मंगलवार, अप्रैल 13, 2010

...प्रवासी मन की व्यथा-कथा

अल्पना वर्मा ने पूरे एक महीने अपने ब्लॉग पर पोस्ट लिखी है। इस पोस्ट में उन्होंने प्रवासी मन की व्यथा-कथा बयान की है। खाड़ी देशों के लोगों से बात शुरू करते हुये वे लिखती हैं:
खाड़ी देशों में आये प्रवासी जानते हैं कि आज हम यहाँ हैं तो कल मालूम नहीं यहाँ हैं भी या नहीं..किसी से पूछेंगे तो कोई भी इस भय को स्वीकारेगा नहीं लेकिन अधिकांश के लिए सच यही है.कि वे भविष्य को लेकर कहीं न कहीं आशंकित हैं ..इसी अनिश्चितता का परिणाम है कि ज्योतिषों और पंडितों की शरण में अब हम ज्यादा जाने लगे हैं.

इसके आगे के किस्से लिखते हुये वे बताती हैं:
जो भी खाड़ी देशों में आता है उस का उद्देश्य और आगे जाना होता है ,वापस भारत अपनी मर्ज़ी से बिरले ही जाते हैं ...प्रश्न यह किस देश में जाएँ जहाँ सही ठहराव मिले?बेहतर विकल्प भी.यहाँ कोई लन्दन कोई ऑस्ट्रेलिया तो कोई अमेरिका ,न्यूजीलैंड या कनाडा जाने के लिए कागज़ भरता है


कागज भरने के बाद अब जब रहने की अनुमति मिल गयी तब लफ़ड़ा यह कि जायें कि न जायें! लोग भी अलग-अलग राय देते हैं:
मिली जुली प्रतिक्रियाएं मिलीं मगर अधिकतर वहाँ के निवासी यही कहते कि बच्चों के लिए केनाडा आ रहे हो तो मत आओ.अब अगर जाते नहीं तो 'पी आर 'कैंसल हो जायेगा..जिन मित्रों को वीसा नहीं मिल पाया वो जाने के पक्ष में कहते हैं .हमारे वहाँ शिफ्ट न होने को बहुत बड़ा ग़लत निर्णय बता रहे हैं.


इस सब के बीच अपने देश में आने के नजारे भी बड़े मायूस करने वाले से लगते हैं। देखिये:
भारत जाते हैं तो सब को देख कर ऐसा लगता है ...किसी के पास समय नहीं है,सब की अपनी दुनिया बस चुकी है, बहुत आगे निकल गए हैं परन्तु हम आज भी वक़्त के पुराने काँटों में रुके हुए हैं!


होते करते जाने का दिन आ जाता है और कहते हैं:
जिस का दिल न हो ..उसे भी लगेगा जैसे अब तो जाना ही पड़ेगा...क्योंकि अब सच में ही लगने लगा है कि 'एन आर आई' का अर्थ है--Not Required Indians !
बड़ी उलझन है......जाएँ तो कहाँ जाएँ और भागें भी तो कब तक और कहाँ तक?


अल्पना वर्मा की इस पोस्ट से प्रवासी मन की स्थिति पता चलता है। और दूसरे साथियों ने भी पहले भी बहुत कुछ इस मन:स्थिति के बारे में लिखा है। अपनी शुरुआती पोस्टों में जीतेन्द्र ने लिखा था :
हम उस डाल के पन्क्षी है जो चाह कर भी वापस अपने ठिकाने पर नही पहुँच सकते या दूसरी तरह से कहे तो हम पेड़ से गिरे पत्ते की तरह है जिसे हवा अपने साथ उड़ाकर दूसरे चमन मे ले गयी है,हमे भले ही अच्छे फूलो की सुगन्ध मिली हो, या नये पंक्षियो का साथ, लेकिन है तो हम पेड़ से गिरे हुए पत्ते ही, जो वापस अपने पेड़ से नही जुड़ सकता.


बाहर रहने/बसने वाले साथी किसी न किसी अपने पुराने समय की यादों में ही दिन काटते रहते हैं। समय उनके लिये ठहर सा जाता है। राकेश खंडेलवाल जी के लिये पनघट, गागर, गोरी, पायल के बिम्ब ऐसे आकर्षण हैं जहां उनका मन लौट-लौट आता है:
महके हुए फूल उपवन से रह रह कर आवाज़ लगाते
मल्हारों के रथ पनघट पर रूक जायेंगे आते जाते
फागुन के बासन्ती रंग में छुपी हुईं पतझडी हवायें
बार बार अपनी ही धुन में एक पुरानी कथा सुनायें

माना है अनजान डगरिया, लेकिन दिशाचिन्ह अनगिनती
असमंजस में पडा हुआ हूँ, किसको छोडूँ किसे उठा लूँ


कभी इस विषय पर लिखने का प्रयास करते हुये मैंने अपनी बात कही थी:
  • मेरी समझ में जितने लोग अपने यहाँ से परदेश जाते हैं वे बेहतर जिंदगी की तलाश में जाते हैं। यह बात अलग है कि कुछ लोग अपनी जान हथेली पर रखकर ‘कबूतर’ बनकर जाते हैं -चोरी-चोरी,चुपके-चुपके। बाकी लोग शानदार तरीके से एअरपोर्ट पर फोटो खिंचवाते हुये जाते हैं।

  • मुझे जितना समझ में आता है कि विदेश जाने वाले अधिक मध्यमदर्जे की प्रतिभा वाले,पढ़ाकू,अनुशासित तथा सुरक्षित जीवन जीने का सपना देखने वाले नवजवान होते हैं। अधिकतर अपनी खानदान के इतिहास में पहली बार विदेश जाते हैं। विदेश गमन उनके परिवार के लिये उपलब्धि होता है। अक्सर इन लोगों के माता-पिता मध्यम दर्जे आर्थिक स्थिति वाले होते हैं जिनको अपने बच्चों को बाहर भेजने की हैसियत दिखाने के लिये अपनी पासबुक में हेरा-फेरी भी करनी पड़ती है ।कुछ दिन के लिये पैसा उधार लेकर अपने खाते में रखना होता है।

  • विदेश में खासकर पश्चिम के देशों में पैसा है,चकाचौंध है,आराम है। कुछ दिन वहाँ की दौड़-धूप में परेशान रहने के बाद वहाँ की आदत बन जाती है। बच्चे बड़े होने पर वापस आने की संभावनायें कम होती जाती हैं। बच्चों के लिये वहीं स्वदेश हो जाता है।

  • जितना मैं समझता हूँ विदेश में तमाम परेशानियाँ झेलनी पड़तीं हैं। ‘नौकर विहीन’ समाज में पैसा कमाने के बाद भी सारा काम खुद करना। अक्सर पहचान का संकट झेलना। जिन कामों को करना देश में हेठी समझा जाता हो वे भी करना। वहाँ के समाज से जुड़ने में भले ही समय लगता हो लेकिन अपने देश से एक बार जाकर फिर वापस आना बहुत जल्द कठिन होता जाता है।


  • मानसी ने इसी विषय पर अपनी बात कहते हुये लिखा था:
    हमारे दिल में अपने देश, अपने लोगों के लिये प्यार, अपनी मिट्टी की सोंधी खुश्बू अभी भी उतनी ही ताज़ा होती है। टी.वी. पर ऊलजलूल हिन्दी गाने भी बस इसलिये ‘आन’ छोड़ देना कि हिन्दी सुन पा रहे हैं, अपने बच्चों को हर रविवार हिन्दी सीखने हिन्दी की क्लास में भेजना, भारतीय स्वतंत्रता दिवस के दिन अपने घर के आगे या गाड़ी में अपने देश का झंडा लहरा कर घूमना, किसी ‘माल’ में किसी साड़ी पहने हुए वयस्का महिला को देख कर अपनी मां की याद आ जाना, कब बदला है। इतना सब होते हुये भी, देश से इतना लगाव होते हुये भी, क्यों नहीं लौट जाते हम अपने देश? क्या दिया है इस पराये देश ने हमें कि हम यहाँ रह जाते हैं। क्या तथाकथित ‘चमक-दमक’ ही रोक कर रख लेती है हमें यहाँ?


    मानसी की इस पोस्ट अपनी राय जाहिर करते हुये ई-स्वामी ने लिखा था:
    विदेशी भूमी पर जमने की प्रक्रिया से भी आत्मविश्वास आता है. संघर्ष का रोना रो कर अलालटप्पूओं से ये सुनना नही चाहते की "वापस आ जाओ क्या रखा है विदेश में". इधर जीवन कोई डालर की सेज भी नहीं. वो पेड पे नही उगते -कम नही खटना पडता.
    मजेदार है ना कई लोगों के लिए आप्रवासी मतलब डालर का बंडल है बेचारे के मार्टगेज की किस्त नहीं! :)


    लेकिन अनूप भार्गव के विचार सबसे महत्वपूर्ण लगे थे मुझे जिनको खोजते हुये ही मैं मानसी की इस पोस्ट तक आया! अनूप भार्गव ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये लिखा था:
    ज़िन्दगी में अधिकांश चीज़ें A La Carte नहीं 'पैकेज़ डील' की तरह मिलती हैं । विदेश में रहने का निर्णय भी कुछ इसी तरह की बात है । इस 'पैकेज़ डील' में कई बातें साथ साथ आती हैं , कुछ अच्छी - कुछ बुरी । अब क्यों कि उन बातों का मूल्य हम सब अलग-अलग, अपनें आप लगाते हैं इसलिये हम सब का 'सच' भी अलग होता है । जो मेरे लिये बेह्तर विकल्प है , वो ज़रूरी नहीं कि आप के लिये भी बेहतर हो । यह कुछ अपनें निज़ी विचार रख रहा हूँ :

    १. हम यहां रह कर जिन भौतिक सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं , उन की एक कीमत भी दे रहे हैं । परिवार , मित्र और सब से बड़ी बात अपनी माटी से दूर होना । अपनें बच्चों को उन के दादा-दादी , नाना-नानी से दूर रखना एक कीमत ही तो है । अपनी मिट्टी से दूर रह कर अपनी एक नई पहचान बनानें के लिये संघर्ष करना भी एक कीमत ही है ।


    अनूप भार्गव की इस मामले में और राय भी है जो आप यहां ही बांचे ताकि और विचार भी देख सकें।

    समीरलाल ने अपनी बात कहते हुये कभी लिखा था:
    अब कोई समझा रहा है, यहां अच्छा ही अच्छा है, आ जाओ. कोई कहता है कि इस तरफ़ की घास वहीं से हरी लगती है, है वैसी ही भूरी, तो आने के पहले सोच लेना.बहुत पापड़ बेलना पड़ेंगे. यहां तक कि यह भी बता दिया कि कितने तो लौट गये.

    समीरलाल की ढाई साल पहले लिखी इस पोस्ट में कुल सोलह टिप्पणियां हैं। उसमें से एक धन्यवादी टिप्पणी खुद समीरलाल की है। बाकी जिन लोगों ने टिप्पणियां कीं उनमें से करीब आधे (जो उस समय के बेहतरीन ब्लॉगर थे) ने लिखना बंद कर दिया है। इस समयान्तराल में समीरलाल की राय बदली है! इस पोस्ट पर उन्होंने जहां सभी टिप्पणियों के प्रति आभार व्यक्त किया वहीं कुछ दिन पहले की खुशदीप की पोस्ट पर उन्होंने मत व्यक्त किया था-
    इसलिए बार बार क्या धन्यवाद दें. सीधे किये गये प्रश्न के जबाब के सिवाय तो अपनी बात कहने के लिए आपकी अपनी पोस्ट है ही!!


    बदली स्थितियों उनके लिये सभी टिप्पणियों के जबाब देना मुश्किल है इसलिये अब वैसा नहीं कर पाते और हर टिप्पणी का जबाब देना मुश्किल भी है।

    इसी बहाने आज और भी कुछ पोस्टें देखीं! पुराने समय के बहुत सारे लिख्खाड़ लिखना छोड़ गये। बिना घोषणा के! बहरहाल!

    चलते-चलते आप अल्पना वर्माजी की आवाज में ये गाना सुनिये!

    और बांचिये ये कविता:
    सुनकर चौंको मत मेरे दोस्त!
    अब ज़मीन किसी का इंतज़ार नहीं करती।
    खुद बखुद खिसक जाने के इंतज़ार में रहती है
    ज़मीन की इयत्ता अब इसी में सिमट गयी है
    कि कैसे वह
    पैरों के नीचे से खिसके
    ज़मीन अब टिकाऊ नहीं
    बिकाऊ हो गयी है!
    टिकाऊ रह गयी है
    ज़मीन से जुड़ने की टीस
    टिकाऊ रह गयी हैं
    केवल यात्राएँ…
    यात्राएँ…
    और यात्राएँ…!

    फ़िलहाल इतना ही! बकिया फ़िर कभी।

    मेरी पसन्द


    वे ऊँचे-ऊँचे खूबसूरत हाई-वे,
    जिन पर चलती हैं कारें,
    तेज रफ्तार से कतारबद्ध,
    चलती कार में चाय पीते-पीते,
    टेलीफोन करते,
    दूर-दूर कारों में रोमांस करते,
    अमरीका धीरे-धीरे सांसों में उतरने लगता है।

    मूंगफली और पिस्ते का एक भाव,
    पेट्रोल और शराब पानी के भाव,
    इतना सस्ता लगता है,
    सब्जियों से ज्यादा मांस
    कि ईमान डोलने लगता है
    मंहगी घास खाने से अच्छा है सस्ता मांस खाना
    और धीरे-धीरे-
    अमरीका स्वाद में बसने लगता है।

    गरम पानी के शावर,
    टेलीविजन की चैनलें,
    सेक्स के मुक्त दृश्य,
    किशोरावस्था से वीकेन्ड में गायब रहने की स्वतंत्रता,
    डिस्को की मस्ती,
    अपनी मनमानी का जीवन,
    कहीं भी,कभी भी,किसी के भी साथ-
    उठने-बैठने की आजादी
    धीरे-धीरे हड्डियों में उतरने लगता है अमेरिका।

    अमरीका जब सांसों में बसने लगा-
    तो अच्छा लगा
    क्योंकि सांसों को-
    पंखों की उडा़न का अन्दाजा हुआ
    जब स्वाद में बसने लगा अमरीका
    तो सोचा -खाओ ,
    इतना सस्ता कहाँ मिलेगा?
    लेकिन हड्डियों बसने लगा अमरीका तो परेशान हूँ
    बच्चे हाथ से निकल गये,
    वतन छूट गया,
    संस्कृति का मिश्रण हो गया,
    जवानी बुढ़ा गई,
    सुविधायें हड्डियों में समा गयीं-
    अमरीका सुविधायें देकर हड्डियों में समा जाता है।

    व्यक्ति वतन को भूल जाता है,
    और सोचता रहता है,
    मैं अपने वतन जाना चाहता हूँ,
    मगर इन सुखों की गुलामी
    मेरी हड्डियों में बस गयी है,
    इसीलिये कहता हूँ- तुम नये हो
    अमरीका जब सांसों में बसने लगे,
    तुम उड़ने लगो,
    तो सात समंदर पार -
    अपनों के चेहरे याद रखना,
    जब स्वाद में बसने लगे अमरीका-
    तो अपने घर के खाने
    और माँ की रसोई याद करना,
    सुविधाओं में असुविधायें याद रखना
    यहीं से जाग जाना,
    संस्कृति की मशाल जगाये रखना,
    अमरीका को हड्डियों में मत बसने देना
    अमरीका सुविधायें देकर हड्डियों में जम जाता है।

    डॉ.अंजना संधीर

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    19 टिप्‍पणियां:

    1. बहुत अच्छा लेख और उतनी ही अच्छी चर्चा।

      रही बात हम प्रवासियों की, आधा समय तो अपने आपको सैट करने मे लग जाता है, सैट होने के बाद, भविष्य की चिंता। ऊपर से ग्लोबल स्लोडाउन और जाने क्या क्या। हर रोज अस्तित्व की लड़ाई लड़नी पड़ती है। रही बात गल्फ के प्रवासियों की, उनकी स्थिति मे थोड़ा फर्क होता ही है। लाइफ़स्टाइल भारत की तरह, कमाई पश्चिम की तरह। लेकिन प्रवासी तो प्रवासी ही है, जहाँ रह रहे है, वहाँ के नागरिक बन नही सकते(गल्फ़ के लिए बोला), भारत जाकर जिंदगी को दोबारा से शुरु करनी पड़ेगी। अब दोबारा शुरु करनी ही है तो पश्चिम क्यों नही, जहाँ सारी सुख सुविधाएं है। लेकिन क्या है, हम दोहरे मापदंडो वाले लोग है, हमेशा दोनो हाथो मे लड्डू चाहते है। चाहते है, सुख सुविधाए भी मिले, बच्चे भी ना बिगड़े, इन्ही उधेड़बुनो के बीच लोग असमंजस की स्थिति मे टाइम पास करते रहते है।

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    2. चर्चा बहुत अच्छी लगी, मन डोल गया क्योंकि अभी तो अपने भी बच्चे जाने की तैयारी में लगे हैं, कुछ करना है, भविष्य तलाशना है तो जमीन का मोह छोड़ना होगा वह बात और है की छोड़ने के बाद बहुत याद आता है वतन.

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    3. विषय बहुत दिलचस्प है .जाहिर है राय भी जुदा होगी ..पर सबको यहाँ समेटना वाकई एक साधुवादी प्रयास है .....ओर हाँ ... डॉ अंजना सधीर की कविता बहुत अच्छी लगी...

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    4. डाल से बिछड़े साथियों को जो कि फलदार वृक्षों पर रम गए है, तमाम शुभकामनाएं देता हूँ. अपना पेड़ अभी भी वैसा ही है अतः मन छोटा न करें. भारत की संस्कृति व भाषा का प्रसार करें, कभी यहाँ से गए बच्चों को कम से कम वहाँ तो अपनी भाषा दिख जाएगी.

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    5. आज की आप की चर्चा बहुत ही प्रभावी लगी,इस बुकमार्क किया है..क्योंकि इस विषय पर अपने से सभी के विचारो को पढ़ने से
      मेरे खुद के विचारों को नयी दिशा मिल सकेगी.
      बहुत बहुत आभार इन सभी नये पुराने लिंक को यहाँ देने का.
      हाँ ,मेरी पोस्ट को शामिल करने के लिए भी आभार.

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    6. दिल को छूती चर्चा। इस विषय पर कहने को बहुत कुछ है। कन्हैयालाल नन्दन जी और डा अंजना संधी्र जी की कविताएं बहुत अच्छी लगीं। आभार

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    7. बड़ा कन्फ्यूजन है दिमाग में इस विषय पर... मैं भी एक पोस्ट लिखता हूँ थोड़े दिनों में इस विषय पर.

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    8. वाह. अल्पना जी के बहाने कितने पीछे चले गये आप. कितनी पुरानी लेकिन नयी का आनन्द देने वालीं पोस्ट्स के लिंक मिले. बहुत-बहुत अच्छी, नई-निराली सी चर्चा. और मेरी पसंद?-
      अमरीका को हड्डियों में मत बसने देना
      अमरीका सुविधायें देकर हड्डियों में जम जाता है।
      बहुत सुन्दर.

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    9. अनूप जी एक बार फ़िर से मज़ा आ गया.. एक बहुत कामयाब चर्चा.. आपने एक बहुत ही अच्छा विषय उठाया और उसको ऐसी ऐसी पोस्ट्स के साथ बान्धा कि हम भी बह गये आपके साथ...
      बहुत सुन्दर..

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    10. कभी इस विषय पर लिखने का प्रयास करते हुये मैंने इस बात का इशारा किया था.. "मेरे भाई सरीखे एक यार बातचीत की बेतार मशीन से मुझे आवाज़ न लगाते, " बरखुरदार, कहाँ रहते हो ? इतने ग़ाफ़िल भी न रहो के अपने यार की नाक कटाओ, और ज़लद ब ज़ल्द सबको पूरा किस्सा पढ़वाओ । " उनने हूबहू वही बात कही जो यहाँ बयान है । ज़नाब ने रोज़ी की ख़ातिर मलेच्छ मुलुक में अपना डौल बनाया तो क्या, दिल तो उनका जैसे यहीं अपने वतन के गिर्द टँगा दिखता है । http://www.amar4hindi.com/2010/04/blog-post.html " और निट्ठल्ले पर राजेश प्रियदर्शी के हवाले से एक पोस्ट http://binavajah.blogspot.com/2008/11/blog-post_24.html घी के लड्डू, टेढ़े ही सही ... भी लिखी थी, बकिया आपकी चर्चा का कील-काँटा हमेशा दुरुस्ते रहता है । हाँ, आपको विषय आधारित चर्चा की ओर उन्मुख होते देख अच्छा लग रहा है !

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    11. Your comment will be visible after approval ?
      तो, सुरक्षा घेरा यहाँ भी लग गया ?
      क्या हम गँदगियों को यहाँ डॅम्प करने वाले टिप्पणीकारों को उनकी हैसियत का नुमाइश करने को यहाँ पड़ा रहने नहीं दे सकते ?
      ऎसी मानसिकतायें, ऎसे ब्लॉगर चिन्हित होते रहें, तो क्या हर्ज़ है ?
      इब्न बतूता पहन के ज़ूता...
      टहलें चर्चा चरने को

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    12. डॉ.अंजना संधीर की कविता बहुत अच्छी है.. अभी आराम से बैठकर पढी.. आजकल मै कुछ ऎसी ही पशोपेश मे हू.. कभी कभी तो लखीमपुर की इतनी याद आती है कि बाम्बे भी अपना अपना नही लगता.. अमेरिका की तो बात ही निराली है.. ऐसे न जाने कितने पल आते है जब हमे कुछ निर्णय लेने पडते है...

      चर्चा बहुत अच्छी.. बहुत अच्छा लगता है यहा आकर.. आप लोगो से उम्मीदे बढ्ती जाती है..

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    13. अब देखी...
      हमें तो अब पता पड़ा कई के प्रवासी होने का...

      वो क्या है कि इस पर कभी ध्यान ही नहीं दिया....

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