शनिवार, अप्रैल 10, 2010

एक बात पूछँ - (उत्तर दोगे?)

नमस्कार मित्रों! मैं मनोज कुमार एक बार फिर चिट्ठा चर्चा के साथ हाज़िर हूँ।

ले दे के सैकड़ा पार हुआ, सुनि लीजै इसकी कहानी कहीं प्रशंसा कहीं आलोचना कभी मचती है खींचा तानी कह मेरा फोटोरहे हैं सूर्यकांत गुप्ता “मेरे सभी ब्लॉगर मित्रों को जिन्होंने मेरे ब्लॉग को झाँका और टिपण्णी के माध्यम से हौसला बढाया, उन सभी का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ वंदन करता हूँ और नमन करता हूँ. आप सभी के आशीर्वाद से ही १०० वां पोस्ट लिख़ा पाया भले ही धीमी गति से क्यों न हो. आगे भी आशा करता हूँ आप सभी का सानिध्य बना रहेगा.”

रोटी...My Photo

मालकिन ने उसे आज

रोटी नहीं दी थी

क्योंकि उसने

कुत्ते की प्लेट में पड़ा

बिस्कुट उठा लिया था

अदा जी की क्षणिकाएं और मयंक की चित्रकारी का अद्भुत संगम देखिए/पढिए यहां। क्षणिकायें, एक से बढकर एक, गागर में सागर हैं।

जगदीश्वर चतुर्वेदी, प्रोफेसर, हिन्दी विभाग,कलकत्ता विश्वविद्यालय, कोलकाता रामचरित मानस की व्याख्या-कुव्याख्या के परिणाम बताते हुए कहते हैं कि जिस समय हिन्दी भाषी क्षेत्र में आर्यसमाज के नेतृत्व में समाज-सुधार की लहर चल रही थी, उस समय स्वामी दयानंद सरस्वती की धूम मची हुई थी, सनातनियों के तर्कों का खण्डन करने के लिए उन्होंने उस समय एक किताब प्रकाशित की जिसका नाम था ''सत्यार्थप्रकाश'', इस किताब के अंत में स्वामीजी ने अस्पृश्य किताबों की एक सूची जारी की थी, इसमें तुलसीदास की कृति ''रामचरित मानस'' का पहला नम्बर था, यानी आर्यसमाज के नेता ''रामचरित मानस'' को समाज -सुधार में सबसे बड़ी बाधा मानते थे, वहीं दूसरी ओर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को अपनी इतिहास दृष्टि के लिए सबसे बड़े कवि के रूप में तुलसीदास और कृति के रूप में ''रामचरित मानस'' महत्वपूर्ण लगा। प्रगतिशीलों में रामविलास शर्मा को तुलसी सबसे प्रिय हैं, जबकि रांगेय राघव के लिए सबसे अप्रिय लेखक हैं। मुक्तिबोध को तुलसी का रामचरित मानस सवर्णों के वर्चस्व का औजार लगा और भक्ति-आन्दोलन की निम्नवर्णोंन्मुख धारा को पलटने वाली कृति। उन्होंने तुलसी को सवर्णों के वैचारिक प्रतिनिधि के रूप में व्याख्यायित किया।

नेट साहित्य पर आप पढिए इस आलेख को और दीजिए अपने विचार तब तक देखिए महाकवि की ये पंक्तियां चार

निज कवित केहि लाग न नीका ।

सरस होई अथवा अति फीका ।

जे पर भनिति सुनत हरषाही ।

ते बर पुरूष बहुत जग नाहीं ।

रसीली हो या अत्‍यंत फीकी, अपनी कविता किसे अच्‍छी नहीं लगती ? किन्‍तु जो दूसरे की रचना को सुनकर हर्षित होते हैं, ऐसे उत्तम जगत में बहुत नहीं है ।

औपनिवेशिक युग में राष्ट्रवाद के उदय के विभिन्न पक्षों पर केन्द्रित प्रसिद्ध बुद्धिजीवी एजाज़ अहमद की पुस्तक का एक महत्वपूर्ण लेखांश को जनपक्ष पर प्रस्तुत करते हैं। बताते हैं कि राष्ट्र एक सार्वजनिक नागरिकता और वैधिक समानता का उत्पाद न होकर पहले से ही एक कल्पित साझा संस्कृति का मूर्तन था। ग्राम्शी का शाश्वत कथन है कि "राष्ट्र' शब्द का कोई अर्थ नहीं यदि उसका अर्थ "जनता' न हो। मगर उन भद्रजन-सुधारकों के लिए "जनता" एक अलंकारिक श्रेणी बनी रही जिसका हमेशा आवाहन तो किया जा सके पर सुधार के उन उद्यमों में जिसे कोई स्वायत्त स्पेस न दी जाये, जबकि राष्ट्र के नाम पर प्रस्तावित अथवा प्रयोजित सुधार हमेशा ही उन सुधारकों के अपने वर्ग, जाति एवं/या समुदाय तक सीमित रहे। इस आलेख में राष्ट्र को तरीक़े से परिभाषित की कोशिश नज़र आती है।

पुराclip_image002[3]नी डायरी की शरण से गिरिजेश राव पंजाब आतंकवाद के चरम के समय की कविता प्रस्तुत करते हुए बता रहे हैं कि यह वह दौर था जब उनका ईश्वर से मोहभंग हो रहा था। उनके मन में यह विश्वास पुख्ता हो चला था कि मनुष्य की सारी समस्याओं की जड़ विभिन्न पंथ और मजहब हैं। आज पंजाब में आतंकवाद नहीं है लेकिन देश के कई भागों में जन दु:ख के प्रति उपेक्षा, निर्मम दमन और शोषण ने हिंसा को एक विकल्प की तरह कायम रखा है। हिंसा - जिससे कोई समाधान नहीं आता लेकिन मनुष्य अपने मन को बहलाता है यह सोच कर कि शायद खून के छींटों से आँखों पर पड़ा पर्दा धुल कर बह जाय।

उजाला तो लगता है

अँधियारों के भ्रम जैसा
सूर्योदय तो श्रम जैसा

लड़ कर आने वाला।

इन शामों में

उदासी के कागज पर

चिंता की लेखनी में

पंजाबी खून की स्याही भर

लिख देता हूँ

तुम्हारा नाम

तुम तानाशाह हो

ईश्वर नहीं।

clip_image006clip_image004

दर्द की एक तेज लहर उठी
और उठ कर छा गयी
झिरी और गहरी हुई
टिप - टिप रिस रहा लहू
दर्द बस वहीँ था ...
दिल पर अभी तक है
उसी कांटे का निशाँ
इससे पहले कि
चेहरे पर झलक आये
दर्द के निशाँ
फिर से मैं मुस्कुरा ही दूंगी

कह रहीं हैं वाणी गीत! इस कविता में उन्होंने अपने-आपको बहुत अच्छी तरह से और बखूबी ढ़ाला है, और ऐसा लग रहा है कि वे बोल रहीं हो या नहीं, उनकी कविता ज़रूर बोल रही है “लिख ही दूँगी फिर कोई प्रेम गीत”

My Photoअपनत्व जी बड़े अपनत्व से मुद्दे उठाती हैं जिनका हमारे जीवन, समाज और संस्कार से सरोकार हो। आज भी वो कह रही हैं

कई वार मुद्दे
स्वयं उठते है
कभी ज़बरन
उठाए जाते है ।

और आगे बताती हैं

फलस्वरूप एक
आम आदमी
भौचक्का सा
दर्शक ही बन
रह जाता है ।

इनकी कविता पढ़ने पर ऐसा लगा कि ये बहुत सूक्ष्मता से एक अलग धरातल पर चीज़ों को देखती हैं।

clip_image007 पं. डी.के. शर्मा “वत्स” जी के आलेख मुझे काफ़ी आकर्षित करते हैं। इनका विश्‍लेषण बड़ा ही वैज्ञानिक और तार्किक होता है। आज उनके विश्‍लेषण का विषय है “ज्योतिष इंसान को परिस्थितिजन्य विवशताओं से मुक्त होने का मार्ग दिखाता है”। कहते हैं प्रकृ्ति यानि--संतुलन। यह वस्तुत: वह अवस्था है जहाँ व्यवस्था अपने शुद्ध रूप में रहती है। असंतुलन, अव्यवस्था जैसी व्यवस्थायें विकृ्तियाँ मानी जाती हैं। हमारे जीवन में अनुकूल-प्रतिकूल, उत्थान-पतन, हर्ष-विषाद जैसी स्थितियाँ आती ही रहती हैं। ये जीवन के लक्षण हैं और हमारी विवशताऎं। सामान्यत: इन स्थितियों पर विचार करने का अभ्यास एक आम आदमी को नहीं होता। परिस्थितिजन्य विवशता उसे इतना गहरे जकडे रहती हैं कि वो इनसे छिन्न होकर इनका विश्लेषण कर ही नहीं पाता और यदि करना चाहे तो शायद तब भी न कर पाये। लेकिन ज्योतिष विद्या इन्सान की इन्ही परिस्थितियों के विश्लेषण का ही दूसरा नाम है। इस विद्या का उदेश्य ही यही है कि इसके प्रकाश में उसके जीवन की इन वर्तमान परिस्थितियों का जो हेतु है, उस मूल कारण से उसे अवगत कराना और आगामी भविष्य हेतु उसका मार्गप्रशस्त करना।

लेखनी प्रशस्त है, बांधती है, भाषा पठनीय है। रचना को पूरी पढ़ने की रुचि जगाती है।

clip_image008

जी हाँ, मातृभाषा हिंदी को मृत अथवा मात्र भाषा कहने वालों की बोलती बंद करने का समय आ गया है। हिंदी चिट्ठाकारिता के इतिहास में पहलीवार ब्लॉग पर उत्सव की परिकल्पना की गयी है । यह उत्सव १५ अप्रैल २०१० से शुरू किया जा रहा है, जो दो माह तक निर्वाध गति से परिकल्पना पर जारी रहेगा । इसका समापन हम विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देनेवाले चिट्ठाकारों के सारस्वत सम्मान से करेंगे । उत्सव के दौरान सारगर्भित टिपण्णी देने वाले श्रेष्ठ टिप्पणीकार को भी इस अवसर पर सम्मानित किये जाने की योजना है । आईए हिंदी को एक नया आयाम दिलाएं , हम सब मिलकर ब्लॉग उत्सव मनाएं ...... ।

clip_image009रंजना (रंजू भाटिया) एक आग आपकी रगों में सुलगती है , अक्षरों में ढलती है प्रस्तुत करते हुए कहती हैं अमृता जी के लिखे यह लफ्ज़ वाकई उनके लिखे को सच कर देते हैं ...उनके अनुसार काया के किनारे टूटने लगते हैं सीमा में छलक आई असीम की शक्ति ही फासला तय करती है । जो रचना के क्षण तक का एक बहुत लम्बा फासला है एहसास की एक बहुत लम्बी यात्रा ....मानना होगा कि किसी हकीकत का मंजर उतना है जितना भर किसी के पकड़ आता है । अमृता जी की लिखी कहानी धन्नो में समाज का छिपा हुआ रूप स्पष्ट रूप से सामने आया है । अश्लीलता इस समाज के गठन में है जहाँ औरत का जिस्म न सिर्फ रोटी खरीदने का साधन बनता है ,बलिक पूरे समाज की इस स्थापना में घरेलू औरत का आदरणीय दर्ज़ा खरीदने का साधन भी है । धन्नो इसी अश्लीलता को नकारती एक ऊँची ,खुरदरी और रोष भरी आवाज़ है ।

आखिरी के सारे शब्द ही अपने आप में एक मुकम्मिल बयान है अमृता प्रीतम के उपन्यासों या कहानियों की खासियत यही है कि उनकी स्त्री पात्र समाज से बगावत करते हुए भी अपना औरतपन नहीं छोडती । धेलियों और आदरणीयों के बीच एक स्थान बनाती धन्नो ...अपने आखिरी क्षणों में लड़कियों की शिक्षा के लिए ही जमीन दान कर जाती है ।

मेरा परिचय यहाँ भी है!सरस, रोचक और शुष्क मन में बहार लाने वाली रचना लेकर एक बार फिर आए हैं डा. रूपचंद्र शास्त्री मयंक। कह रहे हैं

कुछ कहा कीजिए, कुछ सुना कीजिए!
मौन इतना कभी मत रहा कीजिए!!

गम को मिल-बाँटकर, बोझ हल्का करो,
बेहिचक बात पर तप्सरा कीजिए!

जिन्दगी एक मुश्किल भरा फलसफा,
प्यार से दिल लगाकर पढ़ा कीजिए!
मौन इतना कभी मत रहा कीजिए!!

अलका सैनी एक कड़वे सच को उजागर करती कहानी कसक पेश कर रहीं है। एक बहुत ही मार्मिक कहानी के ज़रिए बता रही हैं कि स्त्रियां कुछ भी कर लें अपनी घर गृहस्थी के लिए उनके सारे काम नज़र अंदाज़ कर दिए जाते हैं।

My Photoजीवन के संघर्ष में मायने यह नहीं रखता की जीत होगी या हार, मायने यह रखता है की आपने अपनी अंतरात्मा की आवाज को सुनी या अनसुनी कर दी| जीतता या हारता वही है जो लड़ता है| इसी तरह के मनोबल बढाती सुन्दर रचना लेकर आयी हैं रश्मि प्रभा जी।

मासूम मन के घाव

सबको नहीं दीखते

दिल की लडखडाती धडकनें सुनाई नहीं देती

तुमने मेरे दर्द को महसूस किया

और मेरी मुस्कान बने

तुम्हारी जीत मेरी जीत है

जब भी मन उदास हो

याद रखो-

गिरते हैं शहंशाह ही मैदाने जंग में

यह रचना हमें नवचेतना प्रदान करती है और नकारात्मक सोच से दूर सकारात्मक सोच के क़रीब ले जाती है।

My Photoबिम्बों का प्रयोग देखिए। बेहद छोटी रचना है पर इसके अनूठे बिम्बों ने मुझे आकर्षित किया और इसका लिंक आप को दे रहा हूँ।

दिन-रात
दौड़ती भागती
मेरी मशीनी ज़िन्दगी में,
मोबिल ऑयल हो तुम !
बेहद ज़रूरी,
नितांत आवश्यक.

मीनू खरे जी की इस रचना के शीर्षक मशीनी ज़िन्दगी से ही भावनाओं की गहराई का एह्सास होता है।

My Photoबबली जी की रचनाएं एक सच्चे, ईमानदार कवयित्री के मनोभावों का वर्णन होती हैं। आज वो झूठे जग का झूठा नाता पेश करते हुए कहती हैं

घर के चारों ओर,
मचा था कितना शोर,

नन्ही चिड़िया मन की सच्ची,

दाना खाती लगती अच्छी !

पूरी कविता पढिए। कविता की पंक्तियां बेहद सारगर्भित हैं।

My Photoअभिषेक प्रसाद 'अवि' अपने मन की बात कहना चाह रहे हैं। खास उनके लिए। कहते हैं

आज लिखना चाहता हूँ
इतना जितना कभी लिखा ही नही,
ना मैंने और ना किसी और ने,
इतना कि शब्द ख़त्म हो जाए इस दुनिया से
पर मेरा लिखना जारी रहे...

मानवीय संवेदना की आंच में सिंधी हुई ये कविता हमें मानवीय रिश्ते की गर्माहट प्रदान करती है।

मेरा फोटोकभी तन्हाई मे बैठ के सोचिए .. क्या हम पगले नहीं हैं। कभी कुछ तो कभी कुछ करते हैं... कोई निश्चितता तो है ही नहीं जीवन मे.. तो हम भी तो एक पगले मानुष ही हैं। ये मैं नहीं हिमांशु पंत जी कह रहे हैं।

मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
किस पल मे मै हंस बैठूं,
न जाने किस पल रो जाऊं.
किस पल को न जाने जी लूं,
न जाने किस पल मर जाऊं.

अपने मन की सच्ची बातें कवि सीधे-सीधे अपने ही मुख से उत्तम पुरुष में कह रहा है और पाठक को इस तरह उन भावों के साथ तादातम्य अनुभव करने में बड़ी सुगमता होती है।

इस बार बस्तियों के बसने की कहानी लेकर आए हैं रवीश कुमार जी। बताते हैं कि बस्तियों के उजड़ने की कहानी एक दौर में उन्होंने खूब कवर की है। अब तो ऐसी कहानियों के लिए स्पेस ही नहीं है। मगर बस्तियों के फिर से बसने की कहानी कभी नहीं की। कभी जाकर नहीं देखे कि कैसे गेहूं के खेत में प्लाट काट कर ब्लॉक बनाया गया,वहां सभी बस्तियों को बसाया गया। कई ब्लॉक बने। हर बस्ती के लोग यहां आकर बसे। इस बस्ती में राजनीति से लेकर त्योहार तक जीवन का हिस्सा बनता रहा।

लेकिन हरीश की बात भूल नहीं पा रहे हैं। उसने कहा था कि उसके लिए तो कॉमनवेल्थ २००६ में ही शुरू हो चुका था। जब उसकी बस्तियां उजड़ीं। वे हर दिन बीस से पचीस किमी की दूरी तय करते हैं। बस पकड़ने के लिए तीन चार किमी की दौड़ लगाते हैं। वे तो कॉमनवेल्थ के लिए चार साल से दौड़ रहे हैं। दिल्ली वाले तो अब दौड़ेंगे। कॉमनवेल्थ में वही दौड़ेंगे जो अभी आराम कर रहे हैं।

My Photoहरकीरत ’हीर’ जी बड़ी सरलता से अपनी बात कह जाती है! कब्र और नज़्म शीर्षक रचना उनकी आत्माभिव्यक्ति की अकांक्षा को प्रदर्शित करती है। इस रचना में उनका अंदाजे बयां एकदम जुदा है!

इश्क़ ने खोले हैं
दिल के कोरे वरके
चुपके से इक नज़्म
हुस्न का काफिया
तोड़ चली

.....

आज लफ़्ज़ों ने
छेड़ दी है जो तान
इश्क़ की ...
कब्र तो आँखें मूंदे
पड़ी रही ...
और नज़्म ......
अक्षर अक्षर मुझे
पढ़ती रही .......!!

इस नज़्म में बहुत बेहतर, बहुत गहरे स्तर पर एक बहुत ही छुपी हुई करुणा और गम्भीरता है। इस को पढ़कर एक भावनात्मक राहत मिलती है।

नए चिट्ठे

चिट्ठाजगत॰इन पर पिछले 24 घण्टे में जुड़े हैं 11 नए चिट्ठे। नवपदार्पण करने वाली इन कलियों का टिप्पणी रूपी भ्रमरों द्वारा स्वागत करें!

1. *मेरी नज़र* (http://ajmal-mypenonline.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Dr.Ajmal Khan
2.
Ananddham's Blog (http://ananddham.wordpress.com)
चिट्ठाकार: ananddham
3.
वैदिक नक्षत्र ज्योतिष (http://acharyasushil.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Acharya Shushil Awasthi "Prabhakar"
4.
sSwastik (http://santoshswastik.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Santosh Swastik
5.
Vipin Tomar (http://vipintomar1988.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Vipin Tomar
6.
my life (http://drshandilya.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: shandilya
7.
*MyMediaMyIndia* (http://mymediamyindia.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: *MyMedia~MyIndia*
8.
apne kuch haseen pal (http://madanbhavilokesh.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Lokesh
9.
कारवाँ: कविताओं का (http://karwankawitaonka.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: जयदीप शेखर
10.
My Mobile Blog (http://doeyuk544.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: Anonymous
11.
माधव-हेल्थ (http://madhavhealth.blogspot.com/)
चिट्ठाकार: माधव

आखर कलश पर पढिए देश-भर में होने वाले अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों में कवयित्री के रूप में स्‍थापित डा. कविता किरण कि पांच ग़ज़लें।

१. दिल पे कोई नशा न तारी हो

रूह तक होश में हमारी हो

2. चैन हासिल कहीं नहीं होता

आपको क्यों यकीं नहीं होता

3. है समंदर को सफीना कर लिया

हमने यूं आसान जीना कर लिया

4. आंख मेरी फिर सजल होने को है

लग रहा है इक गजल होने को है

5. मोम के जिस्म जब पिघलते हैं

तो पतंगो के दिल भी जलते हैं

अच्छी ग़ज़लें, जो दिल के साथ-साथ दिमाग़ में भी जगह बनाती है।

आर्थिक विकास के साथ सामाजिक अपराध बढ़ना स्वाभाविक-कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, का हिन्दी संपादकीय पढिए। कहते हैं

क्या गजब समय है। पहले लूट की खबरें अखबारों में पढ़ते थे। फिर टीवी चैनलों पर यह लुटने वाले लोगों के और कभी कभी लुटेरों के बयान सुनते और देखते थे। अब तो लूट के दृश्य बिल्कुल रिकार्डेड देखने को मिलने लगे हैं जो लूट के स्थान पर लगे कैमरों में समा जाते हैं-इनको सी.सी.डी. कैमरा भी कहा जाता है।अपराध के तौर तरीके बदल रहे हैं। उससे अधिक बदल रहा है अपराध करने वाले वर्ग का स्वरूप! सामान्य आदमी की निष्क्रियता के अभाव में ऐसे अपराध रोकना संभव नहीं है क्योंकि सभी जगह आप पुलिस नहीं खड़ा कर सकते। ऐसे में समाज चेतना में लगे संगठनों को अब इस बात पर विचार करना चाहिए कि किस तरह सामान्य नागरिक की भागीदारी अपराधी को रोकने के लिये बढ़े। इसके लिये यह जरूरी है कि अपराध करना या उसको प्रश्रय देना एक जैसा माना जाना चाहिये।

रवीश कुमार एक विचारोत्तेजक आलेख के द्वारा बता रहे हैं कि दंतेवाड़ा में हुए हमले के बाद उनकी जो भी तस्वीरें छप रही हैं, उनमें एक किस्म की उदासी है। साथ ही पूछ रहे हैं कि समस्या का आधार क्या है। क्या हिंसा ही आखिरी रास्ता है। बातचीत और हिंसा छोड़ने की एकाध पेशकशों को छोड़ दें तो यही लगता रहा कि गृहमंत्री युद्ध के रास्ते पर ही चलेंगे। बीच में लगे कि यह रास्ता ठीक नहीं तो पुनर्विचार करने में भी हर्ज़ नहीं है। एक राज्य की मुसीबत यह है कि वह किस संविधान के तहत किसी सैन्य आन्दोलन को मान्यता दे।

नक्सलवादी होने का मतलब ही है राज्य से हिंसक टकराव। एक जटिल समस्या का सरल समाधान बंदूक नहीं है। नक्सलवाद के समर्थन और सरकार के विरोध में लाइन ली जा सकती है। ठीक इसके उलट भी लाइन ली जा सकती है। रवीश जी का मानना है कि सरकार को बातचीत की मेज़ पर आना ही होगा या फिर यह बताना होगा कि जब बाकी समाज से आप इतनी सहानुभूति रखते हैं तो आदिवासियों से क्यों नहीं रखते। क्या सरकार दिल पर हाथ रख कर कह सकती है कि उसकी तरफ से या उसकी शह पर उद्योगपतियों की तरफ से आदिवासियों का शोषण नहीं हो रहा है।

imageइसी विषय पर अपनी राय रखते बजरंग मुनि कहते हैं स्वतंत्रता के समय भारत के राजनेताओं के एक गुट ने गांधी की हत्या की तो दूसरे गुट ने गांधी के नीतियों की हत्या की. गांधी की नीतियों की हत्या करनेवालों ने मिलजुलकर समाज पर एक ऐसा संविधान थोप दिया जिसमें लोकतंत्र के नाम पर अनंतकाल तक समाज को गुलाम बनाकर रखने के सभी उपकरण मौजूद थे. वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था इसी लोकतंत्र को किसी भी तरह से बचाकर रखना चाहती है जबकि नक्सलवादी इस व्यवस्था को उखाड़कर अपनी व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं.

समस्या का विश्लेषण कर वे सुझाते हैं कि इतना तो साफ है कि सरकारी नीतियां ही नहीं सरकार की नीयत भी गलत है. विकास की बात तो महज एक ढोंग है. यदि विकास के नाम पर खर्च किये जाने वाले कमीशन को ही बंद कर दिया जाए तो विकास की सारी पोल खुल जाएगी. विकास के नाम पर जो धन खर्च किया जा रहा है उससे दोनों पक्षों के दलाल लाभान्वित हो रहे हैं. इसीलिए ये लोग विकास का रोना रोते हैं. नक्सलवादी विकास की मांग भी करते हैं विकास में बाधा भी पहुंचाते हैं. दूसरी ओर सरकारी लोग हैं जो विकास के नाम पर बंदरबाट में लगे हुए हैं. इसलिए नक्सलवाद की समस्या का समाधान न तो विकास है और न ही बंदूक. नक्सलवाद की समस्या का एक ही समाधान है स्थानीय स्वायत्तता जिसका संशोधित तरीका है ग्रामसभा का सशक्तीकरण.

लेटे हुए जमीन परनक्सलवाद का जवाब है हमारे पास? यह सवाल पूछ्ते हुए अज़दक पर प्रमोद सिंह कहते हैं ऐसे में यह मज़ेदार है जब घेरे में फंसे दोनों पालों का देवों और दानवोंमें स्‍थूल विभाजन करके, देवों का पाला थामे दानवों के चिथड़े उड़ाये जा रहे हों, एक बुजुर्ग गांधीवादी ऐसी सन्-सन् फिजा में भी तटस्‍थता की चंद समझदार बातें करते दीखें. आप भी भरी हुई बंदूक लिये देश के जितने भी हैं सब माओवादियों को सिर्फ़ भून आने की मंशा और गुस्‍सा न रखते हों, ठंडे मन एक बार फिर सवाल पर विचार करना चाहते हों, तो आप भी एक नज़र मारें विस्‍फोट पर श्री बजरंग मुनि जी कह क्‍या रहे हैं.

आपकी पसंद

My Photoचिट्ठा जगत पर दिख रहे सबसे अधिक टिप्पणियों के आधार पर ... खुशदीप जी की पोस्ट आंखों देखा भ्रम आज आपकी पसंद है। एक कथा के ज़रिए वो बताते हैं कि जब तक सारे तथ्यों का पता न हो, नतीजा निकालने की जल्दी नहीं करनी चाहिए।

मेरी पसंद

आचार्य संजीव ’सलिल’ जी की हिन्दी ग़ज़ल मेरी आज की पसंद है।

सत्य सनातन नर्मदा, बाँच सके तो बाँच.
मिथ्या सब मिट जाएगा, शेष रहेगा साँच..


कथनी-करनी में तनिक, रखना कभी न भेद.
जो बोया मिलता वही, ले कर्मों को जाँच..


साँसें अपनी मोम हैं, आसें तपती आग.
सच फौलादी कर्म ही सह पाता है आँच..


उसकी लाठी में नहीं, होती है आवाज़.
देख न पाते चटकता कैसे जीवन-काँच..


जो त्यागे पाता 'सलिल', बनता मोह विछोह.
एक्य द्रोह को जय करे, कहते पांडव पाँच..

चलते-चलते

“साँप! तुम सभ्य तो हुए नहीं-

नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया।

एक बात पूछँ - (उत्तर दोगे?)

तब कैसे सीखा डँसना-विष कहाँ पाया?”

--- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ’अज्ञेय’

My Photoभूल-चूक माफ़! नमस्ते! अगले हफ़्ते फिर मिलेंगे।

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29 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया!
    रोचक, सरस और सारगर्भित लिंक देने के लिेए आभार!

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  2. विस्तृत और उम्दा चर्चा! बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  3. आभार! रोचक, सरस और सारगर्भित लिंक देने के लिये
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुंदर प्रस्तुति ...विभिन्न चिट्ठों को विस्तार से लिया है ... निष्पक्ष चर्चा... बहुत सुंदर ...आभार ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत अच्छे लिंक इकट्ठे किये हैं मनोज भाई ! आपका आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  6. वाह ! बहुत अच्छी लगी चर्चा. लिंक सहेजकर रख लिये हैं, धीरे-धीरे पढ़ने के लिये. आज की चर्चा में मुख्य बात है---सामाजिक मुद्दों का हावी होना और महिला चिट्ठाकारों की अधिकता.

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  7. हाँ, एक बात और इस मंच के माध्यम से पूछ रही हूँ. मीनू जी का ब्लॉग खोलने पर मालवेयर चेतावनी आ रही है दो दिन से. क्या आप में किसी के साथ भी ऐसा हो रहा है?

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  8. आपकी चर्चा का अंदाज सही है, रचना के साथ आपके अपने विचार भी हैं - शुक्रिया

    उत्तर देंहटाएं

  9. आज की चर्चा में श्री गिरिजेश की रचना निश्चय ही प्रभावित करती है ।
    इन्हीं से मिलते जुलते भाव की एक कविता मैंनें ’ भगतसिंह के दस्तावेज़ों ’ में भी पढ़ी थी ।
    मुझे अब शब्दशः तो याद नहीं.. पर वह महीनों तक मेरे 24 वर्षीय मनो्मस्तिष्क पर कब्ज़ा बनाये रही ।
    चर्चा की मूल आत्मा से भटकती हुई क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम की एक दूसरी कृति के अँश याद आ रहे हैं,

    " महाविद्रोही रणॅक्लान्त
    आमि शेई दिन होबो शान्त
    जॅबे उत्पीड़ितेर क्रन्दनरॉल
    आकाशे बातासे ध्वनिबे ना
    अत्याचारीर खँगकृपाण
    भीम रणॅभूमे रणॅबे ना
    विद्रोही ओ रणॅक्लान्त
    आमि शेई दिन होबो शान्त "


    ( मैं विद्रोही अब लड़ाई से थक गया हूँ, और मैं उसी दिन शान्त हो पाऊँगा जिस दिन कीसी दुखी की आह या चीत्कार आकाश में आग न लगा सकेगा और जब ज़ालिमों आत्याचारियों की भयानक तलवार मैदान में चलनी बन्द हो जायेंगी । तब और तभी मैं भी शान्त हो पाऊँगा और शान्त हो भी जाऊँगा )

    गिरिजेश की रचना हवाला देने के लिये धन्यवाद मनोज जी ।
    और कुछ बिसरी कविताओं में फिर से घुमाने के लिये धन्यवाद गिरिजेश !

    उत्तर देंहटाएं
  10. विस्तृत और बढ़िया चर्चा.....

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत बढ़िया चर्चा शुक्रिया अमृता प्रीतम के लिंक को लेने के लि

    उत्तर देंहटाएं
  12. बढिया और विस्तृत चर्चा.गिरिजेश जी की रचना बहुत पसन्द आई.

    मेरी इतनी छोटी कविता पर भी ध्यान देने के लिए आभार.


    मुक्ति जी मेरे ब्लॉग से सम्बन्धित ऐसी कोई शिकायत अभी तक प्राप्त नहीं हुई है. आशा है आप यूँ ही स्नेह बनाए रखेंगी.

    उत्तर देंहटाएं
  13. हिमांशु जी और हरकीरत जी की रचनाएँ मन को गहरे तक छूती हैं. दोनो को बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  14. विस्तृत और उम्दा चर्चा!………………॥आभार्।

    उत्तर देंहटाएं
  15. जनपक्ष को शामिल करने के लिये आभार

    उत्तर देंहटाएं
  16. बेहद उम्दा चर्चा, मनोज जी! आपकी निष्पक्षता स्पष्ट दृ्ष्टिगोचर हो रही है....आभार्!

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  17. मनोज जी,
    पोस्ट पर लेट आने के लिए माफ़ी...निश्चित रूप से आपकी चर्चा का अंदाज़ सबसे जुदा है...आनंद देने वाला है...

    जय हिंद...

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  18. मीनू खरे जी के ब्लॉग पर चेतावनी है और १ मिनट बाद ही ब्लॉग दिखाई देना बन्द हो कर गूगल का चेतावनी वाला लाल बैनर दिखाई देने लगता है।

    गूगल क्रोम के सभी प्रयोक्ताओं को यह चेतावनी आती होगी। माल्वेयर के लिंक के रूप में dada1313ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम का प्रयोग ऐसे हर ब्लॉग पर समान रूप से मिलेगा जिनमें यह चेतावनी आती है।

    ब्लॉग स्वामी अपनी ब्लॉगलिस्ट हटाकर देखें, वस्तुत: उस लिस्ट के किसी ब्लॉग से यह बैकलिंक हो रहा है और प्रत्येक उस ब्लॉग को स्पैम घोषित कर रहा हि, जिसकी लिस्ट में उसका जुड़ाव हो रहा है। भाटिया जी के पराया देश आदि कई अन्य हिन्दी ब्लॉग ऐसे ही बन्द हो रहे हैं और चेतावनी का बैनर आ जाता है।

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  19. विस्तार से की गयी चर्चा अच्छी लगी.

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  20. वाकई आपके द्वारा चर्चा का अन्दाज़ अलग होता है. अच्छी लगी यह चर्चा.

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  21. आज कि चर्चा ने दिल छू लिया.
    सच में अब चिट्ठा-चर्चा का स्तर बहुत ही ऊंचा हो गया है,
    आपलोग बहुत ही दिल से चर्चा करते हैं.
    कोई खानापूरी नहीं.
    शुभकामनाएं. :)

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  22. विस्तृत और उम्दा चर्चा! बधाई.

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  23. आपने कहां शामिल किया है मिला नहीं मुझे...क्या लिंक दे सकेंगे ..

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  24. बहुत सुन्दर चर्चा .....बहुत अच्छा विश्लेषण और जानकारी भी एक जगह पर .....:):)

    आगे भी यूँ ही बताते रहे इस अंतरजाल की दुनिया का हाल ...:)

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