गुरुवार, अप्रैल 04, 2013

सुनो जान... तुम मुझसे यूँ रूठा न करो...


वो पास भी हैं,करीब भी
मैं देखूं कि उनसे बात करूं।
-फ़िराक गोरखपुरी
चिट्ठाचर्चा करते समय यह शेर लागू होता है अपन पर। जब चर्चा के लिये ब्लॉग पोस्ट चुनते हैं तो लगता है कि इसकी चर्चा करें या पहले इसे पढ़कर इसका आनन्द उठायें। इसकी चर्चा करें या और ब्लॉग देखें। मौका और दस्तूर भी खलल डालते हैं- 1 अप्रैल को मूर्ख दिवस। किसी और दिन कुछ और। बहरहाल।

 आज सबसे पहले नजर पड़ी Lamhon Ke Jharokhe Se... ब्लॉग पर जिसकी पंचलाइन है: 
कुछ लम्हे कभी ख़त्म नहीं होते... हमारी यादों में ठहर जाते हैं, "फ्रीज़" हो जाते हैं... यादों की झोली से निकाले हुए ऐसे ही कुछ ठहरे हुए लम्हे...
लखनऊ की richa अपना परिचय कुछ इस तरह लिखती हैं: 
My Photoअपने बारे में क्या बताऊँ आपको, नवाबों के शहर लखनऊ में पली बढ़ी एक आम लड़की हूँ, a software engineer by profession... लेखिका नहीं हूँ सो शब्दों से खेलना नहीं आता, पर सराहना ज़रूर आता है और ज़िन्दगी की छोटी छोटी चीज़ों में खुशियाँ तलाशना आता है... बच्चों की मासूम किलकारी, फूलों की ख़ुश्बू, प्रकृति की शान्ति, रंग बिरंगी तितलियाँ, हवा में उड़ते गुब्बारे, बारिश की बूँदें, मिट्टी की सौंधी सी महक... बरबस ही हमें अपनी ओर खींच लेते हैं..

 ऋचा का ब्लॉग काफ़ी दिन बाद आज  पढ़ा तो बरबस पढ़ते गये। सबसे ताजी पोस्ट उस मोड़ से शुरु करें फ़िर ये जिन्दगी का ये अंश देखिये:
आज इतने सालों बाद जब ख़ुद को आईने में देखा तो पहचान नहीं सकी... ज़िन्दगी जाने कब उसका हाथ छुड़ा कर आगे बढ़ गयी... वो पीछे छूट गयी... बहुत पीछे... तन्हा... अकेली... किसी अनजाने से मोड़ पे... उसे बिलकुल भी समझ नहीं आ रहा था की वो अब क्या करे… ज़िन्दगी के सफ़र पर यूँ राह भटक जाना तकलीफ़देह होता है... पर ज़िदगी जीने की वजह का खो जाना... नृशंस !







आगे जिन्दगी की सच्चाई बयान की है:
उसकी ज़िन्दगी के सफ़र में बहुत से लोग आये... कहने को दोस्त पर कोई भी उसके साथ ज़्यादा दूर तक नहीं चला... हर रिश्ता उसे हमेशा टुकड़ों ही में मिला... कभी लोग उसके नज़दीक आये, कभी उसने लोगों को ख़ुद के नज़दीक आने का मौका दिया... पर अंत में ये उसकी अपनी ज़िन्दगी थी, उसका अपना सफ़र जो उसे अकेले ही तय करना था...
और यह हौसला देखिये:
ज़िन्दगी में कभी रात भी आती है… और रात के अँधियारे में ही तारे टिमटिमाया करते हैं... उसे भरोसा है ऐसा ही कोई तारा उसे भी मिलेगा... जो ख़ुद को वापस पाने की उसकी राह को रौशन करेगा... 
ऋचा की पोस्ट की खासियत उनके साथ के पॉडकास्ट हैं। पॉडकास्ट पोस्ट का विस्तार हैं। वह नहीं है उसमें जो लिखा है पोस्ट में । उसके अलग लेकिन पोस्ट को मुकम्मल करते हुयी  सी बात।

आओ चलें अब तीन ही बिलियन साल बचे हैं, आठ ही बिलियन उम्र ज़मीं की होगी शायद ! में  पोस्ट के हर हिस्से के साथ गुलजार की आवाज में कुछ संवाद हैं। पोस्ट का अंश देखिये:
तुम्हारी आवाज़ में वो चिढ़ बड़ी प्यारी लग रही थी... बहुत दिनों बाद आज तुम्हारे अन्दर वो पज़ेसिव्नेस दिखी अपने लिये... बहुत दिनों बाद आज फिर से ख़ुद पे गुमाँ हुआ...!
साथ में गुलजार की आवाज में सुनाई देता है:
सिर्फ़ एहसास कि तुम पास हो बस-सिर्फ़ एहसास कि नजदीक हो तुम। अनगिनत लोगों में  घबराई हुई। अजनबी आंखों से लजाई हुई। तन पे लगती हैं चिपकती आखें। बरफ़ सी ठंडी सुलगती आंखे। अनगिनत नजरों में उलझां-लिपटा । अनगिनत चेहरों में रखा चेहरा। सैंकड़ों तागों में उलझाई हुई। सहमी सिमटी हुई शरमाई हुई.....
गुलजार की आवाज सुनना अच्छा लगता है लेकिन यह सोचकर   अटपटा लगता है कि वहां नायिका सहमी, शरमाई, लजाई, घबराई, उलझाई ही क्यों दिखती है। कहीं यह नायिकाओं को बहाने से  छुई -मुई टाइप बनाने का ही तो हिसाब-किताब नहीं है। बहरहाल यह बाद में सोचेंगे और हिसाब करेंगे फ़िलहाल तो ऋचा की इसी ब्लॉग पोस्ट का एक और अंश देखिये:

कहते हैं आखें दिल का आईना होती हैं... लब झूठ बोल भी दें पर आँखें झूठ नही बोल पातीं... दो पल झाँक के देखो उनमें तो दिल के सारे गहरे से गहरे राज़ खोल देती हैं... तुम्हारी गहरी कत्थई आँखें भी बिलकुल किसी मरीचिका सी हैं... एकटक उनमें देखने की गलती करी नहीं किसी ने कि बस मोहपाश में बाँध के बिठा लेती हैं अपने ही पास...

जानते हो तुम्हारी आँखें बेहद बातूनी हैं... हर रोज़ रात के आखरी पहर तक बातों में उलझा के मुझे जगाये रखती हैं... हर दिन ऑफिस के लिये लेट होती हूँ मैं... देखना किसी दिन लिख ही दूंगी अटेंडेंस रजिस्टर में देर से आने कि वजह...!
इसके साथ गुलजार की लरजती आवाज ---तेरी ही आंखों से खुलते हैं सबेरों के ....... ।
पोस्ट का  आखिरी अंश इस  रूठती-मनाती दुनिया में तमाम लोगों के काम आ सकता है:
सुनो जान... तुम मुझसे यूँ रूठा न करो... तुम रूठते हो तो मेरे शब्द भी गुम हो जाते हैं कहीं... गोया तुम्हारा साथ मेरे कलम की रोशनाई हो... तुम चुप होते हो तो ये भी सूख जाती है... गोया मेरे सारे ख्याल तुम्ही से हैं... तुम नहीं होते तो एक वॉइड आ जाता है पूरे थॉट प्रोसेस में... शब्द उड़ते फिरते हैं दिमाग की ख़लाओं में... तुम्हारे साथ का गुरुत्व मिले तो शायद ठहरें वो मन की ज़मीं पर...!
इस पोस्ट के लिये शिखा ने सही ही लिखा है-आपके शब्द और गुलज़ार.... कम्प्लीट पैकेज.! यह पोस्ट फ़रवरी की है। इसके पहले अक्टूबर में लिखा था ऋचा ने:
तुम ज़्यादा बोलते नहीं... तुम्हारे होंठ अक्सर ख़ामोश रहते हैं... पर तुम्हारी आँखें बेहद बातूनी हैं... जाने किस भाषा में बातें करती हैं मेरी आँखों से कि सीधे दिल तक पहुँचती है उनकी आवाज़... बहुत से ऐसे एहसास हैं जिन्हें महसूस तो किया है तुम्हारी आँखों के ज़रिये पर शब्दों में उनका तर्जुमा करना मुमकिन नहीं है... कहाँ से सीखी ये भाषा ? सीधे दिल पे दस्तक देने वाली !

ऋचा गुलजार की प्रशंसक हैं। उनके जन्मदिन के मौके पर लिखी   इस  पोस्ट में  गुलजार के  बारे में तमाम जानकारियां दीं हैं उन्होंने। इस पोस्ट पर टिप्पणियां देखिये:
क्या करूँ इस पोस्ट पर...अब आप ही बता दीजिये मुझे...खड़े होकर तालियाँ बजाऊं?या एक जोरदार सैल्यूट ठोक दूँ... :) :)
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  1. ताली भी बजाइए और सैल्यूट भी ठोकिये... पर हमारे लिये नहीं... हमारे गुलज़ार साब के लिये :):):)
कम्माल की गुफतगू है ऋचा... हमने तो दीनां के इस फ़कीर को ही अपना दीन बना लिया.. और इत्तेफाकन आज भूल ही गया कि उनकी सालगिरह है.. कल से उनको याद कर रहा था, और आज भूल गया!! थैंक्स, इतनी प्यारी गुफ्तगू के लिए, एक बार फिर!!
अभिषेक का भी शुक्रिया यहाँ तक लाने के लिए!!
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  1. गुलज़ार के चाहने वाले गुल्ज़ारियत को पूरी शिद्दत से निभाते हैं... ज़रिया चाहे कोई बने मकसद सबका एक ही रहता है... हमारी ओर से भी शुक्रिया... आपको भी और अभिषेक जी को भी :)

 अपनी इस पोस्ट में अपनी बाबा के बारे में जानकारी देते हुये ऋचा लिखती हैं:
बाबा के बारे में जितना भी सुनते हैं पापा और बुआ से उतना ही ज़्यादा उन पर गर्व होता है और उनसे मिलने का मन करता है... आज से तकरीबन एक सदी पहले भी वो कितनी खुली विचारधारा के इन्सान थे... उस वक़्त जब घर की स्त्रियों को घर से बाहर निकलने की भी आज़ादी नहीं थी वो अम्मा को अपने साथ पार्टी की मीटिंग्स में ले जाया करते थे... अपनी बेटियों और बेटों में कभी कोई फ़र्क नहीं किया उन्होंने... सबको हमेशा ख़ूब पढ़ने के लिए प्रेरित किया... बुआ लोगों के लिये भी कहते थे की ये सब हमारे बेटे हैं... और उस ज़माने में भी साड़ी या सलवार कुर्ते के बजाय सब के लिये पैंट शर्ट सिलवाते थे... बुआ बताती हैं गाँव में जहाँ हमारा घर था वहाँ आस पास के लोग अपनी लड़कियों को उन लोगों के साथ खेलने नहीं देते थे ना ही हमारे घर आने देते थे... कहते थे कि इनके पिताजी जेल का पानी पी चुके हैं इनके घर का कुछ मत खाना... हँसी आती है आज उन लोगों की सोच पर... ख़ैर...
लखनऊ की रहने वाली ऋचा ने एक पोस्ट  लखनऊ की जानकारी देते हुये भी लिखी है शीर्षक है-ये शहर लालाज़ार है यहाँ दिलों में प्यार है, जिधर नज़र उठाइये बहार ही बहार है !
।  अब ऋचा के ब्लॉग के बारे में हमने इतना बता दिया। आगे आप खुद पढ़िये उनका ब्लॉग लम्हों के झरोखे से।

मेरी पसंद

शब्दों का एक चक्रवात सा उठता है
हर रोज़, मेरे भीतर कहीं
बहुत कुछ जो बस कह देना चाहती हूँ
कि शान्त हो सके ये तूफ़ान

जाने पहचाने चेहरों की इस भीड़ में लेकिन
एक भी ऐसा कांधा नहीं
जो मेरी आवाज़ को सहारा दे सके
कि निकल सके बेबसी का ग़ुबार
उमस बढ़ती है अंतस की
तो शोर वाष्पित हो आँखों तक जा पहुँचता है
बहरा करती आवाज़ में गरजती है घुटन
बारिशें भी अब नमकीन हो चली हैं
आवाज़ की चुभन महसूस करी है कभी ?
या ख़ामोशी की चीख ?
भीतर ही भीतर जैसे छिल जाती हैं साँसें
कराहती साँसों की आवाज़ सुनी है ?
कभी रोते हुए किसी से इल्तेजा की है ?
कि बस चंद लम्हें ठहर जाओ मेरे पास
सुन लो मुझे दो पल
कि मैं शान्त करना चाहती हूँ ये बवंडर
कि मैं सोना चाहती हूँ आज रात
जी भर के...!

-- ऋचा

 और अंत में

आज के लिये बस इतना ही। बाकी फ़िर कभी।मजे से रहिये। मस्त बिन्दास।जो होगा देखा जायेगा। नीचे की फोटो ज्ञानदत्त जी की ब्लॉग  पोस्ट से जिसका शीर्षक है- वह मुस्कराती मुसहर बच्ची।
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9 टिप्‍पणियां:

  1. बढियां -ब्लागरों पर फुल पैकेज चल रहा है इन दिनों

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  2. चिट्ठा चर्चा का सफर जारी देख काफी खुशी हुई। यह चर्चा भी अच्‍छी लगी।

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  3. एक बेहतरीन चर्चा के साथ-२, एक प्रतिभावान ब्लागर से मिलवाने के लिए धन्यवाद ।

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  4. वाह आज तो एक पोस्‍ट से ही काम चल गया

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  5. ऋचा को कई बार पढ़ा है. सुकून देता है.

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  6. हमारे लम्हों के छोटे से झरोखे का पूरा कोलाज ही सजा दिया यहाँ आपने तो... हमारे ब्लॉग को चिट्ठाचर्चा में शामिल करने का बहुत शुक्रिया अनूप जी :)

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  7. बहुत ही बढ़िया ....सधी हुयी चर्चा

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  8. चिठ्ठा चर्चा पढ़ कर अभिभूत हूँ.....रोचकता के साथ ही गति का संतुलन सराहनिय है......साथ ही सभी ब्लॉग्स की सामग्री का भी बेहतरीन चुनाव किया है आपने.........गज़ब...।

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