बुधवार, अप्रैल 18, 2007

झुकना हमें भी गवारा नहीं है

वहसीयत कहें, दीवानापन कहें कि पागलपन!! बिना किसी बात के, बिना किसी खता के निर्दोष ३३ लोग मौत के घाट उतार दिये जाते हैं और सब हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं मजबूर. न जाने क्या क्या सपने रहे होंगे-एक क्षण में मिट्टी में मिल गये. फिर भी कोई सबक ले ले तो इनकी मौत शहादत कहलाये. आपस में झगड़ रहे हैं, एक दूसरे को काट रहे हैं, न जाने कौन सी दौड़ में विजयी होने के फिराक में हैं जबकि जिंदगी का अगले क्षण क्या होगा, कुछ पता नहीं.

वर्जिनिया टेक यूनिवर्सिटी केम्पस में हुये इस दर्दनाक हादसे की आँखों देखी बयाँ कर रहे हैं भाई अनुराग मिश्रा जो कि साधूवाद के पात्र हैं. उन्होंने न सिर्फ अपने चिट्ठे पर लगातार ताज़ा जानकारी पेश की बल्कि India TV के लिये भाई नीरज दीवान के सहयोग से घटना के सबसे करीब से हालात की जानकारी बतौर पत्रकार सारे भारत को उपलब्ध करा कर एक नया सिर्फ एक नये युग की शुरुवात की बल्कि अनेकों जिज्ञासुओं की जिज्ञासा को कुछ हद तक शांत किया.

इसी तरह की उन्मादी घटना में बलि चढ़े यूगांडा में देवांग रावल की जानकारी दी चंद्रप्रकाश जी ने.

समस्त हिंदी चिट्ठाजगत इन घटनाओं से दुखी है और अपनी संवेदनायें प्रकट करता है.

अब आज की चिठ्ठा चर्चा, आज यूँ तो कहानी रचना जी सुना रही होतीं मगर हमने अपने लेख गगन चढहिं रज पवन प्रसंगा में उनका जिक्र क्या कर दिया, उन्हें लगा कि अब तो चिट्ठा चर्चा खाली भी छप जाये और उनका नाम हो, तो X Factor के चलते टिप्पणियां तो आ ही जायेंगी. चलो, मान लेते हैं और आप भी मान लें कि यह चर्चा वही कर रही हैं और टिप्पणियां करते चलें.

आज भी कवि और कविताओं का ठीक ठाक माहौल रहा. इस श्रृंख्ला में एक अलग तरह की शुरुवात हुई, जब राम चन्द्र मिश्रा जी ने अपने मित्र की गज़ल की ऑडियो पेश की, मजा आ गया..आप भी सुनें. इसी श्रृंख्ला में आनन्द लें मुक्तक महातोस्व की अगली कड़ी का:


चांद बैठा रहा खिड़कियों के परे, नीम की शाख पर अपनी कोहनी टिका
नैन के दर्पणों पे था परदा पड़ा, बिम्ब कोई नहीं देख अपना सका
एक अलसाई अंगड़ाई सोती रही, ओढ़ कर लहरिया मेघ की सावनी
देख पाया नहीं स्वप्न, सपना कोई, नींद के द्वार दस्तक लगाता थका


कविताओं मे हिन्द युग्म पर मोहिन्द्र कुमार जी लाये हैं, अब नहीं कोई सवाल, अब जवाब चाहिये और मेरी कविताएँ में शैलेश भारतवासी जी राष्ट्रीय जल आयोग और हमारा नल में जल समस्या की बात कर रहे हैं. मुझे शैलेश भाई से सहमत हूँ कि जब तक यह सब आधारभूत समस्याओं का निराकरण नहीं होता, तब तक सार्वांगीण विकास की बात करना सिर्फ मन बहलाने का साधन मात्र है-मात्र छलावा.

आज पंगेबाज अरुण भाई सारे पंगे छोड़कर एक कविता लेकर हाजिर हुये हैं "ढ़ेरों दी कुर्बानी, राहुल". कविता कविता में ही पूरे नेहरु गाँधी खानदान की बखिया उधेड दी. बहुत रोचक प्रस्तुति है. मेरा दावा है अगर आप पढ़ना शुरु कर देंगे तो अंत होने के पहले रुक न पायेंगे, तो देर किस बात की, पढ़ना यहीं शुरु करें और आगे यहाँ पढ़े:

माँ कह एक कहानी

"माँ कह एक कहानी।"
बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?"
"कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी
कह माँ कह लेटी ही लेटी,
मै हू राजकुंवर भारत का और तू है महारानी?
माँ कह एक कहानी।"

"तू है हठी, मानधन मेरे, सुन भारत में बड़े सवेरे,
प्रधान मंत्री बने परनाना तेरे,चली गांधी की मनमानी।
चली गांधी की मनमानी
हाँ माँ यही कहानी हाँ माँ वही कहानी"


हमारे जैसी कांग्रेसी मानसिकता के लोग भी इसे पढ़ें और मजा लूटें, भले ही मजबूरीवश टिप्पणी न करें. :)

डिवाईन इंडिया पर दिव्याभ भाई बहुत दिन बाद एक और बेहतरीन कविता के साथ वापस आये हैं, उनका स्वागत किया जाये. उनकी कमी जाहिर हो रही थी. साथ ही पूनम मिश्रा जी फलसफे सुनना न भूलें, हमेशा की तरह एक गहरी रचना: साथ है पर फिर भी नही.

आज की सबसे सुखद घटना. वो अपने मोहल्ला वाले अविनाश भाई हैं न!! वो भी कविता करने लगे हैं. मैथली में लिखे हैं मगर उससे क्या होता है. कविता तो कविता है. वाह!! भईया, अब यहीं रहो, हम मैथली सीख लेंगे मगर वहाँ वापस न जाना. वो भाषा हम न सीख पायेंगे. कितने अच्छे तो लग रहे हो. दिल सा आ गया फिर काहे वहाँ जाते हो. खैर, आपकी इच्छा, हमें आप यहाँ ज्यादा अच्छे लगे सो बता दिया. सच में अच्छी कविता करते हो. हिन्दी में भी लिखो, हम इंतजार करेंगे.

इनके साथ सुनिये राजलेख पर, दर्द का यहाँ होता है व्यापार और सुनिये रामधारी सिंग दिनकर जी की कविता, जिसे पेश कर रहे हैं संजीव तिवारी जी. जाते जाते दीपक बाबू क्या कहिन तो जान लिजिये कि कभी बेवजह दया सीखा होता.

अभी यह सिलसिला थमा नहीं है, अरुणिमा को सुनें बिना तो जा नहीं सकते. क्या सधी हुई बात करती हैं : झुकना हमें गवारा नहीं है और जब यह सुन लिया तो घुघूती बासूती जी से क्या नाराजगी, उनको भी पढ़ो-उनके क्व्वों के राजा के नाम संदेश को-गद्य पद्य मय रचना में.

तो यह तो हो गई आज की काव्य प्रस्तुति. मगर सिर्फ यही थोडे ही है. बाकि लोगों ने भी तो कहा है. उनको न सुनोगे, तो चल नहीं पाओगे यहाँ. बड़े बड़े लोग हैं. काफी वजन रखते हैं.
इन लोगों को आप न भी जानते हों, मगर लोग उनकी बात करके पूर पोस्ट बना लेते हैं. इसे गासिप कहते हैं. मगर होती है.

आज एक नई खबर मिली और वो भी कविराज से गद्य में..हम ओ नहीं मानते इसे-कहते हैं अलविदा सागर भाईसा मुझे तो स्टंट लगता है. अब देखें क्या सही है. ऐसी ही लकझक खबर तो जीतू भी लाये कि शिल्पा के किसिंग कांड का आँखों देखा क्या हाल रहा गुल्लु ड्राइवर का. हम तो यूँ भी शिल्पा से नाराज हैं यह दोहा देखो न!!:


शिल्पा को अब छोडिये, हमको वो न भाय
गोरन सब चुम्मा धरें, हम चूमें गुस्साय


हम ही नहीं, बिहारी बाबू भी कहे हैं कि कितने गिरे गिअर

खैर, यह शिल्पा की मरजी. मगर तरुण को तो देखो, कहे हैं कि हरि अनंत हरि कथा अनंता का क्या अर्थ है आज. हद है भाई, हम तो चुप्पे टिपिया आये, आप भी जाओ न!! और अभय तिवारी जी को भी पढ़ना न भूलें. बहुत विचारोत्तजेक प्रविष्ठी नैतिकता का हथौड़ा लेकर आये हैं.

फिर बात करें, स्टार न्यूज के ऑफिस पर हुये एक विशेष संगठन के द्वार हमले पर. इससे रिलेटेड पोस्ट देखें:

कलंकित होता केसरिया - संजय बेंगाणी

स्टार न्यूज पर हमला- मोहल्ला

हममें भी दम मगर दिखा तो नहीं- संजय बैंगानी

जड़ों पर प्रहार जारी रखो - नीरज दीवान

हमारी आवाज में है दम- मौहल्ला

इन सबसे दूर, हमारे फुरसतिया जी आज बता रहे हैं कि चुनावी नारों का क्या छिपा अर्थ है- हर जोर जुर्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है. कई सारे चुनावी नारों का विश्लेश्ण कर डाला है अपने बेहतरीन अंदाज में. जरुर पढ़ें.


तंग आकर गलतबयानी से, हम अलग हो गये कहानी सेआम तौर पर यहा नारा केवल चुनाव के समय लगाया जाता है। चुनाव की घोषणा होते ही अपने पुराने दलों से सौदा न पटने पर अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी ज्वाइन कर लेते हैं या अपना खुद का दल बना लेते हैं। आम तौर पर भाई-भतीजों को टिकट न मिलने पर, मनचाहा पद न मिलने पर या अपने जनाधार के बारे में गलतफहमी होने पर इस तरह की स्थितियां पैदा होता हैं। लोग ये शेर कहकर पार्टी से विदा हो लेत हैं नयी खिचड़ी पकाने के लिये।


अरे हां, चलते चलते शुएब का स्वागत कर लें और काकेश भाई का नाम का सन्धि विच्छेद का परिणाम

चलिये, अब चला जाये. कल संजय बैगाणी जी तो कुछ करें. हरि ओम.

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6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही बढ़िया रही यह चर्चा ! बहुत विस्तार से व लगभग सबको शामिल कर लिया आपने ।( मुझे तो किया भाई )
    घुघूती बासूती

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  2. भईया ! आपने मुझे भी पढा बहुत खुशी हुई
    आपने मेरा नाम अपने चिठ्ठाचर्चा में दिया और खुशी हुइ
    क्या दिनकर जी की कविता अपने ब्लोग में लिखना
    कापीराईट का उलंघना है बताईयेगा

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  3. मस्त रही चर्चा, आज काफी देर से देख पाया. :(

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  4. एक और जोरदार परिचर्चा समीर भाई के अंदाज में…स्वागत करने का शुक्रिया…।मुझे तो लौटना ही था।
    ध्न्यवाद!!

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