शुक्रवार, जून 08, 2012

एक अलसाई सी चिट्ठाचर्चा

आज जरा अलसा सा गये। हालांकि उठ तो गये टाइम से लेकिन फ़िर इधर-उधर आवारागर्दी करते रहे। कुछ न कुछ बांचते रहे। कल मोहल्ला में अशोक चक्रधर जी के बारे में कुछ खबरें देखीं और फ़िर उनके सबूत । बड़ी देर सोचता रहा कि ......! बवाल है। तरह-तरह की टिप्पणियां आयी हैं।  इसके बाद विजय कुमार जी की ब्लॉगिंग के बारे में चिंता  देखी। इस पर नीरज गोस्वामी जी का कहना  है:
विजय जी मैं आपसे सहमत नहीं...मुझे ब्लॉग्गिंग में पांच वर्ष हो गए है और मैं अपने ब्लॉग पर नियमित रूप से लिखता आ रहा हूँ...मुझे अभी इस बात का अहसास नहीं हुआ के ब्लॉग जगत में गन्दगी फ़ैल रही है...मेरी मित्र संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है...ये आपके देखने का नजरिया है यदि आप गन्दगी देखेंगे तो आप को गन्दगी ही नज़र आएगी और अच्छाई पर नज़र रखेंगे तो अच्छाई...गिलास आधा भरा है या खाली ये आपकी सोच पर है...बजाय दूसरों की बातों से या कमेंट्स से दुखी होने के अच्छा है के हम पहले अपने आप को सुधारें दुसरे क्या कर रहे हैं उसकी फ़िक्र में दुबले न हों...ब्लॉग भी इस समाज और जीवन का हिस्सा है जो कुछ अच्छा बुरा समाज में होता है वो ही ब्लॉग में नज़र आता है इस पर अधिक दुखी या आश्चर्यचकित होने की जरूरत नहीं है..
गुलाब के साथ कांटे प्रकृति का नियम है. खुश रहें.
आपका भी कुछ कहने-वहने का मन हो कह-वह लीजिये। मौका भी है दस्तूर तो खैर है ही।

जब टहलना शुरु ही किये तो चिट्ठाचर्चा की शुरुआती पोस्टें भी देखी। सबसे पहली चर्चा देखी। उन दिनों इंडीब्लागीस के तहत ब्लागिंग के इनाम दिये जा रहे थे। हमने अंग्रेजी ब्लागरों के रुख को देखते हुये लिखा था:

बहरहाल,एक और मजेदार नजारा दिखा .ज्यादातर महारथी अपने ब्लाग के लिये वोट देने का अनुरोध कर रहे हैं. अंग्रेजी में पता नहीं क्या कहते हैं इसे पर हिंदी में कहते हैं -वोट के लिये दांत चियार रहा है.इस मामले में भी हिंदी वाले बहुत पिछड़े है.तीन में से किसी को भी मिलेगा पहला स्थान सब सोचेंगे कि हमें ही मिला है.
यह बात आज से सात साल पहले की है। गये सालों में हिंदी वालों का  पिछड़ापन दूर हुआ है और जहां कहीं वोटिंग /सेटिंग से इनाम की बात चलती है हिंदी चिट्ठाकारों ने भी जम के दांत चियारना शुरु कर दिया है।

जब कभी बाल चिट्ठाकारों की बात चलती है तो पाखी , आदित्यलविजा , जादू (जी) आदि बच्चों के ब्लागों की चर्चा होती है। आदित्य से और उनके माता-पिता से तो पिछली जोधपुर यात्रा में मिलने का सौभाग्य भी मिला। ये सभी ब्लॉग 2008 या उसके बाद बने।  पिछली चर्चा देखते हुये याद आया कि रविरतलामी जी ने इगा के ब्लाग की चर्चा की थी। यह ब्लाग 2007 से चालू है। जुलाई 2007 की एक पोस्ट में इगा लिखती हैं:
अभी -कुछ दिन पहले ही भारत से लौटी हूँ | तीन सप्ताह मे जितनी हिंदी और अक्लमंदी भारत से सीख कर आयी हूँ उतना तो पापा-ममी ३ सालों में नही सीखा पाए| वो कहावत -' खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे' , पूरी तरह से लागू हो रही है इन दोनो पर |

इस बीच परिकल्पना पर दशक के पांच चिट्ठाकारों की सूची जारी हुई। उनमें पहला नाम पूर्णिमा वर्मन जी का है।
अंतर्जाल पर आज जितनी भी हिंदी दिखती है उसके लिये सबसे ज्यादा योगदान देने वालों की अगर कोई सूची बने तो उनमें से एक नाम पूर्णिमा जी का जरूर होगा। पूर्णिमा जी का जन्मदिन इसी माह की 27 तारीख को है। 2006 में उनके जन्मदिन के मौके पर उनका परिचय अपने ब्लाग पर लिखा था। इसी मौके पर उनसे हुयी बातचीत के वे अंश यहां पेश हैं जो उस समय के ब्लागिंग के परिदृश्य की जानकारी देते हैं।

हिंदी के कई चिठ्ठाकार आपके नियमित लेखक हैं- रवि रतलामी, अतुल अरोरा,प्रत्यक्षा आदि। चिठ्ठाकारी के प्रति आपके क्या विचार हैं?

रवि जीकी प्रतिभा बहुमुखी है इससे आप इनकार नहीं करेंगे। वे लगभग शुरू से ही हमारी पत्रिका से जुडे हुए हैं। उनके व्यंग्य और कविताएं लोगों ने पसंद की हैं। प्रौद्योगिकी के उनके नियमित स्तंभ ने उनके बहुत से शिष्य बनाए होंगे। मुझे यह बहुत बाद में पता चला कि वे हिंदी कंप्यूटिंग के क्षेत्र के जाने-माने विद्वान हैं। हमारे साथ स्तंभ लिखना उन्होंने बहुत बाद में शुरू किया। चिठ्ठाकारी लोग नियमित रूप से करते हैं और अक्सर व्याकरण और वर्तनी पर ध्यान नहीं देते। संपादन भी नहीं होता है पर इसका मतलब यह नहीं कि उन लेखकों में प्रतिभा नहीं या उनकी हिंदी अच्छी नहीं। कुछ तो सुविधाओं की कमी है जैसे हर एक के पास हिंदी आफ़िस नहीं जो गलत वर्तनी को रेखांकित कर सके, दूसरे समय की भी कमी है। अगर इन्हीं लोगों को समय और सुविधा मिले तो हिंदी साहित्य का कायाकल्प हो सकता है। जब मैंने अतुल के कुछ छोटे आलेख देख कर उनसे नियमित स्तंभ की बात की थी तब वे रचनात्मक आकार में नहीं थे। उन्होंने समय और श्रम लगा कर उसे जो आकार दिया उसे सबने पसंद किया। इसी तरह बहुत से चिठ्ठे ऐसे हैं जिन पर ध्यान दिया जाए तो वे स्तरीय साहित्य की श्रेणी में रखे जा सकते हैं। हमें प्रसन्नता होगी अगर ऐसे लोग हमारे साथ आकर मिलें और अभिव्यक्ति का हिस्सा बनें। चिठ्ठा लिखने में किसी अनुशासन या प्रतिबध्दता की जरूरत नहीं है। आपका मन है दो दिन लगातार भी लिख सकते हैं और फिर एक हफ्ता ना भी लिखें। पर जब पत्रिका से जुडना होता है तो अनुशासन और प्रतिबध्दता के साथ-साथ काफ़ी लचीलेपन की भी जरूरत होती है। ये गुण जिस भी चिठ्ठाकार में होंगे वह अच्छा साहित्यकार साबित होगा। प्रत्यक्षा हमारी लेखक पहले हैं चिठ्ठाकार बाद में। विजय ठाकुर और आशीष गर्गआदि कुछ और चिठ्ठाकारों के बारे में भी सच यही है ।


पूर्णिमा वर्मन>
आपने चिठ्ठा लिखना शुरू किया था। अश्विन गांधी के चित्रों के साथ कुछ खूबसूरत कविताएं लिखीं थीं, चिठ्ठा लिखना स्थगित क्यों कर दिया?

 हमेशा के लिए स्थगित नहीं हो गया है। थोडा रुक गया है. मुझे अपनी कविताओं के लिए जैसे ले आउट की जरूरत थी उसके लायक तकनीकी जानकारी मेरे पास फिलहाल नहीं है। जैसे पृष्ठ मुझे चाहिए उसके लिए काफ़ी प्रयोग की आवश्यकता है जिसका समय नहीं मिल रहा है। कुछ चिठ्ठाकर जरूर ऐसे होंगे जिन्हें ब्लॉग पर ले आउट और ग्राफ़िक्स के प्रदर्शन की बढिया जानकारी होगी। शायद मुझे कोई ऐसा सहयोगी मिल जाए जो इस काम में सहयोग कर सके। पर अभी तक ऐसा हुआ नहीं है। अगर हो भी तो इस व्यस्तता के दौर में दोनों ओर से काम करने का समय और सुविधा का संयोग होना भी जरूरी है।

कुछ हमारे जैसे चिठ्ठाकार हैं जो आपको जबरदस्ती अपना लिखा पढाते रहते हैं. क्या आप अन्य लोगों को भी नियमित पढ पाती हैं?

 चिठ्ठाकार की सदस्य हूं तो नियमित मेल आती है। लगभग सभी नए चिठ्ठाकारों के चिठ्ठे मिल जाते हैं। काफ़ी चिठ्ठे देखती हूं पर सभी लेख पढे हैं ऐसा नहीं कह सकती कभी-कभी छूट भी जाते हैं। साहित्य से समाज में बदलाव की आशा करना कितना तर्क संगत है? दो सौ प्रतिशत तर्क संगत है। आप ध्यान दें तो पाएंगे कि दुनिया के सभी क्रांतिकारी श्रेष्ठ लेखक हुए हैं। हां, लेखक में क्रांतिकारी के गुण होने चाहिए। मैं गांधी जी की इस कथन में विश्वास रखती हूं कि ''मुठ्ठी भर संकल्पवान लोग जिनकी अपने लक्ष्य में दृढ आस्था है, इतिहास की धारा को बदल सकते हैं।'' 

फ़िलहाल इतना ही बाकी फ़िर कभी।  

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13 टिप्‍पणियां:

  1. 50-100 लिंक नहीं दिए तो इसे अलसाना कह रहे हैं! मत कहिए!
    पूर्णिमा वर्मन जी की बातचीत का अंश पढ़कर अच्छा लगा! आभार।

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  2. ...अब तो पूर्णिमा जी दशक की सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर हो ही जाएँगी !

    ...आप हमारे लिए सर्वकालीन श्रेष्ठ व्यंग्यकार हैं,अगर ब्लॉगर जोड़ना चाहें तो जोड़ लीजिए !

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  3. prati divas charcha kar apne philhal balak ko kahin aur ka nahi chora....

    pranam.

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  4. आदत सी ही हो गई थी चर्चा के नाम पे लिंक देखने की... फि‍र टूट रही है आदत

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  5. पूर्णिमा जी से आपकी बातचीत पढ़ाने को मिली और वास्तव में उनके समर्पण और लगन से जो रूप आज अभिव्यक्ति और अनुभूति को मिला है उसके लिए वे निश्चित रूपसे सम्मान की पहली हक़दार हें.

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  6. Bahut hee badhiya charcha lagee. Poornimaji ke bareme padhke bada achha laga.

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  7. गुरुदेव ये तो भ्रांतिमान अलंकार वाली बात हो गयी, अलसाते हुए इतनी लंबी चर्चा कर डाली | वैसे कहा भी गया है अलसाते हुए इंसान किसी भी काम को करने का सबसे बढ़िया रास्ता खोज सकता है :) :) :)

    ऐसे ही अलसाते रहिये :) :)

    और मैं संतोष जी से सहमत हूँ, आप हमारे लिए भी सर्वकालीन श्रेष्ठ व्यंग्यकार हैं !!!!!

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  8. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  9. हमारे फन की बदौलत हमें तलाश करें,
    मज़ा तो तब है कि शोहरत हमें तलाश करें।

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  10. हमारे फन की बदौलत हमें तलाश करें,
    मज़ा तो तब है कि शोहरत हमें तलाश करें।

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  11. बहुत ही बेहतरीन रचना....
    मेरे ब्लॉग

    विचार बोध
    पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  12. बहुत दिनों बाद चर्चा पढ़ रहा हूँ। अच्छा लगा। ई-मेल से सबस्क्राइब किया है। पर वहाँ निम्न टिप्पणी मिली। क्या पता मेल से मिलती है या नहीं।

    The feed does not have subscriptions by email enabled

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  13. पूर्णिमा वर्मन जी के बारे में जानकर अच्छा लगा।

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