बुधवार, जून 06, 2012

बदतमीज लहजे में कुछ आत्मीय आवाजों की कौंध

आइए, ऑनलाइन हो जाएं... ये आवाहन है रविरतलामी का। आनलाइन होने का सीन खैंचते हुये वे फ़र्माते हैं:
पूरी दुनिया ऑनलाइन होने की ओर भाग रही है. बची खुची कसर मेरे मोहल्ले के धोबी और नाई ने अभी हाल ही में पूरी कर दी. कल मैं प्रेस के लिए कपड़े डालने गया तो पाया कि उस दुकान का नया नामकरण हो गया है - सबसे-सफेद-धुलाई-डॉट-कॉम.
आगे के किस्से उनके उधर ही बांचिये। वहां पचास रुपये के बाल कटाने के लिये ढाई सौ का रजिस्ट्रेशन कराना होता है। एक सीन तो देख ही लीजिये :
अब दुकान फुल्ली ऑनलाइन हो गई है और अब आप घर बैठे अपने कंप्यूटर से अपन कपड़े की वर्तमान स्थिति के बारे में पता कर सकते हैं कि वो धुल चुकी है, इस्तरी के लिए गई है या फिर अभी धोबी-घाट में पटखनी खा रही है. तो मैंने उससे पूछा कि भइए, जरा अपने कंप्यूटर में देख कर मेरे कपड़े की वर्तमान पोजीशन बताओ जो मैंने इस्तरी के लिए पिछले दिन दिए थे. वह पलट कर बोला घंटे भर बाद आना, अभी तो सर्वर डाउन है.
 बात चली आनलाइन होने की तो देखा जाये एक और दुकान खुली है आनलाइन! इजहारे मोहब्बत आनलाइन दुकान के प्रोपाइटर हैं सागर देहलवी ओरिजनली हेल्स फ़्राम बिहार। उनकी लेखनी जब  फ़ुरसत पाती है ,तब ही उनके कलामे सागर में कोई मोहब्बत का पन्ना फ़ड़फ़ड़ाने लगता है। उनकी इजहारे इश्क की उपमायें अलगै टाइप की होती हैं। दोहराने की शौक नहीं। राहत इंदौरी साहब अपनी बात सच साबित करने की ठेका लगता है सागर बाबू को दे दिये हैं:
अपने तआरूफ़ के लिये बस इतना काफ़ी है,
हम उस रस्ते नहीं जाते जो आम हो जाये।
वैसे तो आपका अगर मन करेगा तो आप खुदै सागर-कने जाके मेरी बात की पुष्टि करेंगे लेकिन सोचते हैं कि एकाध लाइन हम भी पढ़वा दें उनके इहां से उठाय के। एक ठो सीन देखिये:
रात के साढ़े ग्यारह बज रहे हैं 
शाम को बारिश हुई है और आसमान धुला धुला है
हवा मीठे रोमांस की खुशबू सी महक रही है. 
चाँद काले छींट वाले बादलों के परदे टांग 
अपने शिविर में आराम को जा रहा है.
आज उसके मलमल के कुरते का कोई बटन नहीं लगा. 
और उसके सीने से दूधिया चांदनी बरस रही है.
 अब बताइये चांद के सीने से दूधिया चांदनी बरसाने की इंतजाम सागर के अलावा किसके बस की बात है। वैसे मन तो किया कि पूछ लें कि ये दूधिया चांदनी में शुद्ध तो है न! दूधिया में कहीं यूरिया तो नहीं मिला है। लेकिन छोड़िये सवाल पूछ के क्या समय खोटी करना। आगे देखिये आबिदा की आवाज सुनने से क्या होता है सागर को:
आबिदा की आवाज़ मुझे
अपने ही परिवार में इक बिन ब्याही मौसी की याद दिलाती है
जो अपने धड़ को रखती है इस तरह चाक-पैबंद कि
कई बार उसके मर्द होने का अंदेशा होता है. 
उसके छाती से दूध नहीं उतरने का दर्द 
आबिदा की आवाज़ में ढल कर उतर आया है.


 
इन उपमाओं को वर्नियर लेकर नापा जाये तो कुछ झोल मिलें शायद। लेकिन झोल देखने की किसे फ़ुरसत है जी। मन तो ये करता है आगे देख जाये क्या लिखा है लड़के ने।
आबिदा मिलन में छुपे विरह का गीत गाती है
सीले पड़े माचिस को इश्क से सुलगाती हैं
उनकी हूक सुन घर छोड़ लापता होने का मन होता है 
चिठ्ठियों पर पता लिखते लिखते जैसे कोई खो जाता है
आबिदा को सुनता हूँ तो मुझे कुछ हो जाता है.
मुगलेआजम पिक्चर में आलमपनाह अनारकली संवाद कुछ ऐसा होता है न(याद से):


जिल्लेइलाही: कैदखाने के अंधेरे  तुम्हारे आरजुओं को खतम कर देंगे।
अनारकली: कैदखाने के अंधेरे कनीज की आरजुओं को खतम करने के लिये बहुत कम हैं।
जिल्लेइलाही: अंधेरे और बढ़ा दिये जायेंगे।
अनारकली: कनीज की आरजुयें और बढ़ जायेंगी।
 सागर के इजहारे मोहब्बत में भी उसी घराने की ठसक दिखती है जब वे लिखते हैं:
आलते के पत्तों पर रख दो या 
फिर मेरी घडी फोड़ दो
तुम्हारे मन पर रेंग जाऊँगा मैं या 
फिर मेरे होने की सूई तुम्हारे वजूद के डायल में घूमती रहेगी




बड़ा बवालिया है लड़का। लिखता है:
तुम्हारे देह में नेफ्रोन हूँ मैं
तुम्हारे देश को ढँक लूँगा.


सागर के लेखन का लहजा उन्हीं के शब्दों में बयान किया जा सकता है- बदतमीज़ लहजे में कुछ आत्मीय आवाज़ों की कौंध:
बदतमीज़ लहजे में कुछ आत्मीय आवाज़ों की कौंध, लठ्ठमार भाषा में एकआध पंक्ति में प्रेम का अधिकार यूं कि दिल रीझ आए जैसे बहुत सारे मानसिक प्रदूषण के बीच भाषणों में भारत एक महान और विशाल देश है की पहली पंक्ति। 
मन तो कर रहा है कि कुछ और किस्से बयान किये जायें सागर के लेकिन फ़ुरसत का घंटा बज गया है। अब व्यस्तता का पाठ पढ़ना है सो निकल लेते हैं-फ़िलहाल।

मेरी पसंद


 वीरेन डंगवाल की खूबसूरत  कविता का बेहतरीन  पोस्टर  बनाया है रविकुमार जी ने। रविजी नियमित रूप से अपने ब्लॉग सृजन और सरोकार   में अच्छी और सामयिक कविताओं के बेहद खूबसूरत पोस्टर बनाकर पोस्ट करते रहते हैं। इसके अलावा लेखन भी करते हैं। बहुत अच्छा काम है रविकुमार रावतभाटा जी का। आप देखेंगे तो आपको बहुत अच्छा लगेगा।


और अंत में
 कल की चर्चा में कमेंट बक्सा खोलने के हमारे अनुरोध को स्वीकार करते हुये अदाजी ने अपने ब्लाग से कमेंट का ताला खोल दिया है। अभी हालांकि बक्सा दिख नहीं रहा जिसमें कमेंट जमा करने हैं। बकौल अदाजी ही:
हम तो activate कर दिए हैं...पाता नहीं का बात है, लगता है बहुते दिन से ताला बन्द था कहीं जंक तो नहीं लग गया :)
 आशा है जल्दी ही ताला खुल जायेगा और हम फ़िर से वहां टिपियायेंगे। फ़िलहाल त आप इंतजार करिये।


फ़िलहाल इत्ता ही। बाकी फ़िर। चलते-चलते कुछ कार्टून दर्शन कर लीजिये।

 
 अगली मुलाकात तक के लिये विदा।


Post Comment

Post Comment

26 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. तीन दिन में एक पोस्ट रोज को ही उधिराना कहा जायेगा! कहीं वे दिन आ गये तब क्या कहा जायेगा जब दिन में तीन चर्चायें होती थीं।

      हटाएं
  2. आजकल चर्चा रेगुलर हो गयी है...हो सके तो ऐसे ही जारी रखियेगा..
    चिट्ठा चर्चा हर रोज मस्त हो रही है..और आज तो सागर भाई छाये हुए हैं :) :)

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. हां मन तो है नियमित करने की। देखिये कब तक कर पाते हैं। :)

      हटाएं
  3. आज का प्रोग्राम सागर-पेशल रहा,हालाँकि रतलामी जी का करारा व्यंग्य भी ज़ोरदार है |

    ...सागर बड़ी गहराइयों से शब्दों को खैंच कर लाते हैं और उन्हें जिंदा कर देते हैं !आपने सही पकड़ा है उनको.मेरी भी शुभकामनायें और बदतमीज़ हो जाएं !!

    ...वीरेन डंगवाल पोस्टर से जैसे नीचे उतरे वीरेंद्र हो गए.बड़े कवि हैं,उनको पढ़ना अच्छा लगता है !

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. वीरेंद्र वाली गलती सही कर ली। बताने के लिये शुक्रिया।

      हटाएं
  4. चिट्ठाचर्चा रेगुलर होने से हमारे भी कुछ और ब्लोग्स पढ़ने के आसार बढ़ जाते हैं. हम तो अनूप जी की पसंद को अच्छी मान कर चलते हैं...बाकी नए ब्लोग्स ढूंढने में कौन माथापच्ची करे.

    सागर साहब तो हमारे वन ऑफ द मोस्ट फेवरिट्स हैं. (ये और बात है कि लड़का ई पढ़ कर गरियायेगा कि अंग्रेजी में काहे लिखी रे!) उसके लिखे में अपनी मिट्टी की खुशबू आती है. सागर को पढ़ना बिहार के सोंधेपन को और उसकी आंच को जानना, समझना, महसूसना है. खरा और बेबाक लिखना उसकी आदत है. लेखनी पर लिखी कुछ कविताएं ऐसी हैं कि सालों बीत जाने पर भी याद आती हैं और लौट लौट के पढ़ना होता है. ऐसी ही कुछ सोचालय पर पोस्ट्स भी हैं.

    सागर भी बहुत दिन बाद लेखनी पर लौटा है...आप भी बहुत दिन बाद चिट्ठाचर्चा पर नियमित हुए हैं....हमारी दुआएँ कि ये लौटना कुछ दिन टिके.

    खुशामदीद!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. कोशिश की जायेगी कि कुछ दिन नियमित चर्चा करते रहें।

      हटाएं
  5. सागर को जब भी पढ़ती हूँ चाहे फेसबुक हो या सोचालय हर बार ये ख्याल आता है ये ऐसा लिख कैसे लेता है ...भावनाए मानो सुई (इंजेक्शन ) से शिराओ में छोड़ देता है फिर वो रक्त के साथ दौड़ पड़ती है फिर उन्हें कागज़ पर उतारता है ......बाकी चर्चा मस्त है जारी रखिये

    उत्तर देंहटाएं
  6. सागर लड़की होता तो इससे सेल्फ- डेस्ट्रक्टिव् लव हो जाता ।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. भेदभाव करते हो दोस्त... अभी ही कर लो ना...

      हटाएं
    2. सागर लड़की होता तो क्या होता ये सिर्फ़ कयास लगाये जा सकते हैं। शायद इसीलिये कहा गया कि खुदा गंजों को नाखून नहीं देता।

      हटाएं
  7. @ भावनाए मानो सुई (इंजेक्शन ) से शिराओ में छोड़ देता है फिर वो रक्त के साथ दौड़ पड़ती है फिर उन्हें कागज़ पर उतारता है ...........

    ekdummai sahi kahen hain sonaldi.....


    pranam.

    उत्तर देंहटाएं
  8. लेखन में उत्प्रेरक का काम कराती है चिटठा-चर्चा :) बधाई, नियमित होने के लिए.

    उत्तर देंहटाएं
  9. अरे क्या बात है ...वेल्कम बेक .बहुत अच्छा किया नियमित होकर.

    उत्तर देंहटाएं
  10. नींद अब खुली है. अंगराई ली नहीं जा रही. चर्चा यहाँ मचल रही है. दूधिया चांदनी ना सही शोरबा मिला पानी मान लीजिये. कुछ बेहतर दोस्त दिए ब्लॉग्गिंग ने जो लेन देन से ऊपर उठ कर इस ढीठ का पन्ना फेर लेते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. क्या अदा है जी! दूधिया चांदनी , शोरबा !

      हटाएं
  11. दूधिया चांदनी में...अंगडाई का शोरबा मिल गया है...
    यह मुआ सागर हमेशा ज्वार में ही रहता है...

    आभार...

    उत्तर देंहटाएं
  12. आपकी चर्चाओं को पढ़कर अपना दिमाग चकरा रहा है। कित्ता अच्छा-अच्छा लिखते हैं लोग ! कुएँ के मेढक को सागर में छोड़ना कौन सी अच्छी बात है? :)

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. एक सागर ही इस तरह के बयान जारी कर सकता है। :)

      हटाएं
  13. ये चर्चा तो वाकई में सागर भाई की हो गयी, क्या कहने उनके!!!

    पर रविरतलामी जी का व्यंग्य भी धाँसू है और इस तरह की सब चीज़ें हमें बड़ी बढ़िया लगती हैं :) :)

    उत्तर देंहटाएं

चिट्ठा चर्चा हिन्दी चिट्ठामंडल का अपना मंच है। कृपया अपनी प्रतिक्रिया देते समय इसका मान रखें। असभ्य भाषा व व्यक्तिगत आक्षेप करने वाली टिप्पणियाँ हटा दी जायेंगी।

नोट- चर्चा में अक्सर स्पैम टिप्पणियों की अधिकता से मोडरेशन लगाया जा सकता है और टिपण्णी प्रकशित होने में विलम्ब भी हो सकता है।

Google Analytics Alternative