शनिवार, अप्रैल 03, 2010

हित अनहित पहिचानि

नमस्कार मित्रों! मैं मनोज कुमार एक बार फिर चिट्ठा चर्चा के साथ हाज़िर हूँ।

अधिकांश व्यस्त हैं सानिया चर्चा में। सबसे बड़ी ख़बर जो है। इसके अलावा भी एक छोटी बात हुई। शिक्षा को लेकर। उससे संबंधित कुछ पोस्ट मिले।

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तो चलिए चर्चा शुरु करते हैं।

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प्रज्ञा प्रसाद की प्रारंभिक शिक्षा पूर्णिया में हुई और संभावनाओं और शिखर की तलाश में भोपाल आई... यहां उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में स्नातकोत्तर किया। पढ़ाई के दौरान दूरदर्शन भोपाल में बतौर कैजुअल न्यूज़ एंकर काम किया। फिर वेबदुनिया और ईटीवी होते हुए ज़ी चौबीस घंटे छत्तीसगढ़ में पड़ाव डाला। उनकी संभावनाओं और शिखर की तलाश जारी है। 1 अप्रैल 2010 को शिक्षा का अधिकार कानून पूरे देश में लागू कर दिया गया| इस विषय पर सीधी बात करते हुए वे कहती हैं कि व्यावहारिक नहीं है ये क़ानूनउनका मानना है कि इस कानून के तहत कही गई बातें बहुत लुभावनी लगती हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से इसे लागू करना काफ़ी कठिन है। इसमें कई लूप होल्स हैं जिसकी वजह से कभी भी देश के बच्चे इस कानून का फायदा नहीं उठा पाएंगे और बाकी कानून की तरह ये भी महज़ हाथी का दांत बनकर रह जाएगा। इस विचारोत्तेजक आलेख द्वारा उन्होंने मसले को गंभीरता पेश किया है।

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देश के सभी बच्चे अब आपको कुछ सालों बाद शिक्षा लेते दिखाई पड़ेंगे। जी हाँ, ये कोई सपना नहीं, हकीकत में होने वाला है। शिक्षा लेने सम्बन्धी अधिकार बना दिया गया है और इसके अनुसार देश में 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को निशुल्क शिक्षा देने का प्रावधान किया गया है। पहल अच्छी है और इस अच्छी पहल को अच्छा ही बने रहना चाहिए।

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शिक्षा को अनिवार्य कैसे किया जाएगा!
पैसेजंर फाल्ट की तर्ज पर लागू करना होगा कानून ।
भय बिन न प्रीत हो गोसाईं। एक अप्रेल का दिन बचपन से ही अप्रेल फूल बनाने के नाम से जाना जाता रहा है। इस दिन जो चाहे झूट सच बोला जाए, सब कुछ माफ ही होता है। इस दिन किए गम्भीर से गम्भीर मजाक को भी माफ ही कर दिया जाता है। सरकार ने इसी दिन से अनिवार्य शिक्षा कानून लागू करने की घोषणा की है। यह बात मजाक है या सच इस बारे में तो सरकार ही जाने पर आम जनता जरूर इसे मजाक के तौर पर ही ले रही है।

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अभी १० दिन पहले ही इन्होंने इसका भाग १ प्रस्तुत किया था। आज कुछऔरबिखरे भावों को समेट लाये हैं और प्रस्तुत कर रहे है आपके लिए उड़न तस्तरी जी कहते हैं

चुप रहना भी कोई, मेरी मजबूरी तो नहीं,
हर बात जुबां से बोलूँ, कोई जरुरी तो नहीं.

खुश होने की ख्वाहिश लिए
मन फिर से उदास है बहुत...

-कहीं कोई ख्वाब टूटा है अभी

इनके भावों के विविध रंगों का मज़ा लीजिए।

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स्वामिभक्ति तथा त्वरित प्रत्युत्पन्नमति , दोनों के लिए श्रधेया नि:स्वार्थी पन्ना धाय जिसने अपने स्वामी की प्राण रक्षा के लिए अपने पुत्र का बलिदान दे दिया | एक सार गर्भित आलेख पढ़ें।

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राजेश चड्ढा की चार ग़जलें पढ़िए।

आदमी और आदमी की जात देखिए,
इसकी शह पे उसको दी है मात देखिए.
इक हाथ में उसूल, दूजे में स्वार्थ है.
साथ साथ उठेंगे दोनों हाथ देखिए.

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चलते-चलते

रहिमन तीन प्रकार ते, हित अनहित पहिचानि ।

पर बस परे, परोस बस, परे मामिला जानि ।।

रहीम कहते हैं कि शत्रु-मित्र की पहचान तीन तरह से होती है, आप परवश हो जाएं, आप पड़ोस में बसें या आप किसी मामले में फंस जाएं, तब शत्रु मित्र की सही पहचान अपने आप हो जाती है ।

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भूल-चूक माफ़! नमस्ते! अगले हफ़्ते फिर मिलेंगे।

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14 टिप्‍पणियां:

  1. इतनी संक्षिप्त चर्चा को पढ़कर मजा आ गया!

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  2. संक्षिप्‍त लेकिन सारगर्भित चर्चा। धन्‍यवाद।

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  3. इस सुंदर चर्चा को थोड़ा और विस्तार दीजिये ,निवेदन है

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  4. बड़ी सुन्दर चर्चा...आभार ।

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  5. यह बात मजाक है या सच इस बारे में तो सरकार ही जाने पर आम जनता जरूर इसे मजाक के तौर पर ही ले रही है।
    भाई आज तक तो सरकार ने जनता को मुर्ख ही बनाया है....

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