शनिवार, मार्च 10, 2007

चलते हैं दबे पाँव मेरे हाथ भी

चर्चा में देरी के लिये करिये क्षमा, उम्मीद है महफ़िल में अभी बुझी नहीं शमा!

ईस्वामी शॉपिंग फ्रैंज़ी के शिकार अपने मुलक की हरकतों से हैरान हैं। बताते हैं कि शकीरा को यह नितंब झूठ न बोलें कहते देखने के लिये 3650/- के टिकट रखे गये हैं। कौन जायेगा देखने? अरे भिया जहाँ के शहरों में रेव पार्टी में कथित ट्राँस म्यूज़िक सुनने के लिये लोग हज़ारों पेल देते हैं, स्पेंसर से बासी कटी सब्ज़ियों से बच्चों को महंगा न्यूट्रीशन दिया जाता है और मल्टीप्लेक्स में 30 रुपये की 50 ग्राम पॉप कॉर्न स्टाइल से खाई जाती है वहाँ जे कौन सी बड़ी रकम है। शुक्र ये है की शकीरा संक्रांति का टीवी पर सीधा प्रसारण भी होगा, डेविलिश ब्रांड रवीश बताते हैं
कमर के...बलखाने से दर्द नहीं होता। झटका लगता है। वो भी शकीरा को नहीं। टीवी के लफंदर दर्शकों को...ये दर्शक कौन हैं? ये हिंदुस्तान की समस्त सामाजिक समस्याओं का मानवीय समुच्य है...मगर उसे शकीरा तो नहीं मिल सकती न। वो तो अब आने वाली है। अभी तक वह ओंकारा के बिल्लो चमनबहार पर ही दिल लुटा रहा था। बीड़ी जला रहा था। इस बार शाका लाका करेगा।
हिन्दी ब्लॉगजगत में जो काम टीवी 18 समूह चाह कर भी न कर पाया वो एनडीटीवी ने बड़े बढ़िया तरीके से शुरु किया। आईबीएन को श्रेय देना चाहिये ये पहले करने का, जहाँ उनके पत्रकार अपने आफ तहे रिकार्ड्स बोल से चर्चित रहे हैं। अविनाश, रवीश कुमार के बाद अब पंकज पचौरी और संजय अहिरवाल भी (दिबांग की डिक्शन कमज़ोर थी पर क्या लेखन भी? वो क्यों नहीं लेन में?) खैर अपन तो कांस्पिरेसी थियोरी के बुनकर हैं तो ज़ाहिर तौर पर इस मीडिया समूह की कुछ योजना ज़रूर है, यह दीगर बात है कि करन जौहर के साथ उनके अपकमिंग इंटरटेन्मेंट चैनल के न अप होने के संकेत हैं न कमिंग के। योजनाबद्ध हो या स्पौंटेनियस, उन्होंने बकौल जनार्दन भैया काफी गंडगोल भी किया और इनके चक्कर में अपने राम को लोगबाग कम्यूनिस्ट पुकारने लगे

एनडीटीवी पर लौटें तो हिन्दी ब्लॉगजगत से नोट छापने (अच्छा भैया नोट नहीं तो कम से कम लाभ कमाने) के लिये कई समूह उतारू हैं, एनडीटीवी का अपना ब्लॉगिंग प्लैटफॉर्म है पर ब्लॉगर को चुना, पता नहीं क्यों। नीलीमा ने चिट्ठाकार पर एक खबर की कड़ी भेजी, मुझ जैसे कई लोगों ने महसूस किया कि स्पॉटलाईट खामख्वाह पत्रकारों के चिट्ठों पर, फुटास की ललक हमें नहीं होती का? हमने माना के तगाफ़ुल ना करोगे लेकिन, ख़ाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक। नाम नीलीमा का भी था, तो कुछ असला बारूद उनके कने भी है। क्या है कोई बताता नहीं है, सिर्फ हिंट। जीतू भी आजकल बहुत छुपाने लगे हैं, सबके स्टैटकाउंटर पर उनकी नज़र है, हलचल की मेरी जां उन्हें ख़बर है। मुद्दे की बात ये कि हिन्दी ब्लॉगजगत अभी तो काफी छोटा है, कुल जमा 400 लोग, रवि भैया को अब भी ज़्यादा हिट्स अपने अग्रेज़ी चिट्ठे से ही मिल रही हैं। पर आप लोग हवाई किले बना रहे हैं, शोध कर रहे हैं। मालिक अभी तो क्रिटीकल मॉस भी नहीं बन पाया है। रोपाई ही चल रही है और हार्वेस्टर तैनात हैं। सोचो यार ज़रा!

पांडेय जी भी परेशान है, समाजवाद की बातें उनके पल्ले नहीं पड़तीं। अज़दक ने सिंगूर में टाटा के व्वयावसायिक प्रक्रम पर नाक भौं सिकोड़ी तो वे बोले,
मान लीजिये आज आप पूरी दुनिया की सम्पदा सभी लोगों मे बराबर बांट दें। क्या होगा? कुछ समय के लिये आमोद-प्रमोद और सीधे consumption से जुडा व्यवसाय जूम कर जायेगा। पर दुनिया की समग्र अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ जायेगी। दो साल बाद समग्र सम्पदा (जो आज की सम्पदा से कम होगी) फिर उसी अनुपात में बंट जायेगी, जिसमें आज है। ज़रूरत धन के समाजवादी बंटवारे की नहीं, धन की समग्र मात्रा बढाने वालों की है। किसान को आप सशक्त बनायें, पर टाटा को डकैत बता कर नहीं।
सागर भी कम परेशान नहीं। अपनी पोस्ट मिटा दी। कईयों ने, टिप्पणियाँ भी वापिस लीं। गूगल इत्ती जल्दी नहीं मिटायेगा और जिसने पढ़ा उसके मन से हटाना न मिटाना भैये। अपना लिखा मिटाना गलत मानता हूं मैं, धुरविरोधी को भी कहा मैंने, HTML में टैग होता है, काट दो, करेक्शन दिखे तो। हो सकता है दो साल बाद अपना लिखा फिर पढ़ो तो हंसी आये, या फिर रोना। सोच के लिखो, वरना कहना पड़ेगा
लाज़िम थे मुझपे ये लम्हात भी,
चलते हैं दबे पाँव मेरे हाथ भी।
प्रतीक परेशान नहीं हैं, जिया खान के हॉट चित्र छापे हैं, यहाँ बेरोमीटर पर खास प्रभाव नहीं पड़ा। सर्फिंग कुछ ज़्यादा होने लगी है आजकल।

चलते चलते, दिल्ली में हिन्दी चिट्ठाकारों का मिलन होने जा रहा है। अगर आप दिल्ली में है तो ज़रूर शामिल हों और छाछ पियें पिलायें

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4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह महाराज, चर्चा तो चौकस है। देर आयद दुरुस्त आयद टाइप। कुछ शनिवार के चिट्ठे भी निपटा दिये गये। वहीं कुछ शुक्रवार के छोड़ दिये गये। बहरहाल मजा आया। सर्फिंग के नतीजे आप भी दिखाऒ प्रतीक के जवाब में।

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  2. आपका हास-परिहास वाला लहज़ा पसंद आया. बढ़िया चर्चा रही चिट्ठों की.

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  3. देबू दा, इस बार की चिट्ठा चर्चा में एनडीटीवी की अघोषित और खामोश योजना की ताड़ लेने की आपकी कोशिश के लिए सलाम। संदेह हमारे जातीय समाजों की पूंजी रही है। लेकिन मैं बता दूं कि जो सहज रूप से हो रहा है उसे इतने नियोजित तरीके से देखने की ज़रूरत नहीं है। हिंदी में कंपोज़ बॉक्‍स का हिंदिनी औज़ार जब सुनील दीपक ने मुझे दिया था, तो बस यूं ही मैंने मोहल्‍ला शुरू किया था। लिखने में हाथ तंग है, तो सहकर्मी साथियों से कहा कि यार शुरू तो कर लिया लेकिन अब इसमें दिया क्‍या जाए। फिर रवीश कुमार, उमाशंकर सिंह, हृदयेश जोशी ने समय निकाल कर हमारे लिए लिखा। रवीश को चस्‍का लग गया और उन्‍होंने अपनी दुकान खोली। वे लिखने की फैक्‍ट्री हैं, तो रोज़ माल निकालते हैं। लेकिन एक दिन तबीयत ख़राब थी, तो संजय अहिरवाल से लिखवा लिया। मुझे झटका लगा, तो मैंने पंकज पचौरी को टाप लिया। अब मैं रूपाली और निधि कुलपति के पीछे पड़ा हूं। हाल ये है कि जैसे ही हमलोग न्‍यूज़रूम में घुसते हैं, अछूत की तरह लोग देखने लगे हैं- आ गये मोहल्‍लावाले! आ गये कस्‍बेवाले! तो अंदर का हाल ये है देबू दा और बाहर की दुनिया में इस इस तरह के कयास! लेकिन चलिए मज़ा आ रहा है।

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  4. अविनाश, हिन्दी चिट्ठाकारी के व्यावसायिक पहलू की ओर नज़र डालने वाले चंद लोगों में इस नाचीज़ का भी हाथ रहा है, शेखचिल्ली जी और इंस्टाब्लॉग्स वाले गवाह हैं। निरंतर को अपने पैरों खड़ा देखने की मेरी चाह रही है और हिन्दी ही नहीं पूरे ब्लॉगिंग परिदृश्य का बर्ड्स आइ व्यू लेने की हमेशा मेरी रुचि रही है, इस यात्रा को काफी पहले से देख रहा हूँ शायद इसलिये भी। मेरे "कांस्पिरेसी थियोरी" के प्रयोग से ये न समझें कि कोई अपमान का इरादा था, अनूप की शागिर्दी में बस मौज लेने के लिये लिखा। मुझे मुख्यधारा के मीडिया को ब्लॉगिंग की आँच में हाथ सेंकते देख कोई तकलीफ नहीं है, मेरे विचार से ये ब्लॉगिंग के पाठक वर्ग में इज़ाफा ही करेगा और अगर हिन्दी चिट्ठाकारों मे से मुट्ठी भर भी प्रोफेशनल चिट्ठाकार बन सके तो मुझे भी बेहद खुशी होगी। आप ने कहा कि कोई बिज़नेस प्लान नहीं तो कोई बात नहीं, हमने मान लिया। ऐसी योजना होती भी तो कोई बुरी बात न थी, हार्वेस्टर की बात यही बताने के लिये की कि यदि बिज़नेस प्लान आय को ध्येय बना कर बनाये जा रहे हैं तो दिल्ली बहुत दूर है। बकिया स्वांतः सुखाय तो हम सब ये कर ही रहे हैं हमारी हिन्दी के सम्मान में।

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