सोमवार, जून 08, 2009

ज़रा-सी आहट होती है तो दिल ........

कल मुझे एक ईमेल मिला, जो निम्न प्रकार से है -

कुछ विशेष टिप्पणियों का सामान्य जवाब

कल - जून, 8. 2009 सुबह 05.30 पर



एक दिन में लगभग २२ ईमेल मुझे प्रतिदिन ऐसे मिलते हैं, जिन्हें अपनी आगामी पोस्ट के प्रचार के लिए दिन पहले से ही जुटा जुटा कर एकत्र किए ईमेल पर सूचना " रहा है - रहा है" का विज्ञापन शुरू करना पड़ता है वे ब्लोगर नहीं जानते कि इस से उनके पाठक बढ़ते नहीं अपितु वितृष्णा का शिकार ही होते हैं मैंने कइयों को ईमेल लिखे कि भी मुझे ऐसे ईमेल भेजा करें किंतु लोग इतने आत्ममुध हैं कि आत्मप्रचार का माध्यम बन गया है नेट भले ही ईमेल हो, ब्लॉग हो, साईट हो कमाई का मध्यम बने बने सुपीरियेरिटी की ग्रंथि (काम्प्लेक्स) को तो पोस ही रहा है अब यदि हिन्दी के ब्लोगर वास्तव में नेक कार्य करना चाहते हैं तो उन्हें अपने साथी ब्लोगर्ज़ को इस से मुक्त होने में सहयोग देना चाहिए मुक्त होने में सहयोग का उपाय यह कि अपने अतिरिक्त दूसरों को पढ़ें ताकि समझ लगे कि आप ही आप नहीं हैं सर्वेसर्वा आप से ज्ञान में, अनुभव में, शील में, या आयु में वरिष्ठ भरे पड़े हैं बड़ी रेखा को देखिए, अपनी रेखा अपने आप छोटी लगने लगेगी श्रेष्ठ व्यक्ति स्थापित लेखक बन ने का सिद्धांत है - पढ़ो सब से अधिक, लिखो उस से कम और छपो सब से कम श्रेष्ठ लेखक होने के लिए इन्हें लिखना पढ़ना छपना के साथ जोडें श्रेष्ठ मनुष्य होने के सन्दर्भ में इन्हें ) सुनो/जानो , ) सीखो/अपनाओ, ) कहो/बोलो/सुनाओ के साथ जोड़ा गया है


अब दूसरों का पढ़ो का अर्थ टिप्पणी का प्रतिसाद पाने की वांछा अपने या उसके भीतर जगाने की होड़ का स्वार्थ उत्पन्न करना नहीं है उल्टे आज आवश्यकता है कि ऐसी उलटबाँसियों को हतोत्साहित किया जाए जो "अहो रूपं अहो ध्वनि: " कह कर परस्पर अनुशंसा के बहाने मित्रों में इस आत्मघाती वृत्ति को पनपने में सहयोग दे रहे हैं


अभी अभी पर्यावरण पर बातें हुई हैं, बीता है दिवस पढ़िए यह रिपोर्ट -


स्पैम मेल सिर्फ मेल यूजर्स के लिए सिरदर्द है बल्कि एनवायरनमंट के लिए भारी नुकसानदेह है। स्पैम मेल पर हुई एक स्टडी बताती है कि इससे हर साल 33 अरब किलोवॉट बिजली के घंटे बर्बाद हो जाते हैं। जब कि इतनी पावर तो 24 लाख घरों की बिजली जरूरतें पूरी कर सकती है। कार्बन फुटप्रिंट ऑफ ईमेल स्पैम रिपोर्ट' के मुताबिक हर साल करीब 62 ट्रिलियन स्पैम ईमेल भेजे जाते हैं। बीबीसी के हवाले से बताया गया है कि इतनी मात्रा में भेजे जाने वाले स्पैम मेल से 1.7 करोड़ टन कार्बन डाई ऑक्साइड बनती है।यह रिसर्च क्लाइमेट कंसल्टेंट आईसीएफ इंटरनैशनल और एंटी वायरस फर्म मकाफी द्वारा की गई है। काम के ईमेल्स को ढूंढने और स्पैम मेल को डिलीट करने में ही करीब 80 फीसदी एनर्जी खर्च हो जाती है। स्टडी में देखा गया है कि औसत बिजनस यूजर हर साल 131 किलोग्राम कार्बन डाई ऑक्साइड जेनरेट करता है। इसमें से 22 फीसदी तो स्पैम मेल से ही अस्तु होती है। आईसीएफ का कहना है कि स्पैम फिल्टरिंग से अनचाहे स्पैम को 75 परसेंट तक रोका जा सकता है। यह 23 लाख कारों से निकलने वाली CO2 को कम करने के बराबर है। हालांकि आईसीएफ का कहना है कि स्पैम फिल्टरिंग एनर्जी वेस्ट और इसके स्त्रोत को खत्म करने में काफी असरदार है। यह रिपोर्ट अमेरिकी वेब होस्टिंग फर्म मकोलो के केस को भी उजागर करती है। इस फर्म ने स्पैमर्स से ही गठजोड़ कर लिया था। इसके बाद जैसे ही इसके दो इंटरनेट सर्विस प्रवाइडर्स ने इसे ऑफलाइन कर लिया, ग्लोबल स्पैम की मात्रा में 70 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि राहत पाने का यह तरीका सिर्फ टेंपररी ही था पर मकैफी का कहना है कि अगर स्पैम मेल एक दिन के लिए भी गायब हो जाते हैं तो इससे उतनी ही CO2 गायब हो जाएगी जितनी कि 22 लाख कारों से पैदा होती है।



ऐसा
करने से विद्युत हानि के अतिरिक्त समय मानवी ऊर्जा की भी तो हानि होती ही हैबड़ा उपकार होगा ऐसे मित्रों का जो ऐसे ईमेल किसी भी साथी को भेजें, क्योंकि यदि इन्हें अन्य किसी हानि से सरोकार भी हो तो भी वे अपनी हानि को ही रोकें, क्योंकि उनकी छवि बिगड़ने के साथ साथ होता यह है कि ऐसे ईमेल को स्पैम के रूप में चिह्नित कर देते हैं( स्वयं मैं भी) और भविष्य के लिए वे प्रेषक स्थायी रूप से ब्लैकलिस्टेड हो जाते हैं। अस्तु.


आज कुछ ऐसी ही प्रविष्टियों की चर्चा की जाए जो किसी न किसी तर्काधारित नींव पर टिकी हैं और जो हिन्दी ब्लॉग जगत् को टाइमपास माध्यम या आत्मप्रचार- माध्यम से आगे निकल गया प्रमाणित करने में अपनी सहज भूमिका का निर्वाह करती हैं. तर्क या वाद -विवाद हमेशा बुरा या खराब ही नहीं होता. यह हमारे बौद्धिक सामर्थ्य की परख के साथ साथ हमें तर्क की तैयारी करने के लिए स्वाध्याय को भी प्रेरित करता है. ध्यान रखना चाहिए कि तर्क ही तथ्य का जनक होता है. "सत् वचन महाराज" वाली भीड़ की उबाऊ, बोझिल, अनुर्वरक और मत्थाटेक मानसिकता से परे यह जीवन्तता का द्योतक है, इसलिए मुझे तो रुचता है, संभवतः आप को भी रुचे -


सच बोलना मना है पर गत दिनों एक कविता प्रस्तुत की गयी और जयराम जी ने लिखा -

वर्तमान साहित्य की दुनिया में छाये विषयों में से एक संघ के बहाने "हिंदू गाली गान " की परम्परा के इस उत्कृष्ट कविता को पेश कर रहा हूँ । कविता के रंगे गए पंक्तियों को पढ़े उसके भावों को समझें फ़िर अपनी टिप्पणी जरुर दें । कवि की कल्पनाशीलता खुशवंत जी जैसे उच्च कोटि के वयोवृद्ध साहित्यकार से मिलती-जुलती है जिनकी हर बात घुटने से ऊपर और कमर के बीच ख़त्म हो जाती है ।


अब इस पर आई कुछ टिप्पणियों की बानगी देखिए -


- जिस बरतन मे जो पड़ा होगा वही तो निकलेगा


-कृपया के.सच्चिदानन्दन की और कवितायें भी पढवाईये तब तुलनात्मक अध्ययन सम्भव हो सकेगा.


-आईना हमेशा परेशान करता है।
समझ नहीं पा रहा हूं कि कविता ज्यादा अश्लील है या आपकी टिप्पणी।

एक बार आप भी दोबारा पढ़ कर देखिए।



जिस कविता की बात तुमने उठायी है वो कविता राजनीतिक नारेबाजी जैसी लगती है। निश्चय ही उसमें जरा आपत्तीजनक भाषा का प्रयोग किया गया है। बड़े कवि ने प्रतिक्रियावादी तरीके से कविता की है। लेकिन सच्चिदानंदन सड़क छाप शोहदे नहीं हैं। उन्होनें हिन्दुओं या हिन्दु संस्कृती(अगर ऐसी कोई चीज है ?) को छेड़ने के लिए कविता नहीं लिखी। तुम्हें उनकी कविता आपत्तीजनक लगी तो तुम्हें ये लिखना चाहिए था कि ऐसा बड़ा कवि ऐसी कविता लिखे यह अशोभनीय है। तुम इसका विरोध करते हो। यह एक गैर जिम्मेदाराना हरकत है। ऐसे तमाम आदि-इव्यादि वाक्यों प्रयोग करते हुए तुम सच्चिादानंदन की आलोचना कर सकते थे। लेकिन तुमने विचारवान पुरूष की बजाय पहलवान पुरूष की भाषा का चुनाव किया। तुम्हारे लिखे को पढ़ कर मुझे तुमसे पूछना ही होगा कि जिस संस्कृति की तुम वकालत करते हो क्या उसकी आलोचना की भाषा ऐसी ही होगी ? क्या तुम्हें वह महाकाव्य याद दिलाना होगा कि जिसमें मृत्यु की कगार पड़ खड़े रावण से शिक्षा लेने के लिए राम ने लक्ष्मण को भेजा था ? क्या तुम जानते हो कि लोक मिथ है कि कालीदास के पार्वती के श्रृंगार वर्णन के कारण कालीदास को कोढ़ हो गया था ? क्या तुम बनारस की प्रसिद्ध शिवबारात से परिचित नहीं हो जिसमें भोले शंकर को भगवान कम यार ज्यादा माना जाता है ? क्या तुम नहीं जानते कि उसी बारात में भोलेनाथ के लिए ऐसे कई वाक्यों का प्रयोग होता है जिसे आम समझ में गाली समझा जाता है ? ऐसे तमाम उदाहरणों की लम्बी सूची बनायी जा सकती है जो कि यहाँ गैर जरूरी है।


- मैं कहना चाहूँगा मैं किसी पंथ का नही ...........बल्कि पंथ में ख़ुद को जकड़ने से तकलीफ होती है .मैं ख़ुद को पंथ में बाँध कर देश को बाटूंगा . ऐसे कवि और चित्रकार मेरे निशाने पर इस लिए है इनके कृत्यों की वजह से देश विभाजित हुआ है . मनभेद पैदा हुआ है ................


- भाषा के माध्यम से व्यक्ति का व्यक्तित्व परिभाषित होता है ,अत: भाषा का प्रयोग करते समय हमें सदा सावधान रहना चाहिए ,ऐसा लिखना मानसिक कुंठा को दर्शाता है ,यह मेरे विचार हैं |


- नोम चोम्सकी ने एक बार कहा था कि, ”एक उम्र तक मैं किसी भी विचारधारा का विरोध करता था। एक उम्र के बाद मुझे पता चला कि यह सोच अपने आप में एक विचारधारा है।”
मैं मानता हूँ कि बुद्धिजीवी को अपने विचारों और आदर्शांेे के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए न कि किसी राजनीतिक दल के प्रति। राजनीतिक दलों से प्रतिबद्धता के फलस्वरूप बद्धिजीवीयों को जिस तरह की खतरनाक चुप्पी साधनी पड़ती है उसका सबसे ताजा और ज्वलंत उदाहरण सिंगुर-नंदीग्राम का मुद्दा था। कई बड़े-मुखर-साहसी वामपंथी के रूप में पहचाने जाने वाले बुद्धिजीवीयों का इस पूरे मुद्दे पर मौन उनके उम्र भर के किए धरे पर पानी फेर गया। कुछ लोग सुमित सरकार, महाश्वेता देवी जैसे भी थे जिन्होनें पार्टी के बरक्स जनता का साथ दिया।




खैर, आपको यहाँ जाकर पूरे तर्क-वितर्क का बौद्धिक -वैचारिक लाभ लेना चाहिए ( बशर्ते कि चर्चित होने का अधूरा नुस्खा अपना कर काम और देह या सेक्स और यौन वाली शब्दावली के प्रयोग से अपना घोडा हाँकें).



दूसरी चर्चा उस लेख की जिसे धीरेन्द्र सिंह के राजभाषा पर गत दिनों पढा. वे लिखते हैं -

हिंदी के इन सफेद हाथियों का सच

राजभाषा अधिकारियों को निशाने पर ऱखना एक फैशन बन चुका है। जब जी में आता है कोई ना कोई विचित्र विशेषणों का प्रयोग करते हुए राजभाषा अधिकारियों पर उन्मादी छींटें उड़ा जाता है । इसी क्रम में एक नया लेख नवभारत टाइम्स, मुंबई संस्करण में दिनांक 29 मई 2009 को प्रकाशित हुआ। लेखक का नाम था – उदय प्रकाश, हिंदी साहित्यकार। हिंदी साहित्यकार शब्द का नाम के साथ प्रयोग से मेरा पहली बार सामना हुआ। लेख का शीर्षक था – "हिंदी के इन सफेद हाथियों का क्या करें।" इस लेख में कई बेतुके सवाल उठाए गए हैं जिनका उत्तर देना मैं अपना नैतिक कर्तव्य समझता हूँ इसलिए श्री उदय प्रकाश के इस लेख का क्रमवार परिच्छेद चयन कर मैं उत्तर दे रहा हूँ –

एक एक परिच्छेद में उदय प्रकाश जी के लेख को उद्धृत करते हुए कई बिन्दुओं के उत्तर धीरेन्द्र जी ने प्रश्नोत्तर शैली में दिए हैं. समापन में ये लिखते हैं-

सरकारी हिंदी क्या है यह अस्पष्ट है। यदि यहाँ पर आशय सरकारी कार्यालयों में कामकाज की भाषा से है तो यदि देखा जाए तो प्रत्येक देश में बोलचाल की भाषा और कामकाजी भाषा में फर्क होता है फिर उसे सरकारी भाषा कहने का क्या औचित्य ? हिंदी का पूरा ढांचा रातोरात खत्म करने का प्रयास काल्पनिक मात्र है तथा विवेक और सच्चाई को परे ऱख कर लिखा गया वाक्य है। ज्ञातव्य है कि हमारा देश प्रगतिशील देश है तथा प्राइमरी स्तर पर भी अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दी जा रही है जिसके लिए धन कभी बाधा नहीं रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था की पूरी जानकारी ना होने पर प्राय: इस प्रकार के वाक्य लिखे जाते हैं।

श्री उदय प्रकाश, हिंदी साहित्यकार के लेख के उक्त अंश लगभग संपूर्ण लेख को प्रस्तुत कर रहे हैं। इस लेख के बारे में इससे अधिक मैं कुछ और नहीं कहना चाहता हूँ।


लेख के तर्कों का अपना वाद प्रतिवाद हो सकता है किन्तु ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस का वातावरण एक नए समय की आहट दे रहा है ब्लॉग जगत् में.



ऐसी ही एक चर्चा और भी पढी- मैडम टिकट हो गया क्या ?
यह तर्क के स्तर पर एकदम निरस्त कर दिया जाने वाला लेख कहा जाना चाहिए, जहाँ अपने लाभ के सामने विवेक को एकदम खूंटे पर टांग दिया गया हो. वैसे आदर्श राठौड़ (आयु २० वर्ष ) को बेनेफिट of डाऊट दिया जा सकता है कि इस आयु के बच्चे/युवक जल्दी प्रतिक्रियावादी हो जाते हैं व स्थितियों का आकलन सही परिप्रेक्ष्य में करने की सूझ विकसित होने के प्रारम्भिक चरण में होती है. किन्तु यह आलेख महत्वपूर्ण इसलिए है कि अभी अभी प्रातः ४ बजे के आसपास is पर क्रम से ४ टिप्पणियाँ आई हैं, जिन्हें लिखा है - रंगनाथ सिंह ने. ये लिखते हैं -


- आदर्श जी ने तीन घटनाओं का जिक्र किया है। तीनों का स्वंतत्र विश्लेषण करना ही समीचीन होगा । पहली घटना, आदर्श ने जिस महारानी बाग फुट ओवर ब्रिज को पार करके 200-300 मीटर जाने की बात की है। संजोग यह कि बंदा उसी इलाके में रहता है। आदर्श जी या उनके समर्थक टिप्पणी कारों में से सभी से आग्रह करूँगा कि अपनी माँ-बहन की छोड़िए आप खुद रात को पैदल घर पहुँचने का रोमांच लीजिए।....



दूसरी घटना, आदर्श भैया आपने क्या खूब प्रसंग सुनाया। आप उन चार शोहदों द्वारा एक लड़की को शर्मसार किया जाता हुआ देखते रहे और कुछ न बोले !! शेम, शेम !! आप अकेले भी न थे आपका मित्र भी था आप के साथ, फिर भी ??, शेम, शेम !!
आपने कहा है कि आप ने ऐसा होता कई बार देखा है, हाय हाय, हाय रे हाय !!
जिन शोहदों का विरोध करने का साहस हमारे देश के रणबांकरों को नहीं हुआ उसे वह महिला क्या खा के रोकेगी ?? देश के मर्दों.....शेम,शेम !!
रही बात आपका शरीफ दोस्त के छिले हुए मन की !!.....



तीसरी घटना, महोदय आप ने जिस काॅलेज की छात्राओं की तरफ इशारा किया है मैंने उस काॅलेज समेत तमाम वैसे ही दूसरे हाई-प्रोफाइल महिला कालेज की छात्राओं को इलिटीस्ट कर्टसी से लदा-फंदा पाया हैंै। आप के लिखे से तो लगता है कि उन लड़कीयां कोई टपोरी थीं। टपोरी समझते हैं न ? न समझते हों तो मुंबइया सिनेमा देख लीजिएगा या सुधीश पचैरी का साहित्य पढ़ लीजिएगा समझ जाएंगे !! खैर यह मेरा निजी अनुभव हो सकता है। आप की दी हुई कहानी की ही बात करते हैं।
भाई साहब इस मामले में कम कहँुगा ज्यादा समझिएगा....., दिल्ली की बसों में मेरे वो दोस्त जिनकी शक्ल मेरे जैसी खुरदरी नहीं है इन तथाकथित बुडढों के बगल में बैठने से डरते हैं। कई लड़के ऐसे पार्कों में नहीं जाते जो प्रेमी-युगलों के लिए ही प्रसिद्ध हैं क्योंकि कई बार उन्हें कांप्लेक्स देन के लिए तथाकथित बूढ़े बाबा अपनी नातीन/पोतिन जैसी दिखने वाली..........................
खैर इस बात को छोड़िए दिल्ली है दिल वालों की। जिसे कुछ कमजर्फ पेस मेकर कहते हैं वो भी तो आखिर किसी का दिल ही तो है !!
भाई साहब, दिल्ली शहर की तमाम लड़कियाँ इन तथाकथित बुडढों के बनिस्बत युवकों को कम खतरनाक मानती हैं। ऐसे माहौल में कोई लड़की बेमुरूव्वत हो कर किसी बुढ़े से महिला सीट खाली करने को कह दे तो उसके ऊपर वृद्धों के सम्मान का आदर्श का कोड़ा बरसाना ठीक नहीं ??
भाई साहब शालीन भाषा में कहते हैं न, कि दूध का जला छांछ भी फूंक कर पीता है....
वैसे अशालीन भाषा से मेरी बात का मर्म ज्यादा खुलता लेकिन क्या करें.....खैर इस बात को भी छोड़िए........दिल्ली में ही तो संसद है जहाँ लोग हिन्दी नहीं संसदीय बोलते पाए जाते हैं !!
आप से विनम्र अनुरोध है कि अपने उस अनुभव पर ध्यान दीजिए जो जनहित में अभी तक आपके विचार या राय नहीं बने हंै !!


और अपनी चौथी टिप्पणी में जो लिखा है, उसे पढ़कर लगा कि बैलेंस खोए बिना भी कितने आनुपातिक तरीके से वाद-प्रतिवाद या चर्चा की जा सकती है, यह टिप्पणी प्रमाणित करती है.देखिए -

Immanuel Kant had written a very famous book Critique of Pure reason in 1787. here i would like to mention the very first line of that classic book for your consideration
"There can be no doubt that all our knowledge begins with experience."

plz think for a while, is it possible for a human being to write one's experience without any opinion !!



मैं साधुवाद देती हूँ रंगनाथ सिंह जी को.और यहीं यह भी जोड़ना चाहूँगी कि किसी भी तर्क के पक्ष या प्रतिपक्ष में खड़े लोगों को इस बात का सर्वदा ध्यान रखना चाहिए कि वैचारिक मुद्दों पर तर्क-वितर्क को व्यक्तिगत रूप में मानापमान के रूप में नहीं लेना चाहिए, अपितु स्वस्थ बौद्धिक दिशा में जाने का संकेत ही समझना चाहिए.




दूसरी ओर हिन्दी ब्लॉग जगत् में ऐसी घटनाओं का क्रम भी निरंतर चल रहा है, जहाँ दूसरों की रचना को अपनी कह कर धड़ल्ले से उसे छापा, प्रचारित किया जा रहा है. पहली घटना/सन्दर्भ/ उदाहरण में तो कम से कम .....
नहीं नहीं, ऐसे नहीं, आप स्वयं नीचे दी दोनों घटनाओं का अंतर देखें -




)
कबीरा खडा बाज़ार में पर आपके लिए उपयोगी एक ऐसे ही सच का खुलासा हुआ है, आप जा कर देख सकते हैं


भईया लोगों,ज़रा इन्हें पहचानिये.....!!
साहब तो ब्लागरों के बाप हैं....इनका ब्लाग" मोहब्बत में दिक्कतें " सारे अन्य ब्लागरों की रचनाओं से मोहब्बत करता है....अन्य ब्लोगर की रचनाएं ये साहब अपने ब्लॉग पर अपने ही नाम से चस्पां करते हैं,आज किसी लिंक से मैं यहाँ तक पहुंचा तो भूतनाथ जी की दो रचनाएं शीर्षक बदल दानिश नाम से पोस्टेड दिखायीं दीं...और देखा तो "अर्श" साहब की रचनाएं भी इसी तरह उनके नाम पर चस्पां मिलीं....तो हम तो भईया चकिते हो गए...चकिते माने हतप्रभ....मने आश्चर्यचकित....माने अब और माने क्या बताऊँ....अब ऐसे भाई साहब का का करना चाहिए....सो फैसला आप ही करें....!!
यहाँ
और यहाँ




)
कुछ दिन पूर्व एक अजीब धर्मसंकट आन खड़ा हुआ अंकित की गयी कविता को मैंने बचपन में अपनी पाठ्य पुस्तक में पढ़ा है, यह तथ्य है और यह ११०% सही है, किन्तु मुझे इसके रचयिता का नाम स्मरण नहीं हो रहा. शिल्प वा कथ्य से यह रचना माखनलाल चतुर्वेदी जी, दिनकर जी या रघुवीरशरण मित्र जी की लगती है, किन्तु इस रचना को अपने नाम से छपने वाले व्यक्ति का जब विरोध किया तो तो उसने दबंगता से इसे अपनी रचना बताया. मेरे साथ दुर्भाग्य यह कि मुझे कवि का नाम स्मरण नहीं. वागर्थ पर सहायता की अपील भी निकाली किन्तु हिमांशु जी द्वारा सहयोगात्मक रुख के अतिरिक्त ( उन्हें ऐसा अनुमान है कि रचना मैथिली शरण गुप्त जी की है) किसी से कोई समाधान न मिला. आप में से किसी ने इस रचना को पढ़ा हो तो कृपया इतनी ही कम से कम पुष्टि करें कि किसी की पढ़ी हुई है अथवा नहीं. यदि कोई इसके रचयिता कवि का ही नाम बता सकें तो बहुत कृपा होगी.


जो जितना देता है जग में , उतना ही वह पाता है |


यह संसार बहुत सुंदर है ,
यह अपना सपनों का घर है ,
यहाँ कन्हैया रास रचाता ,
यहाँ गूंजता वंशी - स्वर है |
सत्यम् शिवम् सुन्दरम वाली ,
यह धरती सबकी माता है |


गंगा - यमुना के प्रवाह में ,
पाप सभी के धुल जाते हैं ,
यहाँ धर्म - मजहब के नाते ,
ख़ुशी - ख़ुशी से निभ जाते हैं |
अनुपम यहाँ प्रकृति की शोभा ,
सबके ह्रदय विरम जाते हैं |

ढाई आखर प्रेम की भाषा ,
बन जाती अपनी परिभाषा ,
यहाँ निराशा नहीं फटकती ,
यहाँ रंगोली रचती आशा |
सुंदर उपवन जैसा भारत ,
सबके मन को हर्षाता है |


सावन में हैं झूले पड़ते ,
होली में मृदंग हैं बजते ,
तुलसी यहाँ राम - गुण गाते ,
और कबीरा निगुण कहाते |
इस माटी का तिलक लगाओ ,
माटी से सबका नाता है |


जो जितना देता है जग में ,
उतना ही वह पाता है।



कृपया ध्यान से इसे देखें व इस बात का स्मरण रखें कि कोई आपसे आशा लगाए बैठा है. उपकार होगा.


आज की चर्चा इतनी ही. अब विदा लेती हूँ.

आपका सप्ताह आत्मीयों के साथ कुशल मंगल बीते. नित नए लेखन से आप हिन्दी के रचना संसार को समृद्ध करें.

आमीन !!!



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18 टिप्‍पणियां:

  1. हिन्दू गाली गान पोस्ट और टिप्पणी के उद्धरण अच्छे लगे ! एक नहीं दो दो टिप्पणियाँ मैंने भी की थी ,आपने देखा ही होगा !

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  2. हम ऐसे मसलों पर मौन वृत रखते हैं...!

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  3. सुंदर, बहुत सुंदर और संपूर्ण चर्चा।

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  4. बहुत बढ़िया चर्चा.

    पोस्ट पढ़ने के लिए ई- मेल करने की ज़रुरत ख़त्म हो जानी चाहिए. मेरा मानना है कि जो अच्छा लिखते हैं, उन्हें यह करने की ज़रुरत नहीं पड़नी चाहिए. दूसरी बात हममें से न जाने कितने यह कहते पाए जाते हैं कि; "हम तो स्वांत सुखाय लिखते हैं."

    जब यही बात है तो ई-मेल भेजने की ज़रुरत क्या है?

    ब्लागर्स के पोस्ट की चोरी दूसरा ब्लॉगर करता है, इससे घटिया बात और कुछ नहीं हो सकती. लेखक/कवि/शायर कहलाने की इतनी भी क्या इच्छा कि दूसरों की रचनाएँ अपने ब्लॉग पर टाइप कर उसे अपना बता डालें?

    वृहस्पतिवार को चिट्ठाचर्चा में किये गए अपने कमेन्ट में डॉक्टर अमर कुमार जी ने एक लिंक दिया था. वैसे तो कमेन्ट में उद्धृत अंश ही इतना बड़ा था कि उसे ही पढ़कर पता चल गया कि परसाई जी का लेख था. लेकिन जब लिंक के सहारे ब्लॉग पर पहुंचा तो यह देखकर हैरान रह गया कि परसाई जी का कहीं नाम ही नहीं था. ब्लॉगर, जो कि बहुत पुराने ब्लॉगर हैं, ने 'सुदामा के चावल' को अपना सपना बताकर टाइप कर मारा था. दुःख तो तब हुआ जब उन्होंने पोस्ट हटा दी. मैं पूछता हूँ कि इतनी मेहनत करके टाइप किया तो हटाने की क्या ज़रुरत थी? बस केवल इतना ही तो करना था कि लेखक के नाम के आगे परसाई जी का नाम लिख देना था--हरिशंकर परसाई. बस.

    लेकिन शायद फिर सपना टूट जाता न. लेखक कहलाने का सपना.

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  5. kavita ji,aaj ki charcha padh kar bahut aacha laga, aapne behad jaroory mudde uthaye hain.

    email wali baat par shiv ji se sahmat hoon, gmail me block karne ka option hi nahin hai.
    sudama katha maine bhi padhi thi...bahut baar lekhakon ke naam yaad nahi hone ke karan seedhe ungli uthana mushkil ho jaata hai.

    aapne jis kavita ke bare me kaha hai, mujhe bhi lag raha hai ki maine padhi hai, naam pata chalne par jaroor bataungi

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  6. कृपया चर्चा की इस पंक्ति को

    -" बशर्ते कि चर्चित होने का अधूरा नुस्खा अपना कर काम और देह या सेक्स और यौन वाली शब्दावली के प्रयोग से अपना घोडा हाँकें)."

    निम्नलिखित रूप में पढें -

    "बशर्ते कि चर्चित होने का अधूरा नुस्खा अपना कर काम और देह या सेक्स और यौन वाली शब्दावली के प्रयोग से अपना घोड़ा न हाँकें)."

    असुविधा के लिए खेद है. धन्यवाद.

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  7. जब आहट से इतनी गर्मी आ गयी, तो आमद क्या रंग लाएगी।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  8. आज भी एक दो लोग थोडा सा स्टाइल में फेर बदल कर पोस्ट को बेशर्मी से उठा रहे है ...मौलिकता की कमी हिंदी ब्लोगिंग में ज्यादा ही है.....

    रही सचिदानंद जी कविता कुछ दिनों पहले विभा जी द्वारा अपने स्तर पर इसी कविता की समीक्षा की गयी थी .जो छम्मकछल्लो नमक ब्लॉग चलाती है ..शायद तब लोगो द्वारा नजर में नहीं आयी थी ...
    मैंने वही अपनी प्रतिक्रिया दे दी थी...तब किसी सज्जन ने उस पर भी एक पोस्ट लिखी थी.....

    आखिर में एक ओर बात .आज एक ओर नामचीन ब्लोगर को आत्म प्रचार का तरीका इस्तेमाल करते देख दुःख हुआ .मै उन्हें थोडा बेहतर समझता था .....

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  9. बहुत सारगर्भित और सटीक चर्चा.

    रामराम.

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  10. बहुत अच्छी चर्चा है।

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  11. मैं अभी भी कविता जी द्वारा उल्लिखित कविता के रचयिता का नाम तलाश रहा हूँ ।
    चर्चा के लिये आभार ।

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  12. मेरे ईमेल में एक spam बटन (चैट के ignor जैसा) भी है, इसका प्रयोग मैं खुले दिल से करता हूँ..
    दूसरे, ये सफ़ेद हाथी बहुत ही ज़हीन किस्म के लोग होते हैं..जो तालिबान के देश में हिन्दू बनकर जीने की त्रासदी रोज़ झेलते हैं.

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  13. रूढ़िमुक्त , स्वस्थ और विचारोत्तेजक चर्चा पर अभिनन्दन!

    आत्मप्रचार को विज्ञापन युग का मूल्य मानकर ज़बरदस्ती दूसरों के दरवाज़े अपनी रचनाओं का कूड़ा ठेलना किस प्रकार आत्मघाती सिद्ध हो सकता है, यह इस चर्चा से समझ में आ गया.

    टिप्पणियों का लेन-देन भी मुनाफा कमाने के लिए किया जाता है ,यह स्थापना भी सोलह आने सही है, अनुभवाश्रित है.

    जो भी बहसें इधर ब्लोग्स के माध्यम से सामने आई हैं, उनमें से अधिकतर को पढ़कर यह लगता है कि अहंकारियों का वाकयुद्ध चल रहा है. इस वाकयुद्ध की एक परम विशेषता शब्दों का अपव्यय है ; वर्बल डायोरिया. इसलिए ऐसे दंगलों से कन्नी काट कर निकल जाना अच्छा लगता है. बहुत जल्दी यह स्थिति आने वाली है कि ब्लॉगर पाठकों के लिए तरस जाएँगे.

    अश्लीलता का प्रश्न विचारणीय है; ऐसे प्रश्न का अपना औचित्य भी.

    चोर सदा रहे हैं , यह सच है. पर पुलिस भी हमेशा रही है , यह भी सच है. चोरों की दबंगई उन्हें शाह साबित नहीं कर सकती.हाँ, विनम्रता से सत्य स्वीकारने से किसी की हेठी नहीं होती.

    चर्चा का शीर्षक पर्याप्त संकेतपूर्ण है.

    उत्तर देंहटाएं
  14. आज की चर्चा बहुत अच्छी कही
    सुन्दर चर्चा के लिए हार्दिक बधाई
    वीनस केसरी

    उत्तर देंहटाएं
  15. जबरियन पढ़वाने वाले धन्य हैं। रोज कई लोग पूरी श्रद्धा से अपनी पोस्ट का लिंक भेज देते हैं मेल से। चोरी-चकारी भी चलती रहती है। बहस-मुबाहिसा भी चल ही रहा है। आपने चर्चा में सही बातें उठाईं। बधाई!

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  16. साथियों को ईमेल द्वारा प्रचार सामग्री भेजने की यह गुस्ताखी इस चिट्ठे द्वारा पहली बार हुई है. यह आदतन नहीं है बस प्रचार में पिछड़ने के डर से काहिली में किया काम था. लेकिन यह एक शोर्ट कट और आसन तरीका था जो इस चिट्ठे की सेहत और पालिसी के लिहाज से भी ठीक नहीं है. आपकी यह बात तो दिल को ही छू गई कि

    "अब दूसरों का पढ़ो का अर्थ टिप्पणी का प्रतिसाद पाने की वांछा अपने या उसके भीतर जगाने की होड़ का स्वार्थ उत्पन्न करना नहीं है। उल्टे आज आवश्यकता है कि ऐसी उलटबाँसियों को हतोत्साहित किया जाए जो "अहो रूपं अहो ध्वनि: " कह कर परस्पर अनुशंसा के बहाने मित्रों में इस आत्मघाती वृत्ति को पनपने में सहयोग दे रहे हैं।"

    सभी सम्बंधित ब्लॉगर भाईयों और बहनों से क्षमा याचना और साथ ही भविष्य में इस प्रकार की प्रचार सामग्री किसी भी साथी को न भेजने का वायदा रहा. हाँ , आपातकालीन ज़रूरतों के लिए ईमेल भेजी जा सकती है इस लिए कविता जी, अपने स्पैम बटन से अभी इस चिट्ठे को ब्लैक लिस्ट में न डालने की नम्र याचिका स्वीकार करें.

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  17. पहली बात जो बहुत दिन से कहना चाहती हूँ कि आप की चर्चा बहुत अच्छी और सारमय होती है।

    ये सारे मुद्दे कितने दिन से मन में आते हैं। कितने ही लग हैं जो कुछ भी लिख रहे हैं और चर्चित ब्लॉगर भी उन्हे वाह वाह कह रहे हैं। एख ब्लॉग पर तो किशोरों द्वारा अक्सर प्रयुक्त मैसेज ही लिखे जा रहे हैं और सब ३० ३५ टिप्पणियाँ उनकी मौलिकता की प्रशंसा करते हुए आ रही है। और वो लोग जो खुद को बुद्धजीवी मानते हैं। कितने ही उनके फालोवर है और कितनो ही की वे..! खूब प्रशंसा कीजिये खूब मनोबल बढ़ाईये मगर यूँ खिलवाड़ कर के। कितने ही समझदार लोग इस टिप्पणी के व्यवहार के चक्कर में आ गये हैं। कुछ भी लिखा हो कहीं भी लिखा हो। टिप्पणी पानी है तो करनी भी है।

    और अपनी टिप्पनी के साथ जो अपना लिंक देते हैं या बार बार आने का न्यौता देते हैं या मेल की संख्या बढ़ाते हैं उनसे आज यहीं पर कहना चाहती हूँ कि वे कई बार अच्छा भी लिखते हैं तो वहाँ जाने से अनिच्छा सी होने लगती है..!

    एक सही बिंदु पर चर्चा करने हेतु मेरा धन्यवाद....!

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