प्रौद्योगिकी की दुनिया बहुत तेजी से बदलती है..इतनी तेजी से कि इंसान अपनी एक ही पीढ़ी में तकनीक की कई पीढि़यॉं देख कर विदा लेता है... अभी कल तक की बात लगती है जब डोस वातावरण में फ्लॉपी डालकर बूट करते थे अपना 8088 सिस्टम फिर 286 -386-486 पेंटियम.... इसी तरह वर्ड्स स्टार... अक्षर... वेंचुरा। इंटरनेट की बात करें तो नेटस्केप...हॉटमेल...ट्विटर। हिन्दी इंटरनेट की बात करें तो ये फांट वो फांट... चिट्ठा विश्व, नारद, ब्लॉगवाणी... कई बार तो इस पैंतीस की उम्र में ही कराह कर कहने को मन करता बहुत देख लिया ऊपर वाले.. :)। अब यही देखो कहॉं तो एग्रीगेटर चाहिए इसलिए थे कि गैर हिन्दी बहु ब्लॉग प्लेटफार्म हिन्दी ब्लॉगिंग को भाव ही नहीं देते थे कहॉं होते होते हम उस मोड़ पर पहुँच गए हैं कि अब ब्लॉगवाणी वाकई 'भारतीय ब्लॉग एग्रीगेटर' बन रहा है। गिरिजेश ने सूचना दी है साथ ही आशंका भी व्यक्त की है-
मुफ्त सेवा प्रदान करते इस एग्रीगेटर साइट की विषयवस्तु क्या हो, कैसी हो, किस भाषा में हो - इन पर निर्णय लेने के लिए इसका प्रबन्धन स्वतंत्र है। यह उनका अधिकार है।
लेकिन अंग्रेजी चिट्ठों की बाढ़ में हिन्दी चिट्ठे दिखने बहुत कम हो जाएँगे जो कि अभी विकसित होती हिन्दी ब्लॉगरी के लिए शुभ नहीं होगा।
बहुभाषी होने की स्थिति में ब्लॉगवाणी को प्रयोक्ता के लिए भाषा चुनने का विकल्प अलग से देना चाहिए ताकि जिसे जिस भाषा का ब्लॉग देखना हो वही दिखे। इससे अपेक्षाकृत कम ब्लॉग संख्या वाली हिन्दी ब्लॉगरी को फलने फूलने में सहूलियत रहेगी
वैसे सूचना तो हमें थी पर ये तो दिमाग में आया ही नहीं कि इसे पोस्ट बनाया जा सकता है :)। खैर फिर नया होते रहना आज के नेट जगत की विवशता है..प्रासंगिक बने रहने की शर्त ही ये है कि पुनर्नवा रहें। खुद को बार बार रचें। इसी में एक मित्र की छटपटाहट दिखी -
आप कहते तो हैं कि यहां चिट्ठों की चर्चा हिंदी में देवनागरी लिपि में होगी. भारत की हर भाषा के उल्लेखनीय चिट्ठे की चर्चा का प्रयास किया जायेगा
तो क्या मुझ मूरख को यह ज्ञान प्राप्त होगा कि अब तक 1050 पोस्टों में कितनी पोस्टों पर हिंदी-अंगरेजी के अलावा अन्य भारतीय भाषायों वाले ब्लोगो की चर्चा का प्रयास किया गया है? लिन्क दे सकें उन पोस्टों का तो आभार
यह उल्लेखनीय होना भी क्या कोई खास क्राईटेरिया है?
एम ज्ञान साहब ने अपनी ये टिप्पणी-पोस्ट प्रचारार्थ हर जगह चेपी है... चिट्ठाचर्चा में टिप्पणी मॉडरेशन नहीं है इसलिए संभव है कोई तकनीकी वजह रही हो या जो भी हो...लीजिए शिकायत दूर हो गई। सही है अन्य भारतीय भाषाओं की पोस्टें आमतौर पर चिट्ठाचर्चा का हिससा नहीं बन पाई हैं इसके कोई आध्यात्िमक या पराभौतिक कारण नहीं हैं हम चर्चाकारों की सीमा भर है। अब ब्लॉगवाणी के भरोसे कुछ अंग्रेजी मराठी ब्लॉग दिखेंगे तो शायद चर्चा का हिससा भी बनें। जैसे आज निपुण पांडेय की मराठी कविता पर नजर पड़ी'
शुभ पर्व आहे हा संक्रान्तिचा
स्नान करा , घ्या संकल्प नवा
तन आणि मन आपण शुद्ध करा
तीळ गुळ घ्या, गोड़ गोड़ बोला !
इसी प्रकार मृत्युंजयकुमार ने अंग्रेजी में ग्राफिती छाप एक पोस्ट ठेली है-
पिज्जा रीचेस फास्टर देन पुलिस एंड अमबुलंस!
कार लोन एट 8% बट एजुकेशन लोन एट 12 % !
फीस/डोनेशन ऑफ़ स्कूल्स आर मोरे देन सेलारिस ऑफ़ परेंट्स !
मेडिकल साईंस इस अप फॉर आक्शन/बिज़नस … ओं थे देअथ बेड…!
ज्ञानजी ने ब्लागिंग की सीमा के बहाने बेव 2.0 से आगे की बात की है (हमारा धंधा बिगाड़ रहे हैं हमने तो अभी संभा संगोष्ठियों में 'हिन्दी 2.0' गिराना शुरू भर किया था)-
पर क्या ब्लॉगिंग की सीमा मात्र इससे तय होती है? शायद नहीं। जो अप्रिय हो, तिक्त हो, गोपन हो और जिसके सम्प्रेषण पर निरर्थक विवाद हो, वह पोस्टनीय नहीं है।पीरियड।
हमें तो ये पीरियड वाली भाषा मजेदार लगती है आखिरी बात... कह दिया तो कह दिया...बस- पीरियड :)
चलते चलते कुछ और पोस्टें जो हमें अहम लगीं -
कुंभ बाजार पर खुशदीप सूरज का सातवॉं घोड़ा के बहाने विचार कर रहे हैं-
..लेकिन कुंभ का आस्था के अलावा बाज़ार शास्त्र भी है...ज़्यादा विस्तार में न जाकर इस संदर्भ में आपको सिर्फ एक उदाहरण देता हूं...अगले तीन महीने में हरिद्वार में सिर्फ़ फूलों-फूलों का ही 400 करोड़ रुपये का कारोबार होगा...ज़ाहिर है ये फूल और दूसरी पूजा सामग्री गंगा में ही जाएगी...यानि गंगा का प्रदूषण कई गुणा और बढ़ जाएगा... उसी गंगा का जिसकी सफ़ाई के लिए हम करोड़ों रूपये के मिशन बना रहे हैं...
घर बैठे किताबें मँगाने के लिए फ्लिपकार्ट पर अभय जानकारी दे रहे हैं।
मैंने पिछले दिनों कुछ किताबों की ज़रूरत पड़ने पर उनको बुकशॉप्स में खोजा; कहीं न पाया तो फिर नेट पर खोजा। अमेज़न में थी लेकिन डॉलर्स में और किताब की क़ीमत से ज़्यादा उनके शिपिंग चारजेज़। उसी खोज में फ़्लिपकार्ट भी नज़र आया। जो किताब चाहिये थी वो थी, उसके अलावा दूसरी कई किताबें और भी दिखीं जो दिलचस्प थीं और मेरी जानकारी में नहीं थीं। किताब का मूल्य रुपये में, कोई शिपिंग शुल्क नहीं क्योंकि इसका संचालन बेंगालूरु से ही होता है, और उलटे डिसकाउंट!! चार-पाँच किताबे मँगवाई। तीन तो तीसरे दिन आ गई। और शेष भी जल्दी।
गिरिराजजी का लेख ब्लॉगिंग तो नहीं... छापे की चीज है पर है पठनीय। यही स्थिति स्मिता मिश्र के लेख की है। भावेश का आलेख एक शानदार शुरूआत है। कांउटडाउन पर कौशल को पढें।
काउंटडाउन एक चमत्कारिक शब्द है। आप दुनिया के किसी हिस्से में हों, किसी फील्ड में काम कर रहे हों, यदि इसके अर्थो को समझकर इस पर सही ढंग से अमल किया तो इसके जो चमत्कारिक परिणाम होंगे, उसे आप ही हासिल करेंगे। एक बार फिर बताऊं, दुनिया में हर चीज की एक निश्चित अवधि होती है, निश्चित फ्रेम होता है, निश्चित सर्कल भी। उसी अवधि, उसी फ्रेम, उसी सर्कल में चीजें घूमती हैं। आपको इस निश्चित अवधि से अनजान नहीं रहना होगा। इस निश्चित अवधि का संज्ञान में आना, उसका भान होना ही काउंटडाउन है।
चिट्ठियों पर कविता का स्पेस झांकें-
एक दिन सफाई करते हुए न जाने क्या हुआ,शायद मन कुछ ठीक नहीं था,या कुछ और,पता नहीं क्यों ये सोचा की इतनी पुरानी सहेलियां जिनसे बिछड़े करीब १५ साल हो गए है,उन्हें तो शायद मेरी याद भी नहीं होगी,मैं ही उनके पत्रों को संजोए बैठी हूँ मैंने सबसे पुराने पत्र जला डाले.हाँ-हाँ वही पत्र जिनकी खजाने की तरह रक्षा करती थी जला डाले ,पता नहीं इससे घर में कितनी जगह बनी हाँ दिल का एक कोना आज भी खाली महसूस हो रहा है।
एक बड़ी उपलब्धि अब हिन्दी ब्लागिंग के मुख्यधारा राजनीति से जुड़ जाने को माना जाना चाहिए। अमर सिंह अपनी बात कहने के लिए ब्लॉग मीडिया को उपयुक्त माध्यम मान रहे हैं। सपा खींचतान पर अमरसिह ने अपने ब्लॉग में अपना पक्ष रखा है-
पता लगाने पर पुष्टि हुई कि कम से कम यह तो सच है कि रामगोपाल जी के दोनों बयानों (दिल्ली और सैफई वाले) के समय आदरणीय नेता जी दिल्ली और सैफई दोनों जगह मौजूद थे और पुराने समाजवादियों से दिल्ली में उनकी बैठक की भी पुष्टि हुई है. फिर भी संदेह के आधार पर क्या कहूँ? आज़म, नेता जी के दिल की पुरानी धड़कन है और हो सकता है शिवपाल शहीद हो जाए.
कुल मिलाकर कह सकते हैं कि नया साल कुछ कुछ बहुत कुछ नया दिखा रहा है हिन्दी ब्लॉगिंग में। चलते चलते चंद खूबसूरत तस्वीरें आदित्य की - बताइए साबजी कैसा लग रहा है??
बहुत क्यूट।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुंदर चर्चा-आभार
प्रत्युत्तर देंहटाएंachchha hai ji.narayan narayan
प्रत्युत्तर देंहटाएं
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत खूबसूरती से अच्छी पोस्ट्स को सहेजा है, आभार !
चर्चा के क्या कहने...!
प्रत्युत्तर देंहटाएंबेहतरीन...!
सुंदर चर्चा...
प्रत्युत्तर देंहटाएंअच्छी चर्चा.....शुक्रिया
प्रत्युत्तर देंहटाएंबढिया चर्चा. बधाई.
प्रत्युत्तर देंहटाएंसाबजी 8088 सिस्टम की याद दिलाकर आपने दिल खुश कर दी. इसी तरह एम ज्ञान साहब की टिप्पणियो से मुझे वे दिन याद आ गये जब हमने अपना छत्तीसगढी चिट्ठा गुरतुर गोठ शुरु किया था तब हमे हमारे साथी रोज अतिउत्साह मे कहा करते थे कि इस ब्लाग के चर्चा मे आने का कोई जुगत सोचो पर मुझे कभी नही लगा कि इसके लिये कोई जुगत लगाई जाय या लगानी भी पडती है? क्योकि मुझे लगा था कि मेरा चिट्ठा उल्लेखनीय रहा ही नही होगा. एम ज्ञान साहब ने जो 'भारत की हर भाषा के उल्लेखनीय चिट्ठे की चर्चा का प्रयास' की बात की है उस पर सभी चर्चा करने वाले चिट्ठा समीक्षक अमल मे लाने का विचार करे.
प्रत्युत्तर देंहटाएंhttp://www.gurturgoth.com
प्रत्युत्तर देंहटाएंnice
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुन्दर चर्चा..
प्रत्युत्तर देंहटाएंअमर सिंह की तरह अगर मंत्री, संत्री और प्रधान भी ब्लॉग पर आ जाए तो जनता से कितने करीब होगें.. हम भी जान पायेगे की उनकी क्या मजबूरिया है और वो भी जान पायेगे की हम क्या सोचते है.. एक न एक दिन उन्हें इन गलियों में आना पडेगा.. क्योंकि कुछ सालों में उनके वोट ये फोरम् तय करने वाले है....
बेहतरीन चर्चा । आपने चर्चा-मंच को बहुभाषी चर्चा-मंच बना शिकायत दूर की । आभार ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंरंजन ने सही कहा
प्रत्युत्तर देंहटाएंbaanch kar acchaa laga
प्रत्युत्तर देंहटाएंabhinandan !
गहरे परिश्रम से तैयार यह चर्चा हिंदी-ब्लॉगिंग मे बढ़ती विषय-विविधता, ब्लॉगिंग के सामाजिक-राजनैतिक-तकनीकी महत्व और ब्लॉग-चर्चा की संभावनाशील बहुआयामीयता की प्रतिबिंब है..
प्रत्युत्तर देंहटाएंबिल्कुल भी अच्छी चर्चा नहीं की मसिजीवी जी। अरे भाई १०० में से एक बार तो कभी हमें भी याद किया कीजिए। क्या हम बकवास के अलावा कुछ भी नहीं लिखते ? हा हा।
प्रत्युत्तर देंहटाएंबुरा ना मानिए हम ऐसे ही कह रहे हैं। बस यूँ ही आज मन हुआ आपको अपना समाझ कर उलाहना देने का।
बच्चे की तस्वीरों ने मन मोह लिया जी। आपका बहुत बहुत आभार इस सुन्दर चर्चा के लिए।
नज़र न लगे आदित्य को और चिट्ठा चर्चा को भी।
प्रत्युत्तर देंहटाएंअच्छी चर्चा.....
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुंदर और सुरुचिपूर्ण चर्चा...आदित्य बड़ा होकर नाम की तरह अपने तेज से दुनिया को आलोकित करे, यही कामना...
प्रत्युत्तर देंहटाएंजय हिंद...
यूं ही घूमते-टहलते मैं एक अन्य साइट
प्रत्युत्तर देंहटाएंhttp://chitthacharcha.com पर पहुंचा. पाया कि अमरीका के सर्वर पर भिलाई के किन्हीं गुरप्रीत सिंह सज्जन ने यह नाम बुक कर रखा है. वाह जी बल्ले बल्ले.
boss 8088 systm ki yad dila kar aapne na jane kya kya yad karwa diya..... are ise chhoriye, kya batayei 2001-2002 me halat ye thi ki raipur me agar cyber cafe me internet use karna hota tha to 80 se 60 rs per hour charge tha.......
प्रत्युत्तर देंहटाएंyear 2000 ki to baat hi na puchho prabhu....