शुक्रवार, अप्रैल 06, 2007

चिट्ठा चर्चा- अथ: श्री जूता कथा

आज की चर्चा का जिम्मा गिरीराज जोशी का है पर आज एक बार फिर ऐन मौके पर उनके नेट के कनेक्शन ने धोखा दे दिया। सो एक बार फिर आपको मुझे झेलने के लिये बाध्य होना पड़ेगा। मेरी तबियत आज ठीक ना होने की वजह से कई चिट्ठों को नहीं देख पाया अत: मित्रो से अनुरोध करता हूँ कि इसे बात को अन्यथा ना लें।
गुरुवार दिनांक ५ अप्रेल को प्रकाशित सारे चिट्ठों की सूची यहाँ है।

अगर आपको कुछ याद नहीं रहता तो उसके लिये डॉ गरिमा आपको सिखा रही है कुछ ध्यान की विधियाँ जिससे आपकी याददाश्त बढ़ सकती है। अब चूँकि गरिमा पेशेवर हीलींग एक्सपर्ट है और ध्यान की विधियॊं को सुसंगत करना जरूरी होता है और सुसंगत करना ही उनका पेशा है सो लेख के अंत वह यह कहने से नहीं भूली कि
जाते-जाते एक विनम्र निवेदन है कि- यह मेरा व्यव्साय का अंग है इसलिये कृपया घोडे को घास से दोस्ती करने के लिये ना कहें।ही... ही... ही...:D


जीतू भाई अतीत के झरोखे में की तीसरी कड़ी में आज बता रहे हैं हिन्दी चिट्ठाकार, बुनो कहानी, सर्वज्ञ, ब्लॉगनाद, निरंतर, निपुण और अनूगूँज के जन्म के बारे में।
गीतकार जी का मुक्तक महोत्सव चल रहा है और उन्होने मुक्तक क्रमांक २३ से २७ प्रकाशित किये हैं जो हमेशा की भाँति सुन्दर और पठनीय है।

उन्मुक्त जी आज मैसेन्जर या अपने चिट्ठे पर लगाने के लिये अवतार यानि हैकरगॉचिस् बनाने की विधी यहाँ बता रहे हैं। उनमुक्त जी का कहना कितना सही है कि
यदि मुक्त सोर्स का प्रोग्राम उतना ही अच्छा काम करे जितना कि मालिकाना प्रोग्राम, तो फिर मुक्त सॉफ्टवेर में ही क्यों न काम किया जाय?


हिन्दी के पुराने चिट्ठाकारों ने इन्टरनेट पर हिन्दी को फैलाने की जो अलख जगाई थी उसमें पंकज भाई उर्फ मिर्ची सेठ एक कदम और आगे बढ़ते हुए लेकर आये हैं चिट्ठाकारी का नया तरीका "स्क्रीनकास्ट"। स्क्रीन कास्ट में मिर्ची सेठ एक वीडीयो के माध्यम से नये लोगों को हिन्दी लिखना सिखा रहे हैं।

जीतू भाई, जुगाड़ी लिंक में कॉमिक्स बनाना सिखा रहे हैं और साथ ही उन लोगों को काम का लिंक बता रहे हैं जिन्हें टेलीफोनिक इन्टरव्यू देना है।

रवीश आजकल इन दिनों झाँसी में है और बड़े ही मायूस लग रहे हैं क्यों कि लोग रानी लक्ष्मी बाई के बलिदान को किस तरह भुना रहे हैं।
अंदर ही अंदर झांसी की रानी की लड़ाई को मिल कर बेच रहे हैं । लक्ष्मी बाई मुझे बहुत कमज़ोर नज़र आई । मूर्तियों में बंद बेबस । हमें इसका सामाजिक विश्लेषण करना चाहिए कि चोर बदमाश भी कहते हैं कि हम झांसी की संतान हैं । क्या इसी लिए किसी ने अपनी जान दी । हिंदुस्तान की जनता बहुत भ्रष्ट है । वो दूसरे के बलिदानों का भुगतान अपने नाम करा लेती है । झांसी में लक्ष्मीबाई के नाम पर जितनी लूट मची है ये अगर रानी को मालूम होता तो वह अंग्रेजों को झांसी देकर किसी जंगल में चली गईं होती । नहीं गईं । किसी को फर्क नहीं पड़ता । झांसी में कहीं भी जाइये बेकार लोग गुनगान करते मिल जाएंगे ये फलां दबंग का मकान है । इसने यहां कब्जा किया है । वहां डाका डाला है ।
रवीश बिल्कुल सही कह रहे हैं क्यों कि देश में हर जगह महान व्यक्तियों के नाम को भुनाया जा रहा है, फिर चाहे वह राजनीती हो या सामान्य जनजीवन।

प्रियदर्शन भी ग्रेग चैपल की विदाई से आहत, पूछ रहे हैं कि ग्रेग चैपल के सवाल: कौन देगा जवाब पर चर्चा लिखे जाने तक किसी ने जवाब नहीं दिया।

नोटपैड जी ने पीठ खुजाने का जो अभियान छेड़ा है उसमें अब अनुराग मुस्कान जी भी जुड़ गये हैं पर अफसोस उनकी पीठ खुजाने नोटपैड जी के अलावा कोई नहीं आया। और नोटपैड जी के साथ तो बड़ा ही मजेदार वाकया हो गया, वे लोगों से पूछ रही थी क्या आपने आज वोट डाला?? और उनका ही वोट वे खुद नहीं दे पाई।
हमारे साथ लेकिन कुछ दुखद घट गया।
वोट डालने गए। अपनी ४ १/२ साल की औलाद को भी सथ ले गए ।
उसे समझाने और दिखाने कि वोट डालना क्या होता है।
बारी आई, तो हमारी औलाद दौडी ।ज़ोर से बीप की आवाज़ आई।
पता चला नालायक ने बटन दबा दिया। हमारा वोट डल चुका था। पोलिंग आफ़िसर और प्रेसाइडिंग आफ़िसर चिल्लाए।
पर अब का होत जब बेटा डाल चुका वोट।
तो, यह था भारत के सबसे युवा नागरिक का वोट, जो ना जाने किस उम्मीदवार के खाते मे चला गया। और हमारी उम्मीदो पर पानी फ़िर गया।


आजकल चिट्ठा जगत में एक और पुराण चल रहा है उसमें समीरलाल जी और फुरसतिया जी ने अपनी अपनी आहूती दे दी तो काकेश जी भला पीछे क्यों रहते, उन्हें भी इस यज्ञ में आहूति देने का शौक चर्राया है आप फरमा रहे हैं :)
.जूता बिरादरी के अन्य सदस्य मसलन जूते की प्रेमिका सैंडल रानी , छोटी बहिन चप्पल और भी अन्य सदस्य जैसे जूती , बूट इत्यादि नाराज हैं कि ये भेदभाव क्यों ..अब कल ही सैंडल रानियों से पाला पड़ गया
और देखिये पाला पडा तो भी कैसा ... और उसी पोस्ट को फिर से पढ़ा तो पता चला कि आजकल कि नयी पृथा के अनुसार सुन्दरियां “टिप्पणीयों” (कमेंटस) से बहुत खुश होती हैं ..शाम को घर लौटते समय फिर एक बस स्टेंड पर एक सुन्दरी को देखा और उस को खुश करने की ठानी ..और कमेंट्स पर कमेंट्स देने शुरु किये ..वो पहले तो सुनती रही ..हम सोचे कि खुश हो रही है अचानक वो घूमी और उसने भी हमारा सर बजा दिया


यह लिखने के बाद काकेश जी का मन एक बार फिर ऐसे ही मचला जैसे बस स्टैण्ड पर सुन्दरी को देककर मचला था और अपनी आपबीती को पॉडकास्ट के रूप में फिर से सुनाया। एक बात माननी पड़ेगी काकेश जी की आवाज बहुत शानदार है मानो वे रेडियो जाकी हों आप काकेश जी की आवाज को यहाँ सुन सकते हैं


आजका सबसे बेहतरीन लेख अगर पढ़ना चाहें तो वह लिखा है नीरज रोहिल्ला ने, मैकाले के लिये लिखा है कि
मैकाले: सत्य कहीं कुछ और तो नहीं । मैकाले के बहाने हमें वामपंथियों को गाली देने का सुनहरा अवसर प्राप्त हो जाता है और आधुनिक शिक्षा पद्यति के प्रति अपनी भडास निकालने का बहाना भी । इस लिहाज से देखा जाये तो मैकाले ने इस देश को उसकी नकारात्मक ऊर्जा को निकालने का एक माध्यम प्रदान किया है और इसके लिये मैं मैकाले का ॠणी हूँ ।

इस लेख के बारे में ज्यादा लिखने की बजाय आप खुद इसे पढ़ें तो बेहतर होगा।

रचनाकार पर रवि जी लेकर आये है नये कहानीकार कमल की कहानी प्रोजेक्ट ऑक्सीजन।
उत्तर प्रदेश के चुनावों पर तरकश के छोटॆ तीर यानि पंकज बैंगाणी पूछ्र रहे हैं क्या कायम रहेंगे मुलायम? कहीं कठोर तो ना हो जायेंगे?

मीडिया युग पर सूचक रेडियो के पुनर्जन्म के बारे में बतिया रहे हैं एफ एम चैनल्स के आने के बाद किस तरह एक बार फिर से बाजार में रेडियो छा गया है।

एक और नये चिट्ठाकार मिहिर जी ने कल अपने लेख रफी बनाम किशोर पर दोनों महान गायकों के बारे में चर्चा की और आश्चर्य की बात यह थी कि शायद ही कभी टिप्प्णी देने वाले बिहारी बाबू यानि प्रियंरजन झा यहाँ टिप्प्णी देते पाये गये।
किशोर कुमार के गाये हुए ज्यादातर गानों को सुनकर ऐसा लगता है कि हमारे बीच का ही कोई व्यक्ति उसे गा रहा है। यही किशोर दा की लोकप्रियता का राज है। किशोर कुमार की सबसे बड़ी खासियत यही थी कि उन्होंने कठिन से कठिन गीतों को भी इस तरह से गाया कि सुनने वालों को ऐसा लगे कि वह भी यह गीत गा सकता है। दूसरी तरफ रफी साहब के सामान्य गीतों को गाना भी काफी मुश्किल होता है।


प्रमेन्द्र प्रताप जी आज इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले से बड़े खुश हैं जिसमें न्यायालय ने आदेश दिया है कि उत्तर प्रदेश के कई जिल्लों में मुसलिम आबादी चालीस प्रतिशत से ज्यादा है और उन्हें इस वजह से अल्पसंख्यक माना जाना गलत है।


और रामचन्द्र मिश्र जी १२०० रुपये में बीच पर अश्लील हरकतें करने का लाईसेंस दे रहे हैं।

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6 टिप्‍पणियां:

  1. संजय बेंगाणीअप्रैल 06, 2007 12:44 pm

    अच्छी चर्चा रही.
    अधिक चर्चाकार होंगे तो कोई दिन खाली नहीं जाएगा.
    चर्चा पढ़ कर लगा नहीं तबीयत ना साज है. :) मस्त लिखा.

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  2. बहुत बढ़िया!
    घुघूती बासूती

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  3. भाईसा स्वास्थ्य लाभ लेवें... बाकि चर्चा अच्छी रही.

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  4. बहुत सही!!

    आशा है इतना लिखने के बाद तबीयत में सुधार आया होगा! :)

    तबीयत का ध्यान रखें.

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  5. पहली बार चिट्ठा चर्चा में अपने लेख की कतरन देख कर अच्छा लगा. आपकी च्रर्चा ने कुछ छूटे हुए चिट्ठों को पढ़ने पर बाध्य किया यही इसकी सार्थकता है.

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