रविवार, अप्रैल 22, 2007

एक डुबकी दार्शनिक व्यंग्यवाद की निर्मल स्रोतस्विनी में

आज मन जरा दार्शनिक हो चला है ! दूरदर्शन के जमाने भी एक बार यह तकलीफ हम झेल चुके हैं , सो बेखटके कह सकते हैं की जाके पैर न फटी बिवाई सो क्या जाने पीर पराई ! दर्शन भी एक दर्द के समान है ! हमारे दार्शनिकों ने कितनी पीडा झेली होगी दर्शन का ग्यान –भंडार खडा करने में ! हमारे ब्लॉगर भाई भी जुटे हैं कुछेक इस दिशा में अपना जोगदान देने ! पर भई जमाना तो व्यंग्य का है-- सामाजिक व्यंग्य, राजनैतिक व्यंग्य , आर्थिक व्यंग्य आदि – अनादि ! अस्तु हमने भी सोची कि क्यों न इसी तर्ज पर आज दार्शनिक व्यंग्य की सख्त जरूरत महसूस करें और उसे न केवल रचॆं बल्कि सारी ब्लॉगर जाति को इस दिशा में आगे लाएं , न हो तो लिखी लिखाई पोस्टों में यह नई विधा खोज निकालें और दिखाएं ! वैसे राम और खुदा झूट न बुलवाए ! हमने जब देखा तो यह मिल ही गया यहां पर ! तो आगे की दार्शनिक - व्यंग्य कथा इस भांति है-----

हम ज्‍यादा बहकें इससे पहले देखें आज की सारी पोस्‍टें यहॉं पर
कल्पतरू जी ने बहुत ही सटीक एकलाइना पोस्ट लिखी है जिसका सार यह है कि लक्ष्‍यहीन ताकत बेकार जाती है (शायद) वैसे सार-संक्षेपण में मैं कमजोर हूं ! राजलेख जी कहते हैं कि जान पहचान का नाम दोस्ती नहीं होता ! मुझे इस दर्शन से मैचिंग एक गाना बनाने का मन हुआ आप भी नोश फरमाएं --- इस रंग बदलती दुनिया में दोस्त की नीयत ssssss ठीक नहीं -----------

सुषमा कौल जी शीर्षक निरपेक्ष दार्शनिक धारा की हैं उनका प्रश्न है ---कि जाति पाति धर्म कर्मकांड से छोटा क्यों है इंसान !
दर्शन की विज्ञानवादी धारा के मोहिन्दर कुमार दिल का दर्पण में जो कह रहे हैं आप जरूर देखें मुझे तो उत्तल अवतल आवर्ती परावर्ती की स्कूली क्लास में अपना फिसडडीपन याद आ गया ! कवि कहते हैं –


ढोल को देखो, पिट कर भी
बांसुरी को देखो, छिद कर भी
भाषा, जाति, र‍ग भेद से ऊपर ऊठ
माधुर्य की भाषा बोलते हैं


दीपक बाबू कहिन कि बर्बरता भी नहीं देखती धर्म, जात , भाषा , आयु , की कोई सीमा अर्थात -------- मनुष्य की बर्बरता को कोई डर नहीं
कोई जोर बर्बरता पर नहीं sssssss
(मुआफ करना आज गाने कुछ ज्यादा ही बन रहे हैं ! यह दरासल दार्शनिक व्यंग्यवाद का संगीतात्मक उच्छवास है-----)


हम पंछी उन्मुक्त गगन के दिल्लीबद्ध न रह पाएंगे
माल बिल्डिंगों से टकराकर पुलकित पंख टूट जांएगे

जन हित में बता दें अभी –अभी नोट पैड जी की कविता से उत्प्रेरित ( उत्पीडित की तरह ) होकर बनाई है !

वेदमंत्रवादी दार्शनिकाचार्य श्री अंतरिम जी का प्रवचन है -----तमसो मा ज्योतिर्गमय-- अर्थात


1 तुम सो जाओ मां मैं ज्योति के साथ जा रहा हूं
2 तुम सो जाओ मा बिजली तो चली गई है

बजार बाबा के मुख श्री से आज हिंदू समाज के लिए प्रवचन धारा में हिंदू होने के फायदे गिनाए गए हैं ! हिंदू स्नान पर्व पर धाट से सीधा प्रसारण देते हुएअ कहते हैं -



.....और भीड़ चढ़ रही थी। आगे ढलान था और थोड़ी देर ढुलकने के बाद सरयू का पहला घाट आने वाला था। हम सबकी आंखें चमकने लगी। पतारू बोला , 'अबे ! पिछली बार वाला किस्सा भूल गया ? ' मैंने कहा, ' कौन सा वाला ' वह बोला , ' अबे साले वही !! पिछली बार एक लडकी सिर्फ बनियान पहन कर नहा रही थी। और.... बड़ा मजा आया था।' इतना सुनना था कि कल्लू ही ही करके हंसने लगा। मैं भी ही ही करने लगा। फिर पतारू बोला, ' इस बार भी ऐसा ही माल दिख जाये तो भैयिया अपना तो जनम सफल हो जाय

जिज्ञासावादी दार्शनिक मंचों से उठाए गए दो ज्वलंत सवाल हैं



1 क्या संस्कृत एक मृत भाषा है ?
2 समृद्ध भारत भूखा नंगा क्यों हो गया है ?


समय अर्थात काल दर्शन बहुत पुराना है ! इसके एक विद्वान विचारक का मानना है कि आज का समय नष्टशील है इसे अच्छी तरह से नष्ट करने के लिए हृषिता भट्ट की फोटू देखी जानी चाहिए ! उधर चित्र दर्शन के चतुर चितेरे बने मिश्राजी सोनी कैमरे की कृपा से हृदयभेदी चित्र उतार लाए हैं ! आप सब देखें न देखें नोटपैड जरूर देखें !

मनोरंजन जीवन का जरूरी हिस्सा है –ऎसा मानते हुए 0 कमेंटधारी अंकुर महात्मा का कहना है कि सावधान कोई कमेंटस देने का दुस्साहस न करे ! वैसे किसी ने किया भी नहीं ! दूसरी ओर कह रहे हैं आप कैसा मनोरंजन चाहते हैं अब कैसे बताए हम तो डर गए हैं न !

विरोधवाद के प्रवर्तक धुरविरोधी का मानना है कि अविनाश भैया को अपनी थीम अब बदल कर कुछ नया ट्राई करना चाहिए किंतु अविनाश भैया परिवर्तनवाद के सख्त खिलाफ हैं ! सो परमोद भैया को आगे आकर अविनाशी शोले बरसाने पडे



वृहत हिंदी ब्‍लॉगजगत (माने साढ़े पांच ब्‍लॉग) ने हिंदी फिल्‍मों के क्‍लाइमैक्‍स की तरह ‘शैतान’, ‘पाजी’, ‘कुत्‍ता कुमार’, ‘मिस्‍टर ज़हरीले’ का नगाड़ा पीट-पीटकर मोहल्‍ले के जंगली जानवर को उसके जंगले से बाहर खींच उसका पर्दाफाश कर दिया है, और आखिरकार अविनाश को अमरीश पुरी की श्रेणी में ला पटका है-
तो अमरीश जी के पदचिन्‍हों पर चलते हुए स्‍वाभाविक हो जाता है कि अविनाश जंगले से कूदकर पहाड़ की तरफ भागें

आलोक शंकर अपने अपने अजनबी की तर्ज पर अज्ञेय की याद दिलाते हुए अपने अपने खंडहर की रचना करते हैं ! आलोक जी ने व्यक्ति की बात की तो रवीशाचार्य जी समिष्टिवाद पर शंकावादी होते हुए कहते हैं कि पत्रकारिता का गुट काल आ गया है भाई लोग (जिसकी जैसी मर्जी हो )अपना अपना पंजीकरण करवाऎं ! शुएब अभी देश की महक का मजा ले रहे हैं। सृजन भी मान रहें हैं कि देश की मिट्टी की बात ही कुछ और है।

बुडबकवाद के अग्रणी मसिजीवी दलेर मेंहदी के एक गीत में नई अर्थछाया भरते हुए इंटरनेट काल के निंदक हसन जमाल के (अ)बोधवाद पर अपने विचार रखते हैं ! इस माध्यम से उन्होंने दलेर मेंहदी के गाने में भी नए प्राण फूंके हैं –तू तक तू तक तूतिया हई जमाल हो ! वाह वाह वाह ! वैसे जीव जगत के चिंतक ने आत्म हत्या का एक्सक्लूसिव आइडिया बताया है ! जिससे मेरे मन में भी एक आइडिऎ का जन्म हुआ है कि इससे पहले कोई हमारी हत्या करें क्यों न हम आत्महत्या करे लें ? ;)

तो अप्रैल 21 के सभी सुधी चिट्ठाकारों को शत शत नमन जिनकी पोस्टों के माध्यम से दार्शनिक व्यंग्यवाद की यह निर्मल स्रोतस्विनी बहा पाई हूं ! उम्मीद से दुनिया कायम है ! सो आपसे आगे भी ऎसी ही दर्शनगूढ व्यंग्यात्मा प्रधान मार्मिक पोस्टों की आशंका ( कृपया एक बार फिर मुआफ करें ) आशा है। आज का चित्र नोटपैड के कैमरे से लैंसडाउन छावनी का .........बाकी सब माया है। है तो टिप्‍पणी भी माया पर क्‍या आनंददायी माया है...मायादान महादान हो कल्‍याण।

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4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत दिनो बाद पढने को मिली है ताज़गी भरी चिट्ठा चर्चा

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  2. भई वाह, व्यंग्य भरी दार्शनिक चर्चा तो वाकई मजेदार रही. :)

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  3. वाह हास्य व्यंग्य शैली में चिट्ठों की चर्चा और भी मजेदार हो जाती है, बहुत मजेदार!

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