रविवार, मार्च 14, 2010

…. नाम में क्या रक्खा है?

नाम में क्या रखा है? वो भी ब्लॉग नाम में? ‘तुम्हारा कमीना’ हो या ‘चीर फाड़’ या ‘बेचैन आत्मा’ या ‘लड्डू बोलता है’ या ‘स्याह’ या ‘विरोध’ या ‘मो सम कौन’ ! सीधा सादा ‘राम लाल का ब्लाग’ हो या  फिर ‘विचार शून्य’ ! और, ये तो महज एक झलक है, ऐसे दर्जनों हैं, और सैकड़ों आने हैं.

(संबंधित चिट्ठे पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें)

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अंत में,

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19 टिप्‍पणियां:

  1. यूँ नाम में क्या रक्खा है जी। ब्लाग नाम ऐम्बुलेंस या मुर्दागाड़ी भी रखा जा सकता है। मेरे शहर में श्मशान जाने वाली गली का नाम शिवदास घाट की गली है। शिवदास को तलाशा तो इतिहास से नदारद है। जरूर वह शवदाह घाट रहा होगा जो शिवदास हो गया।

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  2. नयी शैली में अलग सी चर्चा अच्छी लगी. ऐसे नाम आकर्षित करते हैं. ब्लॉगिंग को अलग सी एक विधा के रूप में स्थापित करते हैं.

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  3. कहां कहां से ढूंढ लाते है हजूर....

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  4. आंख के अंधे और नयनसुख,नगर सेठ का नाम गरीबदास और कुबेर मांगे भीख्॥नाम तो साप्ताहिक अख़बारों के भी गज़ब के होते हैं,हिला के रह दूंगा,पोस्टमार्टम,उबलता लहू,खौलता खून।मज़ा आ गया,अच्छी चर्चा।

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  5. रविरतलामी जी..ध्यान देने के लिए धन्यबाद....
    लड्डू नाम मेरे मित्रों ने मुझे तब दिया था जब इंजीनियरिंग कॉलेज में ( इंडियन स्कूल ऑफ माइंस , धनबाद में )रैगिंग के अंतिम दिन के फ़ाइनल समारोह में फ्रेसरों के नौसिखिए डांस में मुझे विजेता चुना गया. पुरस्कार में मुझे लड्डू का पैकेट मिला था.
    मुझे डांस करना नहीं आता लेकिन मैं दिल से नाचा था.
    प्रोफेसन से इंजीनियर होने के कारण मेरे ब्लॉग में इंजीनियर शब्द भी है..
    यानि दिल से कही गयी एक इंजीनियर की बातें....
    लड्डू बोलता है ....इंजीनियर के दिल से....
    http://laddoospeaks.blogspot.com/

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  6. जब ऐसे ऐसे नाम भी पसंद आते हैं

    तो बेनामी क्‍यों नहीं लुभाते हैं ?

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  7. कुछ तो जरूर रखा होगा, क्यूंकि ये कहने वाला भी नीचे अपना नाम देने का लालच कहां छोड़ पाया था।

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  8. भाई रतलामी जी, अब लग रहा है कि अपने ब्लाग का नाम मुझे भी "रैम लैल्ज़ लॉग" रख लेना चाहिये था :-)

    ख़ैर, मेरा देसी सा नाम है, देसी सा ब्लाग है, किन्तु स्वागत आप सभी का है बाहें व दिल खोल कर.
    राम राम जी.

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  9. सार्थक शब्दों के साथ अच्छी चर्चा, अभिनंदन।

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  10. रवि साहब,
    हम तो इस बात से ही इतरा रहे हैं कि आपके द्वारा की गई चर्चा में हमारे ब्लॉग का जिक्र आ गया। हम तो जी ऐसे ही नाचीज हैं, इतने से ही धन्य हो गये। और फ़िर टिप्पणी करने वाले विद्वानजनों ने भी अपने-अपने अंदाज में इज्जत बख्शी। शुक्रगुजार हैं आप सबके। वैसे आपने कूटनीतिक भाषा में चर्चा कर दी "और ये तो महज एक झलक है, ऐसे दर्जनों हैं, और सैकड़ों आने हैं", मुझे तो ऐसा ही लगता है कि यह आपकी आशावादिता दिखा रहा है। वैसे तो आपने स्पष्टीकरण नहीं मांगा, पर हमें भी लिखने का नया-नया शौक चर्राया है या यूं कहिये कि बंदर के हाथ में तलवार आ गई है, तो बता देते हैं कि अपने आप को सबसे बड़ा दुर्गुणी मानते हुये अपना परिचय देने के लिये मुझे यही पंक्ति उचित लग रही थी कि "मो सम कौन, कुटिल, खल, कामी", इसी में थोड़ा सा क्ट-पेस्ट करके नाम "मो सम कौन?" रख लिया। यदि किसी नियम या परंपरा का उल्लंघन हो गया हो तो अपराध बता दिया जाये क्षमाप्रार्थी बन जायेंगे।
    इस बात से सहमत हूं कि सैकड़ो आने को तैयार हैं, तो साहब लोग नाराज तो नहीं हैं इस बात पर?

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  11. वाह...क्या खुरपेची दिमाग पाया है आपने..जय हो!!

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  12. वाह मजेदार, एक से बढ़कर एक नाम। :)

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  13. विचित्र से नाम आकर्षित तो करते हैं और कई लोग इसी बहाने ब्लॉग की सैर कर आते हैं । हाँ वे नाम ब्लॉग पर प्रस्तुत सामग्री की विषय वस्तु से मिलते हों यह ज़रूरी नहीं । नाम व विषय मे साम्य ढूंढ्ना भी नहीं चाहिये । हमारे पड़ोस में एक कसाई का नाम दयाराम था । वैसे नाम के लिये कई लोग सलाह भी देते हैं । मेरे एक ब्लॉग का नाम जब मुझे नहीं सूझा तो मैने अपना ही नाम " शरद कोकास " रख दिया । इसे भी कुछ लोग विचित्र नाम मानते हैं इसलिये कि "कोकास " याने क्या किसी को पता नहीं ? वैसे एक मित्र ने सलाह दी है इसे " शरद को का आस " पढ़ा जाये । नव वर्ष की शुभकामनायें ।

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