घंटे में तुम्हारे साथ चला घिनौना तमाशा पब्लिक मेमरी से ना उतर जाए तो कहना। इस हादसे का बोझ लेकर जीना तुम्हें हैं।

मेरी पसंद

लड़कियाँ,
तितली सी होती है
जहाँ रहती है रंग भरती हैं
चाहे चौराहे हो या गलियाँ
फ़ुदकती रहती हैं आंगन में
धमाचौकड़ी करती चिडियों सी

लड़कियाँ,
टुईयाँ सी होती है
दिन भर बस बोलती रहती हैं
पतंग सी होती हैं
जब तक डोर से बंधी होती हैं
डोलती रहती हैं इधर उधर
फ़िर उतर आती हैं हौले से

लड़कियाँ,
खुश्बू की तरह होती हैं
जहाँ रहती हैं महकती रहती है
उधार की तरह होती हैं
जब तक रह्ती हैं घर भरा लगता है
वरना खाली ज़ेब सा

लड़्कियाँ,
सुबह के ख्वाब सी होती हैं
जी चाहता हैं आँखों में बसी रहे
हरदम और लुभाती रहे
मुस्कुराहट सी होती हैं
सजी रह्ती हैं होठों पर

लड़कियाँ
आँसूओं की तरह होती हैं
बसी रहती हैं पलकों में
जरा सा कुछ हुआ नही की छलक पड़ती हैं
सड़कों पर दौड़ती जिन्दगी होती हैं
वो शायद घर से बाहर नही निकले तो
बेरंगी हो जाये हैं दुनियाँ
या रंग ही गुम हो जाये
लड़कियाँ,
अपने आप में
एक मुक्कमिल जहाँ होती हैं
मुकेश कुमार तिवारी

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38 टिप्‍पणियां:

  1. हम अजीब लोग हैं. हम गुनाहगार को सजा नहीं देते,@nishant

    well said

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    1. http://mainghumantu.blogspot.in/2012/07/blog-post_13.html
      http://indianwomanhasarrived2.blogspot.in/2011/06/blog-post.html
      http://indianwomanhasarrived2.blogspot.in/2011/03/blog-post_12.html

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  4. ये घटनाये पूरे समाज का आईना नहीं दिखाती
    मगर इनकी मीडियाई प्रस्तुति ऐसा ही दिखाती है
    जैसे सारा भारतीय समाज ऐसा ही हो उठा हो ..
    आपने भी बहती गंगा में आचमन कर लिया
    और एक शेर की पिटी पिटाई लाईन यहाँ
    झोक दी -कुछ लोगों की भावनाओं को दुलराने के लिए
    पूरे संदर्भ को देखा जाना चाहिए -
    और मौका हो ,उद्दीपन हो तो कई "सभ्य" के दिलों
    में धड़कता वन मानुष उठ खड़ा होगा -
    पुलिस व्यवस्था .कमीने पत्रकार जिम्मेदार हैं और इसे चाशनी बनाकर
    प्रस्तुत करने वाले लोग

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    1. दो सवाल आपसे पूछना चाहती हूँ. १, क्या आप सभ्य हैं? २, यदि इसका जवाब हाँ है तो क्या कोई मौका या उद्दीपन होने पर आपके भीतर का बनमानुस जाग सकता है?

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    2. बन्धु, बेशरम न होकर लज्जा को ओढ़ पहन कर आपको, हमें व हमारे समाज को इस खबर को छिपा लेना चाहिए था। बेहतर तो यह होता कि जिसपर यह कहर टूटा उसे अपना चेहरा, अपने अस्तित्व को छिपा लेना चाहिए था, न, न, उसे तो आत्महत्या कर लेनी चाहिए थी ताकि समाज का इतना कुरूप चित्र समाज को देखना ही न पड़ता। हमें तो अपने सुन्दर, पुराने, वैदिक समाज का सुन्दर व काल्पनिक चित्र को ही दर्पण के सामने रख सच कह संसार को दिखाना चाहिए। कुरूप चेहरे को तोड़ देना चाहिए। भला यह भी कोई बात हुई कि पल भर को हम वनमानुष हुए और आप हमारी फोटो खींच संसार को दिखा दें? वे फोटो क्या हुईं जब हम मातृवंदना कर बलात्कार की मन ही मन तैयारी कर रहे थे? वे फोटो संसार को दिखाइए ना! और कहिए कि यत्र नारी पूजयन्ते... ब्ला ब्ला ब्ला....
      घुघूती बासूती

      हटाएं
  5. एक साधारण सी प्रतिक्रया या इस पोस्ट से उपजा मानसिक मंथन
    ऐसा क्यूँ देखने में आता हैं की जहां पुरुष बिगड़ी व्यवस्था पर चिंता करता हैं , आवाज उठाता हैं , वहाँ बहस , विचारों का आदान प्रदान आपस में ज्यादा होता हैं और अगर क़ोई स्त्री यही सब कहती हैं तो या तो वहाँ बहस नहीं होती { हो सकता हैं संकोच हो } या महज उसको नारीवादी कह दिया जाता हैं . पता नहीं क्यूँ कभी कभी घुघूती बासूती का सत्यार्थ ब्लॉग पर दिया एक कमेन्ट याद आ ही जाता हैं जिस का मंतव्य कुछ ये था की स्त्री को कब क्या करना है , स्त्री आधारित मुद्दों पर सकारात्मक लेखन इत्यादि यानी स्त्री से सम्बंधित विषयों पर केवल और केवल पुरुष सी सही बहस कर सकते . { कुछ इसी तरह की बात अब पुराने लिंक नहीं दे रही :) }


    चर्चा का रंग बदला हैं इसके लिये मेरी शुभकामना स्वीकार करे अनूप


    बदलाव क़ोई भी लाये , लाता रहे बेटियाँ इस लिये स्वीकार्य हो की वो बेटी हैं , बेटे जैसी नहीं . उनके खिलाफ हो रहे शोषण , यौन शोषण , मानसिक यौन शोषण इत्यादि को लोग समझ सके . जेंडर बायस को नकारा ना जाये , और देवी की तरह मंदिर में स्थापित ना करदिया जाए बस मनुष्य हैं वो , ये समझा जाए उनकी भी इच्छा हैं जिस को पूरा करने का अधिकार उनको मिला हैं

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  6. बड़ा दुःख हुआ यह जानकर.....पर इसे गलत माननेवाले भी अधिकतर लोग कसौटी पर गलत निकल जाते हैं !

    ...समाज में संवेदना तेजी से घट रही है !

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  7. बेहद शर्मनाक कृत्य ! तालिबान और इनमें क्या फर्क है. यदि कुछ लोग खुले आम शहर में पुलिस थाने से कुछ ही दूरी पर इस तरह के दुष्कर्म करने कि हिम्मत करते हैं तो हमारी कानून व्यवस्था उनसे बेहतर नहीं कही जा सकती सवाल है की अपराधी इतने बेख़ौफ़ क्यों हैं? स्थितियां और बदतर हो जाती हैं जब पुलिस मीडिया के दबाव में सक्रिय होती है न कि अपने आप. ऐसा लगता है जैसे इस तरह कि घटनाओं को पुलिस प्रशासन गंभीरता से नहीं लेता. इस मामले में भारतीय दंड संहिता में जल्द से जल्द सुधार करने की जरुरत है. इस तरह कि घटना को किसी भी समाज शास्त्रीय या नातिकता वादी बहानो से जरा भी जस्टिफाई नहीं किया जा सकता.

    हालिया घटनाक्रम को अच्छी तरह समेटे हुई पोस्ट.

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  8. Sab live dekh rahe hai..aur kal sunenge...ye log baijjat bari ho gaye. Tab to gussa aur lagega. Lekin ye sach hai, hamare desh ka. Kanoon naam ki koi cheez nahin hai aur isliye sankriti bhi lachhar ho rahe hai.

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  9. पोस्ट तो बहुत अच्छी है सर . लेकिन सवा लाख का सवाल ये है कि ये समाज सुधरे कैसे. मैं तो देखता ये आ रहा हूँ कि ये और बड से बदतर होता जा रहा है .. जबकि , शिक्षा और ज्ञान , हमारे बच्चो को पहले की अपेक्षा और ज्यादा मिल रहा है .... कौन सी कुंठा है.

    पता नहीं . ये सब देखता हूँ तो मन दुःख जाता है. sometimes I feel that we need definitely military kind of political system here. देश रसातल में जा रहा है ..

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  10. इन घटनाओं के पीछे क्या है ? इसको देखने के लिए किशोरों का मनोविश्लेषण करके देखा है. वह जो आवारा है या फिर बड़े घरों के बिगड़े हुए नवाब अपने साथ ऐसे ही जालिलों की टोली लेकर चलाते हें अपना रुतबा दिखाने के लिए. न इनके अभिभावकों को इस बात की फिक्र है कि मेरा बेटा जाता कहाँ है? गाड़ियों में हो रहे दुष्कर्म के पीछे यही युवा होते हें और उनके साथियों का काम सड़कों पर चलाती हुई लड़कियों को छेड़ना होता है. और फिर आम आदमी की मानसिकता कहाँ बहुत बदली हुई है विरोध करके अपनी जन जोखिम में कौन डाले? इस बात को मनाने वाले सड़क पर चलने वाले नजर बचा कर निकल जाते हें और उससे भी बेशर्म और इंसानियत से दुश्मन वे होते हें जो इस भीड़ में शामिल हो जाते हें.
    लड़कियों को अब आत्मरक्षा के लिए मार्शल आर्ट और जुडो करते से स्कूल स्तर पर ही प्रशिक्षित करना अनिवार्य कर देना चाहिए तभी आने वाले समय में वह आत्मरक्षा कर सकेंगी. उन्हें घर में बंद कर लेना कोई हल नहीं है . न्याय की आशा व्यर्थ है , क्योंकि काण्ड होते ही बड़े बड़े नेताओं के फ़ोन गुंडों को छोड़ देने के लिए आने शुरू हो जाते हें फिर वे शेर क्यों न हो? चिल्लाने से या फिर गालियाँ देना इसका निदान नहीं है बल्कि ठोस रूप से कदम उठना इसका निदान है.

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  11. रात को ही इस घटना को एनडी टीवी पर देखा, मन विक्षोभ से भर गया। क्‍या उस लड़की को उन लड़कों द्वारा सजा दी जा रही थी? यह किस समाज का चेहरा है? रवीशकुमार का आक्रोश समझ आ रहा था उनका कथन भी कि घर के सभी बाप-दादों को और संतानों को देखना चाहिए कि हमने किस समाज का निर्माण किया है। उनके माता-पिता क्‍या अपनी संतानों को कानून के हवाले करेंगे? नहीं वे उन्‍हें बचाएंगे। आज सर्वाधिक आवश्‍यकता है इस पुरुष नामक जीव को संस्‍कारित करने की। लेकिन हमने उन्‍हें आजाद या खुला छोड़ रखा है। वे शिकारी बन गए हैं और महिला नामक जीव का शिकार करने की फिराक में रहता है। महिलाओं को कहा जा रहा है कि तुम घर में बन्‍द हो जाओ नहीं तो हम तुम्‍हारा ि‍शकार कर लेंगे। इस मानसिकता को बदलने के ि‍लए महिलाओं को ही आगे आना होगा और देखना होगा कि उनकी संतान की सोच किस ओर जा रही है।

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  12. उफ़....यह है हमारे सो कॉल्ड एडवांस समाज का चेहरा.:(:(. सही है अपनी बेटी का ख्याल आता है तो दिल काँप जाता है.कमी परवरिश में है हमें अपने बच्चों की सोच को देखना होगा.

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  13. देश के लोगों का रवैया देख कर कभी कभी लगता है , हम किस बात पर गर्व करें . शर्म आ जाती है यह सब देख और सोच कर .
    विचारणीय विषय जिस पर जम कर विमर्श होना चाहिए .

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  14. उफ्फ्फ... यह जानकार कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं रही है... आँखों में आंसू और जुबां पर ताला सा पड़ गया है... हम मर्द जल्लाद से कम नहीं हैं...

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  15. शर्म आती है कि हम आज भी ऐसे समाज में रह रहे हैं...
    यह वीडियो देखकर अभी तक शॉक में हूँ...

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  16. असली भारत यही है, तसवीरें झूठ नहीं कहतीं, अगर ऐसा नहीं है तो शाम होते ही अपने बच्चों की चिंता क्यों होती ???? क्या नहीं है यहाँ भ्रटाचार, अराजकता, गुंडाराज वैगरह वैगरह वैगरह......
    अच्छाईयाँ गिनना चाहे तो सिफ़र ही हाथ आएगा....कोशिश कीजिये, अगर मैंने ग़लत कहा है तो....
    संस्कार की पुंगी बजाने वालों से ये जानना चाहूँगी..क्या यही संस्कार लिए हैं हमारी भावी पीढ़ी ने ??

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  17. had to tab dikhti hai jab mudde ke sapeksh vichar na rakhkar mudde ko koun samne la raha....uske hisab se pratikriya hoti hai.....

    is charche se charchakar ke sam-samyik ghatnaon pe unki nazar, ghatnaon ka samoohik pagalpan me pravritt samajik manodasha ke liye jeemewar manobyavhar ko samne lane ke liye vimarsh chorna unki samvedanshilta darshati hai.

    @ बद नजर उठने ही वाली थी किसी की जानिब लेकिन,
    अपनी बेटी का ख्याल आया तो दिल कांप गया।'

    aise sher' se bhi jiske khayal na badalta ho unke liye to yehi kah sakte hain ...'khali baton ke hum nahi kayal...jo aankhon se na tapke o
    lahoo kya hai??????

    @शर्म आती है कि हम आज भी ऐसे समाज में रह रहे हैं...... log jitna sharmayenge...o utna be-khouph hote jayenge....


    pranam.

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  18. धीरेन्द्र पाण्डेयजुलाई 13, 2012 6:57 pm

    क्या हमें लिख लिख कर अपनी भड़ास निकाल देनी चाहिए और फिर से पुराने कामों में लग जाना चाहिए? या कि फिर ये प्रण लीना चाहिए कि अपने समाज में ऐसा नही होने देंगे कम से कम अपनी आँखों कि सामने तो नही भरपूर विरोध करेंगे हम |

    उत्तर देंहटाएं
  19. चलिए धीरेन्द्र जी,
    यहीं लेते हैं प्रण, कि हम अपने सामने ऐसा कुछ भी नहीं होने देंगे...अगर ऐसा हुआ तो हम उसका विरोध करेंगे...
    तो इसकी शुरुआत यहीं ब्लॉग जगत से क्यों न करें...एक महिला की तस्वीर आज भी लगी हुई है...जिसे हटाने की बात अभी तक वहीँ है जहाँ थी...कीजिये कोशिश महिला की अस्मिता बचाने की..
    लिंक मैं देती हूँ...http://swapnamanjusha.blogspot.ca/2012/07/blog-post_09.html

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    उत्तर
    1. और धीरन्द्र जी
      यहाँ भी देखिये कैसे एक महिला पर आरोप हैं की वो निरंतर " एक पुरुष को उकसा " रही हैं इस मानसिकता को क्या कहेगे और कैसे बदलाव लायेगे ज़रा कोशिश कर के बताये . http://dineshkidillagi.blogspot.com/2012/07/blog-post_5547.html?showComment=1341983555763#c4709414237354563881

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  20. एक घटना होती है और समाज के अनेक बयान बहादुर हाजिर हो जाते है बयान देने के लिए जैसे यहाँ पर है एक छोटे से ब्लॉग जगत में हम महिलाओ के अपमान को चुपचाप देखते है आपसी घटना बता कर चुप रहने में ही भला समझते है और इस घटना पर बवाल मचाते है | पर समाज की असली सोच क्या है वो भी इस चर्चा मंच में दिख रही है जरा एक तथाकथित महान विद्वान् की राय यही पर देख लीजिये पता चला जायेगा |

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    1. राय तो हम सब देख ही रहे हैं अंशुमाला जी..
      कुछ नज़रें ऐसी भी हैं, जिनके लिए यह घृणित कृत्य है ही नहीं, यह तो चाशनी में डूबी हुई मात्र एक ख़बर है, और जिसकी औक़ात बस एक चटखारे भर की है...
      भारत एक महान देश है, जहाँ तकरीबन २० भाषाओं में, सैकड़ों अख़बार प्रतिदिन लाखों (शायद करोड़ों हो ) की तादाद में प्रतियां छपतीं हैं...और हर अख़बार का हर कोना, हत्या, लूट, राहजनी, भ्रष्टाचार, बलात्कार, अपहरण से ही भरा होता है...सिर्फ़ एक दिन का कोई भी अख़बार कोई भी उठा ले तस्वीर मिल जायेगी...भारत की इस छवि के लिए कौन जिम्मेदार है ?
      और क्या यह छवि कभी बदलेगी ??
      हम जैसे लोग, जो बाहर रहते हैं, कई बार सोचते हैं, कि वापस आकार हमने जो भी सीखा है, अपने छोटे तरीके से ही समाज में योगदान दें...लेकिन हर बार ऐसी घटनाएं हमारे कदम रोक देतीं हैं...लगता है, वहाँ ऐसे भय में रहने से लाख बेहतर है, यहाँ के शांत-सुखद वातावरण में रहना...रोज़ सुबह अपनी बच्ची का मुँह देखती हूँ और भगवान् को धन्यवाद देती हूँ, कि वो सुरक्षित है | कम से कम यहाँ आए दिन ये सब तो नहीं देखना पड़ता है..

      हटाएं
  21. गुवाहाटी की उस लड़की के नाम : ब्रह्मपुत्र आज सिसक सिसक कर रो रही है !!!

    भाग एक :

    हे बाला [ श्री भूपेन हजारिका अक्सर north -east की लडकियों को बाला कहते थे. ] ; तो हे बाला , हमें माफ़ करना , क्योंकि इस बार हम तुम्हारे लिये किसी कृष्ण को इस बार धरती पर अवतरित नहीं कर सके. actually कृष्ण भी हम से डर गए है . उनका कहना है कि वो दैत्य से लड़ सकते है , देवताओं से लड़ सकते है .जानवरों से लड़ सकते है ; लेकिन इस आदमी का क्या करे ......!!! तो वो जान गए है कि हम आदमी इस जगत के सबसे बुरी कौम में से है . न हमारा नाश होंगा और न ही हम आदमियों का नाश होने देंगे. कृष्ण चाहते थे कि वहां कोई आदमी कृष्ण बन जाए . लेकिन वो भूल गए , धोखे में आ गए . वहां हर कोई सिर्फ और सिर्फ आदमी ही था . और हर कोई सिर्फ दुशाशन ही बनना चाहता था . कोई भी कृष्ण नहीं बनना चाहता था. In fact अब कृष्ण outdated हो गए है . वहां उन लडको में सिर्फ आदमी ही था . वहां जो भीड़ खड़ी होकर तमाशा देख रही थी ,. वो भी आदमियों से ही भरी हुई थी . तो हे बाला हमें माफ़ करना . क्योंकि हम आदमी बस गोश्त को ही देखते है , हमें उस गोश्त में हमारी बेटी या हमारी बहन या हमारी कोई अपनी ही सगी औरत नज़र नहीं आती है .

    भाग दो :

    दोष किसका है : मीडिया का जो कि आये दिन अपने चैनेल्स पर दुनिया की गंदगी परोसकर युवाओ के मन को उकसाती है . या इस सुचना क्रांति का जिसका का दुरूपयोग होता है और युवा मन बहकते रहता है . या हमारे गुम होते संस्कारों का , जो हमें स्त्रियों का आदर करना सिखाते थे. या हम माता -पिता का जो कि अपने बच्चो को ठीक शिक्षा नहीं दे पा रहे है . या युवाओ का जो अब स्त्रियों को सिर्फ एक भोग की वस्तु ही समझ रहे है . टीवी में आये दिन वो सारे विज्ञापन क्या युवाओ को और उनके मन को नहीं उकसाते होंगे. फिल्मो में औरतो का चरित्र जिस तरह से जिन कपड़ो में दर्शाया जा रहा है . क्या वो इन युवा पीढ़ी को इस अपराध के लिये नहीं उकसाते होंगे ? कहाँ गलत हो रहा है . किस बात की कुंठा है. और फिर तन का महत्व इस तरह से कैसे हमारे युवाओ के मन में गलत घर बना रहा है . क्या माता-पिता का दोष इन युवाओ से कम नहीं ? क्यों उन्होंने इतनी छूट दे रखी है . कुछ तो गलत हो रहा है , हमारी सम्पूर्ण सोच में . और अब हम सभी को ; एक मज़बूत सोच और rethinking की जरुरत है .
    भाग तीन :

    तो बाला , हमें इससे क्या लेना देना कि अब सारा जीवन तुम्हारे मन में हम आदमियों को लेकर किस तरह की सोच उभरे. कि तुम सोचो कि आदमी से बेहतर तो जानवर ही होते होंगे . हमे इससे क्या लेना देना कि तुम्हारे घरवालो पर इस बात का क्या असर होंगा . हमें इससे क्या लेना देना कि तुम्हारी माँ कितने आंसू रोयेंगी . हमें इससे भी क्या लेना देना कि तुम्हारे पिता या भाई को हम आदमी और हम आदमियों की कुछ औरते पीठ पीछे ये कहा करेंगी , कि ये उस लड़की के पिता है या भाई है . हमें इस बात से क्या लेना देना , कि अगर तुम्हारी कोई छोटी बहन हो तो हम आदमी उसे भी easily available ही समझेंगे .इससे क्या लेना देना कि अब तुम्हारी ज़िन्दगी नरक बन गयी है .और जीवन भर , अपने मरने तक तुम इस घटना को नहीं भुला पाओंगी. हमें इससे क्या लेना देना कि अब इस ज़िन्दगी में कोई भी पुरुष अगर तुम्हे प्रेम से भी छुए तो तुम सिहर सिहर जाओंगी . और अंत में हमें इससे क्या लेना देना कि तुम ये सब कुछ सहन नहीं कर पाओ और आत्महत्या ही कर लो . हमें क्या करना है बेटी . हम आदमी है . ये हमारा ही समाज है .

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  22. भाग चार :
    अब चंद आदमी ये कहेंगे कि उस लड़की को इतनी रात को उस पब में क्या करना था. क्या ये उस लड़की की गलती नहीं है . अब चंद आदमी ये भी कहेंगे कि आजकल लडकियां भी तो कम नहीं है . अब चंद आदमी ये भी कहेंगे कि उस लड़की ने proactive ड्रेस पहन रखी थी . लडकिया अपने ड्रेस से और अपनी बातो से लडको को [? ] [ आदमियों को ] उकसाने का कार्य करती है .अब चंद आदमी ये कहेंगे कि उस लड़की के माँ बाप को समझ नहीं है क्या जो इतनी रात को उसे पब भेज रहे है . वो भी ११ वी पढने वाली लड़की को . अब चंद आदमी ये भी कहेंगे कि उस लड़की का चरित्र भी ठीक नहीं होंगा . अब चंद आदमी ये कहेंगे कि देश सिर्फ ऐसी लडकियों और औरतो की वजह से ही ख़राब होते जा रहा है . मतलब ये कि ये चंद आदमी पूरी तरह से सारा दोष उस लड़की पर ही डाल देंगे . ये चंद आदमी ये भी नहीं सोचेंगे कि north -east हमारे देश के सबसे अडवांस states है और वहां पर ज्यादा gender biased घटनाएं नहीं होती है .. [ except जब हमारी so called सेना के चंद जवान आदमी वहाँ की औरतो का जब तब दोहन करते रहते है ] . और अब ये चंद आदमी इस देश में तय करेंगे कि औरते ख़राब होती है .

    भाग पांच :

    तो हे बाला , हम सब का क्या . हम थोड़ा लिखना पढना जानते है तो इसीलिए हम थोड़ा लिख कर पढ़कर बोल कर अपना गुस्सा जाहिर करते है . दरअसल उस तरह के लिखने पढने वाले अब नहीं रह गए है कि जिनके कहे से क्रान्ति आ जाती थी और न ही उनकी बातो को सुनकर जोश में कुछ करने वाले बन्दे रह गए है . तुम तो ये समझ लो कि हम सबका खून ठंडा हो चला है . और और एक तरह से नपुंसक ही है . हाँ , हमें दुःख है कि तुम्हारे साथ ये हुआ. ये तुम्हारे साथ तो क्या , किसी के भी साथ नहीं होना था. हमें दुःख है कि आदमी नाम से तुम्हारा परिचय इस तरह से हुआ है . लेकिन हाँ , हम ये भी कहना चाहते है कि सारे आदमी ख़राब भी नहीं होते. क्योंकि जिस पत्रकार ने ये सब हम तक ये सब बात पहुंचाई , वो भी एक भला आदमी ही है . बस तुम इतनी सी बात को याद रखो कि बेटी , ये बाते भी एक आदमी ही लिख रहा है . ईश्वर तुम्हे मन की शान्ति दे. हाँ एक बात और , मुझे ये तो पता नहीं कि ये समाज कब बदलेंगा , लेकिन मैं आज एक बात तुमसे और सारी औरतो से कहना चाहता हूं , कि " अबला तेरी यही कहानी, आँचल में दूध , और आँखों में पानी" वाली स्त्रियों का ज़माना नहीं रहा . समाज ऐसे ही घृणित जानवरों से भरा पड़ा है . इनसे तुम्हे खुद ही लड़ना होंगा. तो खुद को तैयार करो और इतने सक्षम बनो कि हर मुसीबत का तुम सामना कर सको. और हाँ , ईश्वर से ये भी प्रार्थना है कि जीवन में कोई आदमी तुम्हे ऐसा जरुर दे , जो कि तुम्हारे मन से आदमी के नाम से जो डर बैठ गया होंगा ; वो उसे ख़त्म करे , उसे जड़ से निकाल दे. आमीन !!

    भाग छह :

    ब्रह्मपुत्र की लहरों को सबसे ज्यादा गुस्सेल और उफनती कहा गया है . आज ब्रम्हपुत्र जरुर रो रही होंगी कि वो एक नदी है और उसी की धरती पर ऐसा एक बच्ची के साथ ऐसा घृणित कार्य हुआ. हे ब्रम्हपुत्र , मैं सारे आदमियों की तरफ से तुमसे माफ़ी मांगता हूं. इतना ही मेरे बस में है !!! और बस में ये भी है कि मैं एक कोशिश करूँ कि अपने आस पास के समाज को दोबारा ऐसा करने से रोकूँ. और बस में ये भी है कि मैं अपने बच्चो को और वो दुसरे सारे बच्चो को बताऊँ कि औरत एक माँ भी होती है और उन्हें जन्म देने वाली भी एक औरत ही है . और मेरे बस में ये भी है कि मैं उन सभी को औरत की इज्जत करना सिखाऊ. हे ब्रम्हपुत्र मुझे इतनी शक्ति जरुर देना कि मैं ये कर सकूँ.

    भाग सात : एक कविता
    : दुनिया की उन तमाम औरतो के नाम , उन आदमियों कि तरफ से जो ये सोचते हैकि उन औरतो का वतन उनके जिस्म से ज्यादा नहीं होता है :

    जानवर
    अक्सर शहर के जंगलों में ;
    मुझे जानवर नज़र आतें है !
    आदमी की शक्ल में ,
    घूमते हुए ;
    शिकार को ढूंढते हुए ;
    और झपटते हुए..
    फिर नोचते हुए..
    और खाते हुए !

    और फिर
    एक और शिकार के तलाश में ,
    भटकते हुए..!

    और क्या कहूँ ,
    जो जंगल के जानवर है ;
    वो परेशान है !
    हैरान है !!
    आदमी की भूख को देखकर !!!

    मुझसे कह रहे थे..
    तुम आदमियों से तो हम जानवर अच्छे !!!

    उन जानवरों के सामने ;
    मैं निशब्द था ,
    क्योंकि ;
    मैं भी एक आदमी था !!!

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  23. चर्चा चर्चा और चारों तरफ सिर्फ चर्चा.....प्रश्न सभी कर रहे हैं एक दूसरे से उत्तर भी देने का प्रयास जारी है..बस कुछ दिनो की बात है....ये दुर्घटना भी विस्मृत कर दी जायेगी....जैसे कानपुर की नीलम काण्ड और दिक्षा काण्ड मे हुआ....नीलम को मोहल्ले के कुछ बदनाम लड़कों ने इस कदर परेशान किया कि,उसने आत्महत्या करना बेहतर समझा और दिक्षा के साथ तो विद्यालय मे ही बलात्कार कर के मौत के रास्ते पर धकेल दिया गया...आज नीलम के परिवारीजनों का कुछ पता नही है....और जिस विद्यालय मे बलात्कार जैसा घिनौना कृत्य हुआ वो शान से चल रहा है....वाकई हम शौर्य गाथाओं को सुन कर बड़े हुए लोग हैं....हमारा इतिहास वीरों की कहांनियों से भरा पड़ा है...आध्यात्म के क्षेत्र मे हमें महारत हासिल है..हम दुनियां को सबसे अधिक प्रतिभायें सौंपते हैं प्रतिवर्ष...बुद्धिजीवियों की थाती लिये घूमते है हम.....विश्व गुरू होने जा रहे भारत देश मे रहते हैं हम..फिर आखिर क्या कुछ दूर रहा हमसे जो ऐसे नराधमों को हम साथ ले कर चलते रहे.....वो नैतिक प्रयास उसी पहले दिन से ही क्यों हम शुरू नही कर पाये जब किसी स्त्री को पहली बार प्रताणित किया गया.....या दूसरी बार भी क्यूं ना कर सके जब किसी बेटी को जिन्दा आग की लपटों मे झोंक दिया गया.....या तीसरी बार क्यूं ना किया वो सद्प्रयास जब किसी बच्ची से बलात्कार किया गया? इसी तरह के सैंकणों हजारों प्रश्न उत्पन्न होते हुए हम आज तक देखते चले आये गाँधी जी के तीन बन्दरों की मानसिकता के साथ....और अब उन हजारों प्रश्नों मे एक प्रश्न की बढ़ोत्तरी और हो गई है बस......चलो अब चर्चा खत्म हुई....हम भविष्य में फिर तमाम विद्वानों के साथ मिल कर इसी प्रकार की चर्चायें करते रहेंगे....प्रश्न पूँछते रहेंगे...हल सुझाते रहेंगे.....और फिर जब रात्रि के साढ़े नौ बजेंगे तो देश मे कहीं ना कहीं स्त्री के स्वाभिमान को माटी के ढ़ेले की तरह फोड़ा जायेगा...दूसरे दिन से हम फिर फेसबुक,अखबारो,और टी.वी.पर चर्चा करने मे तल्लीन हो जायेंगे...सिर्फ शब्दों से क्रोध को क्षोभ को व्यक्त करने मे.....वैसे मुझे ये चर्चा अच्छी नहीं लगी क्यों कि, कोई हल ना निकल सका....बुद्धिजीवियों से भरे हुए समाज में...।

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  24. बहुत ही बेहतरीन रचना....
    मेरे ब्लॉग

    विचार बोध
    पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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    1. शान्ति गर्ग जी, कभी तो विषय की गंभीरता को समझ अपना विज्ञापन देना बन्द कीजिए। कोई मर गया हो तो भी अपना विज्ञापन उसके कफन पर चस्पाना कोई भली बात नहीं है।
      घुघूती बासूती

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  25. हमारी भावनाओं की एक कीमत है। हम खुद उन्‍हें नहीं जानते, लेकिन मीडिया चलाने वाले जानते हैं और उन्‍हें भुनाने का तरीका भी।

    नंगा करके घुमाई जाती औरतों पर कभी इतनी तीखी प्रतिक्रिया नहीं देखी, जितनी पब के बाहर बर्थ डे पार्टी मना रही ग्‍यारहवीं कक्षा की छात्रा के साथ हुई मारपीट के प्रति प्रतिक्रिया देख रहा हूं।

    http://www.ndtv.com/article/cheat-sheet/guwahati-molestation-case-off-duty-reporter-part-of-mob-claims-rti-activist-akhil-gogoi-243235

    http://zeenews.india.com/news/assam/was-guwahati-molestation-orchestrated-by-reporter_787450.html

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    उत्तर
    1. जितनी पब के बाहर बर्थ डे पार्टी मना रही ग्‍यारहवीं कक्षा की छात्रा के साथ हुई मारपीट के प्रति प्रतिक्रिया देख रहा हूं।


      kehaan nahin daekhii
      is manch ki baat kar rahae yaa samaaj ki


      pab me nabalik ko entry dena manaa haen , ladkaa yaa ladki
      agr 11th class ki ladki kaa wahaan jaana galt tha to ladke kaa bhi

      phir yae जितनी पब के बाहर बर्थ डे पार्टी मना रही ग्‍यारहवीं कक्षा की छात्रा likhna kitna uchhit haen ???

      हटाएं
    2. सिद्धार्थ जोशी जी,
      तीखी प्रतिक्रिया नहीं हुई तो आप कर देते। कोई पब कल्चर वाला रोक रहा था आपको?
      वैसे, इस लड़की को तो जीवित ही नहीं छोड़ना चाहिए था ना?
      घुघूती बासूती

      हटाएं
  26. जानकारी हेतु दे रही हूँ ये सूचना
    ये मामला पुलिस ने "महज छेड़ छाड़ का " के अंतर्गत दर्ज किया हैं जिस की सजा ज्यादा से ज्यादा २ साल हैं
    इतना समय तो इस लड़की की ट्रौमा कौन्सिलिंग के लिये भी कम ही होगा .
    ये बलात्कार की कोशिश नहीं हैं , कपड़े फाड़ने को महज छेड़ छाड़ कहा जाता हैं

    उत्तर देंहटाएं
  27. मैने आपकी टिप्पणी पढ़ी|यह अवश्य शोचनीय बात है की फेसबुक के वॉल par कमेंट्स नही आए,परंतु यह सबके लिए शर्मनाक बात है|वैसे यह अतिशयोक्ति नही होगी की maine अपने ब्लॉग एवं फेसबुक पर भी जन-समस्या पर लिखता रहता हूँ-My Blog's nameis-'jugal's views'.

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  28. बन्धु, बेशरम न होकर लज्जा को ओढ़ पहन कर आपको, हमें व हमारे समाज को इस खबर को छिपा लेना चाहिए था। बेहतर तो यह होता कि जिसपर यह कहर टूटा उसे अपना चेहरा, अपने अस्तित्व को छिपा लेना चाहिए था, न, न, उसे तो आत्महत्या कर लेनी चाहिए थी ताकि समाज का इतना कुरूप चित्र समाज को देखना ही न पड़ता। हमें तो अपने सुन्दर, पुराने, वैदिक समाज का सुन्दर व काल्पनिक चित्र को ही दर्पण के सामने रख सच कह संसार को दिखाना चाहिए। कुरूप चेहरे को तोड़ देना चाहिए। भला यह भी कोई बात हुई कि पल भर को हम वनमानुष हुए और आप हमारी फोटो खींच संसार को दिखा दें? वे फोटो क्या हुईं जब हम मातृवंदना कर बलात्कार की मन ही मन तैयारी कर रहे थे? वे फोटो संसार को दिखाइए ना! और कहिए कि यत्र नारी पूजयन्ते... ब्ला ब्ला ब्ला....
    घुघूती बासूती

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  29. बन्धु, बेशरम न होकर लज्जा को ओढ़ पहन कर आपको, हमें व हमारे समाज को इस खबर को छिपा लेना चाहिए था। बेहतर तो यह होता कि जिसपर यह कहर टूटा उसे अपना चेहरा, अपने अस्तित्व को छिपा लेना चाहिए था, न, न, उसे तो आत्महत्या कर लेनी चाहिए थी ताकि समाज का इतना कुरूप चित्र समाज को देखना ही न पड़ता। हमें तो अपने सुन्दर, पुराने, वैदिक समाज का सुन्दर व काल्पनिक चित्र को ही दर्पण के सामने रख सच कह संसार को दिखाना चाहिए। कुरूप चेहरे को तोड़ देना चाहिए। भला यह भी कोई बात हुई कि पल भर को हम वनमानुष हुए और आप हमारी फोटो खींच संसार को दिखा दें? वे फोटो क्या हुईं जब हम मातृवंदना कर बलात्कार की मन ही मन तैयारी कर रहे थे? वे फोटो संसार को दिखाइए ना! और कहिए कि यत्र नारी पूजयन्ते... ब्ला ब्ला ब्ला....
    घुघूती बासूती

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