मंगलवार, दिसंबर 08, 2009

रेखाचित्र में हिटलर का भी हाथ खूब चलता था

 

image मैं तस्वीर उतारता हूँ... जब मैंने यह शीर्षक देखा तो लगा कि नीरज गोस्वामी जी ने ई कौन सी गजल लिख मारी। लेकिन जब पोस्ट देखी तो पता चला कि भाईसाहब एक फ़ोटॊ प्रदर्शनी देखकर आये हैं और वहीं के किस्से सुनायें हैं। आप देखिये कि कैसे-कैसे अंदाज में फ़ोटुओं की कहानी बताई है अपने दृष्टिकोण से। हां भाई यही नाम रहा उस फोटो प्रदर्शनी का।
लेकिन आप प्रदर्शनी को देखने के साथ थोड़ा ऊप्पर उठिये और चलिये गौतम राजरिशी के नादां दिल के पास। देखिये कि कैसे पूरी वादियों को कब्जिया के कैमरे से खींच डाला है और वादी में रंगो की लीला करते हुये 
कहते हैं--
“ईश्‍वर ने क्या सचमुच अन्याय नहीं किया है जन्नत के इस टुकड़े संग? आखिरकार सब कुछ तो उसी परमपिता परमेश्‍वर के हाथों में होता है। इस जमीन की ये बेइंतहा खूबसूरती उसी सर्वशक्तिमान का तो जलवा है और वो यदि चाहे तो यहाँ का सुलगता माहौल भी एक चुटकी में सामान्य हो जाये...!”

अब जब बात जंगल की चली तो ये वाला जंगल भी देख लिया जाये। सुबह-सुबह सबसे पहली पोस्ट जो मैंने देखी वह यह थी- मुंबई ब्लॉगर-बैठकी, बोले तो .......होठों को करके गोल...... सीटी बजा के बोल..... ऑल इज वेल चाचू .....ऑल इज वेल :) अब आप पूछेंगे कि इसमें जंगल किधर है। अरे भाई देखिये तो सही पहले वाक्य में ही है जंगल। हम बतायेंगे नहीं आप खुद देखिये। इस जंगल ब्लागर मीट का चित्र आलोक नंदन कैसे खींचते हैं यह भी देखिये-भांति-भांति के जन्तुओं के बीच मुंबई बैठक! आलोक नंदन  एन.डी.एडम की चित्र बनाने के हुनर का चित्र खींच रहे हैं--

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“मुझे चित्र बनाना अच्छा लगता था। एक बार अपने शहर में पृथ्वी कपूर से मिला था। वो थियेटर करते थे। मैं थियेटर के बाहर खड़ा था। एक आदमी ने उनसे मेरा परिचय यह कह कर दिया कि मैं एक चित्रकार हूं। वह काफी खुश हुये और मुझे थियेटर देखने को बोले। शाम को जब मैं अगली पंक्ति में बैठा हुआ था तो लोगों को आश्चर्य हो रहा था,”
मुंबईया भाषा में वो इसे तेजी से बोलते रहे। जब वह अपना परिचय दे रहे थे तो बच्चों की तरह उनके मूंह से थूक भी निकल रहा था, जिसे घोंटते जाते थे।

आगे आलोक नंदन हिटलर की रेखाचित्र बनाने की बात बताते हुये  एन.डी.एडम के की जबानी बताते हैं:

“मैं पांचवी तक पढ़ा हूं, फिर चित्र बनाता रहा। मुझे चित्र बनाना अच्छा लगता था। चालिस फिल्म फेस्टिवलों में घुम चुका हूं, और लोगों की तस्वीरें बनाता रहा हूं...पांच हजार से भी अधिक तस्वीर मैं बना चुका हूं….....’’ वह बोलते रहे।

रेखाचि्त्र में हिटलर का भी हाथ खूब चलता था, उसके बुरे दिनों में वह इसी से अपना खर्चा चलाने की कोशिश करता था। कभी-कभी बिना आधार के भी तुलना किया जा सकता है। ये यहां वाला चित्र एन.डी.एडम का ही बनाया हुआ है।

मुम्बई ब्लागर मीट के विवरण और साथियों ने भी लिखे हैं जिनमें से कुछ हैं:

घनी अमराइयों के बीच मुंबई ब्लॉगर्स की आत्मीय बैठक—रश्मि रविजा।

मुंबई ब्लॉगर मीट - पहली रपट एवं मुंबई ब्लॉगर्स मीट – रपट – १---विवेक रस्तोगी।

मुंबई में हूं आज भी- अविनाश वाचस्पति!

मुंबई हिंदी ब्लॉग मिट -मुम्बई टाईगर

 

image वन-रूम सेट में बसती दिल्ली में रवीश कुमार लिखते हैं:
”बरसाती रहने की उस व्यवस्था को कहते हैं जिसके तहत मकान बनने के बाद बचे खुचे सीमेंट गारे से छत पर एक कमरा बन जाता है। जिसकी छत एस्बेस्टस शीट की होती थी और होती है। वन-रूम सेट के अलग-अलग पैमाने थे। किसी में आलमारी तो किसी में नहीं। किसी में टेबल फ्री तो किसी में नहीं। अगले दस साल तक न जाने कितने वन-रुम सेट बदले। मज़ाक में कहता था कि अपनी ज़िंदगी वन-रूम सेटहा हो गई है। सात सौ लेकर पंद्रह सौ रुपये तक के वन-रूम सेट। उन्नीस सौ नब्बे की बात बता रहा हूं।”

इसके आगे की कहानी आप उनके ही ब्लाग में देखिये।

विनीत कुमार का लेख टेलीविजन की कहानी बताता है! वे लिखते हैं-image

टेलीविजन विमर्श के साथ एक दिलचस्प विरोधाभास है। पहले तो आलोचकों ने पूरी ताक़त से इसे इडियट बॉक्स घोषित कर दिया। उसके बाद इस बात की संभावना की तलाश करने में जुट गये कि इससे सामाजिक विकास किस हद तक संभव हैं। इन दोनों स्थितियों में टेलीविजन की भूमिका और उसके चरित्र पर बहुत बारीकी से शायद ही बात हो पा रही हो। बदलती परिस्थितियों के बीच भी विमर्श का एक बड़ा हिस्सा जहां टेलीविजन को पहले से औऱ अधिक इडियट साबित करने में जुटा है, वहीं इसमें संभावना की बात करने वाले लोग जबरदस्ती का तर्क गढ़ने में कोई कोर-कसर छोड़ना नहीं चाहते। नतीजा हमारे सामने है, अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग।

 

मद्रास की अंग्रेजी बस्ती : भारत में विधि का इतिहास-13 में द्विवेदीजी कानून-कथा बता रहे हैं।

वापसी अपनों के पास- में डा. भावना की कविता है।
पहले पढ़ा, अब देखिये.. में समीरलाल के खचाखच भरे हाल में हुये बिखरे मोती के विमोचन के अवसर पर हुये कविता समागम की वीडियो हैं।

नत्तू भागीरथ पांड़े  में नत्तू हैं, भगीरथ हैं,पर्यावरण है, बनवारी जी हैं, जनसत्ता है,दिनमान है अंग्रेजी अनुवाद। अब जब इत्ता सब है तो ज्ञानदत्त पांड़ेजी काहे नहीं होंगे।

उदासी के पास भले कहने को कुछ न हो लेकिन प्रमोदजी के पास है उदासी के बारे में कहने के लिये--

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उदासी के पास कहने को ख़ास कुछ नहीं होता, थोड़ा जो कहती बहकी-बहकी बोलती है, फिर देर तक चुप रहती, चुपचाप तकती है. रिश्‍तों के चुक चुकने के दरमियान की जो अस्‍पष्‍ट तनावभरी ख़ामोशियां होती हैं, कुछ वैसे में ही खिंची-खिंची ख़ामोश बींधती रहती है. उंगलियों के पोर ऐंठने लगते हैं, धुंधलके की दीवानगी में कभी किसी क्षण खड़े गिर पड़ेंगे के एहसास में हारकर मन दोहराता है, ऐसा क्‍या है यहां, क्‍या लेने आती हो? उजाड़ की इतनी बड़ी दुनिया है किसी और ठिकाने जातीं?

लातखाया ग़रीब उधारी की शरम भूल जाता है की तरह बेहया बटुये से सस्‍ती लिपस्टिक निकालकर रसहीन होंठ सजाती है, हाथ से हाथ सटाकर बताती है, एक बार दिल जुड़ने के बाद मोहब्‍बत पूरी उम्र कहां जाती है..

इसीलिये रतन टाटा वन्दनीय और "सरकारी व्यवस्था" निन्दनीय हैं… Ratan Tata, 26/11 Terrorist Attack, Taj Hotel

में सुरेश चिपलूनकर ने रतन टाटा के मानवीय चेहरे को उजागर किया है।

जहाँ स्त्रियों की स्थिति गुलामों से भी बदतर थी  में शरद कोकास बताते हैं गुलाम विद्रोह के नायक स्पार्टाकस और उसकी नायिका वारिनिया के बहाने उस समय की स्त्री के बारे में!

और शहीदों की प्रतिमाओं पर बैठेंगे रोज़ ही कौए .. में वे बताते हैं आज का सच! देखिये।

सब ठाठ धरा रह जाएगा…[आश्रय-25] में ठाठ बाट और बाबूसाब के साथ अजित बाबू भी हैं  जै जै वाले।

एक शुन्य आ गया जीवन में!!! में ललित शर्मा का संघर्ष देखिये।

मेरी पसन्द

image दिन के कोलाहल में
जब खो जाता है मेरा वजूद,
धमनियों की धौंकनी
हो जाती है पस्त समंदर सी,
इच्छाओं का विराट आकाश
सिमट जाता है पुराने बटुए में
तब भी
सिक्कों की तरह कहीं बजती है
तुम्हारी हंसी.
कितना अच्छा होता कि
तुम्हारी हँसी
किसी बरगद सी होती
जिसमे हर साल नयी जड़ें फूटती,
उन पर टांग दिया करती
मैं अपनी मुस्कुराती आँखें,
पर ये तो
नर्म फाहों सी उड़ती है
मेरे आस पास,
उड़ती है एक अनुभवी बाज़ सी...
मगर फिर भी
जब तुम, सिर्फ अपने लिए रोते हो
तब भी जाने क्यों
भुला देती हूँ तुम्हारी हंसी.

नंदनी महाजन

image संभावनायें,
जब भी लौटी निराश
जेब के मुहाने से
मैंने,
खुदको सिमटा पाया
किसी खोटे सिक्के की तरह
अनचाहा गैरजरूरी सा
प्रत्याशायें,
केवल आशा भर रही
जब भी जिन्दगी लगी दाँव पर
द्यूत,
केवल विनोद भर नही था
कुछ और भी था अंतर्निहित
मैंने,
खुदको हारता पाया
सभी बाजी पर युधिष्ठर की तरह  ------------
मुकेश कुमार तिवारी

और अंत में: फ़िलहाल आज की चर्चा में इतना ही। आपका दिन शुभ हो। रिन की झकाझक सफ़ेदी सा।लेकिन जो ऊपर रह गया उसे तो देख लीजिये--

यथार्थ का क्रॉस वेरिफिकेशन ! 

डा.अनुराग आर्य का यह स्केच ही था जिसे दिखाने के लिये कल रात मैंने चर्चा करने का विचार बनाया और वही गोल हो गया। होता है ऐसा, अक्सर होता है। डा.साहब फ़ाइनली कहते हैं--

आदमियों की इस दुनिया में.... जहाँ .जमीर के कई “लिलीपुटीय संस्करण “ बिना अपराधबोध के अपने अपने क्षेत्रफल को हालात के मुताबिक घटा बढ़ा कर रोज  नयी दुनिया में फिनिक्स पक्षी की भांति मर कर पुनर्जन्म  ले रहे है ....घर के सामने खाली पड़े प्लाट में...दिसंबर की ठण्ड में ...  दो कुतियाये इत्तिफाक से एक ही समय में आठ पिल्लो को जन्म देती है  ...जिनमे से .एक असमय दम तोड़ देता है ...उन दोनों के बीच एक अबोला समझौता ...जिसमे वे बारी बारी से बाकी बचे सात पिल्लो को अपना अपना  दूध पिलाती है ...चकित करता है .....ओर आदमी की शर्मिंदा

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17 टिप्‍पणियां:

  1. यह सही कह रहे हैं आप कि मनुष्य चलता तो है किसी उद्देश्य को पूरा करने कस स्वप्न लेकर, पर सारे अभ्यास के बाद अंततः उद्देश्य धरा का धरा रह जाता है । यही हुआ न आपके साथ, क्या क्या कह गये - अनुराग जी छूट गये । ऐसा अक्सर होता है न ?

    पूरा ब्लॉग-जगत भी क्या इससे अलग है !

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  2. सुकुल जी,बढिया शानदार चरचा रहा-आभार

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  3. ये यहां वाला चित्र आलोक नंदन का ही बनाया हुआ है....बड़े विनम्र के साथ कहता हूं कि ये चित्र मेरे बनाये हुये नहीं है...चित्र किनके बनाये हुये इसे जानने के लिए आप इयता पर मेरा एक रिपोर्ट पढ़ सकते हैं....कृपया भूल सुधार कर लें

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  4. अच्छी चर्चा है...कई सारे चिट्ठों का समावेश किया है...उन्हें ढूंढना नहीं पड़ा...अनायास ही मिल गए,..शुक्रिया

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  5. अच्छी चर्चा बस एक लाईन शाम को ले आइये... वक्त मिले तो..

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  6. सादर अभिवादन! सदा की तरह आज का भी अंक बहुत अच्छा लगा।

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  7. @हिमांशु,यह तो देखने का नजरिया है कि आपकी नजर क्या देखती है और उसकी क्या मतलब निकालती है। यह सब आपकी मन:स्थिति पर निर्भर भी करता है कि क्या निष्कर्ष निकालना चाहते हैं। आधे भरे, आधे खाली गिलास की तरह। आपने यहां निष्कर्ष निकाला कि हमसे डा.अनुराग की चर्चा छूट गयी इसी बात को कोई यह भी कह सकता है कि छूटते-छूटते भी डा.अनुराग का जिक्र कर ही दिया। बाकी कैसे चर्चा करते हैं वह विस्तार से मैंने अपनी पोस्ट में लिखा है उस पर आपकी विस्तृत टिप्पणी भी है देखियेगा!

    @आलोक नंदनजी, मुम्बई टाईगर की पोस्ट में लिखा है -- महसुर चित्रकार आलोक नंदन जी ने अविनाश वाचस्पति,सूरज प्रकाश,महावीर बी सेमलानी का चित्र बनाया . उसी के चलते गलती हुई। ठीक कर दी है अब। शुक्रिया।

    @सभी साथियों की प्रतिक्रियाओं का शुक्रिया।

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  8. रचना का सन्क्षिप्त परिचय रचना पढ़ने के लिये प्रेरित करता है इस दृष्टि से यह चर्चा सफल है ।

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  9. कई बेहतर चीज़ें छूटने से बच गईं...
    आभार...

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  10. `इस जमीन की ये बेइंतहा खूबसूरती उसी सर्वशक्तिमान का तो जलवा है और वो यदि चाहे तो यहाँ का सुलगता माहौल भी एक चुटकी में सामान्य हो जाये..'

    ईश्वर तो चाहता है पर शायद खुदा नहीं चाहता :)

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