गुरुवार, अप्रैल 18, 2013

भारतीय ब्लॉग मेला, जर्मनी ब्लॉग मेला और नारी ब्लॉग

कल की चर्चा पर संजय झा जी की टिप्पणी थी:
"हा...हा...हा... भारतीय राजनीति का ’ब्लॉगिंग संस्करण" कहां तो बहुभाषीय ब्लॉगिंग प्रतियोगिता में ’हिन्दी ब्लॉगिंग’ को आगे करने की मुहिम चलना था.....कहां ये आपस में हल्दीघाटी का मैदान बना हुआ है.... मजे लिये जा रहे हैं....मगर ’दुख/संताप/क्षोभ/क्रोध/बेबसी के साथ....."
संजय जी द्वारा प्रयुक्त ’भारतीय’ शब्द के साथ कुछ पुरानी बातें याद गयीं। सन 2004/2005 में जब हम ब्लॉगिंग में नये आये थे। अंग्रेजी ब्लॉग लिखने वाले नियमित रूप से ’भारतीय ब्लॉग मेला’ आयोजित करते थे। इसमें किसी एक ब्लॉग पर ब्लॉगर साथी अपने ब्लॉगपोस्टों के लिंक सटा देते थे और फ़िर उनकी चर्चा वे (अंग्रेजी के) ब्लॉगर अपने ब्लॉग पर करते थे। शुरु में तो बड़ा अच्छा लगा हिन्दी ब्लॉगरों को कि वे ’भारतीय ब्लॉग मेला’ में चर्चा हो गयी। एक बार हिन्दी की कई पोस्टों की चर्चा हुई तो अतुल अरोरा ने मारे खुशी के अक्षरग्राम पर पोस्ट लिख मारी - छा गयी हिंदी ’भारतीय ब्लॉग मेला’ में। कुछ दिन बाद हिन्दी ब्लॉगरों का संकोच खतम हुआ और फ़िर तो धड़ल्ले से हम लोग बहुतायत में ’भारतीय ब्लॉग मेला’ में छाने लागे। अंग्रेजी ब्लॉगरों से बहस करने लगे। बहस जब भी होती तो सब हिन्दी ब्लॉगर साथ हो जाते। ऐसे ही एक ’भारतीय ब्लॉग मेला’ madman के ब्लॉग पर आयोजित हुआ। उसमें उन्होंने हिन्दी ब्लॉग्स की चर्चा करने में अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुये लिखा:
I know some Hindi blog entries were nominated, but I've left them out of this mela, not because I'm a snobbish bastard, but because: 1) I studied Hindi for 10 years at school, and speak the language fluently, but haven't read any big chunks of Hindi since 1990. So my reading speed has reduced to a crawl. 2) The thin strokes of the text coupled with the low resolution of a PC monitor made it even harder to read the entries. 3) Some of the spelling mistakes (mostly misplaced matras) didn't help either. My apologies to you all. Perhaps we should start a Hindi version of the Mela soon. Shanti, what do you think?
इसके बाद किन्ही सत्यवीर ने टिप्पणी करते हुये लिखा:
I agree that hindi blogs should have a different blog mela. It is better to keep regional languages at a different forum. Unlike english blogs it is trouble to download fonts and read a language you have forgot before ages. And if hindi posts are allowed in english blog meal then why not tamil,teulugu,marathi and so on...
सत्यवीर ने जब हिन्दी को क्षेत्रीय भाषा कहा तो हिन्दी के ब्लॉगरों ने वहां इस पर आपत्ति और बहस की। शुरुआत देबाशीष (Indiblogger )ने की। फ़िर इंद्र अवस्थी ,जीतेन्द्र चौधरी और अन्य ने मोर्चा संभाला। जीतेन्द्र चौधरी ने लिखा:
Interesting to know that HINDI is regional language! how about changing the name of this place "INDIAN BLOG WORLD" Why are u using word "BHARTIYA" OR "MELA"? I would not comment on the people, who spoke something foul about hindi but would definately say one thing. "जिस पेड़ के तने पर बैठे हो उसको आरी से काटने की कोशिश मत करो."
इसके बाद madman ने झल्लाकर कमेंट बंद कर दिये। वह पोस्ट थी 4 जनवरी,2005 की। बहस होने के बाद अतुल अरोरा ने गुस्से में लिखा- अब भारतीय ब्लॉग मेला में नामांकन बंद। मैंने उसी समय एक पोस्ट (अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है ) में लिखा:
भारतीयब्लागमेला(वर्तमान) का उपयोग तो सूचनात्मक/प्रचारात्मक होता है.किसी चीज को पटरा करने के दो ही तरीके होते हैं:-
1.उसको चीज को टपका दो(जो कि संभव नहीं है यहां)
2.बेहतर विकल्प पेश करो ताकि उस चीज के कदरदान कम हो जायें.
चूंकि हिंदी में ब्लाग कम लिखे जाते हैं अत:केवल हिंदी के लिये ब्लागमेला आयोजित करना फिजूल होगा.हां यह किया जा सकता है कि सभी भाषाओं के ब्लाग की साप्ताहिक समीक्षा की जाये.जो नामांकन करे उसकी तो करो ही जो न करे पर अगर अच्छा लिखा हो तो खुद जिक्र करो उसका और उसे सूचित करो ताकि वो हमसे जुड़ाव महसूस करे.तारीफ ,सच्ची हो तो,बहुत टनाटन फेवीकोल का काम करती है.है कि नहीं बाबू जीतेन्दर.तो शुरु करो तुरंत ब्लागमेला.

हिन्दी में ब्लॉग कम लिखे जाने की बात सन 2005 की है। अब तो खूब लिखे जाते हैं। इस पोस्ट के तीन दिन बाद ही चिटठाचर्चा की शुरुआत हुई। जिसकी शुरुआती पोस्ट में लिखा गया-
भारतीय ब्लागमेला के सौजन्य से पता चला कि हिदी एक क्षेत्रीय भाषा है.यह भी सलाह मिली कि हिंदी वालों को अपनी चर्चा के लिये अलग मंच तलाशना चाहिये.इस जानकारी से हमारेमित्र कुछ खिन्न हुये.यह भी सोचा गया कि हम सभी भारतीय भाषाओं से जुड़ने का प्रयास करें. इसी परिप्रेक्ष्य में शुरु किया जा रहा है यह चिट्ठा.दुनिया की हर भाषा के किसी भी चिट्ठाकार के लिये इस चिट्ठे के दरवाजे खुले हैं.यहां चिट्ठों की चर्चा हिंदी में देवनागरी लिपि में होगी. भारत की हर भाषा के उल्लेखनीय चिट्ठे की चर्चा का प्रयास किया जायेगा.
चिटठाचर्चा की शुरुआत के समय बमुश्किल 30 ब्लॉगर रहे होंगे हिन्दी के। आज हिन्दी के कुल ब्लॉग की संख्या 30000 तो पार कर ही गयी होगी। तमाम लोग आये लिखने। नयी तकनीक और सुविधायें। पहले हम मुकाबले के लिये अंग्रेजी ब्लॉगरों के पास जाते थे। अब आपस में ही लड़-झगड़ लेते हैं। हालिया जर्मनिया ब्लॉग इनाम में इसका मुजाहरा देख ही रहे होंगे सभी। लोग आपस में एक दूसरे को कतरने में लगे हैं। हास्यास्पद भाषा में तुकबंदी करते हुये इज्जत उतार रहे हैं। संजय झा की टिप्पणी के चलते जो पुरानी बात याद आ गयीं वह यहां बता दिये। अब आगे चला जाये। लेकिन पहले पीछे। पिछली पोस्ट में रवीन्द्र प्रभात जी के एक अंग्रेजी अखबार को दिये इंटरव्यू का जिक्र हुआ। उसमें उन्होंने साइट का लिंक जानना चाहा ताकि वे उसकी प्रामाणिकता से अवगत हो सकें। हमें जो पता था हमने बता दिया। इसके बाद लोगों ने और कुछ टिप्पणियां की। जैसे कि:
  1. डा.महफ़ूज अली ने लिखा: मैं चूँकि रविन्द्र प्रभात जी को पर्सनली जानता हूँ वो ऐसे नहीं हैं ... कुछ ऐसे भी होते हैं जो दूसरों के कन्धों पर बन्दूक रख कर चलाते हैं ... साउथ एशिया टुडे को देखने के बाद यह लगा कि यह साईट किसी सेमी-लिटरेट टाइप के आदमी की है .... इसकी अंग्रेजी मतलब मेरे जैसा अंग्रेजी जान्ने वाला पढ़ लेगा तो छ बार आत्महत्या कर लेगा ... और जो थोडा बहुत काम चलाऊ अंग्रेजी जानते हैं वो सिर्फ उस वेबसाइट पर लानत भेजेंगे ... और जो जाहिल होगा वो उस वेबसाइट पर यकीन करेगा ... और जिस हिसाब से उस वेबसाइट पर सरकारी चीज़ों का इस्तेमाल हुआ है वो ऍफ़ . आय. आर. (सार्क कन्ट्रीज का लोगो का यूज़ हुआ है ... जिसे मैंने मिनिस्ट्री को फॉरवर्ड तो कर दिया है ...बाकि अब सरकार या मिनिस्ट्री जाने) करने के लिए काफी है ... कोई भी अच्छा पढ़ा लिखा आदमी वैसी अंग्रेजी नहीं लिखेगा ... और वैसे भी अंग्रेजी का आदमी इन सब टुच्चा गिरी में नहीं पड़ेगा वो भी हिंदी ब्लॉग के लिए ... यह भी सोचने वाली बात है ... फैक्ट्स को जानने की कोशिश करनी चाहिए ... अगर यह इतनी ही सच्ची वेबसाइट होती तो क्वालिटी की अंग्रेजी होती ...इससे साफ़ ज़ाहिर है कि यह वेबसाइट तामझाम के लिए ही बनायीं गयी है जिसका मालिक अंग्रेजी में बहुत ही कमज़ोर है ....
  2. Sandeep Agarwal ने लिखा: साउथ एशिया टुडे को रजिस्टर करने वाला विनय प्रजापति है और augustvinay @gmail.com उसी का ईमेल एड्रेस है. विनय का जन्मदिन बीस अगस्त को पड़ता है उसी पर उसने ईमेल एड्रेस बनाया है और गो डैडी पर रजिस्टर किया है ... गो डैडी पर रजिस्टर होने के कारण रजिस्टर एरिया न्यू डेल्ही दिखाई दे रहा है। विनय प्रजापति जाकिर और रविन्द्र का ही दोस्त है व् लखनऊ से है और साइबर तकनीशियन है जिसे सब लोग ब्लॉग जगत में इसी रूप में जानते हैं. मैं खुल कर सामने नहीं आ सकता इसलिए छुपकर आना मजबूरी है। पर सच यही है और दिमाग लगाया जाए तो स्थिति सही ही मालूम होगी। ईमेल एड्रेस का augustvinay होना इत्तेफाक नहीं है.
जिस अखबार में रवीन्द्र प्रभातजी का अंग्रेजी इंटरव्यू छपना बताया गया, जिसकी अंग्रेजी डा.महफ़ूज अली ने ऐसी बताई जिसको कि उनके जैसा अंग्रेजी जानने वाला पढ़ लेगा तो छ बार आत्महत्या कर लेगा ..., उसमें जो ईमेल दिया है वह संदीप अग्रवाल ने बताया कि विनय प्रजापति का है। विनय प्रजापति को संदीप अग्रवाल ने जाकिर और रवीन्द्र जी का दोस्त बताया है। अब दोस्ती की बात तो दोस्त लोग ही बता सकते हैं लेकिन हम यही जानते हैं कि विनय प्रजापति वर्ष 2010 में परिकल्पना द्वारा वर्ष के सर्वश्रेष्ठ तकनीकी चिट्ठाकार का अलंकरण प्रदान किया गया था।

संभव है दोनों विनय प्रजापति अलग-अलग हों जिनके मेल एक ही हों। उन वाले विनय प्रजापति को रवीन्द्र प्रभात न जानते हों जिनके अखबार में उनका अंग्रेजी में इंटरव्यू छपा। एक ही नाम के जब कई लोग हो सकते हैं तो एक ई-मेल के कैसे नहीं। हो सकता यह सब जानकारी गड़बड़ हो। कहने को तो लोग यह भी कह रहे हैं-क्या फिक्स हैं डायचे वेले अवार्ड्स?


अब कुछ बातें नारी ब्लॉग को वोट देने के बारे में। कुछ लोगों ने कमियां, नकारात्मकता और पढ़ने तक के लिये आरक्षित कर देने की बात बताते हुये उसको वोट देने वालों पर सवाल उठाये हैं। नारी ब्लॉग के बारे में कमियों वाली बात सही है। यह भी सही है उसकी भाषा ऐसी-वैसी ही है। उसकी माडरेटर मनमानी करती रहीं हैं। जब मन आया तब किसी को सदस्य बना लिया। जब खटपट हुई निकाल दिया। जब मन आया सामूहिक रखा ब्लॉग। जब मन किया व्यक्तिगत बना दिया। केवल निमंत्रण पर पढ़ने वाला बना दिया। जब देखो तब बेवजह के तर्क देते हुये माहौल खराब किया। इतनी कमियों के बावजूद उसके लिये वोट देने जैसा फ़िजूल काम मैंने क्यों किया। वह भी तब जबकि नारी की माडरेटर ने हमारी समय-समय पर आलोचना करते हुये लिखा- कि हम हा हा, ही ही करते हुये ब्लॉगिंग का माहौल बिगाड़ते रहते हैं, अनूप शुक्ल हिन्दी के कौन विद्वान हैं?, आपने अपनी पोस्ट में महिला का चित्र क्यों लगाया?, मामा के किस्से लिखते रहते हैं आदि-इत्यादि कम से पचीस-तीस पोस्टों में उनकी किरपा हमारे ऊपर हुई है।

इसके बावजूद हमने ’नारी’ ब्लॉग को वोट दिया क्योंकि 2007 से हमने देखा है कि: नारी ब्लॉग के पहले तक हिन्दी ब्लॉग जगत मूलत: मर्दवादी था (अभी भी है काफ़ी हदतक)। नारी ब्लॉग के आने के बाद इस एकतरफ़ा वर्चस्व को झटका देने की शुरुआत हुई। नारी ब्लॉग ने हमेशा नारी मुद्दों पर अपनी आवाज उठाई है। शुरुआती दौर में बहुत सारी महिला ब्लॉगर इससे (मेरी समझ में सबसे ज्यादा) जुड़ी थीं। बाद में कम-ज्यादा जुड़ना होता गया। यह तो उन विज्ञान ब्लॉगों के साथ भी हुआ जिससे डा.अरविन्द मिश्र जड़े थे (जो कि उनके मानसपुत्र हैं।) नारी ब्लॉग का रवैया कभी-कभी अतिवादी रहा। लेकिन जब भी कभी नारी मुद्दों पर बात चली तो वहां आवाज उठाई गयी। मौका आने पर ’नारी’ब्लॉग के माध्यम से जुड़ी महिलाओं ने पुरुष ब्लॉगरों के फ़ूहड़ टिप्पणियों का जमकर विरोध किया


इस सबसे अलग मैं ’नारी’ ब्लॉग की माडरेटर का इसलिये प्रशंसक हूं कि उन्होंने जितनी बहादुरी और हिम्मत के साथ अपने खिलाफ़ हुये हमलों का मुकाबला किया है और अभी तक डटी हुई हैं उतनी हिम्मत विरले लोगों में ही होती है। उनके खिलाफ़ लिखी गयी कुछ पोस्टों के नमूने देखिये: लोग माथा पीट रहे हैं और तुम लिंग पकड़ कर बैठी हो यह पोस्ट डा.अलबेला खत्री ने लिखी थी। इसकी चर्चा शिवकुमार मिश्र ने की थी- तुलसी और दुर्वासा इतने भौंडे तो नहीं थे इस पोस्ट में आई टिप्पणियों से अन्दाजा लगाया जा सकता है कि हिन्दी ब्लॉगिंग परिवार के लोग कितनी बेहूदी टिप्पणियां करते रहे हैं उनके खिलाफ़।

ऐसी और न जाने कितनी पोस्टें हैं जिनमें उनके खिलाफ़ और अन्य महिला ब्लॉगरों के खिलाफ़ द्विअर्थी टिप्पणियां करती की गयीं। रचना जी में बहुत सारी कमियां होंगी। लेकिन उनकी बहादुरी, बेबाकी और डटकर मुकाबला करने की हिम्मत के लिये मेरे मन में उनके प्रति इज्जत है।

आज भले नारी ब्लॉग की सदस्याओं के अपने-अपने ब्लॉग हैं। वे उनके व्यवहार या अपनी मजबूरियों के चलते भले न उससे जुड़ी हों लेकिन यह सच है ब्लॉगजगत में ’नारी’ ब्लॉग ने हमेशा महिला अस्मिता से जड़े मुद्दे उठाये। चोखेरबाली ने भी बहुत अच्छा काम किया। उसकी भाषा भी अधिक परिष्कृत रही है। लेकिन ठेठ और ठसकदार तरीके से नारी मुद्दों पर बात कहने की शुरुआत का श्रेय नारी को ही जाता है। उसने कम से कम यह झांसा तो नहीं किया कि कहीं फ़र्जी चीनी भाषा में इंटरव्यू दिया और उसका जापानी से अनुवाद कराके हिन्दी में सटा दिया अपना भौकाल बनाने के लिये।

वैसे यह बढिया मौका था/है महिला ब्लॉगरों के लिये कि वे नारी/चोखेरबाली ब्लॉग का समर्थन करके ब्लॉगजगत के इनाम जीतने के मामले में पुरुष ब्लॉगरों का चला आ रहा वर्चश्व खतम करने की कोशिश करतीं।

न हमारे वोट देने से कोई जीतेगा, न न देने से कोई हारेगा। लेकिन हमारा अपना मानना है कि ब्लॉगजगत में नारी अस्मिता की रक्षा के लिये जितना जद्दोजहद और लड़ाई-झगड़ा और बवाल भी नारी ब्लॉग से जुड़े साथियों ने किया उतना और किसी ने नहीं। इसलिये हमने उसको अपना वोट दिया। यह सपोर्ट बावजूद इस सच्चाई के  बावजूद कि नारी ब्लॉग की माडरेटर ने खुलकर जितनी मेरी खिल्ली उडाई होगी उतनी शायद ही किसी और की।

मैं उनके हौसले , हिम्मत और बहादुरी की तारीफ़ करता हूं। इसीलिये उनका समर्थन किया। अब यह मौका भी है सो अपनी बात कह लिये। ऐसे मौके पर बकौल डा.अरविन्द मिश्र तटस्थ नहीं रहना चाहिये क्योंकि -जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध…

ये तो रही हमारी बात। आपकी आप जानो!

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69 टिप्‍पणियां:

  1. अपने तो इस बॉब शोब की नौटंकी से कोसों दूर हैं | बस अपने ही ब्लॉग में मस्त हैं | आपका लेख पढ़कर अच्छा लगा |

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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    1. ये अच्छा है कि आप ब्लॉग नौटंकी से दूर रहते हैं और अपने ही ब्लॉग में मस्त रहते हैं। बधाई! :)

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  2. जो हो रहा है वो दुखद ही है ...प्रासंगिक लिनक्स साझा किये , आभार

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    1. दुखद क्या यह सब सच्चाई है। धन्यवाद!

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  3. बड़ा खोपड़ी लगानी पड़ती होगी . इत्ते सारे मौजूं बातें और लिनक्स. वैसे नारी ब्लाग के बारे आपकी बातों से सहमत हूँ

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    1. इत्ते लिंक न लगाते तो न सहमत होते? :)

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  4. ...ज्ञानचक्षु खोल दिए प्रभु ! हम भी कितने अज्ञानी थे !
    .
    आपके और आपके मनमुताबिक टिप्पणीकारों का कहना यदि सही भी है,अखबार या साइट फर्जी है या रवीन्द्र प्रभात ही इसके मालिक हैं तो भी यहाँ उस साईट को नोबेल मिलने के लिए नामांकित नहीं किया गया है.जिस तरह आप अपने ब्लॉग या साईट पर विचार रखते हैं ,उसी तरह यदि मान लें तो केवल रवीन्द्र प्रभात के कहे पर चर्चा क्यों नहीं करते ? उनके कहे तथ्यों की मेरिट पर बात करना शायद असहज लगता होगा.
    रही बात उसकी अंग्रेज़ी पढ़कर मर जाने की,सो टिप्पणीकार की कई कविताओं को पढ़कर ज़र्मनी में कई हादसे होने की खबर भी बताई जाती है.
    हाँ,यहाँ आप जिस 'नारी' की पुरजोर वक़ालत कर रहे हैं,उसके हिज्जे-नुक्तों की सामान्य सी गलतियाँ नहीं खटकती,जबकि हिंदी हमारी मातृभाषा है.इस पर दो बोल कहकर आप उसे अभयदान दे देते हैं क्योंकि वह 'सामाजिक-परिवर्तन' जैसे क्रान्तिकारी काम में जुटी हुई है.

    जिस तरह एक नामालूम अखबार की वैधानिकता को लेकर ,जिसने रवीन्द्र प्रभात का इंटरव्यू लेकर बड़ा संगीन अपराध किया है,आप प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं,उस डायचे-वेले की एक भी प्रक्रिया में आपको कमी नहीं दिखती.कमी की बात को हल्के से कहकर और उसके ही लक्ष्यों को पाने में आप उसकी मदद कर रहे हैं.उसकी नामांकन प्रक्रिया और मत देने का सिस्टम बिलकुल ऐसा है,जैसे भाड़े के टट्टुओं को बैठाकर उनसे कहा जाय कि वे बस वोट देते रहें.ऐसे फर्जीवाडे के द्वारा 'नारी' जब जीत पायेगी,तभी उसकी समाज में सार्थकता सिद्ध होगी.इसलिए इस बहस को आप छोड़ देते हैं.

    और हाँ,आपने किसी 'नारी' के मोडरेटर के अपमान को लेकर फ़िर से एक अनावश्यक लिंक दिया है,जिसे न पता हो,वह भी पढ़ ले.पर आपको इसी ब्लॉग-जगत में किया गया खुल्लम-खुल्ला गली-गलौज विस्मृत हो जाता है या उस समय भी आप मौन रह ए थे जब यह सब हो रहा था.डर.अरविन्द मिश्र,अमरेन्द्र त्रिपाठी,संतोष त्रिवेदी आदि आपकी फेहरिस्त में नहीं हैं,सो इनको ख़ूब गरियाया जाए,आपका कर्तव्य-बोध तभी जगता है जब 'नारी' जैसा कोई सामाजिक ,क्रान्तिकारी अभियान शुरू हो और जो हिंदुस्तान में इकलौता हो !
    धन्य हुए आपकी निष्पक्षता ,सामाजिक चेतना और नारी के प्रति गहरी संवेदना को जानकर.हम तो ठहरे निरा पामर और कलुषित जीव ! शायद ही इस जन्म में हमारा उद्धार हो !

    बहरहाल,आप अपना अभियान जारी रखें,अपने खोजी लोगों को तनिक डायचे-वेले के काम पर भी लगा दें,पर उनके मन-मुताबिक शायद ही मिले.

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    1. संतोष त्रिवेदी कभी ध्यान से पढ़ा भी कीजिये: पिछली चर्चा में हमने लिखा था: 1. एक जर्मन संस्था इनाम बांट रही है ब्लॉगिंग के। उसका वोटिंग का तरीका इतना बचकाना है कि कोई भी सौ-पचास लोगों को इकटठा करके अपने पक्ष में वोट हासिल कर सकता है। अगर चुनाव वोटिंग से ही होना तो नारी /चोखेरबाली कभी चुनाव नहीं जीतेंगे। अरविन्द मिश्र/संतोष त्रिवेदी या किसी अन्य के लिये नारी ब्लॉग के माडरेटर ने क्या लिखा यह देखने के साथ यह भी देखना होगा कि उसके पहले उन्होंने क्या लिखा। लिखा तो उन्होंने मेरे खिलाफ़ भी बहुत कुछ है लेकिन जो मुझे सही लगा वह मैंने लिखा। आप व्यंग्य कार हो। परसाईजी लिखते हैं -व्यंग्य के मूल में करुणा की अंतर्धारा बहती है। यह कैसी करुणा है कि अगर वे अपने लिये चार स्पांसर मिलने की बात लिखती हैं तो आप अपने स्टेटस पर लिखते हैं- "डायचे-वेले के ब्लॉगिंग सम्मान को लेकर कुछ लोग इत्ते उतावले हो रहे हैं कि चार लोगों के सहयोग से जर्मनी जाने से परहेज नहीं है।
      हमने तो अभी तक यही सुना था कि अंत समय में ही चार कांधों की ज़रूरत होती है :) " यह व्यंग्य की कौन सी धारा है भाई जो किसी की अंतिम यात्रा की बात करते हुये स्माइली लगाती है? यह करुणा की अंर्तधारा नहीं क्रूरता है। किसी के विरोध का मतलब उसकी अंतकामना होगा? उनको तो हिन्दी नही आती लेकिनआपकी भाषा इतनी गरीब कैसे हो गयी? जरा सोचिये कौन सी भाषा आप प्रयोग कर रहे हैं?

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    2. ....फिर भी उस डायचे-वेले की ,जो आपके अनुसार बचकाना है,नारी को जिताकर आप उसकी सार्थकता सिद्ध करने पर तुले हैं। रही बात चार कन्धों वाली,तो यह ह्यूमर था,इससे कोई मर नहीं जाता और न ही ऐसी कामना है पर इसमें किसी का नामोल्लेख तक नहीं है तो आप को बुरा लगा है,जब नाम ले लेकर माँ-बहन किया जाता है,वह सब त्याज्य है।

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    3. डायचे-वेले में जीतने-हारने से मुझे कोई मतलब नहीं। कोई जीतेगा ही बाकी हारेंगे ही। उनकी जो कमियां हैं मैंने उसके बारे में भी लिखा। अपनी बात कही। जो मेरी समझ में ठीक लगा लिखा। अपनी बातें आप लिखो। चार कन्धों वाली बात अगर आपका ह्युमर तो आपका क्रोध कितना क्रूर होगा समझा जा सकता है।

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  5. 1. ब्लाॅगिंग में आने से पहले की बातें पढ़ कर भला लगा.
    2. ब्लॉग जगत के कभी मूलत: मर्दवादी होने के बारे में पढ़ कर आैर ज्ञानवर्धन हुआ.
    3. चर्चा में अपना भी ज़िक्र हो तो स्वाद सा आ जाता है (पता नहीं क्यों).

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    1. :) धन्यवाद आपकी प्रतिक्रिया के लिये। :)

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  6. व्यक्ति या ब्लॉग, हार या जीत नहीं मुद्दा महत्वपूर्ण है...

    कल मैंने अपना ये कमेंट संतोष त्रिवेदी जी के फेसबुक वॉल पर दिया था...यहां भी प्रासंगिक लग रहा है, इसलिए रिपीट कर रहा हूं...

    संतोष जी, शायद आपको याद हो ब्लॉग को आरक्षित करने पर सबसे पहले मैंने सवाल उठाया था...ये किसी भी ब्लॉगर का अधिकार है कि वो अपने ब्लॉग को कैसे चलाना चाहता है...लेकिन मैंने ये सवाल उठाया था कि ब्लॉग आरक्षित है तो फिर उसे एग्रीगेटर पर क्यों रखा जाता है...नकारात्मता के आपके आरोप भी शायद सही हो सकते हैं...लेकिन मैंने इस बार जो स्टैंड लिया है, वो इन बातों से अलग है...मैं दरअसल देश में इस बात से बड़ा क्षुब्ध हूं कि हम महिला आरक्षण हो या हालिया दामिनी का प्रकरण, आधी दुनिया को बराबरी का हक़ देने के लिए बातें तो बहुत करते हैं लेकिन वक्त आने पर कुछ करते नहीं...अगर ऐसा ना होता तो बरसों से महिला आरक्षण बिल अटका ना होता...इस बात से शायद आप सहमत हो कि 'नारी' ब्लॉग में तमाम खामियों के बावजूद नारी हित से जुड़े मुद्दों को हमेशा उठाया जाता रहा है...चोखेर बाली भी ऐसा ही ब्लॉग है लेकिन इस साल अभी तक इसकी एक ही पोस्ट आई है...इसीलिए मैं 'नारी' को बॉब्स अवार्ड के लिए सपोर्ट कर रहा हूं, ये जानते हुए भी कि उसकी हार निश्चित है...वैसे ही जैसे कि इस देश में महिला मुद्दों के साथ हमेशा से होता आया है...उम्मीद करता हूं कि अपनी बात स्पष्ट कर पाया हूंगा..मेरे इस स्टैंड से किसी से भी मेरे व्यक्तिगत संबंध अक्षुण हैं...आशा है आप भी इसे पढने के बाद पूर्व की तरह मुझसे स्नेह बनाए रखेंगे...

    जय हिंद...

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    1. ये आरक्षित ब्लॉग वाली बात 'नारी' ब्लॉग के लिए नहीं थी, बल्कि दूसरे ब्लॉग "रचना " का ब्लॉग " बिना लाग लपेट के जो कहा जाए वही सच है " के लिए थी...'नारी' ब्लॉग को कभी आरक्षित नहीं किया गया...


      जय हिंद...

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  7. बड़े बदनसीब होते हैं वो जिन्हे मरने के बाद चार कंधे नसीब नहीं होते हैं . सो इस नाते मे खुश नसीब हूँ की अगर आज मौत आजाये तो कम से इसी ब्लॉग जगत के चार ब्लोगर अपने कंधो पर अपोलो अस्पताल पहुचा देगे जहां शरीर दान कर रखा हैं

    फिर चाहे वो अनवर जमाल हो , चाहे खुशदीप , चाहे अनूप शुक्ल या सुरेश चिपलूनकर ,
    हाँ कुछ कंधे बेक अप के लिये भी हैं जैसे सतीश सक्सेना , ऍम मासूम , महफूज़ अली , प्रतुल वशिष्ठ

    अब आते मुद्दे पर
    एक अखबार में रविन्द्र जी का इंटरव्यू छापा , उनका अधिकार
    एक ब्लॉग पर उस इंटरव्यू को हिंदी में छापा गया , उनका अधिकार
    नारी ब्लॉग की मोडरेटर के नाते मैने एडिटर को आपत्ति का पत्र लिखा मेरा अधिकार
    उस पत्र में जो नहीं था उसको परि कल्पना पर डाला गया उनका अधिकार
    मुझे मान हानि का दावा का डर दिखया गया उनका अधिकार
    नुक्कड़ पर नारी की असलियत दिखाई गयी , उसका गला काटो का कमेन्ट में आवाहन किया गया , उसको बेशर्म कहा गया "उनका अधिकार"
    मैने पेपर का डोमेन ट्रेस डाला मेरा अधिकार
    पेपर किसका हैं जहां डोमेन रजिस्टर किया गया हैं कोई भी पता कर सकता हैं
    पर मुद्दा क्या था ????? क्यूँ डोमेन ट्रेस करना पड़ा ??? अखबार किसका हैं इससे क्या फरक पडा , सही कहा मुद्दा ये हैं ही नहीं
    तो मुद्दा क्या हैं , मुद्दा हैं वो साक्षात्कार जिसमे रविश कुमार पर ऊँगली उठाई गयी हैं और अपने को ज्यादा बेहतर चयनकर्ता मानते हुए अपनी पसंद का ब्लॉग को बेहतर बताया गया हैं .

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    1. आपका यह कमेंट पढ़ा तो आंखें छलछला आईं। लगा कि अब कमेंट तो होगा नहीं।
      हम जज़्बाती आदमी हैं, क़स्बाई जो ठहरे।
      कुछ और कहते अभी बन नहीं रहा है और ज़रूरत भी नहीं है।

      ♥ ...हम रचना जी के साथ हैं और उनके लिए लंबी उम्र, अच्छी सेहत और इज़्ज़त के आला मक़ाम की दुआ अपने रब से करते हैं।
      यहां सभी तालीमयाफ़्ता और इज़्ज़तदार लोग जमा हैं। इख़्तेलाफ़ के बाद भी हम एक दूसरे को कैसे इज़्ज़त दें, इसके लिए हमें कोई मुनासिब तदबीर ज़रूर करनी चाहिए !!!

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  8. हिन्दी ब्लागिंग की थुक्का-फजीहत और हाहाकारी से काफी दिनों (बल्कि महीनों) तक दूर रहा (अभी भी हूँ), लेकिन लगता है कि जिस तरह से एक के खिलाफ गोलबंदी हो रही है, जिस तरह छीछालेदारी चल रही है, जिस तरह एक-दूसरे को नीचा दिखाने के खेल चल रहे हैं... अब शायद पुनः मैदान में उतरना ही पड़ेगा. कुछ माह से ब्लागिंग छोड़कर, फेसबुक पर क्या चला गया, शायद भाई लोग मुझे भूल ही गए कि मैंने भी हिन्दी ब्लागिंग की सिर-फुटव्वल में अपना अच्छा-ख़ासा योगदान दिया हुआ है (इस स्थान पर स्माइली चिपकी हुई मानी जाए). हिन्दी ब्लागिंग में पुरस्कार कैसे मिलते हैं (या हथियाए जाते हैं) यह बात उन सभी को पता है, जो २००६ से २०१० तक सक्रिय ब्लागिंग किया करते थे.

    एक फुटकर से पुरस्कार के लिए क्या वही पुराने दिन वापस लौटाने होंगे??? यदि भाई लोग तैयार हों, तो मैं तैयारी करके आता हूँ... फिर निपट लेंगे सभी से. :)

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    1. अब आ भी जाओ। जो होगा देखा जायेगा। :)

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  9. मुझे एक बात समझ में नहीं आती, ब्लॉग लेखन के लिए पुरस्कार की क्या आवश्यकता है? ये पुरस्कार की लालसा ही है, जो आपसी सिरफुटव्वल करती है। इतने साल हो गए हिन्दी ब्लॉगिंग को, अब तो चिट्ठाकारों को परिपक्व हो जाना चाहिए। पुरस्कार रवि को मिले या अतुल को, अनूप को या उड़नतश्तरी को , कोई फरक पड़ता है क्या?
    भाइयों ब्लॉग , विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम है, अगर पुरस्कार चाहिए तो अखबार,पत्रिका में लिखो, वहाँ पर नाम और नामा ज्यादा मिलेगा। बाकी जैसा आप सब गुणीजन ठीक समझें।

    -Jitu

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    1. बड़ी समझदारी की बातें कर गये भाई जीतू!

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  10. अरे ओ संदीप अग्रवलवा, ई साइबर तकनीशियन कौन बला होवत है बे। हमका इसके बारे कुछ बतावा हो। तुम लौंडे भी जाने-जाने का-का बकबकावत हो...

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    1. रामजी की प्रोफ़ाइल भी गुम है। क्या बतायें?

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    2. @अ‍नूप,

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  11. आज की चर्चा में बहुत कुछ जानने को मिला और आपने जो लिंक्स जुटाए और प्रस्तुत किये और बेबाक विवेचना की उसके लिए आपको सलाम . अपने ब्लॉगर मित्रों की स्पष्टवादिता और निष्पक्षता का जो लेखन परिदृश्य दिखलाई दिया उससे लेखन को बहुत संबल मिला . अब समझ आया कि नारी ब्लॉग के कुछ लोगों के आँख की किरकिरी क्यों बना हुआ है? शुक्ला जी अपने जिन टिप्पणियों का उल्लेख किया है , उस समय भी अलबेला खत्री की पीठ थपथपाने वाले और वाह वाह करने वाले लोगों की कमी नहीं थी . मैं तो समझती थी ब्लॉगर प्रबुद्ध और समाज हित के तटस्थ रहने वाले प्राणी हैं जो अपनी रचनाधर्मिता का पालन करते हुए माँ सरस्वती के चरणों में नमन करते है .
    यहाँ नारी अगर नारी के हक लड़ती है तो पुरुष ही नहीं नारी भी उसकी आलोचना करने में पीछे नहीं रहती हैं , लेकिन "नारी" वो ब्लॉग है जो जब शुरू हुआ है अपने पथ से कभी भ्रमित नहीं हुआ और जिस उद्देश्य से शुरू हुआ वो अभी तक शेष है और भविष्य में भी रहेगा . ब्लॉग के नाम पर व्यक्तिगत आक्षेप हमारी ही गरिमा को कम करते है .
    पुरस्कार मिले या न मिले लेकिन ब्लॉग जगत में भी अपने वर्चस्व को बनाये के लिए हम कुछ भी करेगा . नारी दोयम दर्जे की प्राणी वाले ब्लॉग को तो बख्श दो.

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    1. आपकी प्रतिक्रिया के लिये धन्यवाद!
      ब्लॉगर भी तो इसी समाज का अंग है। वह सब यहां भी होगा जो समाज में होता है।

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  12. श्रमसाध्य चर्चा , सामयिक और समीचीन भी तदुनुरूप टिप्पणियां और प्रतिटिप्पणियां भी पढने को मिलीं कुल मिला कर पन्ना और चर्चा का ये अंक बहुत ही यादगार बन पडा है । इसलिए शुक्रिया कबूल करिए । अब बात पुरस्कार , नामांकन , आलोचना , प्रतिआलोचना , आरोप , अपमान , मानहानि , .......सब कुछ सुना सुना सा है , या कहूं कि दोहराया तिहराया या उससे भी ज्यादा सा लग रहा है , बस हर बार देखना ये होता है कि इन्हें कहां कैसे कब और कौन कौन रिन्यू कर और करवा रहा है । मैं हिंदी ब्लॉगिंग को पसंद करता हूं , हिंदी ब्लॉग्स को पढता हूं और हिंदी भाषा के ब्लॉगरों का सम्मान करता हूं ..बस इसके आगे सारे वाद/विवाद/विषाद ..सब गौण पड जाते हैं ..जब जब हिंदी आगे जाएगी ..हम उसे आगे सरकाने में अपना जोर लगाएंगे । शुक्रिया

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    1. आपकी प्रतिक्रिया के लिये धन्यवाद!
      जोर लगाये रहिये हिन्दी को आगे बढ़ाने में! :)

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  13. अब तो हैरानी को भी हैरानी होने लगी होगी । बाप रे! इतना मुड़ी फुटौल ??
    भारत सचमुच पोलिटिक्स अवेयर कंट्री है, तभी तो घर-घर में नेता हैं। राजनीति नस-नस में बहती है।
    रचना जी के साथ मेरी भी असहमतियाँ हो चुकीं हैं, लेकिन इस बात से मैं इनकार नहीं करुँगी कि नारीगत समस्याओं को, जिस भी तरीके से सही, उन्होंने सामने लाने की हमेशा कोशिश की है। इसमें भी कोई शक नहीं जितने तंज़-कटाक्ष, अपमान उन्होंने झेले हैं, शायद ही किसी ने झेला होगा इस ब्लॉग जगत में , लेकिन फिर भी वो डटी रहीं हैं। हो सकता इस प्रतियोगीता में नारी हार जाए, लेकिन जिस तरह के खुलासे किये गए हैं, और उन खुलासों से जिस तरह की खलबली ब्लॉग जगत में मच गयी है, यह अपने आप में नारी की जीत बता रही है।

    सुरेश चिपलून्कर जी के ब्लॉग का नामांकन नहीं होना दुखद रहा। उन्होंने जितना काम किया है शायद ही किसी ब्लॉग ने किया हो।

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    1. आपकी बात से सहमत!

      सुरेश जी का ब्लॉग उनके फ़ालोवर ने नामांकित न किया होता वर्ना ........!

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    2. अजित वडनेरकर जी का भी ब्लॉग है, जो न सिर्फ बहुत प्रतिष्ठित है, बहुत ख़ामोशी से बहुत काम किया है उन्होंने।

      हटाएं
  14. कई दिन से चल रहे इन सब कुचक्रों से अपने को अलग रखने व प्रतिक्रिया न देने न चाहते हुए भी यह सब देख पढ़ कर विवश हो लिखना पड़ रहा है -

    यह बात सच ही प्रमाणित होती लगती है कि हिन्दी वाले जब जहाँ जाते हैं पूरी तरह जाते हैं और अपनी छीनझपट, छलकपट, मारकाट, नीचता, लोभ-लालच, प्रपंच, ईर्ष्याद्वेष और जाने क्या क्या घिनौनापन साथ ले कर जाते हैं। 2006 से 2010 तक इस ब्लॉग जगत से जुड़े रहने के बाद इसीलिए 2011 से सब से किनारा कर लेना बेहतर समझा क्योंकि इतना अधिक छल-छद्म व लूट खसोट है यहाँ, मानो कोई लाखों की संपत्ति बंट रही है। ये सब चीजें असुरक्षा, हीनताबोध व अभाव की मानसिकता से उपजती हैं। पता नहीं क्यों सब के सब इतने अभावपूर्ण, हीनता व असुरक्षाबोध से ग्रसित, और अपनी नंगई उघड़ जाने तक से बेपरवाह हैं?
    हिन्दी में जब ब्लॉग लेखन शुरू हुआ उस से कम से कम दस वर्ष पूर्व अँग्रेजी आदि में लिखा जाने लगा था किन्तु आज तक किसी ने अँग्रेजी ब्लॉगिंग का इतिहास लिखने या इतिहासकार बनने,अपने या दूसरों को अमर बनाने या उसमें सम्मिलित करने /करवाने जैसी कोई पहल नहीं की। अँग्रेजी वाले हिन्दी वालों से कितना पिछड़े हुए हैं न !
    ये सारी मारामार असल में अपने को रेखांकित करने करवाने की कवायद के कारण है। ब्लॉग सबने अपने अपने शौक के कारण शुरू किए होंगे किन्तु जुम्मा जुम्मा दस साल बीते नहीं कि इतिहास में नाम लिखाने के लिए युद्ध भूमि में तब्दील हो गए। सौ साल जब हो जाएँ तब इतिहास की बात आनी चाहिए। इतनी छीना झपट के कारण ही कोई सभ्य व्यक्ति संपर्क में नहीं आना चाहता, भले ही कितने भी पुरस्कारों के तमगे लटका लीजिए... नेट पर लिखा एक एक शब्द आने वाली पीढियों के सामने आपकी/हमारी पूरी कलई खोल देगा, इसे मत भूल जाइए। असली इतिहास नेट पर अंकित हो चुका है और उसे कोई बदल नहीं सकता। बड़े से बड़ा पुरस्कार नहीं और बड़े से बड़ा महिमामंडन नहीं।

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  15. कृपया पहली पंक्ति को यों पढ़ें -
    कई दिन से चल रहे इन सब कुचक्रों से अपने को अलग रखने व प्रतिक्रिया देना न चाहते हुए भी यह सब देख पढ़ कर विवश हो लिखना पड़ रहा है -

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    1. आपकी बात से सहमत। लेकिन छल-छद्म व लूट खसोट किस विधा में नही है?

      हमें तो अभी भी वर्धा में आलोक धन्वा की कही बात सही लगती है- ब्लॉगिंग सबसे कम पाखंड वाली विधा है। कुछ लोग हैं जो छल-छद्म व लूट खसोट करके इस विधा को बदनाम करते हैं। ऐसे लोग तो हर कहीं मिलेंगे।

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    2. आलोक धन्वा क्योंकि ब्लॉगिंग के संसार से दूर हैं इसलिए वे जितना 2 दिन में वहाँ उपस्थित लोगों के निजी परिचय से इसे जान सके, उसके आधार पर उन्होने टिप्पणी दी। वह उनकी सदाशयता थी। इसलिए उनकी टिप्पणी ब्लॉग जगत के लिए योग्यता प्रमाण पत्र नहीं है।

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    3. मगर मुझे आपकी बातों में घोर कूपमंडूकता ही नजर आ रही है. दो-चार हिंदी ब्लॉगों के बीच निम्नकोटि के युद्ध को आधार बना कर आप अपनी बात कह रही हैं, तो इससे यह सिद्ध होता है कि आपने उन हजारों हिंदी ब्लॉगों को अभी देखा भी नहीं है जो इन बातों से दूर, उच्च कोटि के सृजन कर्म में लगे हैं.

      मेरा अब भी मानना है कि हिंदी के नए सूर और तुलसी हिंदी ब्लॉगिंग से ही आएंगे. और इसका आगाज़ हो चुका है.

      हटाएं
    4. और, अपनी बात के समर्थन में ताज़ा ताज़ा छपी, देवेन्द्र कुमार पाठक के ये दोहत्थड़ दोहे पेश करना चाहूँगा -

      मदरीले दृग खोलती,
      भोर-वधू निँदियार;

      ललछौँही छवि सोहती,
      सेँदुर भरे लिलार.

      छोड़ गाँव-घर चल पड़े,
      चैतहरोँ के पाँव;

      जहाँ हाथ को काम है,
      वहाँ ठिकाना-ठाँव

      टेसू हुए दिवालिए,
      मदिराए महुहार;

      खलिहानोँ के सिर टँगी,
      कर्ज़ोँ की तलवार.

      रात रही जब पहर भर,
      तब जागा महुहार;

      फूल झरे मदरस भरे,
      बीनेँ बीननहार.

      जीवन बारह-बाट हो,
      भटका मिली न राह;

      चैत -चित्त-चिंता जले,
      धुँधुआ रही निग़ाह.

      दिन-दिन दूबर हो रहे ,
      नद-नदियोँ के अंग;

      धूप-पसीने मेँ उड़े,
      फागुन के सुख-रंग.

      ~ ~ ~ ~



      आगे पढ़ें: रचनाकार http://www.rachanakar.org/#ixzz2QtRITFa7

      हटाएं
    5. रवि जी, ब्लॉग कोई विधा नहीं, ब्लॉग एक मंच हैं; जैसे अखबार या टीवी एक मंच हैं,एक विधा नहीं। इसलिए इस मंच का उपयोग करने वाला समाज व व्यक्ति वहीं है जो हमारे समाज के सदस्य हैं। एक मंच के सदस्यों को सारे समाज से अलगाया नहीं जा सकता बशर्ते कि यहाँ कोई नियमावली लागू की गई हो कि अमुक तरह के लोग ही इसका प्रयोग कर सकते हैं। जब ऐसा संभव नहीं तो सभी तरह के लोग इसमें हैं और होने चाहिएँ। इसे अलग विधा जैसा घोषित करना ही तो सबसे बड़ा समस्या का मूल है कि इसकी अकादमी और इसके इतिहास पर लोग टूट पड़े और सिर फुटव्वल करने लगे। यदि यही सब चीजें यहाँ भी करनी हैं तो किस स्वतंत्रता और खुले मंच की दावेदारी की बातें की जाती हैं ?कैसा आम आदमी का साम्राज्य ?

      हटाएं
    6. आपकी बात सही है कि इस मंच का उपयोग करने वाला समाज व व्यक्ति वहीं है जो हमारे समाज के सदस्य हैं।

      ब्लॉग कोई अलग विधा नहीं हैं। यह अभिव्यक्ति का एक नया माध्यम है। सभी विधा के लोग इसके माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति कर सकते हैं। लेकिन आम आदमी का माध्यम होने के चलते यहां वो मठाधीशी/राजनीति नहीं है जो साहित्य और अन्य माध्यमों में है जिनमें खूब पैसा और सत्ता है। इस मामले में यह सबसे कम पाखण्ड वाला माध्यम है (विधा छोड़िये नहीं कहते)

      आशा है अब आपके पिताजी स्वस्थ होंगे। उनके अच्छे स्वास्थ्य के लिये मंगलकामनायें।

      हटाएं
    7. अनूप जी, इसी मठाधीशी या मठाधीशी में रूपांतरित हो जाने वाले कारकों व तत्वों का ही तो विरोध किया है, फिर इतनी आपत्ति क्यों ? इतना कष्ट क्यों? एकदम न समझ पड़ने वाली बात है मेरे लिए। जो-जो (यदि) ऐसे नहीं हैं या ऐसी चीजों का समर्थन नहीं करते उन्हें क्योंकर कष्ट होगा ? कभी नहीं होता, न होना चाहिए।

      या मेरा हर हाल में विरोध करना ही है, यह तय करके बैठे हैं आप लोग तो पूरी तरह से विदा लेना ठीक रहेगा। सही बात को घेर कर मारने की नीति यदि बना ली गई है तो वहाँ आकर मरने का किसे शौक है ?

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    8. मैं ब्लॉग(ब्लागिंग) को भी एक विधा मानता हूँ -यह विधा भी है और माध्यम भी!

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    9. @कविता जी,

      कहां विरोध? अरे अपने-अपने मत हैं। रख दिये। आपका विरोध कहीं नहीं!कहां आप यह सब सोचने लगीं? ऐसा कुछ नहीं है!

      हटाएं
    10. कविता जी,
      मेरा किसी से कोई विरोध नहीं है. मैं तो बस कुछ चीजें स्पष्ट कर रहा था.
      और, ब्लॉग के बारे में आपकी बातें विरोधाभासी हैं. आप कह रही हैं कि ब्लॉग कोई विधा नहीं है, बल्कि मंच है. ठीक है. तो फिर आप ब्लॉग जगत को खराब बता कर उससे क्यों विदा लेने की बात करती हैं?

      जबकि मेरा तो मानना है कि हर रचनाशील और सृजन कर्मी - खासकर साहित्यकार को तो - यदि उसका कोई व्यवसायिक क्षेत्र - मसलन प्रकाशकों से रॉयल्टी इत्यादि की समस्या नहीं है तो उसे अपनी तमाम सामग्री ब्लॉग जैसे निःशुल्क परंतु शक्तिशाली माध्यम से इंटरनेट पर डालना ही चाहिए.

      एक समय था कि रचनाकार अपनी रचनाएँ छपवाने के लिए तरसते थे. अब आप अपने जीवन की तमाम रचनावली इंटरनेट पर एकदम निःशुल्क प्रकाशित कर सकते हैं. इससे वृहद बात और क्या होगी?

      इस माध्यम - विधा कहें या मंच इसे कोई भी गलत खराब या कमतर कहेगा तो उसकी सोच में कहीं कोई कमी जरूर है. और इसे ही मैंने स्पष्ट करने की कोशिश की थी. अलबत्ता रूढ़ भाषा के लिए जरूर क्षमा चाहूंगा.

      हटाएं
  16. कितनी मेहनत करते हैं आप ब्लॉग चर्चा में शुक्ला जी।
    यह लिंक हमने भी पढ़ा होगा लेकिन टिप्पणी करने लायक नहीं समझा।
    लेकिन एक बात समझ आती है कि ब्लॉगर्स those who call a spade a spade लोग बहुत कम हैं। ज्यादातर लोग हाँ में हाँ ही मिलाते हैं।

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    1. सही है। हां में हां मिलाना कम नुकसानदेह रहता है इसलिये ज्यादातर लोग ऐसा करते हैं। :)
      आपकी प्रतिक्रिया के लिये धन्यवाद!

      हटाएं
  17. हमें काहें मिस्कोट किये ? :-(
    और मेरी इमेज को खराब करने में आपने भी पूरी गोलबंदी की है हमेशा और कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते -मगर मैं अब सावधान हूँ -
    बाकी तो इस समय भी आप एक गोल के साथ हैं जो कभी विजयी नहीं हुयी है और इस बार भी होना मुश्किल ही है बशर्ते कोई चमत्कार न हो जाय -
    नारी और तस्लीम को नकारात्मक वोटिंग ही हो रही है -मतलब जो नारी को पसंद नहीं करते तस्लीम को और जो तस्लीम को पसंद नहीं करते वे नारी को -यदि ये दोनों ब्लॉग नामों के पर्याय न बने होते तो ऐसी स्थिति न होती -तब इन्हें सकारात्मक वोटिंग होती !

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बाकी तो इस समय भी आप एक गोल के साथ हैं जो कभी विजयी नहीं हुयी है और इस बार भी होना मुश्किल ही है बशर्ते कोई चमत्कार न हो जाय -


      कब हारी हूँ ये बता दे
      आप जो पर्सनल ईमेल देते हैं और जो ब्लॉग पर लिखते हैं दोनों में इतना विरोधाभास क्यूँ होता है
      कमेन्ट यहाँ पेस्ट करदूं कहिये तो

      हटाएं
    2. @Arvind Mishra, आपका तो हमने नाम भी नहीं लिया यहां। आपके शिष्य ने आपका नाम लिया सो जबाब लिखा बस्स!

      जहां तक आपकी इमेज का सवाल है तो आप अपनी मेहनत का श्रेय हमको मत दीजिये। आपने अपनी छवि, जैसी है, बनाने के लिये बहुत मेहनत की है। ऐसी सावधानी किस काम की कि मन की बात भी बिन्दास होकर कह न सकें? हम किसी का समर्थन क्यों कर रहे हैं यह हमने बता दिया। हारने जीतने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। इसी बहाने कुछ और खुलासे भी हो गये।

      वोटिंग का तरीका यहां ऐसा है कि कोई भी किसी को दो-चार दिन नेट पर बैठा दे तो न जाने कित्ते नये खाते खोलकर दनादन वोट डाल दे। बाकी सब ऐसा ही है। जीत-हार हमारे लिये मायने नहीं रखती। अपनी बात रखनी थी रख दिये। बस्स।


      हटाएं
    3. पूर्णतः सहमत हूँ अनूप जी, ये वोटिंग सिस्टम किसी काम की नहीं है। कोई भी दो-चार लोगों को बिठा कर वोट करवा सकता है पूरे दिन। जहाँ इतने खेल खेले जा रहे हैं, ऐसा करना कोई बड़ी बात नहीं होगी।

      हटाएं

    4. मेरे कुछ मित्रों ने फोन कर पूछा है आप से ई मेल पर रचना सिंह जी से क्या गुफ्तगू होती रहती है जैसा कि उन्होंने ऊपर की टिप्पणी में लिखा है -
      रचना सिंह जी यदा कद मुझे मेल भेजती हैं ,मैं उनका औपचारिक जावाब दे देता हूँ -
      अब जैसे जिस मेल का उल्लेख वे कर रही हैं उसका मजमून यह है -(ताकि लोगों की कल्पनाएँ विराम ले लें)
      रचना
      Now my gut feeling is to forward an advance congratulation to Tasliim as a winner of Bobs prize-Nari seems to have lost the battle as it has now relegated to level of unethical practices to win the prize and also has mobilized a clique to go for an unjust lobbying!
      There was no need of such tantrums!(यह परिकल्पना पर मेरी टिप्पणी थी जो उनके द्वारा कोट की गयी है )
      उनका जवब-
      Unethical
      A person owns a news paper and gives an interview in the same and then when a reader objects , changes the content of objection
      Highly ethical I must say
      regds as usual

      arvind mishra
      Dear Rachna ji,
      My good wishes to you as well. Hence onwards I am trying to be indifferent to the issue.
      Regards,
      arvind
      रचना

      no need for good wishes arvind ji you can keep them for your friends but make sure that when you say something in a comment and ridicule someone and preach ethics you should do the reversal on the same post
      but that one does only when one is indifferent to the issue not attached to someone or something

      a person owns a news paper and spills venom and you cast your comment in favour of him and then show indifference NOT DONE but you do it
      मैंने जवाब नहीं दिया

      हटाएं
    5. Re: [क्वचिदन्यतोSपि...] एक अपील! पर नई टिप्पणी.
      Inbox
      x
      arvind mishra

      7 Apr (12 days ago)

      to me
      Thanks a lot Rachna ji to point out to this goof up -am personally indebted to you and admire your keen observation!
      Regards,
      Arvind


      On 7 April 2013 14:07, रचना wrote:

      रचना ने आपकी पोस्ट " एक अपील! " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

      I have sent a email to organiser with cc to zakir pointing out the problem and making suitable correction in the link
      I really feel you should have done this before you made a post here . A wring link may mean disqualification at a latter stage and above all a wring link will mean that TASLIM may go out of race in the end
      inspite of voting for it

      And I am surprised that none your readers and zakir as well did not check on this and rather went head with various newpaper publication of being in nomination race which he has put on the blog





      रचना द्वारा क्वचिदन्यतोSपि... के लिए 7 अप्रैल 2013 2:07 pm को पोस्ट किया गया

      हटाएं
    6. रचना7 अप्रैल 2013 1:42 pm

      "TSALIM is a science blog/website run by several scientists trying to promote interest in science through their various blog projects." ( तस्लीम एक वैज्ञानिक ब्लॉग/वेबसाईट है जो अनेक वैज्ञानिकों द्वारा संचालित है और अपने कई ब्लॉग परियोजनाओं के जरिये लोगों में विज्ञान के प्रति अभिरुचि को बढ़ावा दे रही है "
      सर्प संसार के बारे में दोयिचे वेली की यह टिप्पणी है -

      but the link given there is of science blogger association
      nomination is for science blogger association


      TSALIM is a science blog/website run by several scientists trying to promote interest in science through their various blog projects.
      Scientificworld.in
      प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
      उत्तर

      Arvind Mishra7 अप्रैल 2013 3:15 pm

      रचना जी , वाकई आपका प्रेक्षण बहुत सटीक है -ध्यानाकर्षण के लिए आभार!

      हटाएं
    7. i rarely send mails to you and its you who returns mail when ever i comment on your blog and that mail and the reply on blog are 2 different things


      here is the one that came on mail before the one on blog
      pahali bar aapka kataksh sar maathe! aapne asli putra se mila diya mujhe! :-)

      On 07/04/2013, रचना wrote:
      > रचना ने आपकी पोस्ट " एक अपील! " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:
      >
      > मानस पुत्र
      > पुत्र तो मनुष्य की आत्मा का ही प्रतिरूप होता है -आत्मा वै जायते पुत्रः !
      >
      > कलयुग हैं लोग अपने पुत्रो को भी सही नहीं पहचानते
      >
      >
      >
      > रचना द्वारा क्वचिदन्यतोSपि... के लिए 7 अप्रैल 2013 2:32 pm को पोस्ट किया
      > गया


      रचना7 अप्रैल 2013 2:32 pm

      मानस पुत्र
      पुत्र तो मनुष्य की आत्मा का ही प्रतिरूप होता है -आत्मा वै जायते पुत्रः !

      कलयुग हैं लोग अपने पुत्रो को भी सही नहीं पहचानते
      प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
      उत्तर

      Arvind Mishra7 अप्रैल 2013 3:15 pm


      चलिए एक और पुत्र से आपने मिलवा दिया -यह पुण्य आपके खाते!



      and i have keeping silence for very long and u have been commenting on my silence see the link here http://praveenshah.blogspot.com/2013/03/ssssss.html?showComment=1364141556867#c4305103732068851324


      I write on mail exactly what i comment on blog but you dont

      हटाएं
    8. So it is all what you have to share-where does it prove that I have double standard ? yes a email is a personal communication while blogs are public domain -unless you are deliberately cautions such differences of expressions are quite spontaneous-it is your nagging habit to raise a storm in tea pot and that is not fine! bad habit!
      Now i won't appreciate any emails from you which you are very clever to send in times you find to want some favour!

      हटाएं
    9. in last one year which mail have i sent you ? ridiculous comment making is your habit
      and i have keeping silence for very long and u have been commenting on my silence see the link here http://praveenshah.blogspot.com/2013/03/ssssss.html?showComment=1364141556867#c4305103732068851324


      I write on mail exactly what i comment on blog but you dont

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  18. सच कहूं तो गड़े मुर्दे उखाड़कर आप नारी को नुक्सान पहुंचा रहे हैं -अन्यथा शायद!
    आपसे ऐसी उम्मीद न थी .....

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. गड़े मुर्दे उखाड़कर आप नारी को नुक्सान पहुंचा रहे हैं


      गड़े मुर्दे उखाड़कर आप नारी को नुक्सान पहुंचा रहे हैं

      नारी को कौन नुक्सान आज तक पहुचा सका हैं
      ब्रह्मा विष्णु महेश तक तो दुर्गा के आगे नत मस्तक रहे बाकी अपने अपने घरो में नारी के कितने आधीन या पराधीन हैं ये उनसे बेहतर कौन जानता हैं

      हटाएं
    2. अइसा दीवालिया कमेंट करने से अच्छा तो आप अपने फ़ार्म में ही आकर कमेंट करते तो जरा मजा भी आता। कुछ फ़ड़कता हुआ सा लिखते मिसिरजी!

      हटाएं
  19. मेहनत से तैयार की गयी ,रिसर्च पेपर सी चर्चा है. ब्लॉगिंग का इतिहास जानना अच्छा लगा.निश्चित रूप से नारी ब्लॉग का समर्थन इसलिये नहीं किया जाना चाहिये कि वो रचना जी का है, बल्कि इसलिये किया जाये, कि रचना जी ने तमाम विरोधों/अपशब्दों/ गालियों के बाद भी इस ब्लॉग को बचाये रक्खा.कई बार रचना जी की आपत्तियां मुझे समझ नहीं आतीं, मैं उनका विरोध भी करती हूं. कई बार केवल रचना जी नहीं, सभी नारीवादी अतिवाद की शिकार होती दिखती हैं, वहां भी मैं उनका विरोध करती हूं. लेकिन जहां मामला सही होता है, वहां उनके साथ होती हूं. अभी वोटिंग के मामले पर भी मैं उनके साथ हूं. आपका साथ देना अच्छा लगा.

    उत्तर देंहटाएं
  20. अब समय आ गया है कि ब्लॉग इतिहासकारों में भी वरिष्ट ब्लॉग इतिहासकार, अति-वरिष्ट ब्लॉग इतिहासकार, वरिष्टतम ब्लॉग इतिहासकार वगैरह की पदवी भी निकाली जाय। बाकी लोग थुक्का-फजीहत करते और करवाते रहें, यही कामना है।

    उत्तर देंहटाएं
  21. ...और हाँ लोग हास्यास्पद रस से भरे हास्य-व्यंग भी ठेलते रहें, उसकी जरूरत बनी रहेगी।

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  22. चाहे आपसी रंजिश कितनी ही हो और किसी की भी किसी से हो मगर इस वक्त जरूरत है हम सब एक हो जायें और अपनी भारतीय भाषा हिन्दी का मान बढायें और जिस भी ब्लोग को जो पसन्द करता हो वो उसे वोट कर दे लेकिन उसके लिये के दूसरे पर इस तरह छींटाकशी करना , अपमान करना कहीं से भी उचित नहीं लगता । मेरे ख्याल से हम सभी सभ्य समाज के सभ्य नागरिक हैं और पढे लिखे हैं तो यदि अपनी अपनी मर्यादा में रहकर बिना किसी पर आरोप प्रत्यारोप लगाये एक कार्य को अंजाम दिया जाये तो ज्यादा सुखकर नहीं होगा …………ज़रा सोचिये !!!

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  23. मैने अपने ब्लाग विज्ञान विश्व को ना ही नामांकित किया, ना ही किसी से कहा। किसी पाठक ने स्वंय ही कर दिया! इसके बाद भी मैने इसके लिये वोटो के लिये अपील नहीं की, क्योंकि

    १। मेरे अधिकतर पाठक छात्र है, वो इन वोट देने लेने के पचडो मे नहीं पड्ते। विज्ञान के पाठक ऐसे भी होते कितने है?

    २। यदि किसी पाठक को वोट देना है और यदि उसने मेरे लेखों से कुछ पाया है वह मांगे बिना भी देगा। किसी अपील की क्या जरूरत ?

    ३। कोई पुरसकार / अधिक वोट गुणवत्ता कि गारंटी तो नहीं! मेरे ९०% पाठक गूगल से आते है, बिना किसी प्रचार के , उस पर से फरमाईसे लेकर भी कि उन्हे क्या पढ्ना है।

    ४।सारे लेख कापी-राईट मुक्त है, कितने जगह कापी हुये है, अखबारो मे छपे है, और क्या चाहिये? उपयोगिता का इससे बेहतर प्रमाण क्या?

    ५। मेरा ब्लाग अभी तक अविवादित रहा है, उसे ऐसा ही रहने देना चाहता हुं!

    ६। मै स्वांत सुखाय लिखता हुं, किसी पुरस्कार की कोई अपेक्षा नही।



    इन सभी मुद्दो को अंगूर खट्टे हैं कहा जा सकता है, परवाह नही :-)

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    1. hamare ’दुख/संताप/क्षोभ/क्रोध/बेबसी " ko aapka ye comment 'ram-ban-aukhadh' hai...........

      pranam.

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  24. badhiya aaeena dikhya aapne........

    jo log 'hindi blogging ke 'moulik' itihas ko itna jaldi bhool gaye......o jan 'parikalpana' ke itihas ko kitte din yaad rakhenge.......

    itna kuch hone ke babjood 'hathdarmita' pale hue logon ko dekhkar kisi namaloom vyakti ke kahe ye alfaz yaad aa rahe hain.....

    "hum ausat/samany bhartiya ek baar jab gir parte hain to sambhalne ki koi kosish hi nahi karte........fislte chale jate hain niche-aur-niche"

    @ shiv bhaiji............'narayan....narayan.....narayan'kya kah rahe hain aap??????


    pranam.

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  25. मुझे कभी नहीं लगा की ब्लॉग लिख कर लोग कुछ ऐसा चमत्कार कर रहे हैं की उन्हें सम्मानित किये जाने की परंपरा डाली जय। लेकिन क्या करें कुछ लोगों को ऐसा भ्रम होता है की अगर वो समुद्र में पेशाब कर दें तो सुनामी आ जाएगा। ऐसे लोग जब हिंदी में ब्लॉग लिखते हैं तो इन्हें लगता है की ये लोग हिंदी पर उपकार कर रहे हैं। अपने इस चमत्कार को ये लोग समाज सेवा, हिंदी सेवा, साहित्याकारिता अदि जाने क्या क्या समझने लगते हैं। अब जब खुद को ये इतना कुछ समझते हैं तो इन्हें पुरस्कार की लालसा भी हो ही जाती है। कोई और पुरस्कृत ना करे तो खुद ही पुरस्कार देना शुरू कर देते हैं। मैं तो सभी लोगों से यही अपील करूँगा की जरा वास्तविकता में आकार विचार करें और सोचें की ब्लॉग लिख कर आप कौन सा तीर मार रहे हैं की आपको सम्मानित किया जाय। मुझे तो ये सब आयोजन लाटरी जितने वाले इ मेल्स की तरह का ही लगता है। मुझे नहीं लगता की बॉब साहब किसी को फ्री में जर्मनी बुलाएँगे। अतः एक दुसरे की तंग खीचने की जगह ब्लॉग्गिंग के मजे लें

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  26. एक बात और, जो लोग किसी भी ब्लॉग/ ब्लॉगर के सम्मानित किये का विरोध करते हैं, उसके पीछे कोई न कोई कारण तो होता होगा? अगर वे कहते हैं, कि फ़लां ब्लॉग सम्मन के लायक़ नहीं, तो वे खुद बतायें, कि उनकी नज़र में कौन सा/से ब्लॉग सम्मान के लायक है? सम्मान किसे दिया जाना चाहिए?

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  27. अब तो हम इत्ते वरिष्ठ हो ही गए हैं कि कह सकते हैं कि आपकी पोस्ट में हमारे कमेन्ट करने लायक कुछ है नहीं :)

    आशा है आप हमारी वरिष्ठता का सम्मान करते हुए हमसे ब्लॉग जगत में लौट आने की सदाबहार अपील भी करेंगे ही :)

    जय जय सभी को!

    (वैसे ई आपकी पोस्ट्स की फीड काहे नहीं हम तक पहुँच रही , तनिक इस पर भी ध्यान दिया जाए !)

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  28. Sir ji, mein bhi apki talk se satisfied hu, but
    md bhi sucess hona chahata hu

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