शनिवार, फ़रवरी 17, 2007

देर है पर अंधेर नहीं

चर्चा के दरबार में देर है पर अंधेर नहीं, यह साबित करने के लिये पेश आज की डीलेड चर्चा।

केबल पर पैनल चर्चाओं में समय के टोटे का हाल सुना रहे हैं अज़दक, पर मृणाल थोड़ी गंभीरता से कह रहे हैं

अखबार और टेलीविज़न चैनल बमवर्षक विमानों की तरह जिस ब्रेकिंग न्यूज़ की गोलाबारी हमारे बेडरूम और मस्तिष्क पर कर जाते हैं वह विषय महत्वपूर्ण विषय बन जाता है। परेशान करने वाली बात यह है कि क्या हम इतने सीमित बुद्धि वाले प्राणी हैं कि एक समय में हम कई ध्यान देने योग्य मुद्दों को भुलाकर केवल एक विषय को सर्वाधिक महत्वपूर्ण और गम्भीर मान पाते हैं।

रवि रतलामी ने गूगल एडसेंस के साथ अपने तजुर्बे के हवाले से राय ज़ाहिर की कि "हिन्दी चिट्ठाकारी भी व्यावसायिक रूप से सफलता के झंडे गाड़ने के लिए तत्पर और तैयार है, बस समय की बात है"। इस पर ताउ बोल बैठे, "मेरे विचार से इस लेख का लिंक हर जगह होना चाहिए।" जाल पर हिन्दी का बोलबाला ऐसा बढ़ रहा है कि रवि जैसे चिट्ठाकारों के लेख लोग लिंक क्या समूचा उड़ा कर ही चैंप देते हैं।

पूनम ने "उनको" जगाने के लिये चाय बनाई। दो कप बनाई। रोज़ बनाती हैं पर मेरे ख्याल से चाय में चीनी नहीं मिलातीं। वो "उनके" गुड मार्निंग कहने पर खुद ब खुद घुल जाया करती है। पूनम पहले चाय में अदरक डालती थीं, अब नहीं डालती। अदरक डालने से चाय "ढाबे वाली" बन जाती है। पूनम ने "उनकी" चाय कभी नहीं पी। पूनम जिद्दी हैं। जिद्दी मैं भी हूँ। पूरे पाँच मर्तबा कविता पढ़ी। छठवीं बार पढ़ने से पहले नज़र आई उड़न तश्तरी की टिप्पणी, "मन की उहापोह का सजीव चित्रण, बधाई! बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कहती रचना"। कविता छठवीं बार नहीं पढ़ी मैंने। जब समीर ने नहीं पढ़ी तो मैं क्यों पढ़ूं?#

वैंलैटाईंस डे जैसे हर डे से विचलित अतुल "लखनवी" की धपजी उन्हें मन्ना डे के दर्दीले पार्श्वगीतों के साथ लौकी थमा लर निकल पड़ी शॉपिंग डे पर और ताउ ने हमारे मौकापरस्त देश की परंपरा को कायम रखते हुये घोषणा कर दी ब्लॉग रीडर्स डे की!

हिन्दी ब्लॉगजगत में मेम (Meme) खास लोकप्रिय नहीं। रचना ने "अपने बारे में पाँच तथ्य" के टैग में अपना पक्ष दिया और बकौल उनमुक्त चार "जी" और एक "भाई" को टैग किया।

हिन्दी विकीपिडिया पर अनूप के लेख पर कई पाठकों ने सवाल किया कि लिखना तो है पर आखिरकार विकीपीडीया पर लिखें कैसे। मितुल ने इसी पर हिंदिनी पर दो भागों में लेख लिखा। लेख के भाग 1 और भाग 2 ज़रूर पढ़ें।

बजट क्या है और इसे कैसे प्रस्तुत किया जाता है जानें लोकमंच पर

मासीजीवी बता रहे हैं कि गोदना विमर्श में हिंदी अब हाशिए पर नहीं है। घुघूती बासूती ने टिप्पणी की "अब गर्दन पकड़कर लोगों को हिन्दी पढ़वा नहीं सकते तो उनकी गर्दन पर लिख तो सकते हैं।"

आज का चित्र

आज का चित्र, शुऐब के चिट्ठे पर हमारे राष्ट्रपति की चित्रमय झांकी से

#दिल पे मत लो यारों!

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3 टिप्‍पणियां:

  1. पूनम की चाय का जिक्र जिस तरीके से किया, उनकी कविता बिना पढ़े रह नहीं पाया।
    गजब कविता और गजब आपका अंदाज उसे पेश करने का।

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  2. छठवीं बार पढ़ने से पहले नज़र आई उड़न तश्तरी की टिप्पणी, "मन की उहापोह का सजीव चित्रण, बधाई! बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कहती रचना"। कविता छठवीं बार नहीं पढ़ी मैंने। जब समीर ने नहीं पढ़ी तो मैं क्यों पढ़ूं?#

    -हा हा, बहुत गजब समझ है, देबु भाई. ऐसा करेंगे आप, तो मिल चुके हमें एक भी वोट. :) अब तो क्या सचमुच सब कविता पूरी पढ़ समझ कर टिप्पणी करनी पडेगी, कुछ तो रहम करो. रोज कितनी रची जा रही हैं, सब तो आपके सामने है. :)

    -वैसे 'दो कप चाय' वाकई पूरी पढ़ समझ कर, अंतर्निहीत भावों को समझ कर ही टिपियायी थी, तो पूनम जी निश्चिंत रहें, अपकी कविता मै सचमुच पढ़ता हूँ. :)

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  3. अनूप शुक्लाफ़रवरी 18, 2007 12:55 pm

    शरारतपूर्ण चर्चा। जब कविता समझ में नहीं आती तो समझने का प्रयास काहे करते हो? इससे अच्छी समझ तो जीतेंद्र की है जिसको कविता का ककहरा नहीं आता! पूनम जी की इतनी अच्छी कविता पर ऐसी शरारती टिप्पणी करते हो। ये अच्छी बात नहीं है। बाकी चर्चा चकाचक, चुस्त, चुर्रैट!

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