रविवार, मई 16, 2010

चिट्ठा चर्चा – बरास्ते हिमांशु मोहन

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किसी समय चिट्ठाचर्चा को जमीन में गाड़ देने की बात कहने वाले ज्ञानदत्त ने अपने आज के ब्लॉग पोस्ट में चर्चायन (मिनी चर्चा?) में एक कड़ी हिमांशु मोहन के ब्लॉग की पकड़ाई है. वहाँ जाने पर कड़ी पे कड़ी जुड़ती गई.

घूमते विचरते हिमांशु मोहन के एक पोस्ट पर नजर पड़ी – मेरे ब्लॉग अनुभव. यह पोस्ट तो एक किस्म का लाजवाब चिट्ठा चर्चा है. कुछ हिस्सा नीचे कट पेस्ट कर छापा गया है. आप भी आनंद लें:

आराधना और स्तुति पाण्डेय दोनों ब्लॉग पर भी सक्रिय हैं और बज़ पर भी। अजीब सी आदत होती है लड़कियों की - लड़कियाँ चाहती हैं कि उन्हें कोई छेड़े - तभी तो पहले बताती हैं कि उन्हें चिढ़ किस बात से है, फिर चिढ़ाई जाने पर ख़ुश होती हैं। ये बात मैं अपने बचपन से नोट कर रहा हूँ, ज़्यादातर दीदियाँ तब भी ऐसी ही होती थीं, अभी भी मेरी बेटी पहले अपने भाई से ख़ुद ही कुछ शेयर करेगी, फिर उसी पर घमासान छिड़ेगा।आराधना का ब्लॉग, भानुमती का पिटारा - स्तुति पाण्डेय, ई-गुरू राजीव उर्फ़ आरएनडी, प्रवीण त्रिवेदी मास्साब के ब्लॉग, शेफ़ाली पाण्डे का कुमाऊँनी चेली इन सब पर मैं नियमित जाता रहता हूँ, अक्सर अच्छा पढ़ने को मिल जाता है यहाँ। मन हुआ तो टिप्पणी भी करी – न हुआ तो न करी।
और ब्लॉगर जो नज़र में आए, उनमें हैं अदा जी जिनके ग़ुरूर, अदा और हुनर का परस्पर संबंध अन्योन्याश्रित है, मगर मेरी नज़र में तो उनके लाडले मयंक की रेखाएँ बसी हैं - कृष्ण! प्रकट ही हो गए आप तो मयंक की रेखाओं में! उनकी काव्यमञ्जूषा भी खोल के देख आता हूँ कभी-कभी। पिछले दिनों कुछ खिन्न सी थीं, ब्लॉगजगत की किन्हीं घटनाओं से; मुझे अच्छा लगा कि मैं पूर्णकालिक ब्लॉगिया नहीं हूँ – मेरे पास अपने सरदर्द पहले ही कम नहीं हैं। अब यशोधरा पर एक अच्छी रचना लाई हैं आज मदर्स डे पर।
अरविन्द मिश्रा का क्वचिदन्यतोऽपि, अमित्राघात, ज्ञानदत्त पाण्डेय जी की मानसिक हलचलमेरी हलचल उन्होंने इस बीच शुरू किया और स्थगित भी कर दिया, प्रवीण पाण्डेय और उनका ब्लॉग प्रवीण और ज्ञान पाण्डेय, शिवकुमार मिश्रा और ज्ञानदत्त पाण्डेय का ब्लॉग परिष्कृत रुचि की माँग को पूरा करते हैं और हिन्दी ब्लॉग में प्रवीण पाण्डेय जैसे और ब्लॉगियों की ज़रूरत है, उसे समृद्ध बनाने और विश्वस्तर का बनाने के लिए। और भी ऐसे ब्लॉगिये हैं, मगर प्रवीण की तरह अपने स्तर का निर्वहन करते रह पाने में देखें कब तक ये सब सक्षम रहते हैं। शरद कोकास भी गुणवत्ता का उच्च स्तर बनाए रखते हैं, और संवाद में भी रहते हैं। फुरसतिया के बारे में भी यही राय है कि वह स्तरीय लेखन करते हैं, और जब ठेलुअई करते हैं तो वह भी स्तरीय।
रानी विशाल का काव्यतरंग, माणिक का माणिकनामा बढ़िया हैं। रतन सिंह शेखावत का ज्ञान-दर्पण बहु्त काम का ब्लॉग है, हिन्दी तक सीमित ब्लॉगरों के लिए। प्रियदर्शिनी तिवारी शौकिया लिखती हैं, अनियमित हैं मगर अच्छा लिखती हैं। जिन्न्श वाला लेख तो कमाल था। ताऊ का अड्डा भी बड़ा रोचक है और अपनी रोचकता भी बनाए हुए है और सरोकार भी। प्रणाम इसी बात पर। बस ये नहीं जान पाता कि ये चिम्पैंज़ी की खाल का बुर्क़ा ओढ़े रहने वाला ताऊ है कौन?
इयत्ता, चोखेर बालीवन्दना पाण्डेय, अन्जना का ब्लॉग - पॉवरव्योम के पार-अल्पना वर्मा, वन्दना अवस्थी 'दुबे' की अपनी बात और किस्सा कहानी इन सब पर पढ़ने को अच्छी सामग्री मिलती रहती है। एक चर्चा मंच है जहाँ कृति देव से यूनिकोड में और उल्टा परिवर्तन संभव है, वहीं दाएँ हाशिए में इसका लिंक है। मैं वन्दना गुप्ता जी के संदर्भ से पहुँचा था यहाँ। वन्दना जी के ज़ख़्म जो फूलों ने दियेज़िन्दगी……एक ख़ामोश सफ़र और एक प्रयास तीनों ही अच्छी रचनाओं के ठिकाने हैं, मगर उनकी अपनी ही रचनाएँ क्रॉस-पोस्ट भी होती हैं इन पर।
बहुत रंगीन से कई लेबल लगे होते हैं जहाँ- वहाँ से मैं जल्दी ही भाग लेता हूँ। ईमानदारी से स्वीकार करता हूँ मुझे सज्जा करनी नहीं आती – मेरे ब्लॉगों की थीम भी ज्ञानदत्त जी ने सहेज दी है – सो लगी है।
वास्तव में यह सहजता, मृदुता और नए ब्लॉगियों को प्रोत्साहित करने का बड़प्पन ही “उड़नतश्तरीtn64समीर लाल जी और ज्ञानदत्त जी को वह दर्जा दिलाए हुए है जिस तक पहुँचने के लिए सिर्फ़ एक अच्छा ब्लॉगिया  ही नहीं, और भी बहुत कुछ होना पड़ता है। उड़नतश्तरी आप के यहाँ से गुज़रेगी सर्रर्रर्रर्रर्र और टिप्पणी कर के आप को दे जाएगी ऑक्सीजन आपके ब्लॉग को जिलाए रखने के लिए – जब तक आप यह प्राणवायु देना स्वयं न सीख लें –या जब तक उड़नतश्तरी दुबारा सर्राटा न भरे…!
अमित्राघात पर नई रचना बहुत ख़तरनाक हालात को बयाँ करता हुआ सशक्त ताना है, समाज की महिलाओं के प्रति संवेदनहीनता और दोहरे मापदण्डों के प्रति।
पंकज उपाध्याय ने ग़ज़ब ढा दिया है अपनी नई पोस्ट में- मेरे विचार मेरी कविताएँ पर। कभी गुमसुम, कभी उदास और मासूम, कभी रंगीला-छ्बीला ये लड़का मेरी नज़र में लड़कियों के लिए एक सॉफ़्ट टारगेट है – एलिजिबुल कुँआरा और जैसा है वैसा होने के नाते। अरे पण्डितो! और कुँआरी कन्याओ! मौसियो! चचाओ! पकड़ो – जाने न पाए!
पीडी - मेरी छोटी सी दुनिया और कॉमिक्स, ललित शर्मा ललितडॉटकॉम, अजित वडनेरकर का शब्दों का सफ़र, सुख़नसाज़, सुख़नवर2सुख़नवर, संजीत त्रिपाठी का ब्लॉग सब बहुत अच्छे लगे। पीडी यानी प्रशान्त प्रियदर्शी की लेखनी में तो दम है ही, उन्होंने बड़े-बड़ों को बच्चा बना दिया, और यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि मेरी कॉमिक्स पढ़ने की प्यास अभी भी अधूरी ही है।
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी, अरुणेश जी और झनकार के ब्लॉग तथा राजे शा का हँसना मना है,  भी अच्छे लगे। संजीव तिवारी जी की पत्रकारिता स्तरीय है। सुमन “nice” जी को कौन भूल सकता है? बहुत-बहुत धन्यवाद उनके प्रोत्साहन के लिए। इसके साथ ही एक आनन्द का ब्लॉग देखा था जो संस्कृत में था, शायद इन सबको फ़ॉलो करना भूल गया या शायद लिंक हट गया - तभी इस समय लिंक नहीं मिल रहा। बाद में ढूँढ कर लगाऊँगा।
राकेश कौशिक जी का हृदय-पुष्प, पूनम जी का झरोखा, शारदा अरोरा जी का गीत-ग़ज़ल, ज़िन्दगी के रंग  सब बहुत अच्छे लगे मुझे। शारदा जी को चेतावनी दे आया था कि उनकी कोई रचना –या यों कहें कि उनका “आइडिया” चुराऊँगा किसी दिन, अभी चुराना शेष है।
शरद कोकास का ब्लॉग एक ऐसा ब्लॉग है जहाँ जाकर कभी निराश नहीं लौटना पड़ा। ज़ाहिर है कि ये भी न केवल अच्छे रचनाकार और कवि हैं, बल्कि साथ ही अच्छी चयन की समझ भी रखते हैं। अनूप शुक्ल ही फुरसतिया हैं ये जानने में देर लगी,जब से मैंने प्रोफ़ाइल देखना शुरू किया तब जाना। फ़ोटो लगाते हैं ब्लॉग पर, मगर प्रोफ़ाइल पर नहीं–शायद फ़ुर्सत न मिली हो! :)
ग़ज़ल के बहाने - श्याम सखा ‘श्याम’ जी के ब्लॉग पर जाना सुखद रहा, श्रद्धा जैन की भीगी ग़ज़ल तो ख़ैर भिगोती ही है। नीरज गोस्वामी का ब्लॉग, कुमार ज़ाहिद का ब्लॉग, गौतम राजरिशी का “पाल ले इक रोग नादाँ”;  पंकज सुबीर की कुछ प्रेम कथाएँ, सर्वत इण्डिया, वीनस केसरी और उनका ब्लॉग आते हुए लोग, पद्म सिंह, अर्श, मुफ़्लिस और उनका तर्ज़-ए-बयाँ, शाहिद मिर्ज़ा ‘शाहिद’ के जज़्बात ये सब ग़ज़ल से जुड़े अच्छे ब्लॉग हैं, मुझे पसन्द हैं। सतपाल ख़याल बड़ी मेहनत से काम कर रहे हैं आज की गज़ल पर।
जिन्हें मैं लगातार गूगल बज़ पर ही पढ़ता रहा हूँ (कभी-कभी ब्लॉग पर भी जाना होता है) वे हैं दिनेशराय द्विवेदी जी-बज़ पर और अजय झा जी भी-बज़ पर। द्विवेदी जी का संस्मरणात्मक और वर्णनात्मक लेखन उम्दा और सहज है और विधि के तो विशेषज्ञ वे हैं ही।
अविनाश वाचस्पति जी- नुक्कड़ पर, संगीता पुरी जी का गत्यात्मक ज्योतिष जिन्हें मैं लगातार पढ़ता रहा हूँ ऐसे नियमित और अच्छे ब्लॉग हैं। इन्दु पुरी गोस्वामी जी का ब्लॉग भी बहुत रोचक और प्रेरणास्पद बना रहता है, बाक़ी स्वयं वे “हक़ से माँगो प्रिया गोल्ड” टाइप लगीं। अपनी बात पूरे हक़ और अपनत्व से कहती हैं; कोई बनाव-दुराव-छिपाव नहीं – सीधा-सरल व्यवहार। हरकीरत ‘हीर’ एक अत्यन्त सशक्त हस्ताक्षर हैं कविता के सभी पृष्ठों पर। अनुवाद में भी उनका योगदान है, मैंने अभी देखा नहीं सो कैसे कहूँ उस बारे में?
जो नए जोड़े - गुलज़ारनामादिव्या का ब्लॉग, निशान्त मिश्रा का ब्लॉग से ज़्यादा मज़ेदार योगदान ट्विटर पर मिलता है मुझे – यू-ट्यूब लिंक के रूप में। अन्य भी कई ब्लॉग और उनके रचनाकारों का ज़िक्र बाक़ी है, जैसे स्वप्निल कुमार “आतिश” का “कोना एक रुबाई का”, चौधरी, अनामिका की सदाएँ, अनिल कुमार “हर्ष” आदि; सुलभ सतरंगी, पारुल मगर अब अगर आज ही सब को लिख सका तो फिर अगली बार क्या लिखूँगा?

(पूरा, विस्तृत पोस्ट पढ़ने के लिए हिमांशु मोहन के ब्लॉग पर  यहाँ जाएँ.)

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10 टिप्‍पणियां:

  1. 'संक्षिप्त और संतुलित मूल्यांकन' करता चिट्ठा वर्णन

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  2. मेरे लिए सुविधा होगी मूल्यांकन पर खरे उतरे चिट्ठों पर चटके लगानी की, धन्यवाद 'चिटठा चर्चा' की प्रस्तुति की.

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  3. रविजी , ज्ञानदत्त जी ने हिमांशु पाण्डे के पिता जी द्वारा लिखे तथा अर्चना द्वारा गाये गीत का हवाला दिया है-हिमांशु मोहन अलग व्यक्ति हैं ।

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  4. लगता है हमारे उधर अभी तक नजर नहीं पड़ी आपकी.

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  5. हे राम, इतना कम समय हुआ आये और हिन्दी ब्लॉगजगत को इतना जानते हैं हिमांशु मोहन! हम तो अब तक न जान पाये इतना अब तक।

    एक महत्वपूर्ण लिंकायमान पोस्ट!

    टिप्पणी सौजन्य : GDP
    अँत में डिस्क्लेमर का होना कहीं प्रायोजित तो नहीं ?

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  6. रवि रतलामी जी!
    आपसे मेल पाना और लिंकित होना एक सुखद अनुभूति है अपने आप में। मैंने कहीं पढ़ा था आप द्वारा ब्लॉगरी के बारे में, आप की राजभाषा सेवा के बारे में, किसी पत्र-पत्रिका में। फ़ुरसतिया नाम भी याद था तभी से।
    अब ख़ुद आया इस फ़रवरी के तीसरे सप्ताह से, सो इस जगह के शुरुआती अनुभवों को दर्ज किया था अपने ही संदर्भ के लिए। क्या पता था कि चर्चा कर रहा हूँ।
    ऐसे ही एक बात और- कि साझा लेखन वाले भी ब्लॉगों पर नहीं जाता हूँ - बचपन से सुना है दादी से - साझे का खेत-गदहौ न खावै। किसी दिन गर्दभत्व से उबरा तो शायद वहाँ भी जाऊँ। मुझे पता ही नहीं था कि आप सक्रिय हैं, हैं तो कहाँ…
    प्रणाम स्वीकार करें।
    और हाँ, यह विधि की इच्छा ही थी कि आप हिमान्शु कुमार पाण्डेय के ब्लॉग न पहुँच कर मेरे यहाँ आ गए। हिमान्शु कुमार पाण्डेय बड़े ही प्रतिभावान, पितृभक्त और सतुलित व्यवहार के कवि-गायक-ब्लॉगर हैं। मुझसे वरिष्ठ हैं ब्लॉग जगत में। उनकी पहचान भी काफ़ी है, और यह उनकी क्षमता के अनुरूप ही है।
    सस्नेह - सादर,

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  7. अफलातून जी,
    अरे! पर मैंने लिंक तो वहीं से उठाया था... कहीं गड़बड़ हो गई लगता है. त्रुटि इंगित करने के लिए धन्यवाद.

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  8. वाह..यहाँ तो लिंक-दर-लिंक के बहाने ही पूरी ब्लॉग-कहानी हो गयी..चर्चा के परिपेक्ष्य मे भी यह एक अभिनव सा प्रयोग लगता है..

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  9. बहुत गुणी हैं, हमारी टिप्पणी भी घेर लाये डा. अमर कुमार!

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  10. हिमांशु मोहन जी अब हमारे बीच नही रहे.कल रात को उनका देहावसान हो गया. ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे.

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