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सीमित बुद्धि के कयासी निष्कर्ष

मेहरबान कद्रदान, आज की चिट्ठा चर्चा में तेज़ सुर्खयों का करें पान


  • गाँधी पर बहस बढ़ी जा रही है। पहले अनूप ने सृजन शिल्पी को छेड़ दिया, उसके बाद सागर के बाबा रामदेव द्वारा कवि प्रदीप को चापलूस पुकारने के वक्तव्य का समर्थन करने पर ऐसी खबर ली कि वे बीमार ही पड़ गये। अब अगला जवाबी चिट्ठा किसका होगा इंतज़ार रहेगा।
    बड़े से बड़े समाजशास्त्री भी सामाजिक, राजनैतिक घटनाऒं का पोस्टमार्टम/व्याख्या कर सकते हैं, वर्तमान के आधार पर भविष्य का पूर्वानुमान लगा सकते हैं लेकिन सटीक भविष्यवाणी नहीं कर सकते। ऐसा संभव ही नहीं है। इसी तरह अतीत में घट चुकी घटनाऒं पर कुछ अपने तर्क और ‘डाटा’ रखकर यह कहना कि अगर ऐसा होता तो आज वैसा होता कहने का कोई मतलब नहीं होता। क्योंकि जिस समय आप इस तरह के तर्क पेश कर रहे होते हैं तो वे केवल आपकी सीमित बुद्धि के कयासी (अनुमानित) निष्कर्ष होते हैं। बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति(यों) भी तमाम अपनी काबिलियत के चरम पर होने के बावजूद किसी भी घटना के बारे में ऐसी कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकते जिसके होने की प्रतिशतता १००% हो। गांधीजी के दक्षिण अफ्रीका जाने तक का जीवन भी एक आम सत्यवादी व्यक्ति का जीवन था और ऐसी कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती थी कि यह व्यक्ति एक दिन देश क्या विश्व का विलक्षण व्यक्तित्व बनेगा।
  • अपने ब्लॉग थीम के स्क्युबल थीम से बेहतरीन रूपांतरण करने के बाद तरुण का अपराध बोध बुनो कहानी से निट्ठला चिंतन तक जा पहुंचा है इस उम्मीद से कोई कहानी पूरी कर उनके मन को हल्का करेगा। भाई ऐ भाई! अरे कोई सुन रहा है भाई!

  • गुरु के आगे नतमस्तक हैं जगदीश हालांकि भावावेश में वे अभिषेक बच्चन के अभिनय(?) तक की तारीफ कर गये। पर ये क्या तारीफ तो नितिन भी कर रहे हैं निश्चित ही अभिषेक ”आज खुश तो बहुत होंगे तुम..हैं..???" वैसे समझ ये नहीं आता कि हिन्दी का "ह" भी न समझ पाने वाले दक्षिण के ये दिग्दर्शक (सब्र रखो मणि के अंधभक्तों, प्रियदर्शन को भी लपेटे में ले रहा हूं) हिन्दी पटकथा समझ कैसे लेते हैं, ये सोनिया गाँधी का भाषण तो है नहीं कि फकत बोलने की जरूरत हो, समझने की नहीं। नितिन गुलज़ार के गीत के कई बोल भी नहीं समझ पाये। ये तो सब के साथ होता है, मनबोल देखें, एक खोजो सेंकड़ों मिलेंगे। जगदीश ने लिखाः
    ख्वाब कभी पूरे नहीं हो पाते, जब आप देश की सबसे बड़ी कम्पनी बनाने का ख्वाब देखते हैं, एक बहुत बड़ा सपना होता है यह और जब आप इसे छू लेते हैं तो आपका सपना होता है उसे दुनिया की सबसे बड़ी कम्पनी बनाना। बहुत ही रोमांचकारी लगता है उस इतिहास पर फिल्म देखना जिस इतिहास को आपने स्वयं देखा हो।
  • मंदाकिनी की बहन की घुमावदार सरंचना स्पष्ट रूप से देख रहे हैं लोग, यूंही
  • मुंबई की चौपाल, जहाँ नई पीढ़ी के लोग बुज़ुर्गों के साथ बैठकर एक साथ बात करते हैं, को जाल पर भी खींच लाई हैं नीलिमा।
  • इधर संवाद की महिमा बखुबी समझने वाले ईपंडित वर्डप्रेस से ब्लॉगर धाम की ओर पलायन करने को उतारू हैं और रोक कोई नहीं रहा। उधर वर्डप्रेस खेमे से अलग हुये लोगों के नये शगूफ़े हबारी पर हो रही है नुक्ताचीनी
  • "हम सब ज्ञानी हैं" का नारा लगाकर जीतेंद्र ने सहेजना शुरु किया है सुझावों का खजाना
  • सूचक को विश्वास है कि पत्रकार बदलेंगे, मीडिया युग बदलेगा। जब खबरों के चैनलों और मनोरंजन चैनलों के बीच का अंतर घटता रहा हो तो यह आशावादिता ही शायद काम आये। सवाल जायज है पर जवाब टीआरपी में है
    ये सवाल अपने आप में ही जायज हो जाता कि कितना देखना है और कितना दिखाना है। कितना बेचना है और कितना बचाना है। क्या खबर के नाम पर हर जानकारी देना दर्शक को बांधे रखता है। बीमारी बताइए। दोष बताइए। दोषी बताइए। पर नाट्य रूपांतरण क्यों। क्या बच्चे को समझाना है या एडल्ट को।
  • संजय ने खोज निकाली एक नई विक्शनरी और उधर पंकज ने मंतव्य का वाढदिवस बरसी की तरह मना डाला
  • विदेशी हवा में देसी गंध को तरसते ईस्वामी ने साफ सुथरी फिल्म बनाने के आरोपी सूरज बड़जात्या को क्लीन चिट दे दी
    “विवाह” देखना टाईम-ट्रैवल कर के सतयुग का चक्कर लगा आने जैसा है. चरित्रों का अच्छापन, उनकी पारंपरिकता और और उनकी भावुकता अवास्तविक और अतिशय लगती है. लेकिन वहीं फ़िल्म के कुछ संवाद, कुछ तत्व आम भारतीय रोज़मर्रा वाले जीवन के इतने करीब और सही हैं की दूसरी चीजों पर उपजी खीज़ कम हो जाती है. कुछ भी कहें सूरज बडजात्या को ‘जिस्म’ और ‘मर्डर’ जैसी फ़िल्मों के समय में इस प्रयास के लिए दाद देनी होगी!

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  1. Anonymous rachana कहते हैं:

    देबाशीष जी, आपकी तेज़ सुर्खियों मे से 'सबसे तेज़'-
    "वैसे समझ ये नहीं आता कि हिन्दी का "ह" भी न समझ पाने वाले दक्षिण के ये दिग्दर्शक (सब्र रखो मणि के अंधभक्तों, प्रियदर्शन को भी लपेटे में ले रहा हूं) हिन्दी पटकथा समझ कैसे लेते हैं, ये सोनिया गाँधी का भाषण तो है नहीं कि फकत बोलने की जरूरत हो, समझने की नहीं।"

    मन को भा गई!

  2. Blogger प्रभाकर पाण्डेय कहते हैं:

    जीवंत चिट्ठाचर्चा ।

  3. Anonymous Amit कहते हैं:

    वैसे समझ ये नहीं आता कि हिन्दी का "ह" भी न समझ पाने वाले दक्षिण के ये दिग्दर्शक (सब्र रखो मणि के अंधभक्तों, प्रियदर्शन को भी लपेटे में ले रहा हूं) हिन्दी पटकथा समझ कैसे लेते हैं, ये सोनिया गाँधी का भाषण तो है नहीं कि फकत बोलने की जरूरत हो, समझने की नहीं।

    क्यों भूल रहें देबू दा कि अनुवादकों की कमी नहीं है। हो सकता है कि पटकथा का अनुवाद उन निर्देशकों की भाषा में करा दिया जाता हो जिस कारण वे उसे समझ लेते होंगे। वैसे भी अधिकतर कहानियों के plot आदि तो घिसे-पिटे ही होते हैं, तो थोड़ा पढ़ के भी अनुमान हो जाता है कि गंगा कहाँ बह रही है, क्यों?!! ;)

  4. Blogger Debashish कहते हैं:

    मेरे काबिल दोस्त अमित, कई बार कोई बात फक्त कहने के लिते ही कही जाती है, हर जगह हर चीज़ का वैज्ञानिक विश्लेषण तो नहीं हो सकता न! तुम्हारे बस चले तो तुम गुलज़ार साहब के शेर को कुछ यूं लिखोगे ;)

    शाम से आँख में नमी सी है।
    शायद विटामिन ए की कमी सी है।।

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