बुधवार, अप्रैल 11, 2007

दो कप चाय हो जाये!!

आज फिर चर्चा में हमारा हाथ बटाने रचना जी हाजिर थीं, और देखते देखते पूरी ही चर्चा कर गयीं और हमें कोई काम नहीं रह गया, वाह!! तो हम मुण्ड़ली लिखने लगे, बहुत दिन से लिखी नहीं थी. आप भी सुनें:


रचना जी को देखिये, लिखती जाती आज
चर्चा कुछ हमहू करें, छोड़ा नहीं यह काज
छोड़ा नहीं यह काज कि अब आराम करेंगे
टिप्पणी बाजी जैसा अब, कुछ काम करेंगे
कहत समीर कविराय, हरदम ऐसे बचना
टिप्पणी करते जायें, बाकी लिखेगी रचना.

-समीर लाल 'समीर'

वो तो जब लिख कर चलीं गई तो छपने के पहले दो-चार चिट्ठे और आ गये तो हमने भी कलम साफ कर ली, वरना तो आप आज हमको पढ़ ही न पाते. :)

तो सुनें रचना जी की कलम से:

अहा! आज जब राकेश जी की चर्चा के बाद नारद पर पहला चिट्ठा देखा तो चाय पीने को मिल गई! तमाम लोगों ने वहाँ चाय पी है,आप भी पीजिये! क्या? खत्म हो गई? कोई बात नही कुछ ही दूरी पर ई-स्वामी की चाय की लैब है. अब मैने आपको 'टोक' दिया है तो वहाँ चाय पीकर ही आगे बढियेगा! वरना कुछ भी ऊट-पटांग हो सकता है.

चाय पी ली? तो अब पूजा याने धर्म का वक्त.भाइयों केसरिया और हरे रंग से बाहर आकर 'अन्तर्मन' से भी कुछ जानो!

अब थोडा खेल हो जाये? ह्म्म देखें एक गुगली से सात कैसे आउट होते हैं! ये सिर्फ और सिर्फ अच्छा खेलने से हो सकता है, भविष्य वक्ताओं की अतिउत्साही भविष्यवाणियों से नही!

उफ्फ! अनुराग क्या बात बता रहे हैं, आप ही देखें! बच्चे तो बच्चे, वे पहले माँ- बाप को भी शिक्षित होने को कह रहे हैं! अब भारतीय संस्कारो के तले दबी मै, ये हकलाते हुए ही लिख पा रही हूँ!


आओ थोडा सा बैठें, देखें 'हवा का डाकिया' क्या लाया है! डाकिया एक नहीं कई खबर कई लोगों के लिये लाता है..एक खबर जो सबको पता है, 'अभिएश' की शादी की! शादी से जुडे अभिन्न शब्द 'बरबादी' के बारे मे नोटपेड जी. नोट कीजिये कि उनके विचारों को उनके व्यक्तिगत जीवन से जोडकर न देखा जाए.

अब चलें मोहन राणा के बगीचे में और मिले दो नन्ही चिडिया से! वर्षा के अनकहे शब्द सुनें और मोहिन्द कुमार से उनकी गज़ल और एक बढिया कविता.

कल्पतरु कुछ पूछ रहे हैं, भगवान के बारे मे आपको पता हो तो बतायें! ओह इधर ये शुरुआत का क्या मामला है ? इसे भी देखिये जरा.

हाँ! ये तो बिल्कुल सही कह रहे है अपूर्व जी कि 'संघर्ष आदमी को निखारता है'!और 'काम और वेतन मे सन्तुलन हो! लेकिन सन्तुलन रख पाना आसान नही होता देखिये फिर गडबड कर दी सचिन ने, इसिलिये पंकज उन्हे सम्हलने की सलाह दे रहे हैं.

अब चर्चा का अन्त करती हूँ रचनाकार पर..असगर वजाहत की ईरान यात्रा के संस्मरण के साथ--


एक विद्वान; नाम मत पूछिएगा क्योंकि यह किसी विद्वान ने नहीं बल्कि अज्ञानी ने कहा है कि किसी देश को समझना हो तो उसकी सड़कों पर जाओ। किताबों में गये तो देश को न समझ पाओगे। वैसे भी किताबों की तुलना में मैं सड़क को बेहतर समझता हूं इसलिए अगले ही दिन से मैं तेहरान की सड़कों पर आ गया और वह भी पैदल- यानी रुक-रुककर और मुड़-मुड़कर देखने की सुविधा के साथ।


चलते-चलते उड़न तश्तरी की नजर से:

संजीव तिवारी जी से सुनिये: छत्तीसगढ़ राजभाषा दिवस पर रिपोर्ट और ज्ञानदत्त पांडे जी से किस्सा पांडे सीताराम सूबेदार और मधुकर उपाध्याय .

छुटपुट बता रहें हैं कि ब्लॉग, पॉडकास्ट और विडियोकास्ट पॉर्टमेन्टो शब्द हैं,अब यह क्या होता है, यह वहीं जा कर देखे. वो तो हमेशा एक से एक आईटम बताते हैं, जो पहले कभी न सुने हों और कहते हैं छुट-पुट. :)

अतुल श्रीवास्तव लखनवी जी ने इंदू जैन जी कीकथा से एक गीत सुनाया और राकेश खंडेलवाल जी ने अपना गीत:

गीत श्रृंगार ही आज लिखने लगा:


लौंग ने याद सबको दिलाये पुन:शब्द दो नेह के और मनुहार के
आँज कर आँख में गुनगुनाते सपन, गंध में नहा रही एक कचनार के

तोड़िया झनझना पैंजनी से कहे, आओ गायें नये गीत मधुमास के
पायलों के अधर पर संवरने लगे बोल इक नॄत्य के अनकहे रास के
और बिछवा जगा रुनझुनें पांव पर की अलसती महावर जगाने लगा
झालरें तगड़ियों की सुनाने लगीं बोल गलहार को आज विश्वास के

यों मचलने लगा रस ये श्रंगार का, गीत लिखने लगा और श्रंगार के
लेखनी ओढ़ मदहोशियां कह रही, दिन रहें मुस्कुराते सदा प्यार के


पूरा गीत गीत-कलश पर पढ़ें.


अब अक्षरग्राम पर अनूप शुक्ला जी बतला रहे हैं कि हमारे ब्लागर साथी अपने ब्लाग पर लिखने के अलावा अब पत्र-पत्रिकाऒं में भी स्थान बना रहे हैं। आप भी देखें कि कौन कौन इस क्षेत्र में बढ़ रहा हैं.. ब्लागर साथी छापे की दुनिया में. यह आशा है कि हिंदी ब्लागजगत के साथियों की भागेदारी आगे भी प्रिंट मीडिया में उल्लेखनीय प्रगति करेगी।

इन्द्रधनुष की छटा निराली तो इनसे जाने शादी की उम्र और जब शादी की बात चली है तो उससे मुखातिब अमित भाई कहते हैं फैलता हुआ युद्धक्षेत्र , हालांकि उनका शादी वाली बात से कुछ लेना देना नहीं है, वो तो याहू गुगल बतिया रहे हैं.

अंत में काकेश से सुनिये “नराई” के बहाने सिर्फ “नराई”

अब चलते हैं, थोड़ा आराम करें, थोड़ा टिपियाये और फिर मिलते हैं. रचना जी ने पुनः मन लगा कर चर्चा की, बहुत साधुवाद.

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5 टिप्‍पणियां:

  1. लगता है आजकल चिट्ठों की रफ्तार कुछ ज्यादा ही है। तीन चार चिट्ठे करते करते ही आपने कितने कवर कर दिये। बहुत सही :)

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  2. चिट्ठाचर्चा का यह आउटसोर्सिंग वाला प्रयोग जबरदस्त है और सफल भी. :)

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  3. वाह लालाजी आप तो उस्ताद निकले..

    रचना जी अब फुलटाइम कार्य करें ऐसी अपेक्षा है. :)

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  4. ज़बर्दस्त चर्चा हुई जब दोनों कवी साथ मिल बैठे समीरजी और रचनाजी :)
    कृपया टिप्पणी के लिए यूज़र नेम और पास्वर्ड हटादें तो बडी मेहरबानी साहब आप लोगों की :)

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  5. बहुत खूब! बस अब अगली बार रचनाजी मुंडलिया भी एकाध लिखने लगें बस्स!

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