रविवार, जनवरी 24, 2010

उर्दू ब्लॉग : मुझसे मेरा मजहब न पूछो!

नेट पर हिन्दी सामग्री की प्रचुरता, उपलब्ध तकनीक इत्यादि पर अनुनाद अपनी बेहद बारीकी और पैनी नजर रखते हैं, और नेट पर उन्हें जमाने, लोगों को जागृत करने व सामग्री जुटाने, सहेजने में भी समर्पित भाव से लगे रहते हैं. विकिपीडिया के 50 हजार पन्नों के लक्ष्य को प्राप्त करने में भी उनका अच्छा खासा योगदान रहा है. इस साल के शुरूआत में उन्होंने उर्दू से हिन्दी ऑनलाइन लिप्यंतरण का एक बढ़िया स्थल खोज निकाला. वैसे तो और भी हैं, और स्वयं अनुनाद ने एक औजार विकसित किया था, मगर ये सभी इतने सफल तरीके से उर्दू से हिन्दी में लिप्यंतरण नहीं कर पाते थे. हिन्दी से उर्दू में लिप्यंतरण तो आसानी से हो जाता है क्योंकि हिन्दी जैसी बोली वैसी पढ़ी-लिखी जाने वाली भाषा है. मगर उर्दू में लिखी गई चीज को संदर्भानुसार पढ़ा जाता है जैसे कि उर्दू में लिखे गए पूना शब्द को आप पोना पुना इत्यादि कुछ भी पढ़ सकते हैं. तो ऐसे में शानदार किस्म की कम्प्यूटिंग लॉजिक और विशाल वाक्यभंडार के बगैर परिशुद्ध ऊर्दू-हिन्दी लिप्यंतरण संभव नहीं था. पर मामला काफी कुछ काम लायक बन गया प्रतीत होता है.

तो, आइए, इसी उर्दू से हिन्दी लिप्यंतरण औजार के भरोसे (यहाँ परिवर्तन हेतु पाठ को टैक्स्ट बॉक्स में भरना पड़ता है. यदि गूगल/गिरगिट लिप्यंतरण जैसे प्रॉक्सी सर्वर पर ये उपलब्ध हो जाए तो क्या कहने! वैसे, एक और ठीक-ठाक किस्म का ऑनलाइन उर्दू-लिप्यंतरण औजार यहाँ पर भी है) कुछ उर्दू ब्लॉगों पर हिन्दीमयी नजर डालें -

 

बज़्मे उर्दू – पुणे, एक सफर की झलकियाँ...

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“...किताबों और अपने कॉलिज के माहौल से निकल कर नए शहर की आब-ओ-हुआ और लोगों से भी रोशनास हूं ।

बक़ौल ग़ालिब
बख़्शे है जिलो-ए-गुल ज़ौक़-ए-तमाशा ग़ालिब
चश्म को चाहीए हर रंग में वा हो जाना ।

शहर पूना में कई काबिल-ए-दीद मुक़ामात हैं ।शनिवार वाड़ा,कीलकर म्यूज़ीयम,आग़ा ख़ां पैलेस ,सारस बाग़ ,स्नेक पार्क ,आज़म कैंपस ,वग़ैरा
हमारी मीटीनग का दूसरा दिन था।सुबह तक़रीबन साढे़ आठ बजे में और तोसीफ ओटो के ज़रीये डक्कन बस स्टाप पहुंचे ।पता चला पूना दर्शन ,एक बस दिन भर शहर की सैर कराती है ।एक सौ चालीस रूपए का टिकट तोसीफ के लिए ख़रीदा और वहीं हल्का सा नाश्ता कर के तोसीफ बस में सवार हो गए । सुबह नौ बजे से शाम पाँच बजे तक के इस सफ़र में कई मुक़ामात हैं जिन में कई मंदिर और तारीख़ी इमारात भी शामिल हैं । में तो बाल भारती चला आया और तोसीफ शाम तक पूना दर्शन में मश़गूल रहे । इस सफ़र की चंद तसवीर यहां पेश की जा रही हैं...”

रिजवान के ब्लॉग शराब पर ये मजाहिया शाइरी मुलाहिजा फरमाएँ :

काफ़ी वक़्त के बाद कुछ लिखने की हिम्मत हुई है कभी फुर्सत, कभी तबीयत, कभी नीयत बस कुछ ना कुछ रुकावट बनती रही।
चलें शुरू फ़राज़ के नाम से
(आप के लिए पुराने हों तो नशर मुक़र्रर समझीए)
एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद-ओ-अय्याज़
और उन की जूतीयां ले के भाग गया फ़राज़

फ़राज़ की शादी में हुए इतने फूल निछावर
कैमरा मैन फ़राज़ के साथ जीव न्यूज़ पिशावर

ये किया तो सफ़ैद करते में फिर रहा है फ़राज़
इज काला जूडा पा साडी फ़रमाइशते

इस ने मुझे रात को जंगल में छोड दिया फ़राज़
ये कह कर कि प्यार किया तो डरना क्या

एक नफ़रत ही नहीं दुनिया में दर्द का सबब फ़राज़
सुना है इंजेक्शन की सूई भी दर्द देती है

दर दर फिरते हैं ग़म-ए-इश्क़ के मारे
सूफ़ी स्वॅप के लशकारे जगमग कपड़े सारे

लैला की शादी में लफ़ड़ा हो गया
इतना नाचा फ़राज़ कि लंगड़ा हो गया

इतना सुन कर ही हमारा दिल टूट गया फ़राज़
The number you have dialed is busy on another call

मुझ से लोग मिलते हैं मेरे अख़्लाक़ की वजह से फ़राज़
हूर मेरे कोई समोसेते नईं मशहूर

वो हमें बेवफ़ा कहते हैं तो कहते रहें फ़राज़
अम्मी कहती हैं जो कहता है वो ख़ुद होता है

फ़राज़ तुम्हारे जाने से दिल बहुत रोता है
ऊपर पंखा चलता है नीचे मुंह सविता है

चलो फ़राज़ अब मौसम का मज़ा चखीं
तमाम दवाएं बच्चों की पहुंच से दूर रखें

अब तो डर लगता है खोलने से भी दराज़
कहीं ऐसा ना हो कि इस में से भी निकल आए फ़राज़

ऊर्दूदाँ का ये दिलचस्प किस्सा पढ़िए :

अक्सर मेरी बात एक पाकिस्तानी इंजीनयर से होती रहती है। ये जनाब पाकिस्तान से कैन्डा बड़े ख़ाब ले कराए तो थे, लेकिन यहां आकर फ़ी अल्हाल चौकीदारी कर रहे हैं। ख़ैर ये हालात का तक़ाज़ा है।
मैं इन से बात कर रहा था और इसी दौरान मैंने ज़िक्र किया कि आज कल ज़ाती तौर पर में "इंटरनैट तालीमी ताश" बनाने में मसरूफ़ हूं। बात आगे बढ़ी तो मैंने उन से पूछा कि आया वो तालीमी ताश तलाश करने में मेरी मदद कर सकते हैं। उन्हों ने अक़्दा खोला कि वो तालीमी ताश के बारे में कुछ नहीं जानते, ना ही उन्हों ने कभी खेला है।
जब मैंने पूछा कि क्या वो "इसकरैबल" के बारे में जानते हैं तो उन्हें ने हां मैं जवाब दिया। में यक़ीन से नहीं कह सकता कि वो सच मुच इस खेल से वाक़िफ़ हैं या नहीं।
उन्होंने मुझे मशवरा दिया "आप तालीमी ताश के बजाए असकरेबल क्यों नहीं खेल लेते"
मैंने जवाब दिया "में खेलना नहीं चाहता बल्कि आप को खेलते देखना चाहता हूं।

अहमद फ़राज की कुछ ग़ज़लें यहाँ छपी हैं. पेश है एक ग़ज़ल –

कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो
बहुत कड़ा है सफ़र थोड़ी दूर साथ चलो


तमाम उम्र कहां कोई साथ देता है
ये जानता हूं मगर थोड़ी दूर साथ चलो


नशे में चूर हों में भी तुम्हें होश नहीं
बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो


ये एक शब की मुलाक़ात भी ग़नीमत है
किसे हैकल की ख़बर थोड़ी दूर साथ चलो


अभी तो जाग रहे हैं चिराग़ राहों के
अभी है दूर सह्र थोड़ी दूर साथ चलो


तवाफ़ मंज़िल जानां हमें भी करना है
फ़राज़ तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो


।।। अहमद फ़राज़ ।।

शुएब हिन्दी में भी लिखते हैं, भारत से उर्दू के पहले चिट्ठाकार हैं. अपने एक पोस्ट पर वे पूछते हैं -

मुझ से मेरा मज़हब ना पूछो!
ख़्याल अपना, मज़हब और में
बस में ट्रेन में प्लेन में या जहां कहीं भी कोई नया मिल जाए, बात चीत शुरू होती है फिर नाम पूछते हैं तो जवाब में बोलता हूं कि मेरा नाम शुऐब है तो वापिस कहते हैं ओह आप मुस्लमान हो?
मेरे दिल में एक ही जवाब गुस्से में निकलता है तेरी मां की &&& तेरी बहन की &&&
मेरे पेट पर घूंसा मॉरो, पीठ पर लात मॉरो लेकिन इस से भी ज़्यादा गु़स्सा मुझे तब आता है जब कोई मुझ से मेरा मज़हब पूछता है लगता है जैसे मेरी मां बहन को गाली दे रहा है में इन्सान हूं और हिंदूस्तानी भी
आप से गुज़ारिश है कि सफ़र में या कहीं भी अजनबीयों से इन का मज़हब ना पूछें और अपना मज़हब ना बताएं वर्ना बात चीत का ख़ुशगवार मूड कहां से कहीं और निकल जाता है ये नया ज़माना है, हम सभी को साथ मिलकर रहना है

कुछ और उर्दू ब्लॉग आप यहाँ देख सकते हैं.

 

अंत में, देखें फैज अहमद फैज की शायरी – साभार उर्दू के नाम

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11 टिप्‍पणियां:

  1. मजहब पूछने की जरूरत भी क्‍या है
    ब्‍लॉगवासियों का सिर्फ एक मजहब है
    ब्‍लॉगिस्‍तानी हैं हम
    ब्‍लॉगिस्‍तान हमारा है।

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  2. 1990-92 کے دؤران ایک مُسلمین بھائی مُجھسے بُکھار وُکھار کے سِلسِلے میں مِلنے آیے ۔ اُنہوںنیں گُزارِش کی میں دوایّں لینے کا وقت اؤر تریکا سںکیت-چِنہوں میں لِکھ دُوں، اُنکو ہِندی پڑھنی نہیں آتی ۔ میںنیں اَںگریزی میں لِکھنے کی پیشکش کی، وہ ہِچکِچاتے ہُیے بولے کِ اُنکو اَںگریزی بھی نہیں آتی ۔ ماملا یہ تھا کِ وہ یہاں کِسی پارِوارِک سماروہ میں شامِل ہونے آیے پرواسی مُزاہِر مُسلمین تھے ۔ مینیں سبھی نِردیش اُردُو میں ٹیپ دِیا ۔ وہ ہیرت سے دیکھ کر بیساخ تا بول پڑے، " لیکِن آپ تو ہِندُو ہیں ؟"
    میں تڑ سے کہا کِ یہ زُبان وہاں پروان چڑھ رہی ہو تو کیا۔۔ اِسے اؤر اِسکے ہرُوف آپ میرٹھ سے ہی تو لے گیے ہیں ۔ ہماری بیٹی آپکی اَمانت ہے ۔ تبسے ّآج تک ہم لوگ دوست ہیں ۔ کُل زما کِسّا کوتاہ یہ کِ بھاشا اؤر لِپِ ایک سںسکرتِ کی پرتِنِدھِتو کرتی ہے، یہ کِسی مزہب کی موہتاز ّکبھی نہیں رہی !


    1990-92 के दौरान एक मुसलमीन भाई मुझसे बुखार वुखार के सिलसिले में मिलने आये । उन्होंनें गुज़ारिश की मैं दवायें लेने का वक़्त और तरीका सँकेत-चिन्हों में लिख दूँ, उनको हिन्दी पढ़नी नहीं आती । मैंनें अँग्रेज़ी में लिखने की पेशकश की, वह हिचकिचाते हुये बोले कि उनको अँग्रेज़ी भी नहीं आती । मामला यह था कि वह यहाँ किसी पारिवारिक समारोह में शामिल होने आये प्रवासी मुज़ाहिर मुसलमीन थे । मैनें सभी निर्देश उर्दू में टीप दिया । वह हैरत से देख कर बेसाख़्ता बोल पड़े, " लेकिन आप तो हिन्दू हैं ?"
    मैं तड़ से कहा कि यह ज़ुबान वहाँ परवान चढ़ रही हो तो क्या.. इसे और इसके हरूफ़ आप मेरठ से ही तो ले गये हैं । हमारी बेटी आपकी अमानत है । तबसे आज तक हम लोग दोस्त हैं । कुल ज़मा किस्सा कोताह यह कि भाषा और लिपि एक सँस्कृति की प्रतिनिधित्व करती है, यह किसी मज़हब की मोहताज़ कभी नहीं रही !

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  3. बहुत अच्छा लगा आपका प्रयास रवि साहब ! बहुत बहुत शुक्रिया इतनी सारी दुर्लभ जानकारी मुहय्या करने के लिए ! शुभकामनायें !

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  4. उर्दू ब्लॉग्स की चर्चा...अद्भुत. वैसे भी नये-नये प्रयोग चिट्ठा चर्चा की खासियत है.
    अब शुएब जी की शिकायत, लेकिन इधर तो मुझे ही उनकी भाषा आपत्तिजनक लग रही है. कोई मजहब पूछे तो इसमें इतना गुस्साने की क्या ज़रूरत है? सफ़र के दौरान तो ऐसा आमतौर पर होता है कि परिचय के दौरान कुछ लोग एक दूसरे का धर्म जानना चाहते हैं. हमारे बघेलखंड-बुन्देलखंड प्रांत में किसी का धर्म जानने के लिये पूछा जाता है " कौन ठाकुर हो?" यहां "ठाकुर" से मतलब उसकी जाति से है. मुझसे अगर कोई पूछता है तो मैं तो इतने तैश में नहीं आती. शुएब साहब अपने आप को बाहरी समझते हैं क्या?

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  5. बहुत बहुत शुक्रिया फ़ैज़ साहब की नज़्म सुनवाने के लिये।

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  6. वाह जनाब ! यह पोस्ट बिलकुल हट के है ।

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  7. सुन्दर पोस्ट सुन्दर चर्चा. उर्दू की कड़ियाँ के लिए शुक्रिया

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  8. उर्दू के इन ब्लोगों की चर्चा ठीक लगी ...अनुवाद की मुश्किलें तो है ही ...लेकिन साथ ही उर्दू पढने वालों की भी कमी है आप ने सही बातों को सामने रखा है ...शुभकामनाएं

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