गुरुवार, मई 06, 2010

कसाब, कबाड़ कोबाल्ट और कन्फ़्यूज्ड सूरज

आज मुम्बई हमलों के दोषी कसाब को मौज की सजा सुनाई गयी। न्यूज चैनल इस मामले को पेश करने के लिये अदालत के फ़ैसले का इंतजार कर रहे थे। जब फ़ैसला आया तो जिस तरह एक न्यूज चैनल का संवाददाता भागता हुआ न्यूज लाया और हांफ़ते हुये माइक पर जिस तरह कसाब की मौत की सूचना देने लगा उससे मुझे अनायास फ़िडीफ़िडीज की याद आ गयी। फ़िडीफ़िडीज वह धावक था जो मैराथन से एथेन्स तक युद्द में विजय की खबर ले गया था और हम जीत गये कहने के साथ ही मर गया। न्यूज चैनल के आपसी टीआरपी युद्ध न्यूज प्रसारण के काम को ऐसा हंफ़ना बना देंगे यह आज देखने को मिला। ऐसे ही चलता रहा तो शायद आगे न्यूज चैनल महत्वपूर्ण खबरों के लिये तेज धावकों को शायद अपना रिपोर्टर बनाने की सोचें जो बिजली की गति आपको समाचार सुना सकें -भले ही हांफ़ते हुये।

कसाब को फ़ांसी की सजा सुनाये जाने पर लोगों ने अपने विचार व्यक्त किये हैं। इस मामले पर आशुतोष पाण्डेय का कहना है-किराये के कातिल को फांसी सूत्रधार से दुआ सलाम वहीं बी.एन.शर्मा भोपाल के कहते हैं कसाब को फांसी सुनवा कर कौनसा तीर मार लिया बताइये!

मुस्लिम उलेमाओं और विद्वानों ने अदालत के इस फ़ैसले का स्वागत किया है।

इस मसले पर कुछ लोगों ने अपने विचार व्यक्त करते हुये शंका जाहिर की है कि कहीं कसाब को भी अफ़जल गुरू की तरह फ़ांसी पर लटकाने में देर न की जाये। कसाब मुद्धे से संबंधित कुछ पोस्टे हैं:
  • मत घबराओ क़साब,यह भारत है...

  • कसाब को फांसी: फांसी की सजा तो अफजल गुरु को भी मिली पर अब तक फांसी क्यों नहीं हुई ?

  • क्या कसाब का गला नाप पाएगा जल्लाद

  • कसाब को तुंरत स्पेशल कानून बना कर तुरन्त फांसी दो।

  • क्या फिर कोई कसाब नहीं आएगा!


  • दिल्ली में अभी कबाड़ में कोबाल्ट मिला उसका काफ़ी हल्ला हुआ। रवीश कुमार ने कि दिल्ली विश्वविद्यालय की चूक आपराधिक है:
    दिल्ली विश्वविद्यालय की नैतिक नहीं आपराधिक चूक थी। इतना भारी सामान कबाड़ में बिक ही नहीं सकता था। कोई खिलौना तो नहीं है कि आप कई सामानों के साथ इसे भी कबाड़ी वाले के हवाले कर दें।यहां पर रेडिएशन सेफ्टी आफिसर डॉ अरुणा ने बातचीत में बताया कि यह घटना शर्मनाक है। भारत में पहली बार विकिरण से किसी की मौत हुई है। पूरी दुनिया में इसे पढ़ाया जाएगा कि दिल्ली विश्वविद्यालय ने जिस तरह की बेवकूफी की है वैसी बेवकूफी आप न करें।


    इसी क्रम में देखिये डा.टी.एस.दराल का जानकारी परक लेख कोबाल्ट ६० --इंसान का दोस्त भी , दुश्मन भी

    सुशीला पुरी की कविता के बिम्ब तो देखिये जरा:
    नदी की लहरों पर
    खुशी की धूप उगती है
    जब वह छूती है
    तुम्हारी आवाज
    इस कविता के साथ की फोटो देखियेगा। क्या अंदाज हैं।

    इतना पढ़ने बाद आगे पढ़ने के पहले आप यह लेख पढिये आपकी आंखों के लिये फ़ायदेमन्द है-
    आखें, आप इन्हें पंद्रह मिनट दें ये आपका उम्र भर साथ देंगी

    मेरी पसन्द


    सूरज बादलों में उलझ के
    घर जाने का रास्ता भूल गया है
    कंफ्यूज्ड सा सोच रहा है
    पश्चिम किधर है

    जिस पेड़ से पूछता है
    हड़का देता है, जम्हाई लेते हुए
    सोने का टाइम हो रहा है
    ऊंघ रहे हैं सारे पेड़

    रात छुप के खड़ी है
    क्षितिज की ओट में
    सूरज के कल्टी होते ही
    दादागिरी करने आ जायेगी

    शाम लम्बी खिंच गयी है
    पंछी ओवरटाइम के कारण
    भुनभुनाते लौट रहे हैं
    ट्रैफिक बढ़ गया है आसमान का

    चाँद बहुत देर से
    आउट ऑफ़ फोकस था
    सीन में एंट्री मारा
    फुसफुसा के सिग्नल दिया

    डाइरेक्शन मिलते ही
    सूरज सर पे पैर रख के भागा
    अगली सुबह हाँफते आएगा
    बदमाश पेड़ को बिफोर टाइम जगाना जो है.

    पूजा उपाध्याय

    और अंत में


    फ़िलहाल इतना ही। कल की चर्चा देखियेगा गुरुकुल घराने का कोई सदस्य करेगा।
    तब तक मौज से रहिये! शुभकामनायें।

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    11 टिप्‍पणियां:

    1. कसाब गए ?/! पर यह तो 'जातिवाचक संज्ञा' है ! कहाँ ख़त्म होगी !
      कबाड़ कोबाल्ट नई जानकारी जोड़ रही है !
      कई अच्छे लिंक दिए हैं आपने !
      चित्र भी देख आया , पुरी की कविता वाला , जमाने की तरह 'ब्लैकेन-हुआइट' !
      पूजा की 'हिंग्लिश कविता' की क्या तारीफ़ की जाय , अच्छी तो है ही !

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    2. हाँ अब ठीक है..
      येल्लोऽ, खुदै हाँफ़ते काँखते आधी रतिया में ईहाँ दाखिल हुई रहे हैं, अउर बतावत हैं के रिपोर्टरवा ई किहिस, ऊ किहिस !
      " जी हाँ, बराबर हुआ २६/११ का हिसाब, दोषी आख़िर नहीं बच पाये कानून के शिकँज़े से, कसाब को फ़ाँसी की सज़ा, भारतीय न्यायप्रणाली का उभरा एक मज़बूत चेहरा, देशवासियों ने मनाई इन्तकाम की खुशियाँ, सड़कों पर फूटे पटाखे, पाकिस्तान को मिला स्पष्ट सँदेश, उज्ज्वल निकम के खाते में फ़ाँसी की ३९ वीं सज़ा दिलाने का सेहरा... चर्चा पर सर्वप्रथम यह खबर दे रहे हैं, अनूप शुक्ल.. कैमरामैन विवेक के साथ "
      इन सब हलचल से मैं कतई खुश नहीं हूँ, मेरी उल्टी खुपड़िया में यह घुसा पड़ा है कि, कहीं कोंपल मसल देने से बिरवा कभी सूखा भी है ? जड़ को हिला कर दिखाओ तो जानें !
      अलबत्ता भारत सरकार के हाथ पड़ोसी से लेन देन करने के लिये एक और घोड़ा हाथ लग गया है, करेन्सी नोट ! फ़ाँसी देई कि न देई की सौदेबाज़ी में कुछ समझौतों की अधूरी फ़ाइलों पर दस्तख़तों की अदला बदली होती रहेगी ।
      सत्ता तक पहुँचने की वर्ज़िश में विपक्ष को कसाब नामक पौष्टिक आहार मिल गया, जो कुर्सी पर बैठेगा.. वह पल्ला झाड़ लेगा कि कसाब के नाम से इश्यू हुई फ़ाँसी की रस्सी को पिछली सरकार ने गद्दी छोड़ने से पहले गायब कर दिया, जल्द ही एक कमीशन बैठाया जायेगा जो इस सँभावना पर विचार करेगा कि अमर कुमार नामक विघ्नसँतोषी को ऍलाट हुई रस्सी इस काम में लायी जा सकती है या नहीं ? और हम दूध का पानी और पानी का दूध होना देखते रहेंगे, ब्लॉगर पर कुछ दिनों की चहल पहल का इँतज़ाम हो जायेगा... भईया की बातें ?
      मुला आप तो फ़र्स्ट बाइट वाले सेलेक्टेड लिंक लायो है, बधाई !

      अब एकु बात ई के,
      ईहाँ तो गुरु दर्ज़नन के भाव उपलब्ध हैं, भला कौन गुरुकुल वाले उदय होने को हैं ?
      भिनसारे बिफ़ोर टाइम अईहें कि रात में कल्टी मार दादागिरी करिहें ?

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    3. फ़िडीफ़िडीज भेन्ने के बजाय ईमेल भेददेते तो थोड़ा मॉडर्न दीखते. लेकिन तब आप सिकायत करते कि कमानवेल्थ गेम सर पे खड़े हैं और इत्ते बड़े देस में कोई धावक नहीं है.

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    4. कसाब के मुद्दे पर कुछ बोलने का मन नहीं है. सुशीला जी की कविता और आपकी पसन्द अच्छी लगी. पूजा ने ये कविता पूरे गुलज़ारिस मूड में लिखी है लगता है.

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    5. अनूप जी आभार !!!!!!!!
      मुक्ति ! आपका भी आभार ......
      किन्तु अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी जी की टिप्पणी मै समझ नही पाई ?

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    6. सामयिक लेखों का सही संकलन किया है । आभार।

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