रविवार, जुलाई 12, 2009

आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत

यह एक सुविचार है.

जब बात चली है सुविचारों की , तो अभिषेक प्रसाद की कविता में ये सुविचार तो हम आप सब पर शत प्रतिशत लागू होते हैं –

यहाँ देखिये मेरी नजर से

एक बच्चा खेल रहा है

कितना कोमल,

निर्मल,

निर्लोभ, निश्छल

किसी से ईर्ष्या नहीं

कोई द्वेष नहीं

कोई रोष नहीं

उसे सबसे प्रेम है

गहन स्नेह है

कुछ दिन बाद

वो भी बड़ा हो जाएगा

उसके ये सारे गुण

ख़त्म हो जायेंगे

और वो भी

हमारी तरह

आदमी बन जाएगा...

मैं भी बहुत बार सोचा करता हूं कि मैं ताउम्र बच्चा क्यों नहीं बना रहा. नाहक बड़ा हो गया....

एक और आत्मोन्नति की बात – रंगनाथ सिंह ने प्रस्तुत किया केदारनाथ सिंह की यह कविता –

उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा

दुनिया को हाथ की तरह गर्म और सुन्दर होना चाहिए।

मैं अपनी ओर से इसमें एक शब्द और जोड़ने की गुस्ताख़ी करना चाहता हूं, क्योंकि दुनिया जरा ज्यादा ही कठोर हो रही है –

उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा

दुनिया को हाथ की तरह गर्म, नर्म और सुन्दर होना चाहिए।

अजित वडनेरकर ने रविवारी मुद्दे पर बढ़िया बहस की है. पर हम बहस में नहीं पड़ते और वहां से ब्लॉगोन्नति का ये सूत्र चुराते हैं –

ब्लाग पर ... शब्द महत्वपूर्ण है, वर्तनी नहीं। शब्द का प्रकाशन ज़रूरी है, सम्पादन नहीं। यहां भाव प्रमुख है, कला नहीं... ब्लाग पर भावनाओं का जोर दिखता है। ज्वार उमड़ता है। जब यह उतर जाता है तब संपादन की सुविधा भी यह आपको देता है। यानी सचमुच जैसा आप चाहते हैं।

गुरशरन के ग़ज़ल की एक पंक्ति में ये सुविचार मिलते हैं –

शीशे का मकान तू ने बना तो लिया है दोस्त,

लेकिन वक़्त के हाथ का पत्थर नहीं देखा।

सच है. और पत्थर यदि दिखता भी है तो हम लोग ज्यादातर अनदेखा कर देते हैं. है कि नहीं?

श्यामल सुमन टिप्पणी-सुविचार बता रहे हैं –

टिप्पणी करना कर्म तो टिप्पणी पाना धर्म।

ब्लागर के सम्बन्ध का यहाँ छुपा है मर्म।।

राहुल सिंग ने कीमियागर धारावाहिक उपन्यास में हवा से प्रेरक बातें कीं. काश हम भी हवा होते. उपन्यास अंश से कुछ हवाई प्रेरक सूत्र उठाते हैं –

"जब कोई तुमसे प्यार करे तो तुम कुछ भी नया कर सकते हैं। ऐसी स्तिथि में कुछ सोचने समझने कि जरूरत भी नहीं है। सब कुछ तो अंदर ही घटित हो रहा होता है। ऐसे में हवा में भी तो बदला जा सकता है, बशर्ते हवा साथ दे। "

वैसे, जब व्यक्ति को प्रेम मिलता है, या वो प्यार में पड़ा रहता है तो उसके पैर आसमान में कहाँ रहते हैं? वो तो हवा में ही न टंगा (या टंगी) रहता है?

गौरव बहारे का प्रेरक जुगाड़ कितना घर्षण मुक्त है देखें –

"जीवन दो पहियों कि गाड़ी के समान है" तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इसे घर्षणमुक्त चलने के लिए जिस लुब्रिकेंट अर्थात स्नेहक तेल कि आवश्यकता पड़ती है, वही जुगाड़ है.....

प्रेम फ़र्रूखाबादी ने अपनी ग़ज़ल में प्रेरणा ही प्रेरणा भर दी है. मिसाल के तौर पर उनका यह शेर पढ़ें –

रहना चाहते हो गर खूबसूरत फूलों में

तो जीवन में काँटे क्यों बोने लगे हो।

दीपक भारतदीप ने आलस्य संबंधी सुविचार प्रस्तुत किया –

अभ्यासाद्धार्यत विद्या कुलं शीलेन धार्यते।

गुणेन ज्ञायते त्वार्य कोपो नेत्रेण गम्यते।।

हिंदी में भावार्थ-अभ्यास करने से विद्या प्राप्त की जा सकती है। उत्तम गुण, कर्म तथा अच्छे स्वभाव से परिवार और अपना नाम रौशन होता है। श्रेष्ठ मनुष्य की पहचान उसके गुणों से है और उसका क्रोध नेत्रों से प्रकट हो जाता है।

कुंतलश्री ने एक प्रेरक कथा लिखी है. एक था कौआ एक थी चिड़िया नाम की कथा छोटी सी है, मगर प्रेरक है. यहाँ अंश उद्धृत करने से बात नहीं बनेगी अत: सीधे ब्लॉग पर जाकर पढ़ें.

और, अंत में –

आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत

जल्दी ही सारी दुनिया अंधी और पोपली हो जाएगी.

ज्ञानदत्त के आत्मोन्नति के और भी सैकड़ों सूत्र आत्मसात करने के लिए सीधे यहाँ क्लिकियाएँ.

आज की चर्चा बस इतनी ही. क्या करें, भाई लोगों ने अपने चिट्ठों में प्रेरक-सुविचार ज्यादा लिखे ही नहीं!

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6 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर। पोस्‍ट के बदले पोस्‍ट और टिप्‍पणी के बदले टिप्‍पणी। चर्चा के बदले चर्चा और वो भी बेखर्चा।

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  2. "मैं भी बहुत बार सोचा करता हूं कि मैं ताउम्र बच्चा क्यों नहीं बना रहा. नाहक बड़ा हो गया....

    हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले.....
    चर्चा का अंतिम व्याक्य सूक्ति की तरह पसंद आया:)

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  3. वाकई में केदारनाथ की इन कविता पंक्तियों के साथ आपने गुस्ताखी़ सी ही की है:
    उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
    दुनिया को हाथ की तरह गर्म और सुन्दर होना चाहिए।

    आपने तात्कालिक भावनावश इसमें नर्म और लगा दिया है।
    समय पहले तो इस नई चीज़ का आनंद लिया,और यह ढीला पडने के बाद जब यह और गहरे में उतरी तो लगा गुस्ताखी हो गई है।

    ‘उसका हाथ’पर सोचते वक्त दिमाग़ में कई छवियां उभरती है, परंतु आगे की बात, आयाम खुले रखती है। जैसे ही नर्म लगाते हैं, यह छवियां जाहिर है सीमित होकर माशूका तक सिमटकर रह जाने की ओर प्रवृत्त होती हैं।

    वही पंक्तियां ज्यादा श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वहां बडे आयाम हैं और कठोर श्रम से कठोर और खुरदुरे हो गये हाथों के लिए भी जगह है, चाहे वह माशूका ही क्यूं ना हो, या श्रमशील साथी।
    शायद केदारनाथ सौन्दर्यबोध की यही दृष्टि जगाना चाहते हैं।

    समय की यह भी एक गुस्ताखी ही है, चलती गाडी़ में चढ़ने की।
    मुआफ़ी की गुजारिश है।

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  4. पता नहीं हम सब कौव्वे हैं या चिड़िया। ढूंढ़ रहे हैं या छिपे हैं अपनी करतूतों से!
    सुन्दर चर्चा।

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