शनिवार, मई 08, 2010

जो बड़ेन को लघु कहें, नहिं रहीम घटि जाहिं

नमस्कार मित्रों!

एक बार फिर, मैं मनोज कुमार चिट्ठा चर्चा के साथ हाज़िर हूँ। इसमें हमने सप्ताह की कुछ पोस्टों को शामिल किया है। हो सकता है कई पोस्ट छूट गए हों, जो अधिक महत्व के हों, या फिर कई पोस्ट अन्य चर्चाकारों द्वारा चर्चा कर लिए गए हों।

मेरे साथ दिक़्क़त यह है कि मैं अपने ब्लॉग के डैशबोर्ड से अन्य ब्लॉग के लिंक पकड़ता हूँ, उन्हें पढता हूँ। चर्चा में लगाता हूं। इसमें दो समस्याएं हैं

१. कुछ ब्लॉगर्स के ब्लॉग पर फॉलोअर वाला निशान/आइकॉन होता ही नहीं, और मैं उनका फॉलोअर बन नहीं पाता। फलतः मुझे पता ही नहीं चलता कि उनके ब्लॉग पर कब क्या पोस्ट हुआ है? इधर-उधर से पता चलता है तो शामिल कर लेता हूँ। कई बार छूट जाता है।

२. कई ब्लॉग पर ताला लगा होता है। अतः समग्री पूरा टाइप करना कई बार दुष्कर ;लगता है .. बस… आलस से उनको चर्चा में शामिल नहीं कर पाता।

बाक़ी कठिनाइयां तो अनूप जी बता ही चुके हैं।

हां फोटो लगाना मैं अनुचित नहीं मानता। इसीलिए लगाया हूँ। आपको आपत्ति हो तो दर्ज़ करें, हटा दूँगा।

पर बिना फॊटो के पोस्ट श्रृंगार विहीन लगता है।

हां, लिंक लगाने की अनुमति तो आपसे नहीं मांगी है। मुझे लगता है, जिसे आपने सर्वजनिक किया है उसकी चर्चा तो हम कर ही सकते हैं। फिर भी मैं कोशिश करता हूँ कि जहां से, जिस पोस्ट से लिंक लिया है उनके टिप्पणी बॉक्स में यह बता दूँ कि मैंने इसे चिट्ठा चर्चा में शामिल किया है। अगर आपत्ति आयेगी तो हटा दूँगा।

आज तक कोई नहीं आई।

तो आइए अब चर्चा शुरु करें!

आलेख

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हिन्दुस्तान का इतिहास किसी न किसी ऐसे जयचंदों के वर्णनों से भरा पडा है जिन्होंने अपनी नैतिकता सिर्फ चंद कागज़ के टुकड़ों के लिए और अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए बेचीं है। आज तक वो ही हालात है! ऐसे में यह यक्ष प्रश्‍न हमारे सामने उठ खड़ा होता हि कि जब रक्षक ही भक्षक हो जाए तो कोई क्या करे? देश का खुफियातंत्र..जिसपे पूरी अवाम की सुरक्षा टिकी है, जब वो ही भ्रष्टहो जाए..तो कोई किस पर भरोसा करे?

नुक्कड़ पर श्री नरेन्द्र व्यास यह प्रश्‍न उठा रहे हैं और सच ही कह रहे हैं कि

जिस देश में नेता ख़ुद जो इस लोकतंत्र रूपे विशाल जहाज़ के तारणहार हैं, भ्रष्ट है तो सिर्फ नौकरशाहों और अफसरशाहों से भी क्या अपेक्षा कर सकते हैं?

बात सही भी है कि क्या हम अपना वर्तमान और भविष्य बे-ईमान और स्वार्थी नेताओं के हाथों में सौंपकर चुप बैठैंगे?

व्यास जी सुझाते हैं

इतिहास गवाह है कि किसी भी क्रांति के बिना कभी परिवर्तन नहीं आया, और परिवर्तन ही विकास की धुरी है..एक दिन ऐसी क्रान्ति आयेगी जरूर क्योंकि "अति सर्वर्त्र वर्जयेत"!!

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एक मई को मज़दूर दिवस पर इस सप्ताह कई पोस्ट आये। एक तो हमने खुद भी डाली थी। पर उदय प्रकाश जी कि पोस्ट मई दिवस इस बार : मोसांटो कपास बीजों की नयी फसल के दौर में कुछ अलग-सा लगी। एस.एम.एस. से मिले संदेशों का ज़िक्र करते हुए कहते हैं

“इन संदेशों में कहीं थकान, हताशा, असफलताओं से उपजी विश्वासहीनता और नये शहरी संपन्न मध्यवर्ग में हर रोज़ गहराती जाती सत्ता और पूंजी के हासिल से मिलने वाली महत्वाकांक्षा के सामने अपनी टूट और विखंडन का दर्द भी दिखता है।”

जे.स्वामीनाथन ने एक बार,कहा था-'मैं समकालीन कला को थोड़ा 'असुंदर बनाना चाहता हूं!' यह 'असुंदरता'... लगता है आज किसी भी कला के लिए इसलिए ज़रूरी है, जिससे वह आज की हमारी सबसे बड़ी सामाजिक असलियत के नज़दीक हो सके। यानी इस समय की मांग बौद्धिक विमर्शों को उनकी उच्च-भ्रू पटरी से उतारने की है। उसे 'डि-इंटेलेक्चुअलाइज़' करने की है।

ऐसा इसलिए भी लग रहा है कि इस बीच पत्र-पत्रिकाओं में इस नव शहरी मध्यवर्ग की एक नयी फसल 'सेल्फ़ टर्मिनेटर' (आत्म-विनाशक) मोसेंटो के कपास-बीजों की ऐसे पौधों की तरह अपनी सारी कार्पोरेट रंगीनियत में लहरा रही है, जो न तो परंपरा और अतीत का वंश-बीज है, न भविष्य के लिए वह स्वयम कोई अंकुरित हो सकने वाले बीज की संभावनाएं रखती है।

उदय जी के मोबाइल पर एक मैसेज आया है :

''अगर दुनिया में मेहनत की कदर होती तो गधा सबसे ज़्यादा इज़्ज़तदार जीव होता !''

शायद यह कोई 'चुटकी' ही है, हल्की-फुलकी ....लेकिन चोट तो ज़रूर करती है।

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ऐसा नहीं कहा जा सकता कि आप फलां तरीक़े से स्वस्थ हैं और वो अमुक तरीक़े से स्वस्थ है। आप या तो स्वस्थ हैं या बीमार। बीमारियां पचास तरह की होती हैं; स्वास्थ्य एक ही प्रकार का होता है। इसी तरह के विचार लेकर स्वास्थ्य संबंधी तरह-तरह की जानकारियां स्वास्थ्य सबके लिये ब्लॉग पर प्रस्तुत की जाती हैं।

कुमार राधा रमण एक खोजी रपट का हवाला देते हुए बता रहे हैं कि बच्चेदानी के कैंसर को रोकने वाले टीकों को भारत जैसे विशाल बाजार में फटाफट बेचकर मालामाल होने की दो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मंसूबे पर पानी फिर गया है। आंध्र प्रदेश और गुजरात में परीक्षण के दौरान छह बच्चियों की मौतों से परीक्षण की अनुमति देने वाली सरकारी संस्था इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च भारत में अब हम अपने तौर पर और स्वतंत्र आकलन के बाद ही परीक्षण की अनुमति देंगे। दावा है कि इन टीकों के लेने के बाद एचपीवी (ह्यूमेन पेपीलोमा वायरस) से होने वाले बच्चादानी कैंसर से बचाव करता है।

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‘आने वाला समय हिंदी का है* - ऋषभदेव शर्मा की यह पुस्तक समीक्षा प्रस्तुत किया गया है डॉ.कविता वाचक्नवी द्वारा हिंदी भारत पर। एक पोज़िटिव सोच वाला यह आलेख मुझे बहुत अच्छा लगा। भारत में हजारों मातृभाषाएँ हजारों साल से बोली जाती हैं। भिन्न भाषा भाषियों के बीच परस्पर संवाद के लिए अलग-अलग स्तरों पर कोई-न-कोई भाषा संपर्क भाषा की जिम्मेदारी निभाती दिखाई देती है। पहले संस्कृत और फिर हिंदी के जनपदसुखबोध्य रूप ने यह भूमिका निभाई। भाषा के रूप में हिंदी सहजतापूर्वक व्यावहारिक स्तर पर प्रचलन में है, स्वीकृत है और नई-नई चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है।

यदि संपर्क की सुविधा को ध्यान में रखकर देवनागरी लिपि को भी स्वीकार कर लिए जाए तो अखिल भारतीय भाषिक संपर्क में अधिक घनिष्ठता आ सकती है। राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित भारतीय जनता व्यापक संपर्क की इन प्रणालियों (संपर्क भाषा और संपर्क लिपि) को सहजतापूर्वक स्वीकार कर सकती है, परंतु समय-असमय विकराल रूप में सामने आकर शुद्ध राजनैतिक स्वार्थ ऐसे तमाम प्रयासों में पलीता लगा देते हैं! भारतीय बहुभाषिकता के संदर्भ में उपस्थित होनेवाले इन सब मुद्दों पर डॉ.राजेंद्र मिश्र ने अपनी कृति ‘संपर्क भाषा और लिपि’(2008) में विस्तार से चर्चा की हैं। डॉ. राजेंद्र मिश्र ने हिंदी के कल, आज और कल से जुड़े प्रश्नों पर अपनी दो टूक राय ‘संपर्क भाषा और लिपि’ में लिपिबद्ध की है। उनका यह चिंतन मनन भारत की भाषा समस्या के रूप में फैल धुंधलके को काटने का सार्थक प्रयास है। हिंदी जगत इस कृति का स्वागत करेगा, ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए।

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जी.के. अवधिया जी ने एक कथा के माध्यम से बहुत ही रोचक तथ्य प्रस्तुत किया है धान के देश में। गधा, कुत्ता, बंदर और आदमी इस कथा के पात्र हैं। मैं पूरी कथा न देकर एक अंश दे रहा हूं, पूरा तो यहा पढिए

मनुष्य ने कहा, "प्रभु! 20 वर्ष तो बहुत कम होते हैं। कृपा करके मेरी आयु में गधे, कुत्ते और बन्दर के द्वारा छोड़े गये 30, 15 और 10 वर्षों को भी जोड़ दीजिये।"
ब्रह्मा जी ने उसकी भी प्रार्थना स्वीकार कर ली!

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अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी मरकस बाबा को उनके जन्म दिन पर याद करते हुए यक्कम-दुइयम्म कर रहे हैं। बताते हैं वे गाँव से कला-स्नातक होकर जे.एन.यू. आए स्नातकोत्तर करने। उनकी जानकारी का दायरा बहुत सीमित था , तब तक कालिदास-तुलसी-सूर-कबीर यहीं तक उनकी दुनिया ख़त्म हो जाती थी। ग़ालिब को भी नहीं जानते थे, मरकस बाबा की बात ही जाने दीजिये।
परीक्षा के क्रम में 'नजीर अकबराबादी' की कविता में हिन्दुस्तानी तहजीब' पर एक संगोष्ठी-पत्र प्रस्तुत करने को सभी को कहा गया था। उन्होंने भी संगोष्ठी-पत्र लिखा। पर उनके 'सर' ने आपत्ति उठाई कि

“इस विषय पर संस्कृत के श्लोक का क्या औचित्य , क्या तुमने कार्ल मार्क्स को नहीं पढ़ा , क्या पढ़कर आये हो ?”

आगे बताते हैं यह पहला परिचय था उनका बाद में मार्क्सवादियों में सिद्धांत और व्यवहार का द्वैत खूब दिखा उन्हें। कुछ प्रश्न सदैव उठता रहा कि ये अनुसरणकर्ता लोग सिद्धांतकार और सिद्धांतों का सिद्ध-अंत करने पर क्यों लग जाते हैं , व्यक्तिगत सीमाओं से ऊपर क्यों नहीं उठ पाते हैं !

वे क्षण जो विपदा के मारे

व विचार की कोख बन गए

वे घटनाएं जिनमें जीवन का दर्शन आकर पा गया

वे जीवन, जो कोटि ऋणों के जीवन-भय से मुक्त हो गए

वे सांसे जिनमें अगाध का मेल हो गया;

क्या ये सब विपत्ति -घन हैं ?

नहीं नहीं वह काल रात्रि पर

कला-दिवस का विजयी क्षण है..सुन्दरतम है..!!!

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हिन्‍दी साहित्‍य की बहुत सी किताबें पीडीएफ फारमेट में पहले से ही उपलब्‍ध हैं। संजीव तिवारी की रूचि जनजातीय सांस्‍कृति परंपराओं में रही है जिससे संबंधित पुस्‍तकें क्षेत्रीय पुस्‍तकालयों में लगभग दुर्लभ हो गई हैं किन्‍तु डिजिटल लाईब्रेरी योजना नें इस आश को कायम रखने का किंचित प्रयास किया है। पिछले कुछ दिनों से पोस्‍ट लेखन से दूर, लोककथाओं के आदि संदर्भों की किताबों के नामों की लिस्‍ट मित्रों से जुगाड कर उन्होंने नेट के महासागर में उन्‍हें खंगालने का प्रयास किया तो जो जानकारी उन्हें उपलब्‍ध हुई वह वे हमारे लिये भी प्रस्‍तुत कर रहे हैं, आनलाइन भारतीय आदिम लोक संसार

डिजिटल लाईब्रेरी परियोजनाओं के संबंध में लोगों, साहित्‍यकारों व लेखकों की सोंच जैसे भी हो, हमारे जैसे नेटप्रयोक्‍ताओं के लिए यह बडे काम की है. शोध छात्रों के लिए तो यह और भी महत्‍वपूर्ण साधन है, इससे शोध विषय सामाग्री के लिए अलग अलग स्‍थानों के विश्‍वविद्यालयीन व अन्‍य पुस्‍तकालयों में चुनिंदा पुस्‍तकों को पढने के लिए जाकर समय व धन खपाने की अब आवश्‍यकता नहीं रही। हांलाकि अधिकांश पुस्‍तकें अपने मूल अंगेजी भाषा में उपलब्‍ध हैं किन्‍तु धीरे धीरे हिन्‍दी में भी ये पुस्‍तकें उपलब्‍ध होंगी इस बात का अब भरोसा हो चला है।

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जब तक ब्लॉग नहीं था अपना, तो मैं सोचता था ये ब्लॉग और ब्लॉगिंग क्या है? अब जब सात महीने से ब्लॉग लिख पढ रहा हूँ तो इतना ज़्यादा कनफ़ुज़िया गया हूँ कि कह नहीं सकता! आज भी वहीं हूँ और वही प्रश्‍न है कि ब्लॉगिंग क्या है? पर आप मते कनफ़ुज़ियाइए। छींटे और बौछारें पर रवि रतलामी जी लेकर आए हैं आपके लिए (हमारे लिए भी) बड़े काम की जानकारी “द रफ़ गाइड टू ब्लॉगिंग”

image रवि जी का मानना है

चाहे आप नए नवेले हों या पुराने जमे हुए ब्लॉगर – यह किताब आपके लिए आवश्यक है। क्योंकि छः सालों से ब्लॉगिंग में जमे होने और प्रोब्लॉगर और ब्लॉगर बस्टर जैसे ब्लॉगिंग टि्प्स प्रदान करने वाले ब्लॉगों के नियमित सब्सक्राइबर होने के बावजूद मैं मानता हूँ कि किताब से दो चार नई जानकारियाँ मुझे भी मिलीं. कई मामलों में यह सदैव के लिए संदर्भ ग्रंथ के रूप में भी उपयोगी है।

जोनाथन यंग की लिखी इस पुस्तक में रंगीन चित्रों समेत ब्लॉगिंग के फंडे बताए गए हैं। ब्लॉगिंग के हर क्षेत्र को समेटा गया है। ब्लॉग के इतिहास से लेकर आधुनिक माइक्रोब्लॉगिंग तक की चीजों को शामिल किया गया है।

लेखन के टिप्स और ट्रैफ़िक बढ़ाने के श्योरशॉट तरीके भी दिए गए हैं। ब्लॉग को मॉनीटाइज करने - यानी ब्लॉग से कमाई करने तथा ब्लॉग को पूर्णकालिक आजीविका के रूप में अपनाने के लिए कुछ बेहतरीन टिप्स भी इसमें शामिल हैं।

है न बड़े काम की चीज़!!!

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जी.के. अवधिया जी के इतिहास कहने की कला का मैं कायल हूँ। आप भी हो जाएंगे, इस पोस्ट को पढ़ें। महाकवि भास का प्रसिद्ध नाटक स्वप्नवासवदत्ता
राजा उदयन वत्स राज्य राज्य के अधिपति थे। कौशाम्बी उनकी राजधानी थी। उनके पास घोषवती नामक एक दिव्य वीणा थी। उनका वीणा-वादन अपूर्व था। एक बार प्रद्योत के अमात्य शालंकायन ने छल करके उदयन को कैद कर लिया। उदयन के वीणा-वादन की ख्याति सुनकर प्रद्योत ने उन्हे अपनी पुत्री वासवदत्ता के लिये वीणा-शिक्षक नियुक्त कर दिया। इस दौरान उदयन और वासवदत्ता एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो गये।

एक बार उदयन समुद्रगृह में विश्राम कर रहे होते हैं। वे स्वप्न में ‘हा वासवदत्ता’, ‘हा वासवदत्ता’ पुकारते रहते हैं उसी समय अवन्तिका (वासवदत्ता) वहाँ पहुँच जाती हैं। वे उनके लटकते हुये हाथ को बिस्तर पर रख कर निकल जाती हैं साथ ही उदयन की नींद खुल जाती है किन्तु वे निश्चय नहीं कर पाते कि उन्होंने वास्तव में वासवदत्ता को देखा है अथवा स्वप्न में। इसी घटना के के कारण नाटक का नाम ‘स्वप्नवासवदत्ता’ रखा गया।

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संतोष कुमार सिंह का कहना है कि उन्होंने आंखों में बडे बडे सपने सहेजकर पत्रकारिता की राह थामी थी। देश की एक प्रसिद्ध हत्या, जिस पर अनेकों पोस्ट और विस्तृत चर्चा लिखी जा चुकी है, पर उनका कहना है कि

देशी मछली देशी मुर्गा और विदेशी वियर के सहारे निरुपमा मामले में आँनर किलिंग प्रमाणित करने को लेकर कोडरमा के सेन्ट्रल एसक्वायर होटल में ठहरे मीडियाकर्मीयो के लिए बुरी खबर हैं

संतोष जी बताते हैं प्रियभांशु और मीडिया के टारगेट नम्बर एक निरुपमा के मामा और चाचा के विरुध कोडरमा पुलिस को कोई साक्ष्य नही मिला हैं। जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया हैं कि निरुपमा के पिता और भाई दोनो अपने आफिस में घटना के दिन मौंजूद थे। अब सवाल यह उठता हैं कि निरुपमा के घर में सारे रिश्तेदार को जोड़े तो पाच पुरुष उसके परिवार में हैं जो सभी के सभी घटना के दिन कोडरमा में नही हैं।तो फिर किसने निरुपमा की हत्या की, क्या 55वर्ष की बिमार मां अकेले निरुपमा की हत्या कर दी।इस सवाल के सामने आने के बाद कोडरमा पुलिस की नींद हराम हैं कि अगर निरुपमा की हत्या हुई तो इसको अंजाम किसने दिया। इस मामले का जो सबसे मजबूत पहलु हैं वह हैं डाक्टरो का विरोधाभासी बयान। जब डांक्टर यहा तक कह रहे हैं कि मुझे पोस्टमार्टम करने के बारे में जानकारी नही थी और पहली बार पोस्टमार्टम कर रहा था और मामला हाई प्रोफाईल होने के कारण जल्दी से जल्दी पोस्टमार्टम रिपोर्ट देने के हरबरी में कई साक्ष्यो छुट कहे।
इस पूरे प्रकरण का सबसे दुखद पहलु यह हैं कि कोडरमा में जुटे मीडिया के कर्णधार यह सब जानने के बाद भी खामोस हैं क्यो कि इन तथ्यो को दिखाने के बाद उनकी आँनर किलिंग की थियूरी फलोप कर जायेगी।

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आप कैसे अपेक्षा कर लेते हैं कि अधिकारियों के कान पर जूं रेंगेगी। मेरे भी कान पर कमबख्त जूं नहीं रेंगी तो नहीं रेंगी। जब खूब घने बाल थे तब भी और अब जब चांद की ओर बढऩे की तैयारी है तब भी। जब खोपड़ी में जूं नहीं है तो कान पर रेंगने का सवाल ही नहीं उठता। लेकिन पब्लिक है कि बिना चेक किए कि किसी अधिकारी के सिर में जूं है या नही, अपेक्षा करने लगती हैं कि image बात-बात पर उनके कान पर जूं रेंगे।
ये अंश है राजीव ओझा जी के पोस्ट कान पर जूं का। बहुत सरस और रोचक शैली में लिखे इस पोस्ट को पढ़्कर एक ताज़गी मिलती है।
इस रचना का सहज हास्य मन को गुदगुदा देता है। आपके पास हास्य चित्रण की कला है। बधाई स्वीकारें।

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शिवम् मिश्रा बुरा भला पर, जब हम होंगे साठ साल के तो हमें क्या प्लानिंग करनी चाहिए, इसकी सलाह दे रहे हैं। कहते हैं हर जवानी को एक दिन बुढ़ापे में कदम रखना ही पड़ता है। बुढ़ापा कोई बीमारी नहीं है, जो गिने-चुने लोगों को ही होती है। इसके बावजूद हममें से कुछ लोग ही जिंदगी के इस पड़ाव के लिए पहले से तैयार होते हैं। ऐसा नहीं है कि केवल प्राइवेट कंपनियों में काम करने वालों को ही रिटायरमेंट की प्लानिंग करने की जरूरत है, बल्कि सरकारी कर्मचारियों को भी रिटायरमेंट के बाद गुजर-बसर के लिए पहले से पर्याप्त इंतजाम कर लेने चाहिए क्योंकि नौकरी के बाद सरकार आपकी बाकी जिंदगी का बोझ अपने कंधों पर नहीं ढोने वाली। भले ही आप अभी जवानी का लुत्फ उठा रहे हों और रिटायरमेंट में 30 साल से भी ज्यादा का वक्त हो, लेकिन इस बारे में सोचने के लिए यही सही समय है।

वैसे तो रिटायरमेंट का मतलब आप बहुत अच्छी तरह समझते हैं। इस पोस्ट को अच्छी तरह पढ़ें, हो सके तो बुक मार्क कर लें। बड़े काम का पोस्ट है यह। आख़िर सेवानिवृत्ति के बाद आपको जिंदगी के करीब बीस साल और काटने होते हैं।

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कुछ चिपचिपा सा ही कहने वाले मौसम में रद्दी की ठेलिया पर मौजूद कुछ फ़टी-पुरानी डायरियां ये दिल मांगे मोर वाले महौल में क्या गुल खिला रही हैं फुरसतिया जी की कलम से देखिए यहां। कहते तो हैं कि

घर में पचीस बार बताया जा चुका है कि हम कुछ करते नहीं!

और क्रोधित होने की कोशिश करते हैं पर उन्हें गुस्सा आ नहीं रहा। अगर कुछ करते धरते होते तो फुरसतिया कहलाते क्या? हड़बड़िया गड़बड़िया टाइप के नहीं होते।

चलिए गुस्सा न होते हुए भी गुस्साके घर से निकल लिए हैं शायद गौतम की तरह बुद्धि प्राप्त हो जाए और रद्दी के ठेले वाले के पीपल वृक्ष के नीचे धूनी रमा दी है। उन्हें लगता है कि दुनिया की सबसे बेहतरीन पठन सामग्री रद्दी की दुकान पर ही मिलती है।

उन्हें हाथ लगी ब्लॉगर की डायरी। अब देखिए क्या-क्या रज़ खुला है। मैं तो कट लेता हूँ।

(फुरसतिया जी धीरेसे एक बात बताऊँ … आपके द्वारा प्रस्तुत विवरण पढ़कर मालूम हुआ कि उनमें से एक डायरी मेरी थी जिसे मैं कई दिनों से खोजने का अनवरत प्रयास कर रहा था। लगता है श्रीमती जी की कृपा दृष्टि उस पर पड़ गई थी और संसार की सबसे बेहतरीन पठन सामग्री की दुकान पर पहुंच गई। अब आप ही बताइए आपके क्या विचार हैं … वापस करेंगे या…! आखिर आप भी तो ब्लागर हैं न!)

ज्ञानदत्त जी कहते हैं हम चाहें या न चाहें, सीमाओं के साथ जीना होता है। लेकिन समस्या ये है की जो 'जागरूक' है वो यह जानते है कि गलत है। वो मौको पर चुप रहते है। 'एक्शन' का काम किसी और पर छोड़ कर आत्मसंतुष्टि पा लेते है।

ज्ञान जी गंगा किनारे घूमने जाते हैं। देखते हैं कि कोई घाट पर सीधे अतिक्रमण कर रहा है। एक व्यक्ति अपने घर से पाइप बिछा घर का मैला पानी घाट की सीढ़ियों पर फैलाने का इन्तजाम करा रहा है। घाट की सीढियों के एक हिस्से को वह व्यक्तिगत कोर्टयार्ड के रूप में हड़पने का निर्माण भी कर रहा है! वे अन्दर ही अन्दर उबलते हैं। पर उनकी पत्नीजी तो वहां मन्दिर पर आश्रित रहने वालों को खरी-खोटी सुनाती हैं। वे लोग चुपचाप सुनते हैं। निश्चय ही वे मन्दिर और घाट को अपने स्वार्थ लिये दोहन करने वाले लोग हैं। उन्हें लगता है कि सामाजिक एक्टिविज्म आसान काम नहीं है। सुधार की ज्यादा उम्मीद नहीं है। फिर भी कहते हैं

अगर सारा तन्त्र भ्रष्ट मान लूं तो कुछ हो ही न पायेगा! अब भी मुझे आशा है। देखते हैं क्या होता है। हममें ही कृष्ण हैं, हममें ही अर्जुन और हममें ही हैं बर्बरीक!

प्रयास कभी बंद नहीं करना चाहिए, बहुत मुस्किल होता है सिस्टम से लड़ना पर जितना हो सकता है उतना सुधार करते रहना चाहिए।

कविताएं

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डा. एम.एस. परिहार ने दो सामयिक गीत पोस्ट की हैं विचार-बिगुल पर। डा. परिहार का मानना है --

वर्तमान समय मूल्यों के पतन का है। ऐसे समय में रचनाकारों का दायित्व बन जाता है कि वे अपने युगधर्म का निर्वाह करें। युग बदलेगा आज युवा ही भारत देश महान का।

एक और संग्राम
सपनों की लाशें आवारा

बेबस का है नहीं गुजारा।
माली ने गुलशन मसला है
गांधी का भारत कुचला है।।
हैमसजिद मेंमौन रहीमा और मंदिर में राम।
अभी देश को लड़ना होगा एक और संग्राम।।

वन्दे मातरम् के जनगण हम
इस माटी के कण-कण में हम।
अमर जवान न सो पायेगा
देश धर्म पर मिट जायेगा।।
तम सूरजको नहींखा सके और सिंदूरी शाम।
अभी देश को लड़ना होगा एक और संग्राम।।

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कफन बांध लो

सदियोंसे सोयी जनताको

आज जगाने आया हूं।

मैं शांतिका नहीं क्रान्तिका बिगुल बजाने आया हूं।

सब हाथों को काम मिले
और धरती की प्यास बुझे।
घर-घर में उजियारा करदे
बस तेरी है आस मुझे।।


आज मिटादे तू शोषक को
लेकर नाम भवानी का।
परिवर्तन का बिगुल बजादे
ये ही काम जवानी का।।


कफन बांध लो अपने सिर पै,

मैं भगत बनाने आया हूं।

-***-

उदय प्रकाश जी बता रहे हैं कि उनके द्वारा यह कविता इसी तरह लिखी जा रही है, अलग-अलग समय और मूड्स में। यह किसी सूची में शामिल होने के लिए नहीं, अपने समय की चिंता का हिस्सा बनने के लिए लिखी जा रही है। जीवन की अनिश्चितताओं और बिखरावों के बीच। असमाप्त कविता का एक और नया शुरुआती ड्राफ़्ट!

यह वह पल था जब संसार की सभी अनगिन शताब्दियों के मुहानों पर
किसी पहाड़ की तलहटी पर बैठे सारे प्राचीन गड़रिये
पृथ्वी और भेड़ों के लिए विलुप्त भाषाओं में प्रार्थनाएं कर रहे थे
और अरुंधति किसी कठफोड़वा की मदद से उन्हें यहां-वहां बिखरे
पत्थरों पर अज्ञात कूट लिपि में लिख रही थी

लोकतंत्र के बाहर छूट गए उस जंगल में
यहां-वहां बिखरे तमाम पत्थर बुद्ध के असंख्य सिर बना रहे थे
जिनमें से कुछ में कभी-कभी आश्चर्य और उम्मीद बनाती हुई
अपने आप दाढ़ियां और मुस्कानें आ जाती थीं।

-***-

नवगीत की पाठशाला पर संगीता स्वरूप जी की प्रस्तुति क्या है बस शब्दों का कमाल है! जब आतंक का साया

हो तो कैसे मन मुस्काए?

घर के बाहर
चलना दूभर,
साँस सभी की
नीचे-ऊपर,
काँप रहा उसका दिल थर-थर,
मन बेहद घबराए।
ऐसे आतंकी साये में
कैसे मन मुस्काए?

हुआ धमाका
बम का जब-जब,
बढ़ी वेदना
मन में तब-तब,
लहूलुहान हुए लोगों का
खून छितरता जाए।
इन दृश्यों को देख भला फिर
कैसे मन मुस्काए ?

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मज़दूर दिवस मज़बूर ---- संवेदना को जगाने वाली पोस्ट कर आए हैं समीर भाई। चाँद कवि को महबूबा और गरीब को रोटी सा लगता है ..

चाँद
को
देखकर

कवि
को
याद आती है
अपनी महबूबा

और

मजदूर
को
रोटी!!!

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तुम्हारे जाने के बाद .. कैसी है ज़िन्दगी .. अपूर्व की, इस कविता में शब्द-सौंदर्य इतना ज़बरदस्त है कि अधूरेपन के भाव को भी पाठक मंत्रमुग्ध हो पढ़ता है।

कमरे मे
पैरों मे पहाड़ बाँध कर बैठी है
गुजरे मौसम की भारी हवा
खोल देता हूँ हँसी की खोखली खिड़्कियाँ, दरवाजे
नये मौसमों के अनमने रोशनदान
मगर धक्का मारने पर भी
टस-मस नही होती उदास गंध
और दरवाजे का आवारा कोना
जो तुम्हारे बहके आँचल के गले से
किसी जिगरी दोस्त जैसा लिपट जाता था
अब चिड़चिड़ा सा हो गया है.
जबर्दस्ती करने पर भी नही खुलता है
चाय-पत्ती का गुस्सैल मर्तबान
तुम्हारे कोमल स्पर्श ने
कितना जिद्दी बना दिया है उसे

profile

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आर्कजेश जी कह रहे हैं यह कोई कविता नहीं है। सच! यह तो हक़ीक़त है। बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है ये रचना।

आज भी,
खबरें बनती हैं
कुछ 'निरुपमा', 'आरुषी', 'सायमा'
और पता नहीं कितनी गुमनाम
जो नहीं बन पातीं 'खबर'

आज भी ,
नैतिकता को लालच तय करता है
कभी धर्म का तो कभी पैसे का
इस दुनिया में,
आज भी , अपने ही
धर्म , जाति , सम्‍प्रदाय की
खामियों का मुखर विरोध करने वाले
बहुत कम हैं

'आने वाली नवेली पीढियों ! '

हम आत्‍मघाती खतरनाक लोग हैं
हमसे बचो ।

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रश्मि प्रभा जी के दर्द का सत्य एक अद्वितीय रचना है। लगन और योग्यता एक साथ मिलें तो निश्चय ही एक अद्वितीय रचना का जन्म होता है।

अगर तुम दर्द के रास्तों को नहीं पहचानते

तो ज़िन्दगी तुमसे मिलेगी ही नहीं

दर्द के हाईवे से ही

ज़िन्दगी तक पहुंचा जाता है ..

रास्ते में सत्य का टोल नहीं दिया

तो आगे बढ़ना मुमकिन नहीं

जिन क़दमों को

तुम आगे बढ़ जाना समझते हो

वह तो फिसलन है

कोई सुकून नहीं वहाँ !

सत्य ही ज़िन्दगी देता है

दर्द ही रिश्ते देता है ...

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काव्य का आदि कारण वेदना! आदिम इच्छा के एक फल .... सांसारिक लालसा का प्रतीक है। इसके फलस्वरूप म्स्नुष्य मिथ्या मोहपास मे आबद्ध है। फल है विपरीत, वारि में नैय्या में नदिया न डूबे तो क्या हो.... ? मनोज ब्लॉग पर प्रस्तुत आचार्य परशुराम रय द्वारा रचित नदिया डूबी जाए पढ़कर बरबस कबीर याद आ गए !!!

किस अचेतन की तली से

चेतनाने बाँग दी कि काल का घेरा कहीं से

टूटने को आ गया है।

सोच तो लेते कि मुक्त शीतल मन्द पवन

जब भी करवट बदलेगा

महाप्रलय की बेला में

हिमालय की गोद भी

शरण देने से तुम्हें कतराएगी।

नियति को देती चुनौती

विद्रोह करती वेदना,

आदिम इच्छा के

मात्र एक फल चख लेने की

काट रही सजा,

सृजन के कारागार से

अब बाहर निकल कर आ गई है।

मेरे तो सौभाग्य और दुर्भाग्य की
सारी रेखाएं कट गई,
संस्कारों का विकट वन
जलाने से निकले श्रम सीकर
अभी तक सूखे नहीं।
बन्धन मेरी सीमा नहीं,
मात्र बस ठहराव था।
साथ बैठकर रोया कभी
तो मोहवश नहीं करुणा की धारवश। जीवन की धार देख नाव नदी में नहीं नदी नाव में डूबने को है!
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-***-

संगीता स्वरूप जी एक चेतावनी दे रही हैं

पुरुष ! तुम सावधान रहना ,
बस है चेतावनी कि
तुम अब ! सावधान रहना .

पूजनीय कह नारी को
महिमा- मंडित करते हो
उसके मान का हनन कर
प्रतिमा खंडित करते हो .
वन्दनीय कह कर उसके
सारे अधिकारों को छीन लिया
प्रेममयी ,वात्सल्यमयी कह
तुमने उसको दीन किया .
नारी गर सीता - पार्वती बन
सहनशीलता धरती है
तो उसके अन्दर शक्ति रूप में
काली औ दुर्गा भी बसती है.
हुंकार उठी नारी तो ये
भूमंडल भी डोलेगा
नारी में है शक्ति - क्षमा
पुरुषार्थ भी ये बोलेगा.

इक्कीसवीं सदी में भी सामंती रूढ़ियों वाले पुरु-प्रधान समाज में नारी के लिए आत्माभिव्यक्ति में कितनी कठिनाई हो सकती है, यह सहज अनुमेय है। फिर भी आपने कविता के माध्यम से जो आवाज उठाई है वह प्रशंसनीय है।

आपकी इस कविता में निराधार स्वप्नशीलता और हवाई उत्साह न होकर सामाजिक बेचैनियां और सामाजिक वर्चस्वों के प्रति गुस्सा, क्षोभ और असहमति का इज़हार बड़ी सशक्तता के साथ प्रकट होता है।

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पी.सी. गोदियाल जी हमसे, आपसे, सबसे पूछ रहे हैं कोई तो बताए मिलती कहां होगी?
जब हम्माम मे सब नंगे हों तो भला ये कहां मिलेगी?!

कुछ शर्म खरीदनी है,
अपने लिए भी और
अपने देशवासियों के लिए भी !


मुझे लगता है कि शरीर में
विटामिन की तरह इसकी भी
नित कमी होती जा रही,
लाख जुतियाने पे भी
ये कम्वख्त शर्म नहीं आ रही !

-***-

म्रत्युदंड ..... दे रही हैं रोली पाठक आवाज़ पर

  • मौत का भय...

  • होता है कितना भयावह,

  • अपने अंतर्म न को कचोटता, ह्रदयगति को सहेजता,

  • कांपते पैरो पर खड़ा लडखडाता चुचुआती पसीने की बूंदों को पोंछता

  • होंठो की थरथराहट अँगुलियों की कंपकंपाहट को काबू करने का असफल प्रयत्न करता

  • ग़ज़लें

    -***-

    समकालीन उर्दू शायरी में शहरयार एक बड़ा नाम हैं। हिंदी पाठकों में भी उनकी मुकम्मल पहचान है। वे अपनी शायरी में सामाजिक विसंगतियों को तो उभारते ही हैं, एक नये समाज का ख्वाब भी देखते हैं। सातवें दशक में उनकी गजलों ने उर्दू शायरी में नयेपन का अहसास कराया था। उनकी गजलें लोगों की जुबान पर आ गयीं थीं। उनका एक शेर तो आपको याद होगा ही-
    सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यूं है
    इस शह्र में हर शख्स परीशान सा क्यूं है

    उनके जितने संग्रह उर्दू में आये हैं, उससे ज्यादा हिंदी में आ चुके हैं। वे उम्मीद और हौसले के शायर हैं। नये शायरों के लिए तो वे आदर्श की तरह हैं। डा.सुभाष राय उनकी कुछ गजलें प्रस्तुत कर रहे हैं। एक ग़ज़ल के कुछ शे’र देखिए और पूरा पढिए बात-बेबात पर

    किस्सा मिरे जुनूं का बहुत याद आयेगा
    जब-जब कोई चिराग हवा में जलायेगा

    रातों को जागते हैं इसी वास्ते कि ख़्वाब
    देखेगा बंद आंख तो फिर लौट जायेगा

    कागज की कश्तियां भी बड़ी काम आयेंगी
    जिस दिन हमारे शह्र में सैलाब आयेगा

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    गिरीश पंकज

    -***-

    जितना सुख हिस्से में आया.. काफी है

    मन को तूने ये समझाया.. काफी है

    अपनों से ज्यादा उम्मीदें मत रखना

    जिसने जितना साथ निभाया काफी है

    दौलत तेरे हाथ कभी ना आ पाई

    लायक बेटा एक कमाया.. काफी है

    सुबह खुली है आँख शाम मुंद जायेगी

    जिसने भी इस सच को पाया..काफी है

    अमन के हम पहरुए है, हमारा काम चलना है,

    तिमिर को गर भगाना है, हमें हर रात जलना है..

    ये जीवन है बड़ा सुन्दर करें दुखियों की सेवा हम,

    न पालें द्वेष आपस में, करें न प्यार अपना कम.

    ये साँसें चल रही कब तक अरे इसमे भी छलना है.

    ये हिंसा क्यों हमें इतना लुभाने लग गयी भाई

    कभी हिंसा से ही बदलाव की आंधी कहाँ आई.

    जो खूनी मन है लोगों का उसे पहले बदलना है.

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    -***-

    बहुत ही सरल शब्द और असरदार शे’र वाली श्यामल सुमन की ग़ज़ल किरदार पढिए यहां। और दाहिनी तरफ़ है मनोरमा पर प्रस्तुत उनकी ग़ज़ल। आजकल टिप्पणी काफ़ी चर्चा में थीं तो मुझे ये ग़ज़ल दिखी सोचा उसे भी आज की चर्चा में लगा दूं।

    बाँटी हो जिसने तीरगी उसकी है बन्दगी।
    हर रोज नयी बात सिखाती है जिन्दगी।।
    क्या फर्क रहनुमा और कातिल में है यारो।
    हो सामने दोनों तो लजाती है जिन्दगी।।
    लो छिन गए खिलौने बचपन भी लुट गया।
    है बोझ किताबों का दबाती है जिन्दगी।।

    देखो सुमन की खुदकुशी टूटा जो डाल से।
    रंगीनियाँ कागज की सजाती है जिन्दगी।।

    -***-

    टिप्पणी करना सीख

    टिप्पणीपाने केलिए टिप्पणीकरना सीख।
    बिनमाँगे कुछन मिले मिलेमाँगकर भीख।
    पोस्ट जहाँ रचना हुई किया शुरू यह खेल।
    जहाँतहाँ हरपोस्ट परकुछतो टिप्पणीठेल।

    कहता रचनाकार क्या, क्याइसके आयाम

    नाईस"उम्दा"कुछ लिखेंचलजाताहै काम
    आरकुट और मेल से माँगें सबकी राय।
    कुछटिप्पणी मिलजायेंगे करते रहें उपाय
    टिप्पणी ऐसी कुछ मिले मन का टूटे धीर।
    रोते रचनाकार वो होते जो गम्भीर।।
    संख्या टिप्पणी की बढ़े, बढ़ जायेगा मान।
    भलेकथ्यविपरीतहों इसपरकिसकाध्यान
    गलती भी दिख जाय तो देना नहीं सलाह।
    उलझेंगे कुछ इस तरह रोके सृजन प्रवाह।
    सृजन-कर्म है साधना भाव हृदय के खास।
    व्यथित सुमन यह देखकर जब होता उपहास।।

    -***-

    नीरज के गीत

    हिंदी की बिंदी पर प्रस्तुत यह ग़ज़ल मुझे बहुत अच्छी लगी आपको भी पसंद आएगी।

    अब तो मजहब कोई, ऐसा भी चलाया जाए
    जिसमें इनसान को, इनसान बनाया जाए

    आग बहती है यहाँ, गंगा में, झेलम में भी
    कोई बतलाए, कहाँ जाकर नहाया जाए

    मेरा मकसद है के महफिल रहे रोशन यूँही
    खून चाहे मेरा, दीपों में जलाया जाए

    मेरे दुख-दर्द का, तुझपर हो असर कुछ ऐसा
    मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी ना खाया जाए

    जिस्म दो होके भी, दिल एक हो अपने ऐसे
    मेरा आँसू, तेरी पलकों से उठाया जाए

    गीत गुमसुम है, ग़ज़ल चुप है, रूबाई है दुखी
    ऐसे माहौल में,‘नीरज’ को बुलाया जाए

    -***-

    यह पहेली आप हल करेंगे। आप को सिर्फ यह बताना है कि शायर का और उसके संग्रह का नाम क्या है. आइये ग़ज़ल पढ़िए---

    हमेंभी खुबसूरत ख्वाब आँखों में सजाने दो
    हमें भी गुनगुनाने दो, हमें भी मुस्कराने दो
    हमें भी टांगने दो चित्र बैठक में उजालों के
    हमें भी एक पौधा धूप का घर में लगाने दो
    हवाओं को पहुँचने दो हमारी खिडकियों तक
    हमारी खिडकियों के कांच टूटें, टूट जाने दो
    हवा इतना करेगी बसकि कुछ दीपक बुझादेगी
    मुडेरों पर सजा दो और दियोंको झिलमिलानेदो
    समझने दो उसे माचिस का रिश्ता मोमबत्ती से
    जलाता है जलाने दो, बुझाता है बुझाने दो
    हमेंकोशिशतो करनेदोसमंदरपार जाने की
    हमारी नाव जल में डूबती है डूब जाने दो

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    मेरी पसंद

    -***-

    अनामिका की सदाये......है इस बार मेरी पसंद। पहले तो एक ख़ूबसूरत चित्र ने आकर्षित किया, फिर शीर्षक ने (कुटज तरु सा मेरा मन)। कुटज तरु, एक नए शब्द से परिचित हुआ(शायद केक्टस को कहते होंगे)। एक सार्थक सोच है इस कविता में कि विपरीत परिथितियों में भी मुस्कराता रहे ये मन । परिस्तिथि से टकराता ,गिरता,सूखा नीरस मन फिर भी मुस्कराने को तैयार! मन की पावनता . सरसता और अदम्य जीवनी शक्ति की प्रतीति है ।

    मरू भूमि सी ऊष्ण
    कठोर जिन्दगी की
    विषम परिस्थितियों से
    टकराता, गिरता पड़ता
    चोटिल होता मेरा मन.

    शिव की जटा-जूट सा
    सूखा, नीरस
    शिवालिक बना
    ये मेरा मन.

    कुटज तरु की भांति
    फिर भी सदैव
    मुस्कराने को तैयार
    ये मेरा मन.

    अलमस्त, अटखेलियाँ करता
    अंतस में फैले अवसाद पर
    कफ़न चढ़ाता ..
    आगे बढ़ता..
    मंद समीर सा बहता
    भ्रमर गुंजन में
    खुद को खोता
    ये मेरा मन.

    कृत्रिम आवरणों के
    रेशे करता
    कुछ कह जाता
    नए रूप में
    सजता- संवरता
    अंततः ह्रदय विषाद को
    मुक्ति देता
    और तब एक
    कविता में ढल जाता
    ये मेरा मन.

    चलते चलते

    बड़प्पन की पहचान


    जो बड़ेन को लघु कहें, नहिं रहीम घटि जाहिं

    गिरिधर मुरलीधर कहं, कछु दुख मानत नाहिं

    रहीम बड़प्पन की पहचान इसको मानते हैं कि वह कितना सह सकता है। उसको कोई छोटा भी कहे तो वह कभी घटता नहीं है, गिरिधर को कोई मुरलीधर भी कहे तो वे उससे नाराज नहीं होते।

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    25 टिप्‍पणियां:

    1. आपकी कोशिश श्रम साध्य और सराहनीय है मनोज जी। इतने सारे महत्वपूर्ण चिट्ठों को एकत्रित कर एक साथ पढ़ने का अवसर आपने प्रदान किया। आभार।

      सादर
      श्यामल सुमन
      09955373288
      www.manoramsuman.blogspot.com

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    2. मनोज कुमार जी!
      जिन ब्लॉगर के यहाँ फॉलोवर का ऑप्सन नहीं होता है आप उनका यूआरएल अपने डैशबोर्ड पर जाकर भी फॉलो कर सकते हैं!

      चर्चा विस्तृत होने के साथ-साथ रोचक भी है!

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    3. Badi mehnat ka kaam hai manoj ji..aur aap ki nishtha gajab hai.. Kai jane pahchane chitthon ki charcha ki hai aapne..aur kuch chitthe naye hain mere liye..bahut bahut shuqriya aapka

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    4. आज की चर्चा अच्छी लगी.

      उत्तर देंहटाएं
    5. मनोज जी, चिटठा-चर्चा में मेरी कविता को स्थान देने हेतु धन्यवाद...
      इस ब्लॉग से जुड़ कर अनगिनत बेहतरीन रचनाओं को पढने का मौका मिला..

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    6. "कुछ ब्लॉगर्स के ब्लॉग पर फॉलोअर वाला निशान/आइकॉन होता ही नहीं, और मैं उनका फॉलोअर बन नहीं पाता। फलतः मुझे पता ही नहीं चलता कि उनके ब्लॉग पर कब क्या पोस्ट हुआ है? इधर-उधर से पता चलता है तो शामिल कर लेता हूँ। कई बार छूट जाता है।"
      अरे इस की जगह आर एस एस फीड लेकर क्यों नहीं पढ़ते। बहुत से लोग सारी सामग्री की फीड देते हैं। उसके बाद उनके चिट्ठे पर जान की जरूरत ही नहीं।

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    7. रवि रतलामी जी का लिंक देने के लिए आपका आभार !

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    8. हमेशा की तरह विस्तृत चर्चा..और सारगर्भित भी...बहुत से अच्छे लेखों के लिंक मिले...मेरी रचना को स्थान देने के लिए आभार

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    9. आपकी चयन-निष्ठा को धन्यवाद देता हूँ !
      अच्छे लिंक तक जाना हुआ !
      आभार !

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    10. kutaj taru ko janne ke lie acharya hajari prasad dwivedi ko parhiye.....
      bahrahaal, sundar sankalan.

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    11. हमेशा की तरह विस्तृत चर्चा !!


      मेरे ब्लॉग को चिटठा-चर्चा में स्थान देने के लिए आपका बहुत बहुत आभार !! आशा है यह सहयोग बना रहेगा !!

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    12. क्या जबरदस्त मेहनत। क्या उत्कृष्ट चर्चा।
      बहुत समय लगा होगा इस सब में!

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    13. अभी तलक डागदर साब नाही आये का? डागदर साब को रामराम कर लेत हैं...डागदर साब रामराम पहुंचे..हमार बिटवा का इलाज करो डागदर साब तनि. भगवान आपका बहुते भला करिहै.

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    14. बेहद उम्दा संकलन...विस्तृ्त भी!
      आभार्!

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    15. सच में, आज की चर्चा में आपकी मेहनत दिख रही है. इतने ढेर सारी पोस्टों को एक जगह एकत्र करना निश्चित ही एक श्रमसाध्य कार्य है. धन्यवाद अच्छे लिंक देने के लिये.

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    16. बहुत लगन और मेहनत से की गई चर्चा।
      हमारी रचना नदिया डूबी जाए को शामिल करने के लिए आभार!

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    17. आपकी कोशिश श्रम साध्य और सराहनीय है। इतने सारे महत्वपूर्ण चिट्ठों को एक साथ पढ़ने का अवसर आपने प्रदान किया।

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    18. मनोज जी माफ़ कीजियेगा...आज यहाँ टिप्पणी देने में काफी लेट हो गयी. सच्च में आज आपकी मेहनत काबिले तारीफ है. बहुत सुंदर लेखो से सुसज्जित किया है. पुरे सप्ताह का निचोड़ है ये चिटठा चर्चा. और दिल से आभारी हूँ कि मेरी रचना को आपने 'मेरी पसंद' में चयनित किया.धन्यवाद

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    19. शुक्रिया । इस बार तो आपने बाकायदा सूचित भी किया हुआ था टिप्‍पणी में :-)

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    20. इतनी विस्तृत चर्चा प्रस्तुत करने के श्रमसाध्य कार्य के लिये आपको बधाई..कई भूले हुए लिंक मिले..विशेषकर शहरयार सा’ब की ग़ज़लें तो हम पहले देख ही नही पाये थे..आभार!

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    21. एक सार्थक चर्चा । सच में बहुत श्रम करते हैं आप आपके इस श्रम, समर्पण और निष्‍ठा को मेरा नमन ।।

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    चिट्ठा चर्चा हिन्दी चिट्ठामंडल का अपना मंच है। कृपया अपनी प्रतिक्रिया देते समय इसका मान रखें। असभ्य भाषा व व्यक्तिगत आक्षेप करने वाली टिप्पणियाँ हटा दी जायेंगी।

    नोट- चर्चा में अक्सर स्पैम टिप्पणियों की अधिकता से मोडरेशन लगाया जा सकता है और टिपण्णी प्रकशित होने में विलम्ब भी हो सकता है।

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