शनिवार, मार्च 13, 2010

टूटे सुजन मनाइए जो टूटे सौ बार ।

टूटे सुजन मनाइए जो टूटे सौ बार ।

नमस्कार मित्रों! मैं मनोज कुमार एक बार फिर चिट्ठा चर्चा के साथ हाज़िर हूँ।

पिछ्ला सप्ताह महिला आरक्षण विधेयक को लेकर चर्चा में रहा।

तो चर्चा शुरु करते हैं

संतोष त्रिवेदी महिला आरक्षण क्रांतिकारी क़दम! आलेख के द्वारा बता रहे हैं कि ऐसा नहीं है कि इस बिल में कोई जादुई शक्ति है जिसके पास होते ही उन्हें सारी शक्तियाँ मिल जाएँगी ,परन्तु एक शुरुआत ज़रूर हो गई है जो आगे चलकर एक क्रांतिकारी बदलाव साबित होगा।

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कोमल मन के साथ साथ महिला ज़्यादा संवेदनशील भी होती हैं। ऐसी ख़ूबियों से सजा महिला का दिल ओ दिमाग जब अपने आस पास की चीज़ों को देखता है तो उसमें एक खास गंभीरता अपने आप ही आ जाती है। ऐसा ही एक ब्लॉग है चांद पुखराज का! इसकी संचालिका हैं पारुल। आज वो इस ब्लॉग पर प्रस्तुत कर रही हैं पूरे चाँद की इस ख़ामोश रात। इस कविता में पारुल जी ने ऐसे शब्दों को चुना है जो उनकी कविता के भावों को व्यक्त करने में सशक्तता से उनके साथ खड़े हैं।

पलकों में जाग भरे
रेतीले गले....
पूरे चाँद की रात
कलपते..

दूर बहुत दूर
इस बेला कोई
बिरहा गा रहा है....

बिरह की रात हो और कोई बैराग सिखाये तो बिरहा ही गाया जायेगा। सुन्दर भाव के साथ एक बहुत्त ही बहुत सुन्दर रचना।

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ग़ज़ल के बहाने श्याम सखा 'श्याम' जी एक बहुत ही कड़वे सच को सामने ला रहे हैं। कहते हैं सुनकर सच कोई पास नहीं आयाउनकी की इस ग़ज़ल में विचार, अभिव्यक्ति शैली-शिल्प और संप्रेषण के अनेक नूतन क्षितिज उद्घाटित हो रहे हैं। यह एक बहुत ही अच्छी ग़ज़ल है, जो दिल के साथ-साथ दिमाग़ में भी जगह बनाती है।

मुझको झूठ कभी रास नहीं आया

सुनकर सच कोई पास नहीं आया

भूखे पेट सदा सोये हम यारो

करना लेकिन उपवास नहीं आया

ईद दिवाली होली त्यौहार गए
अम्मा हिस्से अवकाश नहीं आया

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बिल्कुल सच बात है, कुछ ऐसे हालात है और सबके अपने अपने जज़्बात है...जैसा करेंगे वैसा ही तो मिलेगा. . कुछ ऐसे ही जज़्बात के साथ एम. वर्मा जी कह रहे हैं

बोया पेड़ बबूल का

फिर क्यूँ आम ढूढते हो

जीजिविषा मरी पड़ी है

और तुम संग्राम ढूढ़ते हो

खुद ही कहकर खुद ही सुन लो

कौओं से करते कान की बातें, हद है भाई!

इतना सटीक भी कोई लिखता है....हद है भाई ..बेहतरीन अभिव्यक्ति!!!

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अजय कुमार झा जी के ब्लोग कुछ भी कभी भी की पांच सौवीं पोस्ट है बधाई दीजीए ....ये इस ब्लोग की पांच सौंवी पोस्ट है ....मगर वाह नहीं कहिएगा! जब यह बधाई देने की बात है तो वाह मत कहिएगा का निवेदन क्यों? मेरे मन में भी यह प्रश्न आया। वे बताते हैं .आज उनका मन वाह नहीं आह कहने को कर रहा है....... .आह ....!!

टूटा तोडा गया कई बार,
हर बात तुम्हीं ने जोडा भी ,
बस डर इस बात का रहता है ,

इस टूट- अटूट में ,
कभी मैं भी न जाऊं ,बिखर कहीं .........
इस मंच से हम उन्हें ५०० वीं पोस्ट की बधाई देते हैं!!

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कुछ औरों की कुछ अपनी, पर एकालाप कर रहे हैं अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी जी। कहते हैं पहली बार इतनी शिद्दत से महसूस कर रहा हूँ कि ब्लॉग अपना घर होता है .. बाहर से थके हारे आते हैं और बाहरी वस्त्र उतार कर तौलिया बाँध कर कुछ शब्द-दाने चुगने बैठ जाते हैं , थके हारे को ज़रा सा इत्मिनान मिल जाता है , इतना क्या कम है !.. कुछ शब्द-दाने चुगने को उद्यत हूँ .. आज हमसे लेखन में विधा-विभाजन नहीं सध पायेगा .. बस कुछ लिख जाय और अनुद्विग्न स्थिति को प्राप्त हो जाऊं किसी तरह!

आगे उन्होंने कहा है ज्यादा बोलने पर महाभारत के पात्र 'बर्बरीक' जैसा गला कटवाना पड़ता है , और फिर भी महाभारत देखने की इच्छा शेष रह जाती है ! धन्य है नियति!

इसे पढ़कर एक दोहा याद हो आया,

भलौ भलाईहि पै लहर लहर निचाइहि नीचु ।

सुधा सराहिअ अमरता गरल सराहिअ मीचु

भला भलाई ही ग्रहण करता है और नीच नीचता को ही ग्रहण किए रहता है। अमृत की सराहना अमर करने में होती है और विष की मारने में।

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एक समाचार! BBA के गठन की घोषणा कर दी गई है। BBA का मतलब बिज़नेस वाला बैचलर डिग्री नहीं .. "बुढऊ ब्लागर्स एशोसियेशन" है!! चूंकि यह समाज हित का काम है। हम तो थोडा त्याग करने को तैयार हैं, (५० पूरे होने के बाक़ी सालों को त्याग दिया है) आपको भी कुछ करना चाहिये! वैसे तो यह असोसिएशन किसी भी तरह के लिंग भेद को नही मानता पर जिन्हें एक साल से ज्यादा का समय ब्लागिंग करते हो गया है उनको पात्रता उनके लेखकीय उत्पात को देखते हुये दी जायेगी, या फिर ५० साल से ज्यादा उम्र के ब्लागर्स को वाईल्ड कार्ड एंट्री दी जायेगी। सदस्यता के लिए---
वैसे भी ४३१ हिट और ४१ टिप्पणियों का लालच किसी को भी असमय बुड्ढा बना सकता है। हां उनके इस एशोसियेशन की ख़बर पाकर निर्मला दीदी कहती हैं ना ताऊ ना आपके सदस्य गालियाँ बहुत निकालते हैं हम तो अलग से बुढिया अस्सोसिएशन बनायेंगे यहा केवल हमारा एक छत्र राज होगा शायद और कोई एक आध बुढिया ही होगी ब्लागजगत मे। फिर सभी पद अपने पास रहेंगे। हम आपसे रिज़रवेशन क्यों माँगे? अपने दम पर बूढे हुये और अपने दम पर ही पार्टी बनायेंगे।

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शकील परवेज़ की ग़ज़लों का नशा ही कुछ और होता है। चढ जाये तो उतरता ही नहीं और कुछ और, कुछ और की मांग करता है। इन लाजवाब शे’रों पर बड़े अदब से कौन नहीं और कुछ और, कुछ और की मांग करेगा!

हम जब तेरे दस्त से गुज़र जाते हैं

चेहरे पर निशाने ग़म उभर आते हैं

मयक़दा बंद और साक़ी भी है परेशां

देखना है कि अब रिंद किधर जाते हैं

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पीडी जैसा छोटा नाम है वैसा ही कहते हैं कि मेरी छोटी सी दुनियां है और सुना रहे हैं बाथ टब की कहानी सच में छोटी सी ये दुनिया हैं, और हम इसमें छोटी छोटी खुशियाँ बटोर लाते हैं। अपनी भांजी के साथ उनका अच्छा समय बीता और उसे हमसे बांट रहे हैं एक संस्मरण के ज़रिए। आप भी पढ़िए बच्चों की निराली दुनिया का संस्मरण!

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वाकई माहौल बड़ा गरम है...कुछ भी कहना ख़तरे से खाली नहीं है...कौन बुरा मान जाए...कौन लाठी बल्लम निकाल ले...कुछ पता नहीं ...जो नारी ममता की बरसात करती है...प्रेम और वात्सल्य का पर्याय मानी जाती है...पुरुषों के सब मुद्दों को सुलझाने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर साथ चलती है... लेकिन आज उसी नारी को मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही है। ऐसे माहौल में खुशदीप जी बस एक सवाल के जवाब की उम्मीद करते हैं उनका सवाल है

सतयुग हो या कलयुग अग्निपरीक्षा हमेशा सीता को ही क्यों देनी पड़ती है ?

श्रीमती अजित गुप्त का कहना है सीता ने साक्षात अग्नि परीक्षा दी और राम अपनी ही अग्नि में जिन्‍दगी भरे जले। हमारे परिवार की बुनावट ही ऐसी है कि हम एक दूसरे के सहारे जीवन बिताते हैं। लेकिन जब से भोगवाद हमारे जीवन में आया है तभी से नारी को भोग की वस्‍तु मानकर कैद कर दिया गया। लेकिन आज यही भोगवाद नारी पर भी हावी है और वह भी पुरुष को अपनी कैद में करने पर तुली है। जहाँ पूर्व में पति और पत्‍नी के मध्‍य समर्पण था आज अधिकारों ने जगह ले ली है। पति-पत्‍नी, सास-बहु, बाप-बेटा सभी सत्ता के लिए लड़ रहे हैं। परिवारों से निकलकर यह लड़ाई राजनीति में भी जा पहुंची है। मेरे ख्‍याल से हम सभी को आज के युग में अग्नि परीक्षा देनी पड़ रही है।

अवधिया जी कहते हैं क्योंकि जिस कार्य को करने की क्षमता पुरुष में न हो, उसे नारी को करना पड़ता है।

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तन पर धोती कुरता और सिर पर साफा (पगड़ी) राजस्थान का मुख्य व पारम्परिक पहनावा होता था रतन सिंह शेखावत जी बता रहे हैं, और कहते हैं कि एक जमाना था जब बुजुर्ग बिना साफे (पगड़ी) के नंगे सिर किसी व्यक्ति को अपने घर में घुसने की इजाजत तक नहीं देते थे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस पहनावे को पिछड़ेपन की निशानी मान नई पीढ़ी इस पारम्परिक पहनावे से धीरे धीरे दूर होती चली गई और इस पारम्परिक पहनावे की जगह पेंट शर्ट व पायजामे आदि ने ले ली।

लेकिन आज स्थितियां बदल रही है पिछले तीन चार वर्षों से शादी विवाहों जैसे समारोहों में इस पारम्परिक पहनावे के प्रति युवा पीढ़ी का झुकाव फिर दिखाई देने लगा है बेशक वे इसे फैशन के तौर पर ही ले रहें हों पर उनका इस पारम्परिक पहनावे के प्रति झुकाव शुभ संकेत है कम से कम इसी बहाने वे अपनी संस्कृति से रूबरू तो हो ही रहे है।

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शेफाली जी का कहना है नेताओं और औरतों के मध्य कई समानताएं पाई जाती हैं, जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि एक नेता बनने के सारे ही गुण एक महिला में विद्यमान रहते हैं, अतः उन्हें संसद से दूर रखने की कोशिश किसी भी सूरत में नहीं करनी चाहिए। वो कहती हैं कि आने दो हमें संसद में। इस आलेख में नेता और नारी की कमाल की तुलना की गई है। तभी तो निर्मला दीदी कहती हैं वाह वाह क्या इतनी समानतायें हैं पहले क्यों नही बताया? मै घर मे तो कम से कम खुद को नेता कहलवा सकती थी न?”

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त्यागपत्र पर रामदुलारी की शादी की तैयारियां शुरु हो चुकी है। वहां का हाल ई है कि लहरू झा का जयगान जारी ही था लेकिन चौधरी जे के मनोनुकूल नहीं। झटपट तम्बाकू पर ताली ठोंक हथेली बढ़ा दिए। पंडीजी मुँह के भीतर जीभ को नचा कर हो.....आआआक............. थू..... करते हुए निचले होंठ और दांतों के बीच पहले से कब्ज़ा जमा चुके बुद्धि-वर्धक चूर्ण को कोने में विसर्जित कर नया डोज चुटकी में भर कर यथास्थान पुनर्स्थापित कर दिया। "........ जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोपरानी !!"

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बहुत रोचक संस्मरण प्रस्तुत कर रही हैं श्रीमती अजीत गुप्त। अपने मित्र के कर्मचारी के द्वारा आरक्षण कराया था। अभी उन्होंने दो घड़ी चैन के भी नहीं बिताए थे कि टिकट कलेक्‍टर महोदय आ गए। उन्‍होंने उनकी ओर घूरकर देखा। वे दो दम्‍पत्ति साथ में यात्रा कर रहे थे और उनका टिकट एकसाथ ही बना था। टिकट कलेक्‍टर ने रहस्योद्घाटन किया कि उनके टिकट में तीन पुरुष और एक महिला हैं। वहां दो पुरुष और दो महिलाएं थे। उन्होंने टिकट देखी, उनके नाम के आगे मेल लिखा था। इस रोचक यात्रा का विस्तृत विवरण तो आप वहां ही पढ़ें। पर इस घटना का पटाक्षेप करते हुए उन्होंने कहा, मैंने कहा कि भैया तुम्‍हारे चार्ट में मेरे नाम के आगे मेल लिखा है तो वो दुरस्‍त है। यह मेरी स्‍वतंत्रता है कि मैं क्‍या वेशभूषा पहनू। और तुम्‍हारी जानकारी के लिए बता दूं कि मैं ना मेल हूँ और ना ही फिमेल। मैं कभी मेल लिखा देती हूँ और कभी फिमेल। कपड़े भी कुछ भी पहन लेती हूँ। अब बताओं क्‍या करोगे। रात को नो बजे बाद तुम किसी महिला यात्री को रेल से उतार नहीं सकते तो अब मस्‍त रहो।

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आखर कलश भरकर अरुणा राय की कविताएं पेश कर रहे हैं नरेन्द्र व्यास जी। बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए पांच खूबसूरत रचनाएं हैं। ये रचनाएं आग्रहों से दूर वास्तविक जमीन और अंतर्विरोधों के कई नमूने प्रस्तुत करती हैं।

जब चार हथेलियां
मिलीं/
और दो जोड़ी आंखें
चमकीं
तो पेड़ के पीछे से
छुपकर झांकता/
सोलहवीं का चांद
अवाक रह गया/
और तारों की टिमटिमाती रौशनियां
फुसफुसायीं
कि सारी जद्दोजहद के बीच
जीवन
अभी चलेगा !

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खुद से प्रेम करना और दूसरों से प्रेम करना-ये दोनों बातें एक-दूसरे पर निर्भर करती हैं। दूसरों के लिए जीना नहीं सीखते तो खुद से भी प्यार नहीं कर सकते और खुद से प्यार नहीं कर सकते तो दूसरों के लिए भला कैसे जीना सीखेंगे। जब हम स्वयं खुश और संतुष्ट होते हैं तभी हमारी उपस्थिति दूसरों को भी प्रसन्न कर पाती है। अपने बारे में सोचना कोई अपराध नहीं है, लेकिन न सोचना अवश्य ऐसा त्याग है जिससे किसी का भला नहीं होता। इसी तरह की सीधी बात करते हुए अभिषेक प्रसाद ’अवि’ कह्ते हैं आप जो भी कर रहे है वो आपके लिए अच्छा है। खुद से प्रेम कीजिये, दुसरे खुद-ब-खुद आपसे प्रेम करने लगेंगे

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अपने जनपद के बारे में जानकारी देते हुए डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक बताते हैं कि आज से लगभग 15 वर्ष पूर्व उत्तर-प्रदेश का नैनीताल जिला एक बहुत बड़ा जिला हुआ करता था। जिसमें पहाड़ी क्षेत्र के अतिरिक्त मैदानी क्षेत्र भी था जो जसपुर से टनकपुर तक था। लेकिन बहिन कु. मायावती जी ने 1995 में नैनीताल के तराई वाले मैदानी भूभाग को इससे अलग कर नया जिला शहीद ऊधम सिंह के नाम से ऊधमसिंहनगर बना दिया। इस जनपद के बारे में विस्तृत जानकारी पढ़िए एक अच्छे ज्ञानवर्धन करते आलेख में सचित्र और नक्शे के साथ

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उत्सव का यह रंग हमारी परंपराओं और रीति-रिवाजों को कायम रखने, आपस में लोगों को जोड़ने और सर्वत्र हंसी-खुशी का वातावरण बनाए रखने में मदद करता है। प्रभात जी की प्रतिभा और कुछ नया करने की क्षमता तो हम पहले भी देख चुके हैं। अब वे नया प्रयास "परिकल्पना ब्लॉग उत्सव-2010" ले कर आए हैं। यह एक सराहनीय कदम है। बेशक ये एक दुरूह कार्य है पर एक स्वागत योग्य कदम है। साथ ही प्रसन्नता है कि कुछ चुनिन्दा उत्कृष्ट रचनाएं पढने को मिलेंगी।

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महाबलीपुरम में वैसे तो बहुत से मंदिर हैं, पत्थरों के बहुत सी शैली की मूर्तियाँ हैं...पर अगर बंगलोर से महाबलीपुरम जाने के लिए एक वजह चाहिए तो वो वजह होगी...सड़क...ऐसी खूबसूरत सड़क कि साढ़े तीन सौ किलोमीटर पता ही नहीं चले। इतना अच्छा रास्ता..और पूरे रास्ते खूबसूरत फूल और अच्छी बनी हुयी सड़क।
इस यात्रा के बारे में बताते हुए पूजा जी कहती हैं हम तो समंदर देखने और चिरकुटई करने गए थे...सो किये...ढेर सारा खरीद दारी भी। शंख सीप, क्या क्या उठा लाये। हमारा बस चलता तो जिस झोपड़ी में रह रहे थे उसी को उठा लाते, समंदर समेत!! आखिर कुछ यादें बस आँखों में बसाने के लिए भी होती हैं। कहीं यह
रेत पर लिखी इक इश्क की दास्ताँ तो नहीं? ख़ुद ही पढ लीजिए।

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अनिल कांत जी की कलम और उनकी अभिव्यक्ति चाहे वह कहानी ही क्यों न हो, में शिखा जी को हमेशा एक कविता दिखाई देती है..और शायद इसीलिए एक ही सांस में पूरी पढ़ जाती हैं। पूरी कहानी। आज की उनकी कहानी क्या इसी दुनिया का था वो? बहुत ही अच्छी कहानी है। सच कहा जए तो अनिल जी की लेख्ननी में साँस रोक देने का जादू है। लेख्ननी अपनी आत्मीयता से पाठक को आकृष्ट कर लेती है।

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पारम्परिक रूप से दुनिया भर में शादी होने के बाद महिलाओं का कुल गोत्र वही हो जाता है जो उनके पति का है। महाराष्ट्र में तो शादी के बाद लड़की का उपनाम ही नहीं उसका नाम भी बदल दिया जाता है। यानी जो कुछ उसका पिछला है वह सब कुछ छोड़कर, वह पति के परिवार को अपनाती है। नारी ब्लॉग पर प्रतिभा वाजपेयी पूछती हैं क्या महिलाओं को शादी के बाद अपना उपनाम बदलना चाहिए? इस आलेख में उन्होंने शादी और उपनाम से संबंधित विषय पर मूल्य निर्णय न देकर आलोचनात्मक ब्याख्यान प्रस्तुत किया है। इस प्रश्न पर मुक्ति जी का कहना है आखिर यहाँ भी पुरुषों की ही चलती है। शादी के बाद नाम बदलवा दिया और तलाक के बाद वापस ले लिया। नाम के साथ व्यक्तित्व का अभिन्न जुड़ाव होता है। सरनेम बदलने से व्यावहारिक दिक्कतें तो आती ही हैं, साथ ही भावनात्मक दिक्कतें भी होती हैं।

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बड़ा विश्‍वविद्यालय था, नालंदा। दस हजार विद्यार्थी थे। चीन और लंका और कंबोदिया और जापन और दूर-दूर से लोग, मध्‍य एशिया और इजिप्‍त, सब तरफ से विद्यार्थी आते थे। वहां के तीन विद्यार्थी आखिरी परीक्षा पार कर लिए थे। लेकिन गुरु जाने के लिए नहीं कह रहा था। आखिर एक दिन एक ने पूछा कि आखिरी परीक्षा भी हमारी हो गयीं लेकिन जाने क्यों नहीं दिया जाता? तो गुरु ने बताया कि आखिरी परीक्षा अभी हुई नहीं, आखिरी परीक्षा ऐसी थी कि वह ली नहीं जा सकती थी; वह तो एक तरह की कसौटी थी, जिसमें से गुजरना पड़ता था। जब वे उससे गुज़रे तो दो फेल कर गए एक ही पास कर पाया। इस कथा के उपसंहार में मनसा आनंद 'मानस' बताते हैं कि अंतिम परीक्षा शब्‍दों की नहीं है; अंतिम परीक्षा तो प्रेम की है। अंतिम परीक्षा पांडित्‍य की नहीं है; अंतिम परीक्षा तो करूणा की है। गुरु के चरणों में बैठकर लोग सीखते थे, वर्षो लग जाते थे। अजीब-अजीब परीक्षाएं थी। पत्‍थर जब तक छैनी से प्रेम नहीं करेगा तब तक उससे मूर्ति निर्मित नहीं हो सकती। बहुत ही ज्ञान देता आलेख।

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अदा जी बता रही हैं कि घर और बाहर के पाटों के बीच में पिस रही महिला चाहती है कि, सदियों पुरानी पुरुष मानसिकता और रवैया अब बदल जाए लेकिन अगर, पुरुष मन में ऐसी धारणा बना ले कि अमुक काम सिर्फ पुरुष के हैं और अमुक काम सिर्फ स्त्री के तो समस्या का समाधान कठिन है। उनके ये शब्द मैं हूँ न!!! इस सकारात्मक सोच को दर्शाता है कि आज के इस युग में न सिर्फ वो पुरुष के साथ कंधे से कन्धा मिला कर चल रही है, अपितु कई क्षेत्रों में उसने पुरुषों से भी बाज़ी मार ली है। यह रचना --- --- समस्या के विभिन्न पक्षों पर गंभीरता से विचार करते हुए कहीं न कहीं यह आभास भी कराती है कि अब सब कुछ बदल रहा है। प्रश्न यह है कि क्या पुरुष को भी अपने आप में समयानुसार बदलाव नहीं लाना चाहिए ?? सुझाव भी देती हैं और कहती हैं कि अगर पुरुष अधिक न भी करे कुछ ही छोटे-छोटे कामों को अपने हाथ में ले ले तो स्त्री (पत्नी) को बहुत राहत मिल सकती है, इस प्रकार थोड़ा-बहुत अपने साथी का साथ देने से न सिर्फ स्त्री इस दयनीय स्तिथि से उबरेगी अपितु उसके आत्मबल को भी बल मिलेगा, घर का वातावरण सौहार्दपूर्ण होगा ...याद रखिये जब एक-एक घर मुसुकुरायेगा तो समाज मुस्कुराएगा और तब ही राष्ट्र खिलखिलाएगा !! आस्था और आशावादिता से भरपूर स्वर इस आलेख में मुखरित हुए हैं । आलोचना करने पर भी संतुलन नहीं खोना आपकी विशेषता है।

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मुक्त कविताओं में आज़ादी यह रहती है कि कवि अपनी भावनाओं को शब्दों के बेहिसाब गिलाफ पहना कर कांगा पर सजा देता है ताकि दिल का गुबार पूरी तरह से निकल सके। दूसरी बात कि कवि शाइर ग़ज़लकारी की बारीकियों से भिज्ञ ही नहीं होते, उन्हें आज़ाद नग्‍मों के रूप में भाग निगकलने का रास्ता (यानी राहे फरार) मिल जाता है। अर्थात अपनी कम फहमी को ढाँपने का एक जरिया।
ऊपरी दोनों दलीलों के ज़रिये कहा जा सकता है कि मुक्त कविताएँ ज़रूरी भी हैं और मजबूरी भी। आज़ाद नमों में सबसे बड़ी खराबी ये होती है उसे पढ़ते वंक्त किसी 'रिद्म' का ना तो आभास होता है और न ही कुछ ज़ेहन में महफूज़ रहता है। छंद मुक्त कविताओं को इसलिये इस प्रकार लिखा जाना चाहिये कि कि पढ़ने वाला, पढ़ते रहने का पाबंद हो जाए। शुरू करे तो खत्म तक पहुँचकर ही दम ले। इस भूमिका के बाद शिवना प्रकाशन पर -डॉ. मोहम्मद आज़म दीपक चौरसिया 'मशाल' की 'अनुभूतियाँ' की समीक्षा प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि ये कविताएँ मनन माँग रही हैं, ये गंभीरता चाह रही हैं। इन्हें ऑंख खोलकर नहीं बल्कि दिल व दिमांग खोलकर पढ़ने की आवश्यकता है । पढ़िए एक बेहतरीन समीक्षा। शिवना प्रकाशन जिस तरह से नये उभरते कवियों को सामने ला रही है, वो प्रशंसनीय है।

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विवाह के 22 वर्षों के जीवन पर नज़र डालते हुए कैसा रहा २२ वर्षों का मेरा वैवाहिक जीवन शीर्षक आलेख के द्वारा संगीता पुरी जी कहती हैं बोकारो स्‍टील सिटी में दोनो बेटों की पढाई के समाप्‍त होने के बाद ईश्‍वर ने फिर से मुझे एक नए मोड पर खडा कर दिया है , जहां से आगे की यात्रा करने में हमें एक बार फिर से कोई बडा निर्णय लेना है , हमारे निर्णय से आगे की जीवन यात्रा भी सुखद और सफल हो , इसके लिए आज बोकारो स्‍टील सिटी के भगवान जगन्‍नाथ जी के मंदिर में भगवान के दर्शन और पूजन को गयी।

हम इस मंच से उनके सुखद, शांतिपूर्ण व सफल जीवन की कामना करते हैं।

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एहसास की अभिव्यक्ति और समर्पण के रस में सराबोर कविता हमें तुम भूल भी जाओ लेकर आयी हैं रानी विशाल! यह एक दिल की गहराइयों से निकली हुई सुन्दर व कोमलतम मनोभावो की प्रभावी बेहतरीन प्रस्‍तुति है।

सूने दिल में तुम आए
तुम्हे उसका सिला देंगे
हो जो भी आरजू तुमको
वही तुमको दिला देंगे
तुम्हारे दिल में भी कसक होगी
हम इंतज़ार करेंगे

हमें तुम भूल भी जाओ
तुम्हे हम प्यार करेंगे
गवारा जो न हो तुमको
नहीं इज़हार करेंगे

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Ktheleo की ख्वाहिश है -- मेरा पैगाम है मोहब्ब्त जहां तक पहुंचे!

यह सबसे खूबसूरत अहसास का लाजवाब बयान है।

खुली आंख से

सपना जैसा,

तेरी आंख में

आंसू मेरे,

दुनियां ज़ालिम,

सूखे उपवन

दूर बसायें

अपने डेरे,

क्या जादू है?

मै न जानूं!

नींदें मेरी,

सपने तेरे|

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चंदा मांगना हमारी गौरवशाली परंपरा है। कई महापुरुषों ने बहुजन हिताय चंदा मांगा है। चंदा आज भी मांगा जा रहा है बस अंतर इतना है कि तब जनकल्याणार्थ मांगा जाता था अब आत्म कल्याणार्थ मांगा जाता है। कुछ इसी तरह के विचारों के साथ नुक्कड़ पर चंदाई के चंद नुस्खे प्रस्तुत कर रहे हैं अतुल चतुर्वेदी। लोग तो घोटाले कर के नाक कटा रहे हैं तो कुछ नहीं और आप फालतू ही शर्मा रहे हैं । उनसे कुछ तो सीखिए।

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स्वागतम ... नए चिट्ठे

आज 09 नये चिट्ठे जुड़े हैं चिट्ठाजगत के साथ। इनका स्वागत कीजिए।


1. राष्ट्र और बुंदेलखंड को समर्पित (http://apnobundelkhand.blogspot.com/)

चिट्ठाकार: Kavi Hardayal Kushwaha

2. gsumaro (http://gsumaro.blogspot.com/)
डॉ. महेश परिमल प्रस्तुत कर रहे हैं प्रगतिवादी बन रहा है मुस्लिम समाज और बताते हैं तीन घटनाएँ जो उस दकियानूसी और कट्टर समझे जाने वाले समाज की प्रगतिशीलता की ओर इशारा करती हैं। वे यहाँ की परंपराओं ओर रीति-रिवाजों में घुलमिल गए हैं। कई जगहों पर तो इन्हें केवल नाम जानने के बाद ही पहचान होती है कि ये मुस्लिम हैं। बाकी रहन-सहन, खान-पान और संस्कृति को पूरी तरह से अपने में ढाल लेने वाले ये लोग कितने प्रगतिशील हे, यह जानने की जरूरत है।

3. hindi advertisement ki bhasha (http://kamalhetawal.blogspot.com/)

चिट्ठाकार: Dr. Kamal Hetawal

4. an atheist's view of life (http://gurukiganga.blogspot.com/)

चिट्ठाकार: cool creature

5. ममता (http://pratham-purush.blogspot.com/)

चिट्ठाकार:Satyajeetprakash

6. Manoj Goyal (http://manojkgoyal.blogspot.com/)

चिट्ठाकार: Manoj Goyal

7. sadhak ummed (http://ummed-baid.blogspot.com/)

चिट्ठाकार: Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "

8. CBSE | NCERT Solution (http://cbse-ncert-solution.blogspot.com/)

चिट्ठाकार: Dr. Abhijit Joardar

9. BEBAK - AAWAZ (http://manglesh-gajbhiye.blogspot.com/)

चिट्ठाकार: MANLESHWAR


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आज का सबसे ज़्यादा पसंदीदा

चिट्ठा जगत पर दिख रहे सबसे अधिक टिप्पणियों के आधार पर ...

टिप्पणियाँ भी एक सृजनकर्म है -अगर मुख्य सृजन नहीं तो कोई गौंण भी नहीं -ब्लॉगजगत में चर्चा,प्रतिचर्चा और परिचर्चा की बहुत ही महत्वपूर्ण कड़ियाँ हैं टिप्पणियाँ -उनकी उपेक्षा कतई उचित नहीं हैं और न हीं उन्हें घूर घाट के किनारे लगाने की प्रवृत्ति होनी चाहिए .वे किसी भी तरह इतनी उपेक्षनीय नहीं हैं -टिप्पणीकार की मानस पुत्र और पुत्रियाँ है टिप्पणियाँ! अरविंद मिश्र जी इन विचारों के साथ निवेदन कर रहे हैं वापस कीजिये मेरी टिप्पणियाँ ! यह एक विचारणीय मुद्दा है। प्रवीण जी का कहना है टिप्पणियाँ साहित्यिक सृजन है। उन्हें सहेज कर रखना चाहिये। कोई विधि हो जिससे आपके द्वारा की गयी टिप्पणियाँ एक जगह एकत्रित रह सकें। प्रवीण जी की सलाह पसंद आई। एक आलेख आया था हिन्दी ब्लॉग टिप्स पर क्या आप अपनी सारी टिप्पणियां पढ़ना चाहेंगे?

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हमारी पसंद

आज की हमारी पसंद है डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी की पोस्ट।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी कण चाहता हूँ पेश कर रहे है। विचारों का जीवन में विशेष महत्‍व है। उच्‍च, सद्विचारों से मनुष्‍य संघर्षों से जूझ सकता है। इस असाधारण शक्ति के पद्य की बुनावट की सरलता और रेखाचित्रनुमा वक्तव्य सयास बांध लेते हैं। रचना दृष्टि की व्यापकता के चलते हर वर्ग में लोकप्रिय होगी। रचना में भाषा का ऐसा रूप है कि वह आसानी से हृदयगम्य हो जाती है। अगर मैं यह कहूँ कि यह एक राष्ट्रीय जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है जो प्रेम, सुख-चैन, अमन, सौहर्द्र चाहता है तो अतिशियोक्ति नहीं होगी।

नही कार-बँगला, न धन चाहता हूँ।
तुम्हारी चरण-रज का कण चाहता हूँ।।

दिया एक मन और तन भी दिया है,
दशम् द्वार वाला भवन भी दिया है,
मैं अपने चमन में अमन चाहता हूँ।
तुम्हारी चरण-रज का कण चाहता हूँ।।

उगे सुख का सूरज, धरा जगमगाये,
फसल खेत में रात-दिन लहलहाये,
समय से जो बरसे वो घन चाहता हूँ।
तुम्हारी चरण-रज का कण चाहता हूँ।।

बजे शंख-घण्टे, नमाजें अदा हों,
वतन के मुसाफिर वतन पर फिदा हों,
मैं गीतों की गंग-ओ-जमुन चाहता हूँ।
तुम्हारी चरण-रज का कण चाहता हूँ।।

कलम के पुजारी, कहीं सो न जाना,
अलख एकता की हमेशा जगाना,
अडिगता-सजगता का प्रण चाहता हूँ।
तुम्हारी चरण-रज का कण चाहता हूँ।।

*** *** ***

चलते-चलते

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो छिटकाय ।

टूटे तो फिर ना मिले मिले गांठ पड़ जाय ।

रहीम कहते हैं कि एक बार प्रेम का जुड़ाव हो जाए तो उसे तोड़ना नहीं चाहिए। जब प्रेम टूट जाता है तो फिर मिलता नहीं। और मिलता है तो गांठ पड़ ही जाती है।

टूटे सुजन मनाइए जो टूटे सौ बार ।

रहिमन फिर फिर पोहिए, टूटे मुक्ताहार ।।

मुक्ताहार यदि टूट जाता है तो फिर-फिर उसे पोहना चाहिए, मानव मूल्यों से लगाव छूट जाता है तो फिर-फिर जोड़ना चाहिए ।

*** *** ***

भूल-चूक माफ़! नमस्ते! अगले हफ़्ते फिर मिलेंगे।

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20 टिप्‍पणियां:

  1. मनोजकुमार जी!
    आपकी यह चर्चा उत्कृष्ट चर्चाओं में से एक है!
    इसका विस्तारित रूप देखकर बहुत कुछ सीखने के लिए हमें भी मिला!

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  2. बढ़िया और विस्तृत चर्चा के लिए आभार

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  3. उपस्थित श्रीमान !


    उक्त टिप्पणी की साहित्यिक महत्ता तलाश कर जल्द लौटता हूँ !

    बढ़िया और विस्तृत चर्चा के लिए आभार..
    आपकी यह चर्चा उत्कृष्ट चर्चाओं में से एक है !

    इन प्रासँगिकताओं के साथ इसे जोड़ना टेढ़ी खीर है !

    उत्तर देंहटाएं
  4. मनोज जी चिट्ठा चर्चा का यह बृहद और सुंदर रूप बहुत पसंद आया ..बढ़िया चर्चा के लिए बहुत बहुत आभार

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत ही परिश्रम पूर्वक तैयार की गयी पोस्‍ट। आपको ढेर सारी बधाइयां। इतनी पोस्‍ट पढ़ना फिर उन्‍हें छांटना और अपने तरीके से देना एक दुरूह कार्य है। लेकिन आपने कुशलता पूर्वक सम्‍पादित किया इसके लिए आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  6. आज की यह चर्चा और विश्लेशण पसन्द आया.बधाई....

    उत्तर देंहटाएं
  7. बढ़िया चर्चा के लिए आपको ढेर सारी बधाइयां।

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  8. चिट्ठा चर्चा करने में आप पूरी मेहनत करते हैं .. बहुत ही बढिया पांस्‍ट !!

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  9. बहुत बढ़िया चर्चा के लिए बधाई मनोज जी !

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  10. मनोज भाई क्या मैने झूठ कहा बढिया है ना मेरी स्कीम? अच्छी लगी चर्चा खूब मेहनत की है
    । धन्यवाद्

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  11. फुर्सत से की हुई चर्चा... यह हर शनिवार दिखती है पर मेरे ब्लॉग लिस्ट के अपडेट में नहीं दिखाती

    बात सिर्फ अरुणा राय की प्रेम का अनोखा पक्ष इनकी कविताओं में दिखता है.... सबसे अलग... UP पुलिस सेवा से जुडी अरुणा जी की कविता कुमार मुकुल के ब्लॉग कारवां पर भी उपलब्ध है

    http://hindiacom.blogspot.com/2010/01/blog-post_3807.html

    शुक्रिया...

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  12. वाकई आपके पोस्ट कोम पढकर बहुत अच्छा लगा. समझ में आता है पोस्ट को देखकर कि आपने बहुत बढिया तरीके से सारे चिट्ठो को पढकर एक सारगर्भित सारांश प्रस्तुत किया है.

    आभार

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  13. सबसे संभव नहीं है कि इतनी लगनशीलता के साथ चर्चा कार्य को
    संपादित कर सके ,,
    आप धन्यवाद के पात्र हैं क्योंकि पहले आप गंभीरता से ब्लॉग दुनिया
    की पोस्टें पढ़ते हैं फिर उनका विवेचन करते हैं , धैर्य के साथ !
    अधिकांश संपर्क-सन्दर्भ बड़े सुन्दर हैं ...
    आभार !

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  14. People involved in 'chitthacharcha' are patience personified.

    Congrats !

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  15. बहुत उत्तम और विस्त्रित चर्चा

    उत्तर देंहटाएं
  16. प्रिय मनोज जी,

    आप के द्वारा मेरी रचना "ख्वाहिश" (http://sachmein.blogspot.com/2010/03/blog-post_11.html)को "कविता" Blog पर पढने व पसंद करने तथा उसे अपने मंच( चिट्ठा चर्चा ) पर सराहने के लिये मैं आप का आभारी हूं।

    साथ ही आप का ध्यान एक अति महत्वहीन एक तत्थ्य की ओर आकर्षित करना अपना कर्तव्य समझता हूं,वो यह कि "कविता" Blog पर प्रस्तुत यह अति साधारण एवं तुच्छ रचना, मेरे द्वारा शब्दांकित की गई थी। ये तो माननीया ’शमा जी’ का स्नेह और सह्रयता है कि वे मुझे अपने सुन्दर चिठ्ठे ’कविता’ पर पोस्ट करने का मौका दे कर ,उनके पाठक गणों तक पहुंचने का अवसर प्रदान करती हैं।

    एक और सुझाव देना चाहुंगा कि यदि सम्भव हो तो, किसी भी पोस्ट को चर्चा हेतु प्रस्तुत करने से पूर्व ही उसकी सूचना Blog Owner/लेखक को दे सकें तो शायद ज्यादा, आनन्द आवेगा और जैसा मेने देखा कि कुछ लेखको को जिन्हें शायद मौजूदा प्रक्रिया पर किन्चित एतराज हो सकता है से भी से बचा जा सके।

    एक बार पुन: सधन्यवाद,शुभकामनाओं सहित,

    'Ktheleo' "सच में" (www.sachmein.blogspot.com

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  17. आपकी चर्चा बहुत अच्छी लगी...जहाँ नए ब्लॉग का पता चलता है वहाँ आप सबको एक सूत्र में पिरो भी देते हैं.....बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  18. छोटी चर्चा....
    लड्डू बोलता है ....इंजीनियर के दिल से
    http://laddoospeaks.blogspot.com

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  19. मनोज जी,
    Prompt response के लिये आप का शत शत धन्यवाद!

    रहीम दास जी को शत शत प्रंणाम करते हुये इस दोहे की नवीन ज़मीं देखें:

    रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो छिटकाय ।

    टूटे तो फिर ना मिले मिले गांठ पड़ जाय ।

    "मोहब्बतो-ओ-तकरार करने से है,
    वो करा कीजिये,ये न करा कीजिये."
    एक और कि:
    "शेर सुनना हो जब भी नये रंग का,
    मुझको यादों का नस्तर चुभा दीजिये।"

    आदर और शुभकामनाओ सहित,
    _Ktheleo @ www.sachmein.blogspot.com ("सच में")

    उत्तर देंहटाएं

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