शुक्रवार, अप्रैल 05, 2013

एक नौजवान वैरागी के किस्से

आज सबेरे अपना लोटपोट लेकर बाहर बरामदे में आये। बैटरी खतम है सो लम्बा तार लिये बिजली से जोड़े हैं इसे। ऐसे लगता है जैसे किसी गहरे कुय़ें से पानी निकालने की बाल्टी हो लैपटाप और ये बिजली का तार बाल्टी से बंधी लंबी रस्सी। सामने मेस के बगीचे के झूले में बाहर से आये कुछ बच्चे झूला झूल रहे थे। खुश हंसते हुये।  खिलखिलाते। सात बज चुका है। फ़ैक्ट्री का हूटर बज रहा है हू ऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊ। पूरे शहर के लोगों को पता चल गया होगा कि सात बज गये हैं। सामने से सूरज अपना काम संभाल लिये हैं। सुलग रहे हैं कि हम तो टहल रहे हैं यहां अतरिक्ष में और तुम बैठे चर्चा कर रहे हो।

सबसे पहली पोस्ट आज दिखी पीडी की। पीडी बोले तो प्रशांत प्रियदर्शी। पहले चेन्नई में रहते थे अब बंगलोर विराजते हैं। हाल ही में अपने मां-पिताजी के साथ बिताये समय को याद करते हैं पीडी:
पहली सुबह पापा के फोन से नींद खुली, पता चला कि कहीं गए थे सुबह-सुबह और रास्ता भटक गए. मैं और मम्मी देर तक इस पर हँसते रहे. वापस घर आकर पापा भी हँसते रहे. लगा जैसे पूरा घर खुश है, दीवार और खिड़की पर टंगे परदे भी हंस रहे थे. लगा जैसे घर मुझे घूर रहा है, इतने कहकहे उसने अभी तक एक साथ नहीं देखे थे कभी.
इस पोस्ट पर शिखा की टिप्पणी है:
मेरे घर की दीवारें नहीं सुनती अब कहकहे वैसे, मेरी रसोई का चुल्हा अब भी उस चाय को तरसता है.एक ऐसा सपना याद करा दिया तुमने, जो अब पूरा होना संभव नहीं.
प्रशान्त ने अपने मम्मी-पापा को याद करते हुये तमाम पोस्टें लिखीं हैं। अपनी दो बजिया वैराग्य सीरीज में बहुत बार उन्होंने अपने बचपन, मां-पिताजी के साथ बिताये समय को याद किया है और अपने मन की बात कही है। बचपन में दुनियावी लिहाज से कम सफ़ल रहने पर होने वाले अनुभव को साझा किया है। उनमें से कुछ के अंश यहां पर पेश हैं:

  1. मम्मी हमेशा पापा को कहती थी कि अगर ये बिगड गया तो सारा कसूर आपका ही होगा, और पापा उसी समय पलट कर कहते थे, और अगर सुधरा तो सारा श्री भी मेरा ही होगा.. मम्मी कभी इस बात का विरोध नहीं करती थी, बस इतना ही बोलती थी, अगर सुधरा तो ना? लव यू मम्मी - दो बजिया वैराग्य
  2.  छोटे में आप जान बूझ कर मुझसे हर खेल में हार जाते थे और मैं बहुत खुश.. बहुत बाद में ये समझ में आया की आप जान कर हारते थे.. मैं ये भी जानता हूँ कि आपके लिए शायद यह सब उतने महत्व का विषय नहीं होगा जिसे क्रमवार याद रखा जाए, मगर मुझे याद है पापाजी.. कह सकता हूँ की वे सब घटनाएं लगभग क्रमवार याद हैं मुझे.. याद है पापाजी, आप क्रिकेट में बौलिंग करते समय थ्रो फेकते थे? ठीक विकेट को निशाना बना कर? हैप्पी बर्थ डे पापा जी।

  3.  मैं जानता हूँ, आपके तीनों बच्चों में सबसे नालायक और नकारा संतान हूँ मैं.. रेशम की चादर में टाट का पैबंद सा.. मैं भी अपनी जिंदगी की एक तिहाई से अधिक उम्र गुजार चुका हूँ, फिर भी एक भी क्षण ऐसा याद नहीं आता है जिस पर आप अपने उन दोनों बच्चों से भी अधिक गर्व का अनुभव किये होंगे. इन सब के बावजूद मैं जानता हूँ, आप कहें ना कहें, आपने सबसे अधिक प्यार मुझ पर ही लुटाया है.. कई लोगों से सुना है कि बच्चों में जो सबसे मजबूत होता है उसे बाप का प्यार अधिक मिलता है और जो कमजोर उसे माँ का, उनसे कुछ कहता नहीं हूँ, जमाने से बेमतलब की बातों पर बहस क्या करना? मगर अपने अनुभव से मैं कह सकता हूँ की वे झूठ कहते हैं.हैप्पी बर्थ डे पापा जी।
  4.  जिंदगी के तीस बसंत गुजर चुके हैं.. अगर आज भी घर पर होता तो सुबह उठ कर आशीर्वाद लेने से पहले ही पापा सीने से लगा लेते और मम्मी माथे को चूम लेती.. जो किसी आशीर्वाद से कहीं बेहतर रहता आया है मेरे लिए.. एक आत्मिक संतोष जैसा कुछ.. जन्मदिन की सुबह तो यक़ीनन ऐसी ही होती.. आज फिर पापा के सीने से लगने की इच्छा हो रही है.. सोचता हूँ की मम्मी के अपने माथे को चूमने के एवज में शायद मैं उनके गाल को चूम लेता.. मैं उन्हें अक्सर छेड़ने के लिए उनका गाल चूम लेता हूँ और वो मुस्कुरा कर एक थप्पड़ सर पर लगा देती है, शायद तब भी ऐसा ही करती.. पापा को सीने से लगाने के बाद मैं उन्हें नहीं छोड़ता हूँ तब वह अक्सर पेट में गुदगुदी लगाने लगते हैं, तब भी शायद ऐसा ही करते.. दो बजिया वैराग्य एक और भाग
  5. सोने से पहले घर पर पापा के नंबर पर एक SMS छोड़ देता हूँ, "Love you & miss you both. Good Night." both लिखने के पीछे कि मनोदशा कुछ समझ में नहीं आती है.. उसे लिखने से पहले एक-दो मिनट सोचता हूँ, फिर वही लिखता हूँ और भेज देता हूँ.. सुबह दस बजे के करीब फोन कि घंटी से नींद खुलती है, और माँ पूछती है कि निशाचर हो क्या? सुबह के चार-पांच बजे तक जगे हुए थे? मैं बस टाल जाता हूँ.. माँ कुछ देर इन्तजार करती है, शायद कुछ कहेगा.. कुछ देर कि चुप्पी के बाद दफ्तर का बहाना करके फोन रख देता हूँ.. मैं फिर से किसी से बात ना करने वाले मनःस्थिति में हूँ.. दिन भर बीतने के बाद फिर से बैंक में फोन नहीं कर पाता हूँ..  दो बजिया वैराग्य भाग छ:
और भी तमाम किस्से हैं इन नौजवान वैरागी के। पढ़ने के लिये उनके यहां पहुंचिये।




















मेरी पसंद

मुझे अब भी प्यार करना चाहिए.
मुझे अब भी प्यार करना चाहिए.
मैं अपने आप को कोंचता हूँ

मुझे अब भी अच्छी चीजों में यकीन
रखना चाहिए
मैं अब भी मानता हूँ कि
मुझे अब भी अच्छी चीजों में यकीन
रखना चाहिए

मुझे अब भी स्वप्न देखने चाहिए
मैं जानता हूँ कि
मुझे अब भी स्वप्न देखने चाहिए

मुझे अब भी कोशिश करनी चाहिए
मुझे याद है कि
मुझे अब भी कोशिश करने चाहिए.

मुझे अपने भविष्य को अब भी
ऐसे देखना चाहिए
जैसे कि मेरे पिता ने देखा था.



स्व.अवधेश कुमार



 और अंत में

आज पंकज बाबू का जन्मदिन है। पंकज माने पंकज उपाध्याय। पंकज को सबसे पहले मैंने 2008 में पढ़ा था और उनकी कविता पंक्तियों की चर्चा की थी :
पंकज उपाध्याय तो बाकयदा एक ठो कविता भी लिख चुके हैं पहिले ही। इस कविता से पता चलता है कि आज की पीढ़ी कित्ती धैर्यवान है:
उसकी बिंदी के तो हिलने का
मैं इंतज़ार करता था, की कब वो
हल्का सा हिले और मैं बोलूँ
की "रुको! बिंदी ठीक करने दो"।


अब बताओ जिस पीढ़ी के नायक नायिका के बिंदी हिलने का इंतजार करते रह सकते हैं ताकि उसे ठीक कर सकें उस पर ऊबने और बोर होने का आरोप कैसे लगाया जा सकता है।
इसके बाद मैंने उनके ब्लॉग की सारी पोस्टें (करीब 100) एक साथ पढ़ीं। उनको पढ़ना अच्छा लगता है। उनकी पोस्टों का इंतजार रहता है। उनका अपने पिताजी के बारे में लिखा संस्मरण मैंने कई बार पढ़ा है। लेकिन पंकज को लगा कि अच्छा ब्लॉगर  कहलाने के लिये लिखना बंद करना जरूरी है। सो उन्होंने लिखना बंद कर दिया। अब शायद फ़िर शुरु करें क्योंकि विश्वस्त सूत्रों  से पता चला है कि शीघ्र ही उनको बिंदी ठीक करने की सुविधा हासिल होने  वाली है।

पंकज को उनके जन्मदिन की खूब सारी शुभकामनायें। 




नीचे का चित्र LADDO की फ़ेसबुक वाल से। परिचय में बताया है-हमीरपुर जिले के बदनपुर गांव की फूलमती बुंदेलखंड की धरती पर वह कर रही हैं, जिसे देखकर पुरुष भी दांतों तले उंगली दबा लेते हैं।इतनी पढ़ी लिखी तो हैं नहीं कि पायलट बन सकें, लेकिन ऊपर वाले ने बाजुओं में वो ताकत जरूर दी है कि सम्मानपूर्वक परिवार का पालन-पोषण कर सकें।पति नशेबाज व अकर्मण्य निकला तो वह प्रतिदिन हमीरपुर से बदनपुर के बीच रिक्शा चलाकर सवारियां ढोती हैं।सलाम "माँ भारती की इस माता" को सलाम इनके जज्बे को..



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6 टिप्‍पणियां:

  1. alla-subha(off. ka 10 baje) hi sentiya diye ............ achh.....bahut
    achha laga........


    pranam.

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    1. oh babua ko janm-din ka badhai subhkamnaon ke sath dena bool gaya....
      umeed hai babua bura nai manegen

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  2. पंकज सिवाए उसे पढ़ते रहने के सिवा कुछ नहीं कह सकता। गिल्ट होने लगता है। हम तो न अच्छा बेटा हुए सो इतनी भावुकता कहां से लाऊं? निजी जि़ंदगी से इतना कह सकता हूं वो एक नैतिक और अच्छे दिल वाला इंसान है। दोस्तों की मदद करने वाला और बदले में शुक्रिया तक नहीं चाहने वाला। मेरा भी दिल करता है कि मैं उसका इस्तेमाल करूं। और यहीं हमारे बीच की सारी औपचारिकता खत्म हो जाती है।
    ***
    पंकज तो पंकज हैं। उनकी याददाश्त बड़ी अच्छी है। बोरिंग आदमी हैं (हमारे साथ)
    उसकी बिंदी के तो हिलने का
    मैं इंतज़ार करता था की कब वो
    हल्का सा हिले और मैं बोलूँ
    की ष्रुको! बिंदी ठीक करने दो।

    ये तो गुलज़ार वाली बात हो गई कि "मुझे इत्ते से काम पे रख लो, कि जब जब तुम्हारे गले का लाॅकेट उल्टा हो जाए, मैं सीधा कर दिया करूं। "

    खैर बिंदी ठीक करने की सुविधा तो उन्हें अब भी हासिल है लेकिन लाइसेंस के तहत हक मिलने में वे अपार धैर्य का परिचय देते हुए डेढ़ महीने के होल्ड पर हैं।

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  3. क्या ब्लॉगर्स भी कवियों की तरह भावुक और नाज़ुक दिल होते हैं ?
    मात पिता का आदर सम्मान और उनकी देखभाल करना सबका कर्तव्य है।
    लेकिन इतना भी फिक्सेशन नहीं होना चाहिए कि और कुछ न सूझे।

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