शीर्षक पढ़ लिया? अब कविता का कंटेंट पढ़िए;
कहीं स्वाइन फ्लू जैसा रोग है
कहीं आँगन में पसरा सोग है
कहीं ठण्ड के मारे हड्डियाँ चटक रही हैं
कहीं भूखी बुढ़िया भिक्षा को भटक रही है
लेकिन तुम्हें दिखाई नहीं देता
रुदन किसी का सुनाई नहीं देता
इसीलिए
शायद इसीलिए इतना ऐंठी हो
लोग माथा पीट रहे हैं
और तुम लिंग पकड़ कर बैठी हो
तुम्हारे दिल में ज़रा भी दर्द नहीं है
लगता है
तुम्हारी ज़िंदगी में कोई मर्द नहीं है
वरना ऐसे फालतू काम नहीं करती
भले लोगों को बदनाम नहीं करती
क्योंकि देह जिसकी असंतुष्ट होती है
सारी दुनियाँ उसके लिए दुष्ट होती है
न तो कोई ढंग का काम कर पाती है
न वह आराम से आराम कर पाती है
देखो ज़रा....
जग हर्ष मन रहा है
नव वर्ष मना रहा है
और तुम?
हाँ हाँ तुम!
अपने आपको
भाषा की जंजीरों में जकड कर बैठी हो
दुनियाँ चाँद पर पहुँच गयी
और तुम यहाँ लिंग पकड़ कर बैठी हो
लिंग ही पकड़ना था तो
किसी ज्योतिर्लिंग को पकड़ती
काशी में शिवलिंग को पकड़ती
मेवाड़ में एकलिंग को पकड़ती
तुम भी तर जाती
तुम्हारा कुनबा भी तर जाता
जहर जीतता भरा है
तुम्हारे भीतर' वह मर जाता
लेकिन तुम्हारे ऐसे सौभाग्य कहाँ?
सूर्पनखा के भाग्य में वैराग्य कहाँ?
उसे तो नाक कटनी है
और लुटिया डुबानी है
हे आधुनिक सूर्पनखा!
पुल्लिंग और स्त्रीलिंग में क्या सार है?
मेरी आँख से देख इसके अलावा भी संसार है
मगर तुम जिद्दी प्राणी हो' सच पहचानोगी नहीं
अपने घमंड के आगे किसी को मानोगी नहीं
इसलिए
ऐंठी रहो!
ऐंठी रहो
ऐंठी रहो
हम तो अपने काम में लग रहे हैं
तुम लिंग पकड़कर
बैठी रहो!
बैठी रहो!
बैठी रहो!
महाकवि की इस कालजयी कविता पर रामचरित मानस तथा भगवद गीता के जानकार और देवभाषा के पक्षधर श्री अरविन्द मिश्र की टिप्पणी पढ़िए;
जबर्दस्त- कवि अपने पर उतरता है तो दुर्वासा भी बनता है और तुलसी भी.
नववर्ष की मंगल शुभकामनाएं
आदरणीय राज भाटिया जी की टिप्पणी पढ़कर लगा जैसे वे भी ऐसा कुछ कहना चाहते थे लेकिन कह नहीं पाए. पता नहीं क्या मजबूरी थी? उन्होंने अपनी टिप्पणी में लिखा;
अलबेला भाई जीयो खूब जीयो, बहुत सुन्दर और सटीक कविता कही, जो बात हम सब नहीं कह पाए वो आपने कह दी, हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा......इस कालजयी कविता का सन्दर्भ अरविन्द मिश्र जी की पोस्ट है. जहाँ आयी टिप्पणियां भी महाकवि अलबेला खत्री जी की कविता से जरा भी कमतर नहीं हैं.
आप में से कुछ कह सकते हैं कि केवल एक पोस्ट को इतना महत्व देने की क्या ज़रुरत है? या फिर यह कि मुझे चिट्ठाचर्चा जैसे मंच इस्तेमाल कर किसी के खिलाफ लिखना शोभा नहीं देता.
मेरा कहना है;
ब्लॉग जगत को ख़राब किया जा रहा है.
ब्लॉग जगत में गुटबाजी हो रही है.
ब्लॉग जगत से गंध आ रही है.
कुछ लोगों ने ब्लॉग जगत को बर्बाद करने का बीड़ा उठा लिया है.
या इसी तरह की और बातें कहने वाले लोग खुद क्या कर रहे हैं? ब्लॉगर का स्त्रीलिंग क्या होना चाहिए? क्या महिला ब्लॉगर को ब्लागरा कहा जा सकता है? ऐसी बातों को आधार बनाकर दस लाइन की पोस्ट लिखकर तथाकथित बहस चलाकर ब्लॉग जगत का क्या भला किया जा रहा है? कितना भला किया जा रहा है? कहने की ज़रुरत नहीं कि रचना जी की टिप्पणियों और उनकी पोस्ट को आधार बनाकर कुछ लिखना और उसपर तथाकथित बहस करवाना किस तरह की ब्लागिंग है?
मैं और मेरे जैसे तमाम लोग यह मानते हैं कि ब्लॉग अभिव्यक्ति का माध्यम है. जो चाहे लिख सकते हैं. लेकिन क्या ऐसा कुछ लिखा जाना चाहिए जैसा परम आदरणीय अलबेला खत्री जी ने लिखा है? भौंडेपन की कोई लिमिट है कि नहीं? पाकिस्तानी हास्यास्पद रस के कलाकारों के साथ टेलीविजन पर तथाकथित लाफ्टर के फटके मारते-मारते इतना गिर जायेंगे कि ब्लॉग पर इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करेंगे? और टिप्पणी करने वाले बुद्धिजीवी उन्हें तुलसी और दुर्वासा बता रहे हैं.
कौन सी बहस महत्वपूर्ण है? यह कि "महिला ब्लॉगर को ब्लागरा कहा जाय?" या फिर यह कि "किसी के खिलाफ इस तरह की कविता लिखी जा सकती या नहीं?"
एक बार सोचियेगा.
मैं आदरणीय अरविन्द जी से और परम आदरणीय अलबेला खत्री जी से कहना चाहता हूँ कि उनके खिलाफ लिखने का या उन्हें केंद्र में रखकर चर्चा करने का मेरा कोई ध्येय नहीं है. बात केवल इसलिए उठाई गई है ताकि चिट्ठाकार यह तय कर सकें कि तथाकथित बहस के लिए कौन सा मुद्दा ज्यादा महत्वपूर्ण है?