शुक्रवार, जून 12, 2009

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मे हमारी पंक्चर जोडाई माने आज की चिट्ठा चर्चा

बचपन मे हम एक खेल खेला करते थे- कानाफूसी । इस खेल मे बच्चे गोल दायरे मे बैठ जाते हैं , एक बच्चा बगल वाले बच्चे के कान मे कोई बात या शब्द फुसफुसाता है , फिर बगल वाला बच्चा अपने बगल वाले बच्चे के कान मे वही शब्द फुसस्फुसाता है ...इसी तरह शब्द आगे चलता जाता है और जब तक पहले बच्चे ,जिसने शब्द कान मे फूंका था , तक पहुँचता है उसका स्वरूप इतना परिवर्तित हो चुका होता है कि यह सभी के लिए मज़े का खेल बन जाता है।
जब अली अपने ब्लॉग पर पंक्चर जोडाई की मानवीय प्रवृत्ति के बारे मे बात करते हैं तो सहसा मुझे यही कानाफूसी का खेल याद आ जाता है।
ईश्वर है या नही यह भी बहस का एक विषय है , पर फिलहाल इस दुनिया मे ईश्वर के नाम पर होने वाले धरम -करम {?} देखकर यह सोचे बिना नही रहा जाता कि ईश्वर नौसिखिया है या खून का प्यासा? उसने जो भी किया,जैसे भी किया उसका अलग अलग वर्ज़न मे बखान दीन धरमो मे मिल जाता है मय पंक्चर जोडाई के :) यह वाकई विचित्र है कि इनसान बिना पंक्चर जोडाई के एक भी बात को यहाँ से वहाँ सम्प्रेषित नही कर सकता।साहित्य का इतिहास पढते हुए बताया जाता था कि चन्दबरदाई के प्रसिद्ध "पृथ्वीराज रासो " मे ऐसे ही कईं क्षेपक (पंक्चर) जोड़े गए हैं। तुलसी दास के रामचरित मानस मे से जिस दोहे को बार बार उद्धृत करके उन्हे स्त्री विरोधी और दलित विरोधी व व्य्वस्था पोषक कहा जाता है , वह भी सुना है कि दर असल एक क्षेपक ही है।
बहुत बड़ी बड़ी बातें क्यों की जाएँ - अपने घर मे ही देखा जाए।एक व्यक्ति की कही बात दूसरे तक बिना पंक्चर लगाए नही पहुँचती।खेल खेल मे बच्चों की टक्कर हो जाए तो चोट खाया बच्चा आकत्र शिकायत लगाता है कि - उसने मुझे मारा ! लग जाने मे और मारा मे कितना फर्क है , फिर भी, यह पंक्चर जोडाई का कमाल से दूसरे बच्चे की पिटाई करवा सकता है।
मीडिया भी इस पंक्चर जोडाई मे माहिर है बहुत। आप के मुख से निकले शब्द - वाक्य क्या क्या क्षेपक लग ने के बाद टी वी के पर्दे पर आयेंगे आप स्वयम भी नही जानते।
खैर , यह हमे भी स्पष्ट हुआ कि इस दुनिया मे क्या क्यों कैसे है के जवाब मे बनी सभी कहानियाँ, जनश्रुतियाँ , लोककथाएँ मानवीय पंक्चर जोडाई का कमाल हैं...........अली की बात मे मै यह भी जोड़ना चाहूंगी कि लिखित इतिहास भी दर असल मानवीय पंक्चर जोडाई का कमाल हैं।भारत की गुलामी और आज़ादी के कहानी जब कोई भारतीय लिखेगा तो वह उस फिल्म "सज़ाए कालापानी" जैसी होगी। लेकिन सोचिए कि जब यही इतिहास कोई ब्रिटिश इतिहास कार लिखेगा तो उसका संस्करण क्या ऐसा ही होगा कि आप उसे पढकर ब्रिटिशर्स के प्रति घृणा से भर उठें?
अली की इस बात का क्या जवाब हो सकता है कि यह पंक्चर जोडाई मासूमियत है या शातिरपना ?
मुझे नहे लगता कि यह मासूमियत है । यह निश्चित ही शातिरपना है।मनुष्य जानवर से बहुत अलग है।वह अपने कृत्यों को औचित्यपूर्ण ठहराना जानता है।यहाँ तक कि वह ईश्वर के कृत्यों को भी अपने हक मे व्याख्यायित करना जानता है।समस्त व्यवस्था इसी पंक्चर जोडाई पर खड़ी है इसलिए व्यवस्था के रखवाले कभी नही चाहते कि इन पंक्चरों की हकीकत तक पहुँचे।इन व्याख्याओं की असलियत को उघाड-उघाड़ कर रख दे।वह ज़रूर बागी कहलाता है।सोचने की बात है कि यह समय बागी होने का ही समय है या पिछले पंक्चरों की तरह अपने नए पंक्चर जोड़ते चले जाने और अपना काम निकालने का है?
कमाल की बात यह है इसी पंक्चर जोडाई को आप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम भी दे सकते हैं और अगत्र अपने इस हुनर का इस्तेमाल मै भी करूं तो सारे ब्लॉग दर असल पंक्चर जोडाई ही कर रहे हैं।अपने समय के सच मे अपने हिस्से की सच्चाई का पैबन्द लगा रहे हैं।इसे ही बखानते हुए शिवकुमार मिश्र लिखते हैं -
हम ब्लॉगर लोग आम आदमी हैं. इसलिए ब्लॉग लिखते हैं. आते-जाते जो कुछ भी देखते हैं, टांक देते हैं ब्लॉग पर. ई ससुर गूगल ने सर्वर क्या दिया हमारी तो खिल गईं. अरे मैं बाँछों की बात कर रहा हूँ. खिल गईं. एक आईडी क्रीयेट किये और शुरू हो गए. क्या-क्या नहीं लिख डाला. वर्ण व्यवस्था कब ख़तम होगी? किसान काहे आत्महत्या कर रहा है? महिला आरक्षण को लेकर इतना हंगामा क्यों है? कसाब अपना बयान काहे बदल दिया? हम सेकुलर हैं, तो तुम कम्यूनल काहे हो? साध्वी प्रज्ञा के साथ इतनी बदसलूकी काहे हो रही है?.........हम जब न्याय-व्यवस्था पर लिखेंगे तो एक आम आदमी की धारणा लिए लिखेंगे. हमें तो केवल इतना पता है कि अदालतें न जाने कितने वर्षों से चल रहे न जाने कितने मुकदमें निबटा नहीं पा रही. क्यों नहीं निबटा पा रही, उसपर दिया जलाकर रौशनी दिखाना ख़ास लोगों का काम है............
धोनी और सहवाग का मनमुटाव हो या कसाब मुद्दे पर मीडिया (साहसिक पत्रकारिता ) और सरकार का नज़रिया और लाइन ऑफ एक्शन या फिर आदर्शवादियों के लिए यह सन्देस कि वही उपदेश दें जो आप खुद भी कर सकें ....यह सभी कुछ पंक्चर जोडाई के नमूने ही हैं।
मेरा कहना कतई यह नही कि यह होना नही चाहिए आखिर हम भी कभी ब्लॉग लिखा करते थे और पंक्चर जोडाई तो अब भी कर ही रहे हैं दूसरों की अभिव्यक्ति पर अपने नज़रिए का टीका लगा के :) सो माना जाए कि कोई भी एक स्टेट मेंट कोई भी एक बात अंतिम नही होती उसमे हमेशा एक अन्य नज़रिए या कहूँ एक पंक्चर की गुंजाइश बनी रहती है। सो यह भी साबित माना जा सकता है कि सम्पूर्ण मै ही जानता हूँ या जो मैने जान लिया सत्य बस उतना ही है ... यह भी मूर्खता ही है। सच कहे तो इसी लिए हम कभी किसी ओशो ,आसाराम या आनंदमयी मूर्ति से प्रभावित नही हो सके।उपदेश लेने और देने वाले को पंक्चर की लिमिटेशंस के बारे मे पता रहना चाहिए :)

सुजाता

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12 टिप्‍पणियां:

  1. आपने तो पूरा पंक्चर बना दिया. :)

    स्माइली भी पंक्चर को ढांपने के काम में माहिर है.... :)

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  2. आपका आलेख चिंतन परक है ! मुझे 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' की संज्ञा काफी शालीन लगती है ,मैं इसमें 'छल' शब्द जोड़ना पसंद करूंगा !

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  3. कमरे में बंद हो कर कुछ भी किया जा सकता है। लेकिन जब बाहर हों तो कपड़े तो पहनने पड़ेंगे?

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  4. लेखों का अच्छा चुनाव.. बधाई..

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  5. आज सुबह मेजर गौतम की पोस्ट पढने के बाद मन अजीब सा हो गया .था .. किसी ब्लॉग को पढने की इच्छा नहीं हुई थी .
    शाम को दुबारा आया ...आपकी चर्चा पढ़ी..पंक्चर जोड़ना .हाँ यही तो कर रहे है हम सब ...पर क्या हम सभी वाकई वही अभिव्यक्त कर रहे है जो हमारे भीतर है ?दरअसल हम सब के पास एक फिल्टर होता है ,मायूसियों ओर ना-उम्मीदों को फिल्टर करते करते जब हम सहूलियत की दहलीज़ पर पहुँच जाते है तब हम केवल एक ही चीज़ फिल्टर करते है ...असहमति ..हम सिर्फ़ वही देखना सुनना चाहते है जो हमारे मुताबिक है......हम भले ही कितने बुद्दिजीवी हो अहम् की दहलीज़ पे आकर सब एक सामान हो जाते है ......व्यवहारिक लोग तटस्थता का दामन पकड़ते है या खामोशी का ..मीडिया भी समाज के लोगो से बना है तो फिर वो अलग कैसे हो सकता है ...असवेदनाशीलता अब इस समाज में तरक्की का पहला नियम है ....इस इश्तेहारी ज़माने में मीडिया एक बड़ी ताकत है ....ओर मीडिया को इस ताकत पे गरूर भी है .....भले ही वो इसे सार्वजनिक तौर पे स्वीकारे या न स्वीकारे .... पर मीडिया ओर हर इन्सान की अपनी अपनी जरूरते है जो वक़्त ओर हालात के मुताबिक बदलती रहती है...बाईट की छटपटाहट इतनी ज्यादा है कि अब सच के ढेर में से हर इंसान सिर्फ़ अपने हिस्से का सच उठाता है ओर बाकी छोड़ देता है ,उस ढेर में बचे खुचे ऐसे कितने सच आपस में इतने गड मड हो जाते है की झूठ से लगने लगते है
    इन्सान अब इतना ज्यादा समझदार या चालाक हो गया है की आइनों को भी धोखा देने का हुनर रखने लगा है ...

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  6. डा० अनुराग की बात में दम है,
    असहमति का कोई स्थान नहीं है, या फिर आप बवाले ए ज़ान के लिये तैयार रहें ।
    यह एक मज़ाक नहीं तो क्या है.. आप टिप्पणियों के लिये बेताब हो और टिप्पणी मिलने पर स्वीकृति देने की बात करते हो !
    अब तो मैं टिप्पणियाँ भी यदा कदा देता हूँ, कहाँ तक पँक्चर जोड़ता फिरूँ ?

    @ दिनेशराय जी :
    बात तो आपकी सवा सोलह आने ठीक है, पर ?
    यदि ब्लागिंग में बाहर की बातों को बँद कमरे में पर्त दर पर्त उधेड कर देखने और लिखने की ज़रूरत का क्या किया जाय ?
    मीडिया तो पहले से ही बेईमान है, पर सनसनी की शर्त पर ईमानदार भी है । किसी तानाशाही राज्य में, क्या कोई ज़ूता-फ़िंकाई का कवरेज़ देख सकता था ? शायद किसी को कानों कान ख़बर भी न होती या ऎसे तत्वों को अवाँछित करार देकर गुम कर दिया जाता । सो, पँक्चर महिमा अपरँपार है.. नेतृत्व सहित पूरा का पूरा भारतीय जनमानस एक दूसरे का पँक्चर जोड़ कर न जाने किसको ठग रहा है ?

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  7. नयी बात सी है यह पंक्चर जुड़ाई। कम्न्युकेशन गैप और पंक्चर जुड़ाई एक ही चीज हो गयी। वहां दूरी बढ़ती है यहां कम होती है। अच्छा लगा इस चर्चा को पढ़ना। सुन्दर।

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  8. पंचर या पंक्चर जुडाई मे भी बहुत बदलाव आये हैं।ये सबसे एडवांस है सोल्यूशन वाला।

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  9. 'मुद्दे पर चिंतन के लिए आभार'

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  10. आज की चर्चा के इंतज़ार में.....

    वीनस केसरी

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