शुक्रवार, अप्रैल 23, 2010

अज्ञान के आनंद में डुबकी लगाती चर्चा अनइग्‍नोरेबुल की

 

अज्ञान में अपूर्व आनंद है। अरसे से ब्‍लॉगक्रीड़ा से परे हैं, सप्‍ताह दर सप्‍ताह अनूपजी हमें बताते रहे कि चर्चा करनी है हम इस मेल के साथ वैसा ही बरताव करते रहे जैसा मितव्‍ययता के सरकुलरों के साथ सरकारी दफ्तर में होता है। अपनी आखिरी पोस्‍ट हमने विनीत के जुकाम पर लिखी थी इस बीच विनीत का जुकाम न जाने कब का ठीक हो गया बल्कि अब तो वे दोबारा बीमार हो चुके हैं। लिवाइस के शोरूम रूपी अस्‍पताल में भरती होने को उद्धत हैं-

मैं उन लाखों लोगों को निराश नहीं कर सकता जो इसकी बाट जोहते-जोहत गंभीर से गंभीर और नाजुक से नाजुक बीमारियों को भी ढोते चले जाते हैं। मेरे लिए बीमारी का इलाज कराने के लिए हॉस्टपीटल जाने और लिवाइस की शोरुम जाने में रत्तीभर भी फर्क नहीं है।

तो इतना पानी नाला बनी यमुना से बह चुका हमें ब्‍लॉजगत में झांके हुए। आज चर्चा के लिए ब्‍लॉगवाणी खोला तो लगा सब 'नार्मल' है। कुछ लोग एग्रीगेटरों को गलिया रहे हैं, सांप्रदायिकता, बैन करो बैन करो, तूत मैंमैं बदस्‍तूर जारी है यानि सब ठीकठाक है अब ये भी न हो तो क्‍या ब्‍लॉग में सत्‍यनारायण की आरती होगी। :)  कीचड़पैजार उसी शाश्वत सौंदर्य के साथ जारी है अत: सब जाना पहचाना सा लगता है। ऊपर से आनंद ये कि इतने दिन बाहर रहने के चलते अज्ञान का सुख है... पता नहीं कौन गलत कौन ठीक है इसलिए पक्ष लेने की जहमत से बचे हुए हैं। चूंकि हम अनुपस्थित हैं इसलिए तय है कि हम न गाली देने वालों में न लेने वालों में... अज्ञान का सुख वाह वाह।

अकेली दिक्‍कत बस यही कि अब पढें तो क्‍या- समीर बाबू बता चुके हैं कि क्‍या नहीं पढ़ना है-

मुझे तो लगता है कि उनका लिखना जितना गलत है, हमारा उन्हें पढ़ना, उससे भड़क जाना और भड़क कर उन्हें प्रचारित करना और भी ज्यादा गलत है. अगर भूलवश आपने पढ़ भी लिया तो भड़क कर जब आप उनके बारे में एक आलेख लिख डालते हैं तो उन्हें इससे प्रचार ही मिलता है. जिसने नहीं पढ़ा, वो भी पढ़ने पहुँच जाता है. उनका उद्देश्य हल हो जाता है और मात खाते हैं आप. फिर क्यूँ नहीं नजर अंदाज करते उन्हें?? इसमें क्या परेशानी हैं

तो हम भी तय कर चुके हैं कि अमुक खान ने अमुक अहमद के खिलाफ तथा अमुक सिद्दिकी के पक्ष में जो अमुक चौधरी के थोड़ा पक्ष तथा थोड़ा विरोध में है लेकिन अमुक शर्मा तथा अमुक बिजलानी के पूरा पक्ष थोड़ा विरोध में है, को हम पूरा इग्‍नोर मारेंगे। कल की चर्चा में अनूप गिना गए हैं कि कैसे संकलकों पर आए आरोप पहले नही हैं आखिरी भी नहीं। नारद के मामले में हम  अनूपजी से असहमत थे आज भी हैं, अंतत: बैन की वीरता में ही नारद वीरगति को प्राप्‍त हुआ... उम्‍मीद है आज के संकलक वीरता के स्‍थान पर समझदारी को तरजीह देंगे।

तो चूंकि हमें केवल अनइग्‍नोरेबुल पोस्‍टों पर ही नजर डालनी है इसलिए प्रमोद की गरमी से तपी पोस्ट तापें-

मगर ई एतना गरमी में अमदी का करे? केतना तरबूज का फांकी खाये और फ्रिज का बोतल-बोतल पानी पिये? तरबूज का पइसा मगर आपका बापजी देंगे? नहीं ऊ काहे ला देंगे, देना होगा त आपको देंगे, हमको ई गरमी में मां-बहिन का गारी देंगे, तरबूज अऊर खरबूज का मीठा काहे ला देंगे? हमरा तS सच्‍च पूछिये इच्‍छा हो रहा है कि अपना गरम कपार हियें छोर के, आत्‍मा का नरम मुलायमी पे सवार पहाड़ोन्‍मुखी हो जायें, हुआं बरफ़ का सोहाना वादी में अपना जाकिट हवा में ओछाल, महेंदर कपूर का मानबता का सलामी गावे लगें, ‘हे नील गगन के तले, धरती का पियार पले, हे हे!..’

एक और ब्‍लॉगराना बात दिनेशजी (जी पर तवज्‍जोह दें.... एकदम खालिस गैर-संघी किस्म का 'जी' है) ने उठाई है आखिर वे अपने से छोटे को सम्‍मान क्‍योंकर न दें-

यदि मैं उन्हें खुशदीप जी कहता रहूँ तो क्या वे कम निकटता, कम स्नेह महसूस करेंगे? मुझे लगता है कि उन्हें इस से बहुत अंतर नहीं पड़ेगा। मेरी कोशिश यही रहेगी कि मैं सभी से ऐसा ही व्यवहार कर सकूँ। मैं तो कहता हूँ कि मेरे सभी पाठक यदि अपने से उम्र में छोटे-बड़े सभी लोगों से ऐसा व्यवहार कर के देखें।  वे अपने बच्चों और पत्नी या पति को जिस भी नाम से पुकारते हैं उस के अंत में जी लगा कर संबोधित कर के देखें, और लगातार कुछ दिन तक करें। फिर बताएँ कि वे कैसा महसूस करते हैं।

ये मामला प्रेम का है 'जी' में भी प्रेम है और 'अबे ओए कमीने' में भी है बात महसूस करने की है मंशा और मूड की है। पूजा इस प्रेम की एक और शेड अपनी फिल्‍म समीक्षा में पेश करती हैं-

सबसे आश्चर्यजनक है कि ये फिल्म बिना स्क्रिप्ट के बनी थी, पूरी फिल्म हर रोज नयी होती थी, और उस सारी क्लिप्पिंग में से ये फाइनल फिल्म बनायीं गयी है। निर्देशक के बारे में जीनियस के अलावा कोई शब्द नहीं आता। कुछ लोगों के धरती पर आने का एक मकसद होता है, कुछ कवि होते हैं, कुछ लेखक...पर कई फिल्मों को देखने के बाद लगता है कि कोई तो है जो वाकई सिर्फ फिल्म निर्देशन के उद्देश्य से धरती पर आया है। या फिर कोई बड़ा मकसद, जैसे प्यार के अनछुए रंग दिखाने की खातिर।

एक अनइग्‍नोरेबुल समस्‍या अनिल की भी है पूरा हिसाब लगाकर वे बता रहे हैं कि कैसे पच्‍चीस साल तक की घिसाई बावजूद उनकी शादी होने पर संकट बना हुआ है, 25 साल का हिसाब इस तरह है-

कच्छा बदलने के दिन = 5 साल
नर्सरी + के.जी.           = 2 साल
1 से 12 वीं तक           = 12 साल
स्नातक                      = 4 साल
स्नातकोत्तर                 = 2 साल
--------------------
कुल                           = 25 बरस

शादी हो ही जाने से कौन धरती पर स्‍वर्ग आ जाएगा काश अनिल अभी से  रश्मि रविजा को पढ़ लें और वक्‍त रहते चेत जाएं पतिपद प्रतिपद परवश है जान लीजिए-

पुरुषों के लिए, नौकरी मिलने से पति बनने तक के बीच के दिन बड़े  सुनहरे होते हैं और फिर कभी लौट कर नहीं आते. सैकड़ों फोटो देखी जाती हैं,दावतें उडाई जाती हैं और चुन कर सुन्दर,स्मार्ट, पढ़ी लिखी लड़की शादी कर घर लाई जाती है .और बस उसके बाद , आँखों पर पड़ा रंगीन पर्दा हट जाता है और खुरदरी  यथार्थ की जमीन  नज़र आने लगती है.

नलिनी ने अपनी पोस्‍ट में मीडिया को दर्पण दिखाने की प्रक्रिया जारी रखते हुए पत्रकार बिरादरी के पतन की मिसाल पेश की हैं (वैसे ज्‍यादती है, बेचारे अधिकतर पत्रकार बनना चाहते थे आईपीएस परचे पास न हुए तो लगे बाइट-ब्राइब लेने देने ऐसे में अफसर देखकर घिघियाने लगते हैं तो क्‍या गलत है)

मीडिया में ऐसे पत्रकारों की भी जमात है जो पुलिस अधिकारियों के पैर छूते है...जब तक प्रेस-कॉन्फ्रेंस के लिए पुलिस अधिकारी अपनी कुर्सी पर बैठ ना जाए तब तक बैठते तक नहीं है, स्टैंडिग पोजीशन में ऐसे खड़े रहते हैं जैसे कि पुलिस अधिकारी के मातहत हों। कई पत्रकार (इलैक्ट्रॉनिक मीडिया और अखबार) तो पुलिसवालों को ‘भैया’ या ‘दीदी’ शब्दों से भी नवाजने से नहीं चूकते। कुछ रिपोर्टर तो अपराधियों और पुलिसवालों के बीच मिडिएटर तक बनने से नहीं हिचकते।

 

चलते चलते पृथ्‍वी दिवस के अवसर पर अनिलजी की पोस्‍ट विचारणीय है-

 

अधिकांश लोग मुझे लगता है ऐसा ही कुछ करते है वरना धरती माता का इतना बुरा हाल नही होता।उसके वस्त्र जंगल रोज़ काट रहे है हम।उसे नंगा करने मे क्या कोई कसर छोड़ी है इंसानी लालच ने।पहाड़ो को फ़ोड़ कर खनिज़ लूट रहे है और नदियों की भी हत्या करने मे चूक नही रहे हैं हम।हमारे शहर की जलप्रदायनी खारुन नदी की दुर्दशा तो यही कह रही है।कहने को बहुत कुछ है मगर पूरी राजधानी को पानी पीलाने वाली खारून नदी का हाल आपको दिखा देता हूं।आज शायद फ़ीता काटते समय हाथ कांपे,फ़ोटू खिंचवाते समय चेहरे पर थोड़ी शर्म नज़र आये और फ़िल्मी डायलाग मारते समय ज़ुबान थोड़ा लड़खड़ाये

 

अभी के लिए इतना ही, शेष फिर कभी।

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16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सधी हुई चर्चा की है.....लेकिन बहुत बढिया लगी। धन्यवाद।

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  2. हम्म...आपने ब्लोगवाणी खोला,चर्चा के लिए, तभी हमारे पोस्ट तक भी पहुँच गए...शुक्रिया.
    वैसे चिट्ठाचर्चा की परंपरा देखी है कि कुछ चयनित ब्लोग्स की हर पोस्ट शामिल की जाती हैं...और बहुत ख़ुशी होती है जान कि हमारे ब्लॉगजगत में इतना अच्छा लिखने वाले हैं कि उनकी हर पोस्ट recommend की जाती है,पढने को (चर्चा का अर्थ ,मेरी समझ से recommend करना ही होता है,) यह जान भी सुकून मिला कि हमारे जैसे अति साधारण लिखने वाले भी दो-तीन महीने में दस-बीस पोस्ट के बाद कुछ ऐसा लिख जाते हैं कि उसे चर्चा लायक समझा जाता है.

    वैसे मैं यह निवेदन करने आई थी कि मैं इस चर्चा के स्तर के अनुकूल नहीं लिखती ...अतः मेरी पोस्ट कृपया चर्चा में शामिल ना करें. पर एक तो आप अक्सर चर्चा नहीं करते और ब्लोगवाणी में पोस्ट देखी थी आपने, इसलिए कुछ कहना बेमानी है...फिर भी दूसरे चर्चाकारों से यही अनुरोध है कि मेरी पोस्ट में कुछ आपत्तिजनक लगे, या किसी बात का विरोध या आलोचना करनी हो तभी मेरी पोस्ट शामिल करें...अन्यथा नहीं. मेरे जैसे अति-साधारण लिखने वाले का भी साधारण सा पाठकवर्ग है. और मैं उसी से संतुष्ट हूँ.

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  3. अच्छी चर्चा, अच्छे लिंक्स. रश्मि जी का गुस्सा जायज़ है. चिट्ठाकार ध्यान दें. ऐसे चिट्ठे सचमुच नहीं छूटने चाहिये जो निष्पक्ष भाव से केवल साहित्य-सृजन कर रहे हैं, और बेहतर लिख रहे हैं.

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  4. चिटठाचर्चा पर कभी कभी चर्चा पढ़ने आती हूँ. , ऐसा लगा कि यहाँ चर्चा क्या सिर्फ व्यक्ति की होती है या विषय की ? मेरी अधिक पैठ तो नहीं है ब्लोग्स के क्षेत्र में लेकिन फिर भी कभी कभी सब जगह झांक लेने का मौका मिल जाता है. मैं नियमित लेखक भी नहीं हूँ, फिर भी लगा कि इस चर्चा में शामिल चर्चों से अधिक समसामयिक और सार्थक चिट्ठे मौजूद रहते हैं जिन पर कि चर्चा की जाय. क्या चर्चा के लिए विषय अपने मित्रों और परिचितों के ही चुने जाते हैं? अगर नहीं, तो फिर चर्चा में विषय के अनुरूप चर्चा क्यों नहीं होती? पृथ्वी दिवस पर जिस पोस्ट कि आपने चर्चा कि लगा कि किसी व्यस्त व्यक्ति से दो शब्द बोलने के लिए कहा गया और वह बोल कर चला गया और चर्चा का विषय बन गया. इसके लिए एक बार www.shabdkar.blogspot.com कर जाइए और फिर पृथ्वी दिवस के लेख की सार्थकता को आंकिये .

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  5. हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

    लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

    अनेक शुभकामनाएँ.

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  6. अच्छी चर्चा, अच्छे लिंक्स.
    रश्मि जी और रेखा जी का गुस्सा जायज़ है.
    मैं भी यहां चर्चा करता हूँ। कुछ सीखने को मिला, .... बहुत कुछ सोचने को। इस तरह के मंच की सार्थकता पर प्रश्‍न चिन्ह लगाया जा रहा है कुछ दिनों से, कुछ पोस्टों द्वारा, कुछ टिप्पणियों द्वारा।
    कल की चर्चा मुझे करनी है .. करूँ या छोड़ दूँ ... उलझ गया हूँ।

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  7. इतनी ’दिलरुबा’ टाइप चर्चा पर...
    ऎसी ’होशरुबा’ टाइप टिप्पणियाँ ?
    उफ़्फ़.. साधो, साधो, साधो ।

    डिसक्लेमर : यहाँ साधो साधो का मतलब वास्तविक साधो साधो से ही है ।
    कोई सज़्ज़न इसका अर्थ ’ चर्चाकार को साधो ’ से न लगायें ।

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  8. मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है
    सड़कें - बेतुकी दलीलों-सी…
    और गलियाँ इस तरह
    जैसे एक बात को कोई इधर घसीटता
    कोई उधर

    हर मकान एक मुट्ठी-सा भिंचा हुआ
    दीवारें-किचकिचाती सी
    और नालियाँ, ज्यों मुँह से झाग बहता है

    यह बहस जाने सूरज से शुरू हुई थी
    जो उसे देख कर यह और गरमाती
    और हर द्वार के मुँह से
    फिर साईकिलों और स्कूटरों के पहिये
    गालियों की तरह निकलते
    और घंटियाँ-हार्न एक दूसरे पर झपटते

    जो भी बच्चा इस शहर में जनमता
    पूछता कि किस बात पर यह बहस हो रही?
    फिर उसका प्रश्न ही एक बहस बनता
    बहस से निकलता, बहस में मिलता…

    शंख घंटों के साँस सूखते
    रात आती, फिर टपकती और चली जाती

    पर नींद में भी बहस ख़तम न होती
    मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है…
    --- Amrita Pritam from Hindikunj

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  9. कुछ दिनों पहले खुशदीप जी (देशनामा वाले) जी एक achchhi पोस्ट लिखी थी "हम ब्लॉग्गिंग क्यों करते हैं ... उस पर मेरे विचार (जो स्पष्ट नहीं था उसे फिर खुशदीप जी ने पूरा किया था)

    मैं आपकी इस बात से सहमत नहीं हूँ या यूँ कहें की इसे महसूस नहीं कर पाता कि यहाँ ग्रुप चलता है या कोई मित्र देश हैं ऐसा कुछ... (की फलाने ने मेरे मित्र के ब्लॉग पर कमेन्ट नहीं की तो मैं भी उसपर नहीं करूँगा, कंटेंट में दम होगा तो लोग कमेन्ट जरुर करेंगे, एक राज़ की और अपनी कमजोरी बताता हूँ (इसे मेरी शेखी बघारना ना समझा जाये) मेरे मेल पर कई ऐसे मेल आते हैं जहाँ लोग कहते हैं आप कमेन्ट नहीं करते, मैं माफ़ी मांगता हूँ जो मुझे प्रभावित नहीं कर पाते (इसे मेरी कम ज्ञान का स्तर ही समझा जाये) मैं उस पर कैसे कुछ कह सकता हूँ ? अपनी बात करूँ तो मैं अपने दुश्मन के घर भी कुछ अच्छा पढने को मिल जाये तो कमेन्ट कर आऊं. (वैसे दुश्मन कोई नहीं है सब हमारे बनाये हुए हदें हैं)

    हमारी हदें तय है ऑफिस में ब्लॉग लिस्ट से ही फुर्सत नहीं है ऐसे में आराम से मुझे चर्चा से कुछ बेहतर पढने को मिल जाता है...

    यह सब अतिमहत्वकान्षा के कारण होता है... जिसमें जिसकी रूचि हो वो पढ़े, सराहे, उस पर बात करे तो कभी समस्या नहीं होगी... गधे हम लोग है जो फ़ालतू की चीजों को भी हाइप करते हैं... कुछ लोग छपास मोह में रहते हैं तो कुछ मिथ्याभिमान में और मेरे जैसा आदमी ने तो यही प्रोफाइल ही बना ली है.

    "ठक... ठक... ठाक... का हो बाबू ! इधर किधर ? कैसे भटके? क्या सोचकर इधर चले आये कि यहाँ उच्च कोटि का साहित्य मिलेगा जिसे पढकर उसे अपने आँखों से लगाएंगे, माथे पर रखेंगे, रचना ध्यान में रखेंगे और अपना जीवन कृतार्थ समझेंगे. अरे महाराज गलत जगह आ गए हैं आप. यहाँ तो तिकडमों के सहारे ब्लॉग चला रहे हैं. वो निदा फाजली ने कहा है ना “सस्ते गीतों को लिखकर हमने घर बनवाया है” और यह भी सच है इतने में ही खूब गुमान पाल लिया है और रहेगा भी"

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  10. हिन्दी में इँग्लिसिया दखल,Your comment will be visible after approval ?
    मोटी गुद्दी वाली समझ :
    ऎप्रूवल बोले तो ब्लॉग-मालिक / मॉडरेटर द्वारा अनुमोदित टिप्पणी !
    फिर स्वतँत्र विचार टिप्पणियों का ठौर कहाँ है ?
    श्रीमन, हमारे असभ्य होने तक तनिक प्रतीक्षा तो कर लिया होता ?

    ( ब्लॉग-मालिक / मॉडरेटर में जो न लागू हो, कृपया काट दें )

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  11. @Vandana and Manoj ji....am not angry at all...just dont want to b a part of 'THIS CHARCHA' ever thats all...Hope u wud understand and I think every one has a right to express her/his own wish.
    (sorry for writing in english..am in a hurry)

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  12. अज्ञान के आनंद में डुबकी लगाती चर्चा this is title of today post.
    i have so many queries

    there are lot of charcha going on now a days but why people are looking for this one only whenr others are doing same thing.?

    can any one see over those charcha any good blogger making ha -hollah that you are not included my post ? this shows the difference between character as they never included some bloggers too.
    can all those bloggers who are making ha- hollah are sure that they never write mail to any one to read there blog? they never ask anyone to favored them? can they?

    why so many bloggers make a scan copy of there printed material and put that on there blog if they are not "chapas rog" peedit

    why you are writing a blog ?for chitthaa charcha ?or for your self?

    i have gone through so many blogs they hardly appear on this charcha but they are really appreciate by so many readers.charcha can"t make a blog hit. its the content only.

    how many maximum tippani you can get from any post ?100 or more not more that ? by the same people .how many times they will say that you are best ?are you happy again and again by listening with the same people .


    if this charcha include these bloggers every time would they behave in same manner ?


    see you cant make happy every one even if you do charhca some one say hey my name is not included.




    plz think

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  13. मसिजीवी जी,
    बहुत दिनों बाद आपको पढ़ने को मिला, अच्छा लगा...

    साथ ही आंधी फिल्म के एक गीत के बीच में संजीव कुमार और सुचित्रा सेन का डॉयलॉग याद आ गया...

    संजीव कुमार...वैसे तो अमावस हर महीने आती है...लेकिन इस बार बड़ी लंबी हो गई...

    सुचित्रा सेन...पूरे सात बरस न...

    तेरे बिना ज़िंदगी से शिकवा तो नहीं, शिकवा नहीं...
    लेकिन तेरे बिना ज़िंदगी भी ज़िंदगी नहीं, जिंदगी नहीं...

    जय हिंद

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