गुरुवार, जनवरी 28, 2010

जामे कुटुम समाय घराने की एक चर्चा

बसंत आ गया. कोहरा बसंत के साम्राज्य को आगे बढ़ने से रोकने के लिए अपना दम लगाये है. लोग बसंत पर कम और कोहरे पर ज्यादा कविता लिख रहे हैं. संत सिंह चटवाल पद्मभूषण हो गए हैं. प्रधानमंत्री के डॉक्टर साहब भी पद्मभूषण हो लिए. कुछ लोग पद्मभूषण होते-होते बच गए. अमर सिंह जी राज्यसभा से इस्तीफ़ा देने से मना कर दिया.

इन सब के बीच एरिक सीगल नहीं रहे. लव स्टोरी नामक किताब के लेखक. तमाम प्रेमियों को अपनी भाषा से प्रभावित करने वाले एरिक. आज गौतम राजरिशी जी एरिक सीगल पर एक पोस्ट लिखी है. पढ़िए वे क्या लिखते हैं;

"love means not ever having to say you are sorry"...हम जैसे कितने ही आशिकों के लिये परम-सत्य बन चुकी इस पंक्ति के लेखक एरिक सिगल की मृत्य हो गयी इस 17 जनवरी को और मुझे इस बात का पता चला बस कल ही।"


एरिक को श्रद्धांजलि देने वालों में हमारे नीरज भैया भी हैं. उन्होंने अपनी टिप्पणी में लिखा;

"लव स्टोरी एक जादू जगा देने वाली किताब है, मैंने अपने कालेज के दिनों के बाद पढ़ा था, इतनी छोटी सी किताब इतना बड़ा असर डालती है की क्या कहूँ...बिना इसे पढ़े नहीं जाना जा सकता...हमारी भी श्रधांजलि."

आज श्री जाकिर अली रजनीश ने ब्लॉगर भाइयों का आह्वान किया और बताया कि; "ब्लागिंग को हल्के में न लें, अगले महीने एक और धमाके के लिए रहे तैयार.."

धमाका क्या है? इसके बारे में बताते हुए जाकिर साहेब लिखते हैं;

"साथियो, आप सबको बताते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है हिन्दी में प्रकाशित होने वाली विज्ञान केन्द्रित चर्चित पत्रिका "विज्ञान प्रगति" के फरवरी अंक में विज्ञान ब्लॉगिंग पर डा0 अरविंद मिश्र एक विस्त़ृत आलेख प्रकाशित हो रहा है। यह आलेख ब्लॉग की उपयोगिता और महत्ता को रेखांकित करने का एक और प्रयास है। आप सब इस लेख को अवश्य पढिएगा और अपनी प्रतिक्रिया से हमें जरूर अवगत कराइएगा। "


आशा है, जाकिर साहेब के आह्वान के बाद अब हम ब्लागिंग को हल्के में न लेंगे.

श्री रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक' की कविता पढ़िए. सुन्दर कविता उन्होंने कुहरे पर लिखी है. वे लिखते हैं;

भूरा-भूरा नील गगन है,
गीला धरती का आँगन है,
कम्बल बना बसेरा!
देखो हुआ सवेरा!


मनीष कुमार जी अपनी केरल यात्रा की दास्तान पढ़वा रहे हैं. मुन्नार में बिठाये उनके दिन और रात सबसे खूबसूरत थे. इसके बारे में मनीष बताते हैं;

"वापस रास्ते में सूर्य अपनी रक्तिम लालिमा लिए पहाड़ों की ओत में जाता दिखाई दिया.हमारे दुमंजिला कॉटेज की ऊपरी बालकनी पश्चिम दिशा की और खुलती थी. इसलिए हम सभी जल्द से जल्द वहां पहुंचकर इस मनोरह दृश्य को कैमरे में कैद कर लेना चाहते थे."


और क्या खूब फोटो निकाली हैं मनीष जी ने अपने कैमरे से. आप खुद देखिये. मेरे कहने से नहीं मानेंगे. यहाँ क्लिकियाइए.

जसवीर की बहुत ही प्यारी कविता पढ़िए जो उन्होंने मास्टर गोकुलचंद के नाम लिखी है. जसवीर लिखते हैं;

"मंदिर वाले स्‍कूल में
जिसे उस वक्‍त विद्या-मंदिर नहीं
कहा जाता था
और न ही उसमें पढ़ाने वाले
बूढ़े मास्‍टर गोकुलचन्‍द
को सर या टीचर।
उनकी आंखें पत्‍थर की थीं
हाथ में छड़ी रहती थी
धोती पहनते थे गंदी-सी
आवाज कड़क थी
गणित उनके लिए खेल था
बच्‍चे उनका जीवन थे।"


अब कविता पढ़ रहे हैं तो रजनी भार्गव जी की यह कविता पढ़िए. वे लिखती हैं;

"लम्हे, गुल्लक में
रेज़गारी से खनकते हैं
हर दिन रुई से भरी दोहड़
के लिए ललकते हैं।
एक लम्हा,
जब आँखें उस पर टिक जाती हैं,
लाल, पीले फूलों वाली,
किस, किस पगडंडी से गुज़रती है"


पूरी कविता पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कर दीजिये और देखिये हम आपको कितनी बढ़िया कविता पर ले जाते हैं.

कविताओं की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए पहुँचते हैं डॉ. मनोज मिश्र द्वारा प्रस्तुत स्व. पंडित रूप नारायण त्रिपाठी जी की रचना. एक नमूना देखिये;

"तुम्हारे पास बल है बुद्धि है विद्वान भी हो तुम
इसे हम मान लेतें हैं बहुत धनवान भी हो तुम
विधाता वैभवों के तुम इसे भी मान लेते हम
मगर यह बात कैसे मान लें इंसान भी हो तुम।"


आज समीर भाई की माताजी की पुण्यतिथि है. इस मौके पर समीर भाई ने बहुत ही भावुक कर देने वाली पोस्ट लिखी है. माताजी को याद करते हुए वे लिखते हैं;

"मैं उसके नाम के साथ स्वर्गीय लगाने को हर्गिज तैयार नहीं आज ५ साल बाद भी. वो है मेरे लिए आज भी वैसी ही जैसी तब थी जब मैं उसे देख पाता था. तुम न देख पाओ तो तुम जानो.

माँ कभी मरती है क्या...वो एक अहसास है, वो एक आशीष है, वो मेरी सांस है...उससे ही तो मैं हूँ..वो मेरी हर धड़कन में है..वो कोई एक तन नहीं जो मर जाये और हम उसे भूल जायें पिण्ड दान कर पुरखों में मिला कर."


बहुत ही प्यारी पोस्ट है. पोस्ट का महत्व उसके अंत में कविता की वजह से और बढ़ गया है.

हम सब की तरफ से माताजी को श्रद्धांजलि.

जहाँ एक और जाकिर साहेब कह रहे हैं कि ब्लागिंग को हल्के में न लें...वहीँ राजकुमार ग्वालानी जी के एक मित्र ने उनसे पूछ लिया; "तुम्हारे ब्लॉग की औकात ही क्या है?"

अपने मित्र के सवाल का जवाब देते हुए राजकुमार जी लिखते हैं;

"हमें इतना मालूम है कि आने वाले समय में ब्लाग का स्थान बहुत ऊंचा होने वाला है। इसको आज पांचवें स्तंभ के रूप में देखने की शुरुआत हो चुका है। अगर भविष्य में ब्लाग अखबारों के लिए खतरा बन जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। ऐसे में ब्लाग लिखना फायदेमंद है, इसकी औकात की बात करना गलत है।"


गणतंत्र साठ का हो गया. कवितायें लिखी गईं. परेड हो गई. हथियार निकाल कर दिखा दिए गए. और गणतंत्र दिवस मना लिया गया. इसी मौके पर पढ़िए प्रोफ़ेसर आनंद प्रधान का लेख. प्रोफ़ेसर प्रधान लिखते हैं;

"क्या यह सिर्फ एक संयोग है कि जिस समय गणतंत्र साठ का हो रहा है, देश में 'पेड न्यूज' यानि पैसा लेकर खबरों की शक्ल में विज्ञापन छापने पर तीखी बहस चल रही है? क्या यह भी सिर्फ संयोग है कि जिस संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके जरिये मीडिया की आज़ादी की गारंटी की गई है, उसके साठ साल के होने के मौके पर देश में मीडिया को 'रेगुलेट'(नियंत्रित) करने की मांग को लेकर बहस तेज हो रही है? निश्चय ही, यह सिर्फ संयोग नहीं है. ये दोनों ही मुद्दे एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं और उनका सीधा सम्बन्ध मुख्यधारा के मीडिया उद्योग की मौजूदा दशा-दिशा से है."



नीरज रोहिल्ला
नीरज रोहिल्ला ने ह्यूस्टन मैराथन में हिस्सा लिया. उसकी रिपोर्टिंग भी की. रिपोर्टिंग के शुरू में ही उन्होंने डिस्क्लेमर दे दिया. लिखा; "लम्बी और भावनात्मक पोस्ट". अब इस डिस्क्लेमर की वजह से अगर आपने पोस्ट न पढ़ी हो तो मैं कहूँगा कि पढ़ आइये. कमाल की पोस्ट है.

नीरज लिखते हैं;

"दौड़ के शुरू होने पर भी हमारा दिमाग ठिकाने पर नहीं था लेकिन हमने सोचा कि अब जो भी होगा दौड़ के बाद ही देखा जाएगा, घुटने का जायजा लिया तो यदा कदा किसी कदम के साथ थोडा सा दर्द था लेकिन कुछ ख़ास नहीं| बार बार अलग अलग ख्याल आ रहे थे और दौड़ पर ध्यान नहीं था| लेकिन शुरुआती ६ मील पलक झपकते ही कट गये | हर साल की तरह इस साल भी ह्यूस्टन निवासी धावकों का हौसला बढ़ने के लिए सड़क के दोनों ओर खड़े थे|"


आज एक और ब्लॉग पर चिट्ठाचर्चा हुई. यहाँ क्लिक कीजिये.

तो यह थी "जामे कुटुम समाय" घराने की चिट्ठाचर्चा. आपसब का दिन-रात सब मौज में बीते एही कामना है.

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15 टिप्‍पणियां:

  1. जामे कुटुम समाय घराना ?
    पता नहीं !

    चर्चा सुन्दर रही । ’साधु न भूखा जाय ’ टाइप ! आभार !

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  2. बहुत सुन्दर चर्चा शिव कुमार जी ! आज इसका (चर्चा का ) महत्व कुछ अधिक ही है !

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  3. चर्चा जितनी अच्छी...शीर्षक उससे भी बढकर :)

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  4. कुछ अपने प्रिय ठिकाने मिले और कुछ अपने लिये नये.

    आभार.

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  5. हमने दुसरे वाले चिट्ठाचर्चा पर टिपण्णी नहीं की. असली वाले पर ही कर के जा रहा हूँ.. :)

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  6. समीर भाई के माताश्री को मेरा श्रद्धा-सुमन समर्पित है ।
    लग रहा है, आख़िर डॉक्टर अरविन्द मिश्र जी का लोहा जगज़ाहिर होकर ही रहेगा !
    कुटुम्ब की बात कुटुम्ब के बाहर के लोग सोचें, अपनी तो चर्चा पढ़ने की भूख मिट गयी।

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  7. आज के जमाने में समर्थ से समर्थ चर्चाकार इसी घराने का हो सकता है।जगत समाय... के लोभ में पड़े नहीं कि गए :)
    हमें खूब जमी ये चर्चा

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