शनिवार, मार्च 17, 2007

आई एम लविंग इट

रवि ने ख़बर दी कि दैनिक हिंदुस्तान के हिन्दी व अंग्रेज़ी संस्करणों में हिन्दी चिट्ठों पर लेख छपा है। इस लेख के बारे में सबसे पहले तो यही कहना चाहूंगा कि मुख्यधारा का मीडिया किस कदर आत्ममुग्धता और बेखबरी के आलम में पड़ा होता है यह इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। लेख में एक जगह कहा गया है कि "हिन्दी ब्लॉगिंग को क्या हिंदुस्तान नज़रअंदाज़ कर सकता है", ये नादान भूल गये कि इनके समूह से ही प्रकाशित कादंबिनी पत्रिका में गौरी पालीवाल, जो सराय की छात्रवृत्ति पर इस साल शोध भी कर रही हैं, ने सबसे पहले हिन्दी चिट्ठों के बारे में लिखा था। खैर कादंबिनी तो समूह में हाशिये पर ही पड़ी रही होगी तो इसके लेखों की कौन परवाह करता होगा। एनडीटीवी के पत्रकारों का मन इस नये लॉलीपॉप को चूस चूस कर भी भर नहीं रहा, पहले मिडडे, फिर हिंदुस्तान, मीडिया के इनके दोस्त वही देख रहे हैं जो ये दिखा रहे हैं और यही बात दूर तलक जायेगी। धुरविरोधी के चिट्ठे पर अविनाश ने भोलेपन से लिखा, "नीलेश की रपट एकांगी है। मुझसे जब बात हुई, तब मैंने उन्हें नारद के बारे में विस्तार से बताया था। पता नहीं क्यों उन्होंने ज़िक्र तक नहीं किया।" अमिताभ इस में कुछ षड़यंत्र के पदचाप सुन रहे हैं। शिल्पा ने लिखा, "शायद इसलिये जलन हो रही है कि आपका नाम नहीं लिखा गया"। सृजन बोले, "कम से कम रवि रतलामी जी का जिक्र हुआ, यह संतोष की बात लगी"। पर सौ टके की बात कही पंकज ने, "गलती उनकी नही है. हमारी है। अपनी पहचान खुद बनानी पडती है…कहीं ना कहीं रह ही गई है…आज की दुनिया में प्रचार का भी उतना ही महत्व है"।

मेरे इस विषय पर दो विचार हैं, पहला कि ये कि मुख्यधारा के मीडिया में चिट्ठों के ज़िक्र से चिट्ठामंडल का भला ही होगा, ये चीटों की फिरोमोन ट्रेल है, लोग आप तक ज़रूर पहुँचेंगे। दूसरा यह, की भाड़ में जायें, क्या हम ब्लॉगिंग इनके लिये करते हैं, मेरी अतुकांत कवितायें जो नवनीत ने लौटा दी थीं वो मैं गर्व से अपने ब्लॉग पर छापुंगा, मुझे परवाह नहीं। तुम पत्रिका छापते हो तो निरंतर हम भी छापते हैं। तुम एयर वेव्स की सवारी करते हो तो पॉडकास्टिंग हम भी करते हैं। हम पत्रकार भी हैं, प्रकाशक भी, हम वकील भी हैं, पुलिस और जज भी, हम समाजसेवी भी हैं, गृहस्थ भी। और हमें पैसे दे कर भी तुम्हारे मन का नहीं लिखवा सकते, हमारे सर पर किसी संपादक, किसी विज्ञापनदाता का पेपरवेट नहीं रखा। बाकी जवाब मुक्ति के दिन ही देंगे। हिन्दी चिट्ठा जगत में टीवी पत्रकारों के पदार्पण पर ही मानो मान्या ने लिखा
तुमसे मिलना, एक अजीब-अद्भुत संयोग
विपरीत धाराओं से मैं और तुम
उलझ जाते हर बार जब भी मिलते
ना तो मैं तुम्हारी सुनती, ना तुम मुझे समझते
दोनों बस अपनी ही रौ में बहते
टीवी पत्रकारों की ही बात करते हैं। सूचक ने लिखा, "कैमरों में कैद तस्वीरों से सच दिखता है। पर उसे पेश करने के तरीके से वो धुंधला हो जाता है।" इधर अविनाश की लगाई चिट्ठाई आग से उनका घर ही फुंका जा रहा है, कुछ लोग सिटिंग आन द फेंस भी मज़ा ले रहे हैं, "आई एम लविंग इट"। दिलीप कुमार के अहं की बात करने वाले लोग न जाने क्यों जब भी इकट्ठा होते हैं, सर फुट्टोवल की स्थिति आ जाती है। खैर कभी मेरे आराध्य रहे अमिताभ कर खिलाफ़ माहौल गर्माता जा रहा है। पर योगेश हिन्दी ब्लॉगमंडल में मुहल्ला पुराण और फिर छद्मनाम पर हुये कसैली चर्चाओं से दूर जाने की सलाह दे रहे हैं।

यदि आप कभी रेडियो के दीवाने रहे हैं तो फरमाइशी गीतों के कार्यक्रमों में ‘झुमरी तिलैया’ का नाम अवश्‍य सुना होगा। 1950 से 1980 तक रेडियो से प्रसारित होने वाले फिल्मी गीतों के फरमाइशी कार्यक्रमों में शायद ही किसी गीत को सुनने के लिए झुमरी तिलैया के श्रोताओं ने फरमाइश न भेजी हो। पढ़िये कमल शर्मा की रोचक प्रविष्टि। सिलेमा में पढ़िये ईरानी फिल्मों के बारे में, प्रमोद आप IMDB की कड़ियाँ भी दिया कीजीये।

पंजाब प्रकाशसिंह बादल ने सत्ता संभालते ही पूर्वमुख्‍यमंत्री और उनके परिवारजनों पर आय से अधिक संपत्ति रखने के कानूनी मामलों में फाँस लिया। भुवनेश जानते हुये भी सवाल कर रहे हैं कि क्या ये पूर्वनियोजित है।
इस प्रकार की घटनाएं कांग्रेस के जगजाहिर चरित्र पर तो सवालिया निशान लगाती ही हैं उससे भी ज्यादा न्यायपालिका पर भी सवाल खड़े करती हैं। हालांकि ऐसी घटनाओं के लिए उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालयों पर सवाल उठाना तो ठीक नहीं होगा क्योंकि इन्हीं के कारण आज भी एक आम भारतवासी न्यायपालिका पर विश्वास करता है। परंतु जो मामले निचली अदालतों से संबंधित हैं, उनमें एक समय विशेष पर ही अदालत द्वारा कार्रवाई करना संदेह पैदा करता है।
अनूप ने चुटकी ली, "राजनीति की मंडी बड़ी नशीली है, इस मंडी ने सारी मदिरा पी ली है।"

सेठ होशंगाबादी का विचार है , "धन का चरित्र पानी की तरह नहीं होता कि यह पहले खाली जगह में जाए। यह तो पहले भरी जगह जाता है। जब आर्थिक विकास होता है तो सबसे पहले और ज्यादा लाभ उनको होता है जिनकी तिजौरियां भरी होती हैं।"

सुनील ने हिजाब पर विचारोत्तेजक लेख लिखा ह,ै और इसमें मोदीवाद की झलक पा कर संजय झूम पड़े ;)। सुनील ने लिखाः
मुझे तस्लीमा की बात सही लगती है कि सब बुरके, हिजाब, सिर ढकने वाले कपड़े, पृतवादी समाज के द्वारा स्त्री को दबाने के अलग अलग तरीके हैं, इसलिए भी कि यह आप को क्या पहने या न पहने को चुनने की स्वतंत्रता नहीं देता.
और चलते चलतेः

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12 टिप्‍पणियां:

  1. महाराज,
    यह थोडी सचमुच सुघड चिट्ठी है। धन्‍यवाद।

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  2. वाकई बहुत अच्छी चर्चा की है आपने, चर्चा इसी तरह की होनी चाहिये। इसे देख कर लगता है कि अभी बहुत कुछ सीखना होगा मुझे।

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  3. बहुत उम्दा रही चर्चा आज की। पिछली बार से मुझे यह महसूस हो रहा है कि आगे बढ़ते चिट्ठों की संख्या के साथ तुम्हारी चर्चा का अन्दाज 'रोल चर्चा' के रूप में होगा। हिंदुस्तान पर ब्लागिंग से सम्बंधित समाचार के बारे में तुम्हारे हीरो का डायलाग याद आता है- लाइन वहां से शुरू होती है जहां हम खड़े हो जाते हैं। जहां से मीडिया वाले आ गये वहीं से ब्लागिंग की शुरुआत हो गयी। बधाई !

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  4. बहुत कायदे से आपने चिट्ठा चर्चा की है। आपको बहुत बहुत बधाई।

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  5. यह स्टाईल बहुत भाई, भाई. इसी तरह कहना ठीक रहेगा चर्चा को!! बधाई.. :)

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  6. बहुत सधी हुई चिट्ठा चर्चा। वाकई अच्छा लगा।

    उपरोक्त प्रकरण पर मैने संजय भाई के ब्लॉग पर एक टिप्पणी की थी:
    संजय भाई,
    इस समाचार को दूसरी तरह लीजिए, लोगों ने दोस्ती निभायी है, साथ ही हिन्दी ब्लॉगिंग की बात भी की है। निराश मत होइए। ऐसे बहुत सारे लोग आएंगे जो एक ब्लॉग पोस्ट लिखकर, स्वयं को हिन्दी चिट्ठाकारी का प्रणेता कहेंगे, तब क्या करेंगे? उनके कहने से क्या ऐसा हो जाएगा?

    जहाँ हिन्दी चिट्ठाकारी की निष्पक्ष चर्चा की बात है, नारद की अनदेखी करने की बात है। ये मीडिया के साथियों की बेइज्जती है और साथ ही यह भी सिद्द करता है कि इनकी समझ कितनी कम है। और कम अक्ल की बात का क्या बुरा मानना। जिन साहबान ने भी यह लेख लिखा है उसे सामूहिक रुप से चिट्ठी लिखी जाए और उसे हिन्दी चिट्ठाकारी के बारे मे जानकारी दी जाए। उम्मीद है दोगनी संख्या मे मीडिया के साथी हिन्दी चिट्ठाकारी के बारे मे निष्पक्ष रुप से लिखेंगे, बिना दोस्ती निभाए।

    अब कुछ सवाल हम अपने आपसे पूछें:

    क्या हम ब्लॉग मीडिया के लोगों के लिए लिखते है?
    क्या फूल की सुगंध को रोका जा सकता है?
    क्या नारद पर कोई चिट्ठा रजिस्टर किए बगैर, दुनिया उसके बारे मे जान पाएगी?
    अगर मीडिया वाले नही बताएंगे तो क्या लोग चिट्ठाकारी के बारे मे नही जान सकेंगे?


    रही बात नारद के बिकने की बात, नारद के दरवाजे सबके लिए समान रुप से खुले है, ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर। किसी भी तरह का पक्षपात नही। लेकिन हाँ, नियमावली से खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नही जाएगा। नारद को हमने आज तक विज्ञापन रहित रखा है, किसी भी तरह का प्रायोजित कार्यक्रम नही चलाया और ना ही कभी चलाएंगे। नारद नान-प्रोफ़िट था और रहेगा। नारद चिट्ठाकारों के सामूहिक सहयोग पर निर्भर है यही हमारी सबसे बड़ी ताकत है।

    इसलिए मस्त रहिए और लिखते रहिए। हमे किसी के भी प्रमाणपत्र की जरुरत नही।

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  7. नीरज दीवानमार्च 17, 2007 11:21 pm

    किसी भी साथी को किसी और के प्रमाणपत्र की ज़रूरत नहीं.देशभर के अख़बारों की कतरनों के बीच सात साल बैठकर इतना तो समझ ही चुका हूं कि कौन-कब किस कतार में खड़ा होकर मूत्र विसर्जन करता है. क़तारों पर न जाओ.. खेमेबाज़ी पर न जाओ.. अपनी अक़ल लगाओ. ख्वामख़्वाह ..हम इसे तवज्जो क्यों दे? मैं यह भी पूछता हूं कि क्या हमें तभी संतुष्टि मिलेगी जब हमारा किया-धरा अख़बार और चैनलों में आंका जाए? ये मोह क्यों? हमने फिर ब्लागिंग शुरू ही क्यों थी? हम समानांतर माध्यम लेकर चल ही इसलिए रहे हैं क्योंकि हम आज़ाद रहना चाहते हैं. ये मौक़ा मीडिया ने दिया होता तो समानांतर चलने की ज़रूरत क्या थी?

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  8. चर्चा पसंद करने के लिये शुक्रिया। नीरज ने पते की बात कर दी है और मैं उनसे बिल्कुल सहमत हूँ।

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  9. इतनी बेबाक चर्चा के लिये साधुवाद! मुझे ये पन्क्तयाँ सर्वाधिक पसँद आईं-
    //हम पत्रकार भी हैं, प्रकाशक भी, हम वकील भी हैं, पुलिस और जज भी, हम समाजसेवी भी हैं, गृहस्थ भी। और हमें पैसे दे कर भी तुम्हारे मन का नहीं लिखवा सकते, हमारे सर पर किसी संपादक, किसी विज्ञापनदाता का पेपरवेट नहीं रखा//

    चिट्ठाकारी का एक आयाम, जो मुझे लगा वो ये भी कि ये एक चिट्ठाकार के समांतर व्यक्तित्व ( जो उसके भौतिक परिवेश और जीविका कमाने के लिये किये जाने वाले काम से अलग है )को भी दिखाता है..इसलिये यहाँ पर अगर भी अखबारों, पत्रिकाओं की तरह गड्ड्मगड्ड विचार और शब्दों के महाजाल होंगे तो इनका मूल आकर्षण जाता रहेगा.

    नीरज जी और जीतू भाई की बातों से सहमत हूँ.

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  10. जीतू, नारद से जुड़े होने के बावजूद मुझे ये लाइन गैरजरूरी लगती है-क्या नारद पर कोई चिट्ठा रजिस्टर किए बगैर, दुनिया उसके बारे मे जान पाएगी?यह ऐंठ ठीक नहीं है। यह मत भूलो कि ब्लाग्स हैं तो नारद है।यह नहीं कि नारद था इसलिये ब्लाग्स लिखने लगे लोग! अपनी तुरही खुद बजाने से बचना चाहिये हम लोगों को। कोई दूसरा टोंके और जिसका तुम्हे बुरा लगे इसके पहले मैंने इशारा करना जरूरी समझा! :)

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  11. वाह दादा मैं सोच रहा था कि इस बारे कुछ कहूं लेकिन आपकी इस धांसू चर्चा के बाद कहने को कुछ बचा ही नहीं।

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  12. इसमें मोदीवाद की झलक पा कर संजय झूम पड़े ;)

    दादा आपकी इस लाइन पर मुझे आपत्ति है. मजाक ठीक है पर भैया को किसी वाद से मत जोडिए.

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