गुरुवार, दिसंबर 03, 2009

सम्मान सहित हम सब कितने अपमानित हैं

रमानाथ अवस्थीजी ने अपनी एक कविता में दिल्ली में रहने का दर्द और अपने गांव के छूटने की टीस बताते हुये कविता लिखी थी—

सम्मान सहित हम सब कितने अपमानित हैं

यह बात गांव की पगडंडी बतलाती है।

रवीश कुमार की यह पोस्ट बांचते समय यह कविता फ़िर याद आई। इसमें रवीश कुमार अपनी जमीन से उजड़ने की टीस और वापस जुड़ न पाने का दर्द बताते हैं। अपने मनोभाव बताते हुये वे लिखते हैं:image बीबी बच्ची के कालेज और स्कूल जाने के बाद लगता है कि किसी वीराने में घिर गया हूं। क्या कोई लौट सकेगा कभी अपनी मां के गर्भ में और वहां से शून्य आकाश में। उन्नीस साल हो गए दिल्ली में। जो मिला वही छूटता चला गया। दरअसल सहेजने आया ही नहीं था,जो सहेज सकूं। हर दिन गंवाने का अहसास गहराता है। लौट कर आता हूं तो ख्याल आता है। क्यों और कब तक इस शहर में बेदिल हो घूमता रहूंगा। इस शहर में जबड़ों को मुसकुराने की कसरत क्यों करनी पड़ती है?

अपनी मां के दिल्ली से जुड़् न पाने की बात कहते हुये वे लिखते हैं:दिल्ली कब तक मुझे बसा कर उजाड़ती रहेगी। यहां बादशाह टिका न आवाम। सब टिके रहने के भ्रम में जी रहे हैं। मेरी तरह कहीं से आए प्रवासी मज़दूर मकान खरीद कर सोचते हैं कि वो दिल्ली में बस रहे हैं।

उनकी इस पोस्ट पर अंशुमाली रस्तोगी की टिप्पणी है:image अभी पिछले दिनों ऐसी ही क्रांतिकारी बातें उदय प्रकाश ने भी कहीं थीं किसी बातचीत में। पर सवाल यह है कि क्या आप अपनी जमीन पर वापस लौट सकेंगे?
शहरों ने हमारे भीतर चकाचौंध पैदा की है। शहरों में रहकर जो अपने गांवों को याद करते हैं, साहस क्यों नहीं करते वापस लौटने का। शायद इसीलिए मैं न बरेली को छोड़ पाया हूं न ही अपने मोहल्ले को। इससे अत्यंत लगाव है मुझे।

इसी बात की तरफ़ इशारा करते हुये कथाकार /सम्पादक अखिलेश ने अपने आत्मकथ्य में लिखा है:image यूं तो कहा जा सकता है, जैसा इधर की रचनाऒं, साक्षात्कारों और व्याख्यानों में रोज-रोज कहा जा सकता है कि हम बहुत हिंस्र या बहुत क्रूर या हत्यारे या कठिन समय में रह रहे हैं। अथवा इसी प्रकार के किसी अन्य विशेषण वाले समय में रह रहें हैं। लेकिन क्या सचमुच जघन्यतम समय आ गया है? घोर कलयुग! यदि ऐसा है तो क्यों एक बड़ा समुदाय कहता हुआ मिलता है कि यह बहुत अच्छा, अग्रगामी समय है। स्त्री से आप पूछिये कि कि क्या वह पुराने समय की स्त्री होना चाहेगी? दलितों से पूछिये कि क्या वे पुराने समय में वापस जाने या पुराने समय को वापस लाने की इच्छा करते हैं? बच्चे से पूछिये, यहां तक कि पुराने समय के किसी वयोव्रद्ध से ही पूछिये कि इस वृद्धावस्था में उन्हें पुराने जमाने के भूगोल में डाल दिया जाये ? बल्कि दिल्ली में रहकर दिल्ली को कोसने वाले कवियों से पूछिये कि वे आदिवासियों के किसी गांव में बसना पसन्द करेंगे? हर जगह नकारात्मक होगा।

अपनी बात को और स्पष्ट करते हुये वे लिखते हैं:सुख, सूचना और सम्पर्क के बेइन्तिहा साधन हो चुके हैं। शिक्षा, चिकित्सा, यातायात सभी में अभूतपूर्व तरक्की हुई है। विवाह के बाद बेटी की आवाज सुनने के लिये मां को अब तरसना नहीं पड़ता है। प्रेमचन्द छप्पन वर्ष की अवस्था में कोलाइटिस से मर गये थे, आज शायद वे बच सकते थे। मेरे बाबा मामूली बीमारी से मर गये थे, आज होते तो मैं उन्हें बचा लेता। मेरे जन्म के पहले मेरा एक भाई बुखार में मर गया। आज शायद न मरता।

यह बात अपने समय और पूर्व-परिवेश से बिछड़े हुये लोगों के बारे में सही प्रतीत होती है। बीत गये समय की तमाम यादें बेतरह सताती हैं लेकिन अगर कोई बीते समय में लौटने को कहे तो हममे से बहुत लौटने से इन्कार कर देंगे।

नीलिमा कल बहुत दिन बाद वापस आईं। उन्होंने महिलाओं की चप्पल-चयन समस्या को व्यापक अंदाज में देखते-परखते हुये लिखा:image हमारे सौंदर्य के मानदंडों में कद और सुंदरता का गहरा नाता है सो अच्छे लंबे कद के प्रदर्शन के फेर में स्त्री अपने लिए ऊंची से ऊंची हील की चप्पलों को पहनती हैं ! अक्सर इस तरह की चप्पलों से उनके पैरों के तकलीफ होती है , थकान बहुत होती है ,गिर पडने का खतरा बढ जाता है नोकदार ऎडी किसी गड्ढे, नाली के जालीदार ढक्कन या सीढी चढते हुए अटक जाती हैं - पर स्त्री को पीडा सहने की आदत होती है ! ब्यूटी और स्टाइल ही नहीं यहां अपने भीतर पनपी हीनता ग्रंथी को भी सवाल है ! कष्ट तो सहना ही होगा ! कष्ट तो शरीर पर वैक्सिंग करवाने , भौहें बनवाने और बच्चा जनने में भी होता है ! पीडा सहना तो हमारी आदत में शुमार है ! शायद पीडा सहने की प्रौक्टिस करते रहना हमारी विवशता है ... !

imageजबाबी कव्वाली की तरह इस चप्पल विमर्श की तर्ज पर जूता  विमर्श करते समीरलाल अपना संभावित डर या ज्यादा सच कहें कि प्रच्छन्न इच्छा जाहिर करते हुये लिखते हैं: मैं आज तक नहीं समझ पाया कि इनको क्या पहले खरीदना चाहिये-पार्टी ड्रेस फिर मैचिंग चप्पल और फिर पर्स या चप्पल, फिर मैचिंग ड्रेस फिर पर्स या या...लेकिन आजतक एक चप्पल को दो ड्रेस के साथ मैच होते नहीं देखा और नही पर्स को.

गनीमत है कि फैशन अभी वो नहीं आया है जब पार्टी के लिए मैचिंग वाला हसबैण्ड अलग से हो.

आपने जूता-चप्पल विमर्श के बहाने स्त्री-पुरुष विमर्श तो देख लिया। अब शुद्ध जूता विमर्श भी देख लिया जाये:

जूते का प्रधान कर्तव्य अपने मालिक पैरों की रक्षा करना होता है। जो अपने कर्तव्य का निर्वहन न कर सके, चलते-चलते पैर को बचाने के लिये अपने सीने पर ठोकरें न खा सके , धूलि-धूसरित न हो सके वह जूता कैसा? जूते के नाम पर कलंक है ऐसा जूता जो पैरों की रक्षा करते-करते फट न गया। किसी ब्लागर कवि ने सही ही कहा होगा-

जो चला नहीं है राहों पर, जिस पर चिप्पी की भरमार नहीं,
वह जूता नहीं तमाशा है, जिसको मालिक पैरों से प्यार नहीं।
अदभुत है हमारा शरीर.... में जानिये अपने शरीर के बारे में।

प्रेम कई तरह से आपको छूता है : कविता और कलाकृति की जुगलबंदी: पठनीय पोस्ट

  एक लाईना

जब ब्लॉगर होने के कारण शादी न हो सके और जुडने वाला रिश्ता तोड दिया जाय......तो इलाज सतीश जी से ही पूछना पड़ेगा भाई!

अलविदा, अलविदा...खुशदीप—तुम तो ये न कहो।

काबा के मुताबिक चले दुनिया भर की घडियां: तो क्या घडियों में सेल न डलवाने पड़ेंगे?

अब कौन भला इनको सुलझाएगा ?: कोई नहीं ऐसे ही पड़े रहेंगे।

हाँ चोर हूँ मैं ... दूसरों के मैटर चुराता हूँ: आप भी आजमाइये न! थाने में कुछ नहीं देना पड़ेगा।

क्या इस देश में गरीब अब अपनी बेटी की शादी कर पायेगा ?: वो तो होती रही हैं, होती रहेंगी।
बाबु ये तो गिरने वाली हरकत है...: गिरोगे और लोग टिपिया के फ़ूट लेंगे।

और अंत में:

फ़िलहाल इतना ही। बकिया मौका मिलने पर। अभी दफ़्तर की तरफ़ उन्मुख होना है। आपका दिन शुभ हो। मस्त रहें। चिरकुटई के भाव कम से कम आयें। आयें तो न्यूटन के जड़त्व के भाव के साथ आयें ताकि अमल से दूर रहें।

ठीक है न!

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18 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतर चर्चा । थोड़ी छोटी जरूर । आभार ।

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  2. apni zameen se judne ka vishay charcha ki maang karta hai ,ham men se ab bhi bahut se aise log bhi hain jo retirement ke baad apne gaon men hi basna aur wahan kuchh naya karna chahte hain .aise binduon ko uthane ke liye badhai ,aur dhanyavad.

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  3. कोई चारा नहीं कि यह न कहूँ कि, ’ अच्छी चर्चा ! ’
    ज़मीन से ऊपर उड़ने वालों ज़मीन की याद आना, कहीं कोई नया बिकाऊ फ़ैशन तो नहीं?

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  4. "मिली हवाओं में उडने की वो सज़ा यारो,
    कि ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारो."
    अखिलेश जी के आत्मकथ्य का अंश सचमुच सोचने पर मजबूर करता है.क्या हम लौटना चाहेंगे सुविधाहीन गांवों की ओर...?

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  5. लगता है बुद्धिजीवियों से तो हम ही बेहतर हैं। कम से कम उत्क्रमित प्रव्रजन की योजना तो बना रहे हैं!

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  6. बहुत बढ़िया चर्चा. लगता है शाम तक दूसरी भी आ रही है. :)

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  7. कुछ बेहतरीन लिंक्स...

    अच्छी चर्चा!

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  8. दुनिया बदल रही है .कंप्यूटर दुनिया बदल रहा है.......ऐसा हल्ला मचता है ....रोज सुबह इस उम्मीद में झांककर देखते है के कुछ बदली के नहीं.......बस पोलिश हुई नजर आती है ........... कितनी चीजे तो अब भी नहीं बदली......बदली क्या ?

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  9. ‘पर सवाल यह है कि क्या आप अपनी जमीन पर वापस लौट सकेंगे?
    शहरों ने हमारे भीतर चकाचौंध पैदा की है। शहरों में रहकर जो अपने गांवों को याद करते हैं, साहस क्यों नहीं करते वापस लौटने का। ’

    भैया हम तो जिस गांव और घर में जन्मे थे, आज तक उसी से चिपके हैं- ये और बात है कि अब यह गांव का शहरीकरण हो गया है... इसके लिए हम थोडे़ ही न ज़िम्मेदार हैं :)

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